Friday, 7 December 2012

 अंत, अंत हे गर्दनीबाग !

विकास की भेंट  चढ़ते अनेक इलाकों में से एक का आर्तनाद.... 

 1912 में अलग बिहार राज्य बनने के बाद सचिवालय  बना  और वर्ग-2 अधीनस्थ ,वर्ग-3 तथा वर्ग-4 कर्मचारियों के लिए एक  सुन्दर और व्यवस्थित आवासीय कॉलोनी बनाई  गयी हावरा-दिल्ली रेल लाइन के दक्खिन गर्दनीबाग में। लाइन के उत्तर में साहब  लोग बसाये गए जो आज भी आबाद हैं हार्डिंग रोड और उसके  आस-पास। यह इलाका खूब हरा-भरा  और शहर से लगा हुआ है। धीरे -धीरे रखरखाव के अभाव में ,साथ ही  अतिक्रमण के कारण गर्दनीबाग़ का बड़ा  हिस्सा आज बुरी अवस्था  में है।
गर्दनीबाग़ के नवनिर्माण की योजना बनी है जिस से पुराने मोहल्ले का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। इसका
'हेरिटेज कॉलोनी ' के रूप में जीर्णोद्धार हो सकता है जो एक खूबसूरत बात होती .लेकिन विकास के पैरोकारों को यह बात 'सूट' नहीं करती।
साल भर की उम्र से लेकर बाइस साल तक मैं गर्दनीबाग के एक क्वार्टर में रहा। आज भी मुझे वहीँ के सपने आते हैं।
तो यह कविता देखिये : "अंत , अंत हे गर्दनीबाग !"   विकास की भेंट  चढ़ते अनेक इलाकों में से एक का आर्तनाद.... 

 अंत, अंत हे गर्दनीबाग!
                                                                                                                -शिवदयाल

इस वसंत
      अंतिम बार फुलाया है सेमल
      सुग्गों-कठफोड़वों की
      अंतिम चहचहाहट है यह
      सेमल के फूलों की लाल-लाल
       लहलहाहट में
       कैसे लहालोट हो रहे हैं पंछी -
       अंतिम बार, अंतिम बार!

पुटुस की झाड़ियों की
      खटतूरस गंध
      अब हमेशा -हमेशा के लिए
      शेष होने वाली है
      न मालूम
      रंगबदलू गिरगिटान
      अब कहाँ ठौर पाएँगे
      किस देश जाएँगी
      उधेड़बुन में दौड़ लगातीं,
      एक-दूसरे को छकातीं
      ढीठ गिलहरियाँ

अबकी गर्मी तक
     सिरफल वृक्षों को
     अपनी उदारता दिखाने का
     मौका शायद ही मिले
     लू के थपेड़ों से जूझती टिटिहरी
     थक कर किस डाल बैठेगी
     कौन जानता है

ऊँची घास के नम घेरों में
     चें-चें करतीं, जाने क्या सहेजतीं
     खोजतीं-बीनतीं
     पनमुर्गियों का विहार
     अंतिम बार!

कसैले नीम के नन्हें फूलों पर
     मँडराती मधुमक्खियों और
     अमलतास के स्वर्ण-पुष्पों का
     पराग लूटते मदमस्त भौरों का गुँजन
     बस अंतिम बार!

  गोधूलि में
     बूढ़े पीपल पर
     कौओं की यह अंतिम पंचायत!
     चैत-बैसाख की धूप-हवा में पकीं
     कँटीली फुनगियों से लटकती
     गुलाबी, लच्छेदार जलेबियों की
     खग-वृन्द की यह अंतिम दावत!

आम के पत्तों-पल्लवों से
     ढँके-छिपे प्रणयातुर पंडुक
     निकलने वाले हैं
     अंतहीन प्रवास पर
     जाने किस दिशा  में

अगली बार
    अचरज और शोक से देखेंगे
    आसमान में चक्कर काटते
    नई-नई व्यूह रचनाओं का संधान करते
    सुंदर-सजीले बगुले -
    यह वही जगह तो नहीं
    जहाँ पाँख खुजाते, सुखाते
    सुस्ताते और ध्यान लगाते
    बिताया था चातुर्मास

बाल-बच्चों को संग ले
    इस ढूह से उस ढूह घूमते
    रुक-रुक कर मुँह उठाते
    अपनी ही दुनिया को पुनः-पुनः
    देखते-आँकते
    नेवलों की यह अंतिम तफरीह

कहीं कुछ ऊबड़-खाबड़ नहीं
    सब समतल हो जाने वाला है
    अबकी बारिश  में जगह-जगह
    नहीं जमा होंगे पानी के चहबच्चे
    जिनमें अपनी छवि देखने को
    बार-बार उद्धत हो
    झुण्डों में घूमती
    अपनी लंबी पूँछ के भार से दबी जाती
    पुँछल्ली ड्रैगनफ्लाई

अगली बरसात में
    धरती की कोख में ही दुबके रहेंगे
    शरीफ-शीलवान ढाबुस-दादुर
    उनका यह अंतिम मेघ -मल्हार

अपने में खोई कोलतार की
     सूनी सड़कों का एकाकीपन
     चौड़े में जमे गो कि झडे़, उधड़े
     बाबुओं के क्वार्टरों का
     डूबती नब्जों के बीच आत्मालाप
     जिनकी स्मृतियों में अभी जीवित हैं
     अंग्रेज बहादुर और लोहा सिंह
    -यह छोटी होती दुनिया में
     ऊँचे पेड़ों की गरिमा
    -यह सिकुड़ते स्पेस में
     खुले में रहने की जीवटता -
     सब अंत को संक्रमित

राजकुमार की
    चाय की दुकान पर
    चाय की यह रसीली अंतिम घूँट
    आँखों में पानी ला देती
    कड़ाही में तली जाती कचरी की
    यह अंतिम झाँस

जिन्होंने अपनी बुभुक्षा
    और लिप्सा में इस वसुंधरा को
    माता से भोग्या बना दिया
    सब कुछ रौंदता
    अपने घर्घर नाद में
    आर्त पुकारों को सोखता जाता
    ‘नई’, दौलतमंद दुनिया की
    जमीन तैयार करता उनका विकास-रथ
    अब गर्दनीबाग के सीवान तक आ पहुँचा है

अपनी मिट्टी
      हवा, धूप और आकाश
      अपने खग-विहग, जीव-जंतु
      अपनी हरीतिमा और विश्रान्ति
      अपनी खुषबू और फैल
      सुंदरता, कोमलता और नैसर्गिक मोहकता
      अपनी संपन्नता और पूरेपन के साथ
      उत्सर्ग को तैयार है
      गर्दनीबाग -
      जीवन की बहुतेरी छवियों,
      कोमल आहटों और गुंजारों से स्पंदित
      एक मोहल्ला जो बदकिस्मती से
     ‘बेशकीमती जमीन’ पर आबाद है

जिनके देह लगी हो इसकी माटी
     जिनके नासापुटों में बसी हो हरी घास की महक
     जिनका रहा हो यह क्रीड़ांगन
     यहाँ से गुजरते
     ठंडी छुअन से भरा हो
     जिनका जला हुआ मन

जो भुतहा बहेड़ा के नीचे से
     कभी डर कर गुजरे हों
     झड़बेरी और करौंदे की काँटेदार टहनियों से
     जिनकी आस्तीनें छिली हों

जिनके सपनों में आया हो
     बहुरुपिया - कच्चे खाँव
     जो भागे हों फेरी वाले की
     उस आवाज के पीेछे -
     एक पैसे में दो बटन, सिन्दू ऽ ऽ र ऽ ऽ ..   
     जो कभी भय तो कभी जुगुप्सा से
     साधुओं-सँपेरों-फकीरों का चुपके-चुपके
     पीछा करते रहे हों

  जो टमटम की सवारी का मजा लूटते
      घोड़े की पीठ पर पड़ते चाबुक से
      कभी खुद भी दहले हों
      गहन रात्रि में
      टीसन से खाली लौटते
      ताड़ी के नशे में
      सातवें सुर में अलाप लगाते
      टमटम वाले की तान और उस पर
      ताल बैठाते घोड़े की लयबद्ध टापों से
      जिनकी नींद उचटी हो

चितकोहरा पड़ाव पर
      खाली-खाली-सी दोपहरियों में
     अपने खोखे में
     बीड़ियाँ बनाते, बाँधते, सेंकते
     किसी वीतरागी से नसीब मियाँ को
     शाम की कव्वाली में सुर उठाते देख
     जो विस्मित रह गए हों

जिन्होंने यहीं देखी थी कोई छब
     और हमेशा  के लिए खुद को
     रख-छोड़ आए थे यहीं
     सुनते रहे थे जो रात की निविड़ता में
     छायागीत और बिनाका गीतमाला
     जो रोए थे चुपके-चुपके
     जिनकी रह गई बहुत कुछ अनकही

जिन्होंने यहीं की सड़कों पर
        मुट्ठी तानना सीखा था
        जिन्होंने यहीं,
        ठीक यहीं से देखनी शुरू की थी दुनिया
        जिनके केश सन के खेत हुए
        यहीं की धूप में
        जो यहीं से खो जाना चाहते हैं
        बहुत नीले आसमान की निस्सीमता में
        जिनके लिए शुरू होती है
        अनंत की यात्रा यहीं से
  
 उन्हें, उन सबको
        गर्दनीबाग का
       अंतिम प्रणाम्!


(जनसत्ता वार्षिक अंक 2012 में प्रकाशित।)


       

Sunday, 25 November 2012

खरीदारी
                  -शिवदयाल 


डिपार्टमेंटल स्टोर में
आइटम पसंद आ जाने पर
उन्होंने सेल्समैन को
आदेश  दिया - पैक कर दो !

काउंटर पर
पर्स हाथ में ले
उन्होंने मैनेजर से पूछा -
हाउ मच ?

पेमेंट रिसीव कर
मैनेजर ने जब ‘थैक्स’ कहा
तो मचलते हुए सामान उठाए
वे बाहर निकल आए।

लौटते हुए
उन्होंने खरीदी तरकारी
और मोल-भाव कर
डेढ़ रुपए की बचत कर ली
साथ में गंदे नोटों के लिए
सब्जी वाले को धिक्कारा ।

ऐन गली के नुक्कड़ पर
लड़के से फी दर्जन अंडों पर
अठन्नी कम कराकर
इतराते हुए घर आ गए।

उस दिन
ऐसे की उन्होंने खरीदारी
छोटे मुनाफों में की हिस्सेदारी
और खुश  हुए !

Monday, 12 November 2012

मेरा दीया पथ आलोकित करे तुम्हारा 
और हरे कुछ तमस अंतर का .....          
                                                            !! शुभ दीपावली !!


Thursday, 8 November 2012

कहानी                                                            दायरा 
                                                                                                                                          - शिवदयाल



आज तीसरा दिन है। न वो कॉलेज आई न उसका कोई फोन ही आया। वही बात है। और कोई बात हो नहीं सकती। पहले कभी ऐसा नहीं हुआ पिछले दो सालों में। लगभग हर दिन अगर मुलाकात नहीं हुई तो बात जरूर हुई। आज यह एकदम से क्या हो गया!
वही बात है! शीरीं का मन बुझ गया। आँखें भर आईं। उसकी ऐसी कोई सहेली आज तक नहीं हुई, सुरभि जैसी। लेकिन इन कम्बख्तों के चलते उसकी ये खूबसूरत दोस्ती भी गई। अब वह किसे अपना कहे। यह सवाल पिछले पाँच-छह सालों से उसे कदम-कदम पर चिढ़ाता रहा है -  तुम्हारा कौन है? कौन है तुम्हारा अपना? फिर मिली सुरभि, यानी महक, और उसकी जिन्दगी में खुशबू फैल गई। पहले सुरभि अपनी हुई, फिर सुरभि की जो चीजें अपनी थीं वे भी  जैसे उसकी उतनी ही अपनी होती गईं। जिन्दगी जैसे फैल कर बड़ी हो गई।

धमाका 18 को हुआ, सत्तर के करीब लोग मारे गए, जख्मी भी हुए बहुत सारे लोग। उस दिन सुबह उससे बात हुई थी मोबाइल पर कि वह कॉलेज नहीं आ रही, उसे कहीं जाना है। तब उसने भी कॉलेज का प्रोग्राम ड्राप कर दिया। और उसके बाद से आज यह तीसरा दिन है।
हर धमाका जैसे वजूद को हिला देता है। घर में भी यकायक एक सहमी हुई चुप्पी पसर जाती हैं। ‘‘लो आज फिर ---, या खुदा ---’’ गुस्से और बेबसी में पापा की जुबान से यही कुछ निकलता है। एक अनजाना डर जैसे पूरे घर को जकड़ लेता है। मम्मी सख्त ताकीद करती है, पहले पापा को फिर  मुझे, फिर  जावेद को, कि घर से बाहर जरूरत होने पर ही निकला जाए और हर एहतियात बरती जाए। पापा माहौल को हल्का करने की गरज से मम्मी को चिढ़ाते हैं  -  ‘ऐसा फरमान जारी करते हुए तुम बकरे की अम्मा जैसी हो जाती हो। लेकिन वह खैर मनाती होगी और तुम सबको होशियार करती हो।’ लेकिन पापा का यह मजाक दिल में नश्तर की तरह चुभता है। मतलब वाकई हम सब ---!
‘‘पापा हम माइनॉरिटी क्यों हैं? क्या मतलब है इसका?’’ खीझकर एक दिन शीरी ने पूछा था तो पापा यकबयक कुछ बोल नहीं पाए थे। फिर  थोड़ा रुककर उन्होंने कहा था - ‘‘आप अब बी.ए. में पढ़ती हैं, इतना जो जरूर जानती हैं। लेकिन बेटे, देखने और समझने की बात यह भी है कि हमारा नजरिया क्या है इस सवाल को देखने का। पूरे मुल्क में मजहब को पैमाना माने तो शीरीं नाम की यह शख्स माइनॉरिटी को बिलांग करती है। यही शीरीं अपने शहर के इस मोहल्ले में मेजॉरिटी कम्यूनिटी से ताल्लुक रखती है, बल्कि कुछ शहरों और सूबों में आप मेजॉरिटी को रिप्रेजेन्ट करती हैं। दरअसल हमारे मुल्क में कोई भी सोशल यूनिट ऐसा नहीं जो हर कहीं मेजॉरिटी होने का दावा कर सके। वह एक जगह एक नजरिए से मेजॉरिटी है तो दूसरी जगह दूसरे नजरिए से माइनॉरिटी। हमारा मुल्क तो माइनॉरिटीज का ही एक ' कम्प्लेक्स होल' है। हम ही नहीं इस मुल्क का मेजॉरिटी कम्यूनिटी भी माइनॉरिटज्म या माइनॉरिटी फीलिंग का शिकार है, हम तो हैं ही।’’ पापा ने उसे बहलाया ही तो था, वह क्या नहीं समझती।
जब ऐसा वाक्या घट जाता है, लगता है जैसे हर शख्स शहर का सवाल कर रहा है उससे, वह जैसे किसी का सामना करने से कतराती है। एक तो धमाके के बाद की चीख-पुकार से दिल दहल जाता है और दूसरी ओर एक अपराध्-बोध् जाने कहाँ से उसे अपनी गिरफ्त में लेने लगता है। उसे कुछ समझ में नहीं आता, ऐसा क्यों होता है। वह पहले पापा से कितने सवाल पूछा करती थी। अब उनसे पूछने की भी हिम्मत नहीं होती। एक दिन उसने उन्हें भी मम्मी से ऐसा ही कुछ कहते सुना था - ‘‘मैं इन धमाकों से बहुत डरता हूँ, आस-पास के लोग कभी-कभी अजीब निगाहों से देखते हैं, सिर्फ अजनबीपन से नहीं, कहीं हिकारत...’’

उसने सुरभि से पूछा एक दिन -  ‘‘हमारी दोस्ती पर तुम्हारे घर वाले एतराज तो नहीं करते?’’
‘‘नहीं, क्यों?’’
‘‘यों ही पूछा!’’
‘‘बस कभी-कभी खाने-पीने में सावधनी बरतने को कहते हैं, दादी कहती है, और कोई नहीं! और-तुम्हारे घर वाले?’’
‘‘वो तो खुश होते हैं, मन ही मन तुम्हारा इंतजार करते हैं। हमारी दोस्ती की लंबी उम्र के लिए दुआ करते हैं।’’
‘‘अच्छा? जानती हो, मेरे पापा को अपने एक पुराने दोस्त की याद ताजा हो जाती है ...’’
‘‘मेरी दादी कभी-कभी मेरे कपड़ों को लेकर परेशान रहती है और मम्मी को जाने क्या-क्या कहती हैं। मम्मी हँसती रहती है, उनकी बात का जवाब नहीं देती।’’
‘‘क्यों, तुम्हें सानिया मिर्जा तो नहीं समझतीं?’’ सुरभि ने उसे चिकोटी काटी।
‘‘ध्त्!’’ शीरीं शर्मा गई तो सुरभि हँसने लगी।
‘‘तुम तो ऐसे शर्मा गई जैसे तुम्हारी शादी की बात कर दी हो?’’
‘‘शादी से कौन शर्माता है?’’
‘‘क्यों, तय है क्या पहले से? हमें तो भाई इंतजार करना होगा।’’
‘‘नहीं, अभी तो ऐसी कोई बात ही नहीं है, मम्मी-पापा कहते हैं, बी.ए. में रिजल्ट कैसा होता है, इसी पर डिपेन्ड करेगा कि मेरी शादी कर दी जाए, या फिर  आगे पढ़ाई जारी रखूँ।’’
‘‘वाह-वाह, क्या बात है! दिक्कत भी क्या है, दुल्हा तो आस-पास से ही निकल आएगा तुम्हारा?’’
‘‘आस-पास से क्यों? तुम तो जानती हो मेरा कोई अफेयर नहीं!’’
‘‘अरे, तुम लोगों में रिश्तेदारियों में भी तो शादियाँ होती हैं, कि नहीं?’’
‘‘हर खानदान में ऐसा नहीं होता। मेरे यहाँ इसे पसन्द नहीं किया जाता!’’
‘‘चल, ठीक ही है, कम से कम एक फ्रेश  शक्ल तो दिखेगी तुझे।’’
‘‘चलो हटो!’’ शीरीं फिर  लजाई और सुरभि की पीठ पर एक धौल जमा दिया।
‘‘तुम कितने दिनों से घर नहीं आई।’’ शीरीं ने शिकायत की।
‘‘क्या करें, ऐसे इलाके में रहती हो, घरवाले परेशान हो जाते हैं नाम सुनते ही। उन्हें डर लगता है, और मुझे भी।’’
‘‘हमारा तो पुश्तैनी मकान है न! ... लेकिन मैं तो नहीं डरती तुम्हारे घर जाने में?’’
‘‘अरे तू क्यों डरेगी बेवकूफ? जिन मुहल्लों में अलग-अलग तरह के लोग रहते हैं उनमें डर नहीं लगता।’’
‘‘हाँ, यह तो है! पापा भी कहते हैं, मुहल्ले अलग रहने से कुछ हासिल नहीं होता, बल्कि नुकसान होता है, दूरियाँ बढ़ती हैं।’’

आज जब शीरीं कॉलेज गई तो रास्ता जाम था। जुलूस निकला था धमाकों के खिलापफ। लोग पुतले जला रहे थे। हुजूम में कुछ दुपल्ली टोपियाँ भी दिखीं तो उसे जैसे बहुत राहत महसूस हुई। थोड़ी ही देर पहले जब ऑटो में सवार एक आदमी ने गद्दारों को सबक सिखाने की पैरवी की तब वह बेहद डर गई थी। उसने देखा, उन्हें देखकर वह आदमी भी कुछ हैरत में था जैसे। शीरी की मुट्ठियाँ भिंच गईं जैसे कि खिलाड़ियों के भिंच जाती हैं गेम जीतने के बाद।
बडे़ हौसले से उसने सुरभि को चारों ओर खोजा। लड़कियों से पता किया, लेकिन कुछ नहीं। कम्बख्त फोन तक नहीं करती। मिस्ड कॉल ही कर देती! उसने एक बार फिर  सुरभि को फोन लगाया, तो  जवाब आया -  ‘‘दि ... कस्टमर यू आर कॉलिंग इज आउट ऑफ रेंज।’’ चीजें आउट ऑपफ रेंज क्यों हो जाती हैं? जिन्हें वाकई हमारे दायरे के बाहर होना चाहिए, उनमें ही हम घिरे रहते हैं और जो चीज सचमुच हमारे बिल्कुल पास होनी चाहिए - वही आउट ऑफ रेंज, पहुँच के बाहर! सुरभि आउट ऑफ रेंज। सुरभि के बहाने उसकी आँखों से देखी गई दुनिया भी आउट ऑफ रेंज! रेंज में क्या है - नफरत, जिल्लत, जहालत, तंगख्याली और .... धमाके!

कॉलेज में शीरीं का बिल्कुल मन नहीं लगा। उसने अनमने भाव से क्लासेज किए। और घर की राह पकड़ी। सुबह जो उत्साह मन में जगा था, वह इस समय तक मानो एकदम बुझ गया। मम्मी उसे देखकर खुश हुई लेकिन उसे जावेद और पापा का अभी इंतजार करना था। जब सब लोग घर में आ जाएँ तभी जैसे जिन्दगी शुरू होती है वरना ‘सस्पेंड’ रहती है कॉलेज के क्लासेज की तरह।
वही बात है! सुरभि ने भी आखिरकार मुझे वही समझा। उसे तो मेरे मुहल्ले में आने में भी डर लगता था .... उसके लिए मेरी दोस्ती जैसे एक अलग तरह का टाइम पास थी। उसे तो डिफरेंट चीजें करने में मजा आता है। दोस्ती भी की तो शीरीं से। पिछली बार जब धमाके हुए थे तो उसने शायद मजाक में यह नहीं कहा था -  ‘‘यार, अपने भाइयों को जरा समझाती क्यों नहीं?’’ क्या पता वह दिल की गहराइयों से ऐसा कह रही हो। ओफ! किसी चीज पर भरोसा नहीं जमता, अपने पर तो बिल्कुल नहीं।

शीरीं अपने कमरे में थी। ड्राइंग रूम में टीवी देखते सब लोग गपशप कर रहे थे। लेकिन उसका ध्यान उनकी ओर नहीं था। टीवी तो उसने दो दिनों से देखा तक नहीं था। वह क्लास नोट्स उलटते-पलटते क्या-क्या उलजलूल सोचे जा रही थी कि उसका मोबाइल बजा। उसने जैसे झपट्टा मार कर उसे टेबुल पर से उठाया। कोई अनजाना नंबर था। उसका दिल धक्-से हो गया। उसने फौरन स्वीच ऑफ कर दिया और घबराहट में अंगुलियाँ चटखाने लगी। फिर  उसे क्या सूझा कि उसने मोबाइल ऑन करके रिंगिंग वॉल्यूम ऑफ कर दिया। थोड़ी देर के बाद फोन पर फिर  वही नंबर उगा। बाहर का नंबर लगता था। इन दिनों अनजान कॉल्स अटेंड करना आफत मोल लेना है। उसने फोन वहीं छोड़ दिया और डर दूर करने के लिए ड्राइंग रूम में ही आ गई।
पता चला कि कल, यानी अगली सुबह आतंक के खिलाफ मुहल्ले के लोग एक जुलूस निकालने वाले थे। इसे लेकर पापा तो बहुत उत्साह में थे लेकिन मम्मी पता नहीं क्यों डरी हुई थीं। वे उसे समझाने की कोशिश कर रहे थे -
‘‘इस मौके पर लोगों को बाहर आना ही चाहिए। तुम बेकार में परेशान हो रही हो ....’’
‘‘पापा, हम भी चल सकते हैं जुलूस में?’’ अचानक शीरी ने पूछा तो पापा तुरंत कोई जवाब नहीं दे पाए। तभी उनका मोबाइल बजा। सबका ध्यान उसकी ओर गया।
‘‘कौन बोल रहे हैं? किससे बात करनी है?’’ पापा ने अनजान कॉलर से पूछा तो शीरीं बिल्कुल घबरा गई। उसने पापा को फोन ऑफ करने का इशारा किया कि पापा हँस पड़े -
‘‘अच्छा-अच्छा, तो तुम हो! लो भई लो, तुम्हारा शिकार यहीं है।’’ उन्होंने फोन शीरीं को बढ़ा दिया। काँपते हाथों से उसने फोन पकड़ा- ‘‘इडियट, फोन क्यों नहीं उठाती? आधे   घंटे से ट्राई कर रही हूँ। ... अब बोलती क्यों नहीं? ... अरे, क्या हुआ?’’
शीरीं उछल कर खड़ी हुई और भाग कर अपने कमरे में आ गई। वह क्या बोले! उसके मुँह से तो आवाज ही नहीं निकलती, बस आँखें उमड़ती चली आ रही हैं।
‘‘तीन दिनों से तू थी कहाँ? मैं तुझे फोन करते-करते ...’’ और वह अपने को जब्त न कर सकी।
‘‘तू वही की वही रहेगी कम्बख्त! मैं तो अपने मामा के पास चली गई थी, तुझे बताने का मौका ही नहीं मिला। मेरा फोन खराब हो गया। यह रिमोट एरिया है यार, कोई नेटवर्क काम ही नहीं करता ठीक से। अभी तो बूथ से कर रही हूँ।’’
‘‘तो तू यहाँ नहीं है?’’
‘‘और मैं कह क्या रही हूँ तबसे? पागल हो गई है क्या?’’
‘‘देख सुरभि, अबसे तू कभी आउट ऑफ रेंज मत होना यार ... अच्छा नहीं लगता कुछ भी ...’’ सुबकते-सुबकते शीरीं ने कहा तो उधर  से सुरभि ठहाका मार कर हँस पड़ी -
‘‘ये जुमले अपने होने वाले के लिए बचा कर रख ...। इसी से कहती हूँ कोई ब्वॉयप्रेंफड कर ले ... लेकिन तू तो रहेगी वही ....’’
शीरीं भी हँस पड़ी और हँसती चली गई। दोनों सखियाँ देर तक बातें करती रहीं। अभी मानों चीजें हाथ के बाहर नहीं थी। और इससे बहुत सुकून था, आश्वस्ति थी।  (जनसत्ता वार्षिक अंक 2009)                                    

Thursday, 1 November 2012

ड्राप आउट
                          -शिवदयाल
मुजफ्फरपुर का एक गाँव .     फोटो : सृष्टि









सोचा था
तुम पर लिखूँगा एक कहानी

खूब सोचा जब इस बात पर
तो पाया
तुम तो कविता का विषय हो
ए सरिता !

तुमसे भी कहा था
वादा किया था मैंने
कि लिखूँगा जरूर एक कहानी
कि कैसे बनती फिरती है
एक छोटी-सी किशोरवय लड़की
गाँव भर की नानी

लेकिन मेरे कहन पर
भारी पड़ती है तुम्हारी नादानी,
और वह कौतुकपूर्ण विश्वास
‘हमें भी जरूर बताइएगा चाचा - !’

ओह, मैं कैसे पिरोऊँ कथा में यह सब -
जैसे कि
खेल-खेल में तुम जो
इतने सारे काम करती जाती हो -
रोपनी, सोहनी, कटनी, दँवनी
तुम्हारी देह-भंगिमाओं में
व्याख्यायित होता है ऋतु-चक्र

तुमने मास्साहब को कैसे छकाया
और स्कूल जाने से इनकार कर दिया
चारा ढोते कैसे सीधी की
कितकित की उलटी गोटी -
मैं कैसे लिखूँ
कैसे कहुँ कि
भुअरी गइया की बाछी की
आखिर तुम लगती कौन हो !

तुम तो हो
स्कूल से ‘ड्राप आउट’
और लिख सकती हो
बस स से सरिता
लेकिन यह तो बताओ
कि गाँव भर के जनावर
और चिरई-चुरुँग
कैसे समझ लेते हैं तुम्हारी भाषा ?

कागज चबाती बकरी
मुर्गियों पर झपट्टा मारता कुत्ता
आपस में सींग लड़ाती गऊएँ
झट मान लेते हैं तुम्हारी बात ?

तुमने आखिर
कौन-सी पढ़ाई पढ़ी है
ए सरिता
तुम पर लिखी जा सकती है
सिर्फ कविता !

सच सरिता,
किसी कथानक में नहीं समाते
तुम्हारे नन्हें-नन्हें सरोकार
जिनसे चलता है वास्तव में
जगत का  जीवन-व्यापार !
                           
         (’ कवि के गाँव शीतलपुरा , सीवान की एक बच्ची)

Thursday, 25 October 2012

                                     थोड़ी-सी करुणा ... !
                                                                                                                         - शिवदयाल

बरामदे के फर्श पर लाठी पटकते हुए वे आवाज देते - मलकिनी जी ....! लो , झूलन मिस्त्री आ गए। हर किसी को मालूम हो जाता कि वे आ गए हैं, बाहर निकलकर आवभगत करने की उतावली नहीं होती। एक किस्म का इत्मीनान होता कि झूलन मिस्त्री आए हैं तो अभी रहेंगे। उन्हें जाने की कोई हड़बड़ी नहीं होगी। अभी तो वे बाहर बरामदे पर बैठकर सुरती ठोकेंगे, फिर लाठी घुमाते, टेकते अहाते का पूरा चक्कर लगाएँगे और एक तरह से अपने लिए एंगेजमेन्ट की तलाश करेंगे। कहाँ क्या-कुछ किया जा सकता है। कहीं कोई क्यारी सूखती मिलेगी, कहीं खुराई तो कहीं बोआई की जरूरत होगी, कहीं झाड़ उग आए होंगे तो उन्हें काटने-छाँटने की दरकार होगी। कुछ न कुछ तो काम होगा या कि उसका बहाना।
वे इतवार या किसी छुट्टी के दिन ही नहीं आते थे, कभी भी चले आते थे। हमें नहीं, माँ को आवाज लगाते थे - मलकिनी जी..., और बस! 
गहरा साँवला रंग, औसत कद, अंदर को धँसी  छोटी-छोटी आँखें, बदन पर धोती-गंजी और गमछा जो अक्सर पगड़ी की तरह सिर पर बँधा   रहता। हाँ, उनकी गंजी आध्ी बाँह की कुर्त्तानुमा गंजी होती जिसमें दोनों ओर जेबें होतीं। ऐसी गंजी आज भी चलती है, खादी की। उनकी लाठी उनके साथ बाद में जुड़ी जबकि आँख में मोतियाबिन्द उतर आया।
माँ जब अपने कामकाज निपटा लेती तो जैसे उसे उनका ध्यान आता। वह उनका हाल-चाल पूछती और कोई काम हो तो वह भी बताती। कभी-कभी उन पर खीझती भी। झूलन मिस्त्री मनोयोग से अपना काम करते जबकि माँ बरामदे के फर्श पर बैठी सुस्ताती रहती। दोनों के बीच तब भी संवाद चलता रहता। वे मगही बोलते थे, माँ भोजपुरी लेकिन कहीं कोई रुकावट नहीं। दुनियादारी की बातें, बाल-बच्चों की राजी-खुशी से लेकर महँगाई और तंगी तक।
सन् 71-72 में पटना के गर्दनीबाग स्थित हमारा सरकारी क्वार्टर पूरी तरह तोड़कर बनाया गया था। कोई चार-पाँच महीने तक काम चलता रहा। हम क्वार्टर छोड़कर नहीं गए, किसी तरह उसी में गुजारा किया। शुरू में कोई पंद्रह-बीस मजदूर और राजमिस्त्री सुबह से शाम तक काम करते, बाद में ठेकेदार ने पाँच-सात से ही काम चलाया। कभी-कभी माँ उन्हें  चाय पिलाती। उनमें से एक थे माधो  मिस्त्री जिन्होंने हमारे सामने ही ईंटें ढोते-ढोते करनी पकड़ ली थी और राजमिस्त्री  बन गए थे। वे सबसे साफ-सुथरे दिखते थे, ठिगने कद के गठीले बदन वाले। रंग एकदम साफ। हर समय एक मुस्कराहट उनकी घनी मूछों के बीच से झाँकती रहती। छुट्टी के समय हम बच्चों का सबसे बड़ा शगल मजदूरों को काम करते देखना था। दोपहर के भोजन के वक्त उन्हें सत्तू खाते देख हम भी ललचते। कभी-कभी उन्हें अँचार-चटनी भी सुलभ कराते। इसके लिए हमारी सिफारिश को माँ ने कभी नामंजूर नहीं किया।
हमारा र्क्वाटर बनकर तैयार हो गया। सब मजूर-मिस्त्री अगले ठौर को चले गए। हमने दूसरी चीजों में मन लगाना शुरू किया। लेकिन माधो  और झूलन मिस्त्री का हमारे पास जैसे कुछ रह गया। प्रायः छुट्टी के दिन वे चले आते। बाबूजी को बागवानी का शौक था, उनके साथ क्यारियाँ बनाने में जुट जाते। माँ उन्हें चाय तो पिलाती ही, भोजन भी कराती, उसकी चादर तंग थी तब भी। कोई साल दो साल बाद माधो  मिस्त्री का आना कम हो गया, बाद में तो जैसे वे गायब ही हो गए। शायद काम के सिलसिले में उन्होंने शहर ही छोड़ दिया हो या अपने गाँव लौट गए हों। बच गए झूलन, जो  मिस्त्री  नहीं बन पाए, मजूर ही बने रहे। हमने सन् 82 में क्वार्टर छोड़ा और किराए के मकान में आ गए। तब तक उनका हमारे यहाँ आना बना रहा।
 वे ढल गए थे। हाथ में लाठी आ गई थी, आँखें जवाब दे रही थीं। मजूर की अगर आँखें साथ न दें ...! उनसे अब ज्यादा कुछ नहीं हो पाता था। ओसारे पर बैठे आँखें साफ करते रहते, तब भी माँ-बाबूजी से काम पूछते। उन्हें चाय मिलती और भोजन भी। तब तक उनका आना कम होता गया था। क्वार्टर छोड़ते वक्त हमें उनकी भी याद आई - झूलन  मिस्त्री कहाँ रह गए, एक बार भेंट हो जाती!
शहर बदल चुका है। तब से तीन ठिकाने बदले हैं। राजधनी के नये इलाके में हूँ। तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था के बीच अपने शहर को भी आधुनिक होते देख रहा हूँ। चारों ओर बहुमंजिली रिहाएशें हैं, चमकती-दमकती दुकानें हैं, मॉल हैं, शोरूम हैं, क्या है, क्या है ...। चौड़ी होती सड़कों के बगल में ठेलों पर तरकारी की दुकानें भी हैं। हाँ, सुबह निकलता हूँ, तो नुक्कड़ों-चौराहों पर मजूरों की कतारें देखता हूँ, कोई उनके श्रम का खरीदार मिल जाए तो उस पर लुझ पड़ते हैं। यह श्रम-हाट है, लेबर मार्केट। हर वय, हर रंग, हर शक्ल, हर क्षमता का मजदूर। धेती-पायजामे से लेकर जींस और बारमूडा तक में अपना श्रम बेचने को तत्पर, कहीं बेकल मजदूर! किसी को दीवारों की मरम्मत करानी है, किसी को नाली बनवानी है, किसी को माल ढुलवाना है, किसी को मिट्टी कटवानी है। जमकर मोल-भाव होता है। वाजिब दाम वाले के साथ सौदा पट जाता है। बाकी दूसरे ग्राहक की राह देखते हैं। दिन चढ़ने के साथ-साथ इनकी बेकली भी बढ़ती जाती है।
 इन्हीं में कोई लेह-लद्दाख में सड़कें बनाने चला जाता है तो कोई जामनगर और मुंबई-पुणे-बंगलोर में रोटी जुटाने के साथ-साथ मार खाने की अपनी बारी का इंतजार करता है। ये हर कहीं है लेकिन कहीं नहीं। इनका कोई नहीं। कोई दल, कोई झंडा भी नहीं। इन्हें देखता हूँ तो कभी-कभी झूलन मिस्त्री याद आ जाते हैं - मलकिनी जी  ...! उनसे जुड़ा हास-परिहास और उपहास भी याद आता है। लेकिन जाने क्यों एक उदासी-सी छाती है। उन्हें याद करना आज मानो एक मजूर मात्र को याद करने जैसा नहीं है।
आज माँ नहीं है। पता नहीं माधो   और झूलन मिस्त्री कहाँ हैं! जाने हैं भी कि नहीं। कहीं कोई और चीज भी खो रही है, साथ छोड़ रही है जैसे। वह किसी तरह बच पाती ...। वह जो थोड़ी-सी करुणा थी।

                  गरदनीबाग क्वार्टर की छत पर मैं ,सन  7 6-77 का फोटो .
(जनसत्ता में प्रकाशित - दुनिया मेरे आगे - स्तम्भ में।)

Wednesday, 17 October 2012

 नीचे दिए लिंक पर मेरी कुछ कहानियां पढ़ी जा सकती हैं :


http://www.worldcat.org/title/munna-baindavale-ustada-kahani-sangraha/oclc/302318513/viewport

Sunday, 14 October 2012

घोंघा
                          शिवदयाल 

घोंघे को मिला है कवच
जो बसेरा भी है उसका !

घोंघा अपना कवच
साथ लिए चलता है
अगर चलने की दरकार हो

जरा-सी आपदा की
आहट हो या
कोई अजनबी स्पर्श
घोंघा दुबक आता है
अपने खोल में
अगर किसी विवशता में
जरा देर के लिए
आ भी जाए बाहर ।

घोंघा जी नहीं सकता
निष्कवच
घोंघा अपने कवच में ही
मर जाना चाहता है ।

- आदमी अंदर से कहीं
घोंघा होता है !

(समकालीन कविता के प्रथमांक में।)

Wednesday, 10 October 2012

नाव
                                            शिवदयाल 

कागज की है
यह नाव
ओ लहरों ....
देखना,
अपनी तरंगों की गति में
कहीं इसे ले न डूबना
यह नाव कागज की है !

चलेगी थोड़ी दूर,
भीगेगी, फूलेगी
धीरे-धीरे इसमें रिसेगा पानी
फिर खुद ही ढूँढ लेगी सतह

तब तक लिए जाना
इसे नजरों से दूर
और करने देना किल्लोलें
शिशु -मन को !
ओ लहरों ...
          
(दस्तावेज में प्रकाशित )

Friday, 5 October 2012

यथास्थिति
                                 - शिवदयाल

धुएँ में लगातार देखने से
एक दृष्टि-मोह बनता है,
चीजों को स्पष्ट देखने की बजाए
लगातार धुएँ से लिपटे रहने में
एक अलग ही आनंद है

कल्पना के सुंदर घर में
पलंग पर लेटे-लेटे
खिड़की से आकाश  देखने में
वक्त अच्छा कटता है

यथार्थ भूले हुए
सपने की तरह
नींद में दस्तक देता है

कोई खलल क्यों
पहलकदमी किस लिए ?



                                    (पहले की एक रचना .)
 

Monday, 1 October 2012

            बिहारी राष्ट्रवाद का मिथक
                                                                                                                                     - शिवदयाल

1912 के पहले बिहार बंगाल का ही एक अंग था, जैसा कि उड़ीसा भी बंगाल का ही एक भाग था। 1757 के पलासी युद्ध में जीत के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी को बंगाल की दीवानी मिली तो इसमें उडीसा और बिहार भी शामिल थे।
बिहारी राष्ट्रीयता के प्रति आग्रह हाल के इतिहास में पहली बार बंगाल से बिहार को अलग करने के आंदोलन के दौरान ही दिखाई देता है जो बीसवीं सदी के पहले दशक में प्रारंभ हुआ। इसे पढ़े-लिखे लेकिन बंगाली प्रभुत्व के नीचे दबे बिहारियों ने शुरू किया था जो सता, प्रशासन और रोजगार में अपना हिस्सा चाहते थे। विस्मित करने वाली बात यह है कि जिन दिनों बिहारी राष्ट्रीयता का उदय हो रहा था, बंगाली राष्ट्रीयता जो भाषा और संस्कृति के आधार पर कहीं अधिक मजबूत और अटूट थी, स्वयं धर्म के आधार पर भंग हो रही थी। बंगाली राष्ट्रीयता का प्रकटीकरण कहीं न कहीं भारतीय राष्ट्रवाद में हो रहा था इसलिए अंग्रेजों ने मुसलमान बहुल पूर्वी बंगाल को हिन्दु बहुल पश्चिम बंगाल से अलग कर दिया। इस घटना का इतना भीषण विरोध् हुआ कि आखिरकार अंग्रेजों को यह फैसला वापस लेना पड़ा, लेकिन बिहारीयत का झण्डा उठाने वाले बिहारी भ्रदलोक को यह सुनहरा अवसर हाथ लग गया - जब बंगाल बँट सकता है तब बिहार बंगाल से अलग क्यों नहीं हो सकता? विडम्बना यह कि भारतीय राष्ट्रवाद को कमजोर करने के लिए बंग भंग किया गया, लेकिन अलग बिहार की मांग करने वालों ने भले ही बिहारी पहचान का हवाला दिया हो लेकिन यह दावा भी करते रहे कि बंगाल के मुकाबले बिहार अंग्रेजी राज के प्रति बहुत अधिक वफादार और इसीलिए शांत था। एक मुजफ्फरपुर बम काण्ड (खुदी राम बोस को फांसी हुई थी) को छोड़कर कहीं कोई हलचल नहीं हुई। अंग्रेजों को भी लगा कि बंगाल को दो बंगालों में बांटने की बजाए बिहार को अलग करने से अंग्रजी राज को कही अधिक स्थिरता मिल सकती है। आखिरकार 1912 में बिहार बंगाल से अलग होकर एक और सूबे के रूप में अस्तित्व में आया।
बिहारी राष्ट्रीयता की थोड़ी-बहुत चर्चा पिछली सदी के अंतिम दशक में चली जबकि बिहार से काटकर झारखण्ड राज्य के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो रहा था। इस समय झारखण्डी पहचान भारी पड़ी और बिहार के राजनीतिक दलों के लिए यही सुविधाजनक लगा कि बिहार से झारखण्ड को अलग कर दिया जाए। वास्तव में बिहारी राष्ट्रीयता सचमुच मजबूत होती तो एक आदिवासी मुख्यमंत्री को मौका देकर भी बिहार विभाजन को रोकने की कोशिश की जा सकती थी।
इस बीच कुछ अर्थशास्त्रियों और राजनीतिक चिंतकों ने यह सिद्धांत गढ़ने की कोशिश की कि क्षेत्रीयता या उप-राष्ट्रीयता विकास के लिए उत्प्रेरक का काम करती है। बिहार पिछड़ा इसलिए है कि बिहार में ‘बिहारीयत’ नहीं है, बिहारियों में ‘बिहारीपन’ नहीं है। इसलिए जातीय व भाषाई पहचानों के ऊपर यदि बिहारी पहचान को प्रतिष्ठापित किया जाए तो तरक्की का रास्ता खुल जाएगा। वर्तमान सरकार अपनी उपलब्धियों का बहुत कुछ श्रेय इस बात को भी देती है कि उसने जातिग्रस्त बिहारी समाज को एक समवेत बिहारी पहचान के साथ संयुक्त किया है। वैसे देश के विभिन्न भागों में बिहारियों के साथ जो दुर्व्यवहार हुआ उससे भी बिहारीयत की भावना जगी है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।यह बात अलग है कि जाति की राजनीति बदस्तूर जारी है और नये जातीय सभीकरणों पर भी लगातार काम होता रहा है।
सवाल यह है कि हिन्दी भाषी राज्यों की अलग-अलग क्या पहचानें हैं? उत्तरप्रदेशीय, मध्यप्रदेशीय, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी पहचानें क्या हैं? उनका आधार  क्या है? समूचे हिन्दी क्षेत्र की ही पहचान का आधार क्या है? बिहार ही नहीं, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी उपसंस्कृतियों वाले क्षेत्र हैं, यानी बिहारी या उत्तरप्रदेशीय राष्ट्रीयता के अंदर भी राष्ट्रीयताएँ - मिथिलांचल, पूर्वाचल, रूहेलखण्ड, बुंदेलखण्ड ... । वरना क्या एक ही झटके में उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में बाँटने का प्रस्ताव वहां की सरकार पारित करा सकती है? वास्तव में गहराई से विचार करें तो हिन्दी प्रदेशों के साथ सुविधा यह है कि वे अपनी पहचानों को राष्ट्रीय पहचान के साथ एकाकार कर सकती हैं, उनके पास उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी भाषा है, और लगभग एक साझा राजनीतिक संस्कृति और विरासत है। अगर ये अलग प्रदेश हैं तो प्रशासनिक सुविधा के लिए ही अधिक, न कि क्षेत्रीय या सांस्कृतिक विविधता के कारण।
इनमें भी बिहार की स्थिति विशेष है। बिहार में वैसे भी पहचान का आग्रह उतना मजबूत नहीं रहा, उल्टे बिहार ने अपनी पहचान को भारत की अस्मिता में विलयित करके रखा। इसके ऐतिहासिक कारण हैं। बिहार से भारत ही नहीं, दुनिया को देखने की परम्परा रही है। भारतीय उपमहाद्वीप का पहला साम्राज्य ढाई हजार साल पहले बिहार में ही बना। उसके बाद की कुछ सदियों की उथल-पुथल के बाद गुप्तों के विशाल साम्राज्य का केन्द्र भी बिहार ही रहा जो हूणों के अनवरत आक्रमण के कारण चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समय उज्जयिनी स्थानांतरित हो गया। मौर्यो (अशोक) और गुप्तों (समुद्रगुप्त) का साम्राज्य उपमहाद्वीप की सीमाओं के बाहर तक फैला था। इसी के साथ विराट विश्वदृष्टि के साथ जैन और बौद्ध धर्म बिहार में ही प्रवर्तित हुए - यह विकास भारत की परम्परागत वैदिक संस्कृति के समानांतर या कि विरोध में हुआ। बिहार बाद में सिख धर्म का भी महत्वपूर्ण केन्द्र बना। बौद्ध धर्म विश्व को बिहार की सबसे महान देन है, आज वह विश्व का चौथा धर्म है। गुप्तों की राजधानी उज्जयिनी स्थानांतरित होने के बाद इतिहास में ठहराव दिखाई देता है जैसा कि सत्ता-केन्द्र बदलने के पश्चात यह स्वाभाविक ही है। मध्यकाल तक आते-आते दिल्ली भारत का सत्ता केन्द्र बन गई और बिहार नेपथ्य में चला गया। लेकिन सोलहवीं सदी में एक अप्रत्याशित घटना घटी। बिहार का एक सिपाही हिन्दुस्तान का बादशाह बन गया। शेरशाह सूरी के उदय के साथ बिहार फिर से राजनीति की मुख्यधारा में आया, भले ही यह वापस सत्ता केन्द्र न पाया हो। एक कहावत चल पड़ी - बिहार का एक सिपाही हिन्दुस्तान का शहंशाह हो जाता है। शेरशाह की दृष्टि कितनी व्यापक और उदात्त थी, यह अल्पावधि में अंजाम दिए गए उसके महान कार्यों से प्रमाणित है। सासाराम में अपने खूबसूरत मकबरे के अलावा बिहार को शेरशाह ने अलग से और क्या दिया, जीटी रोड तो बस बिहार से होकर गुजरी। लेकिन परिवहन, संचार (डाक व्यवस्था), भूमि प्रबंधन (जमीन की पैमाइश और बंदोबस्ती), न्याय व्यवस्था और जन कल्याण के उसके अभिनव प्रयोग बाद के बादशाहों-हुक्मरानों के लिए अनुकरणीय और कभी तो श्लाघनीय बने रहे।
शेरशाह की असामयिक मृत्यु के पश्चात बिहार पुनः गुमनामी में खो गया। उसके बाद तो 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में ही बिहार चमका, बाबू कुँअर सिंह के शौर्य, पराक्रम और स्वातंत्र्य-चेतना के कारण। वे बिहार को नहीं भारत को अंग्रेजों से आजाद करने के लिए लड़े। वह भी अस्सी वर्ष की वय में। बिरसा मुण्डा का आंदोलन भी अंग्रेजों के जालिम राज से मुक्ति की अपनी तरह की एक कोशिश थी जिसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। क्या अजीब बात है कि जिस राजभक्ति की एवज में अंग्रेजों ने बिहार को अलग प्रांत बनाया 1912 में, उसके पाँच वर्ष बाद ही 1917 में चम्पारण की धरती पर गांधीजी के सत्याग्रह का भारत में प्रथम प्रयोग हुआ जो आशातीत रूप से सफल हुआ। इस एक घटना ने बिहार को भारत के स्वतंत्रतता आंदोलन के आधुनिक चरण का अगुआ बना दिया। राजभक्ति की दुहाई देकर अलग प्रांत के लिए लड़ने वाले अधिकांश नेता स्वतंत्रता आंदोलन के सिपाही बन गए। 1942 के निर्णायक दौर में जयप्रकाश नारायण के बहाने बिहार ने देश का नेतृत्व किया। 1947 में देश स्वतंत्र हुआ। क्या यह मात्र संयोग है कि एक बिहारी डा. राजेन्द्र प्रसाद ही स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्राध्यक्ष बने ? दो कार्यकाल पूरे करने के बावजूद राजेन्द्र बाबू सिवान-मैरवा रोड से जीरादेई गांव को जोड़ने के लिए एक अच्छी सड़क तक न बनवा सके। नवस्वतंत्र राष्ट्र की स्थिरता और अखण्डता, उसकी जातीय चेतना और आत्मगौरव की रक्षा करना उनकी प्राथमिकता थी । देश को बनाने-बढ़ाने में बिहार ने अपने दोनों हाथ खोल दिए और आंखें बंद कर लीं। नहीं तो  आज भारत विश्व के दस प्रमुख औद्योगिक देशों में न होता। आज के नेता हमारे पुरानी पीढ़ी के नेताओं की इन ‘गल्तियों’ का रोना रोते हैं लेकिन ध्यान से देखें तो उस समय के हमारे नेताओं ने वही किया जो उन्हें करना चाहिए था और जो  उनके इतिहास-बोध और राजनीतिक चेतना के अनुरूप था। बिहार ने पुनः 1974-77 में देश का सर्वसत्तावाद के खिलाफ नेतृत्व किया - 1942 की क्रांति के नायक जेपी एक बार फिर सामने थे। बिहार परिवर्तन के प्रयोगों की प्रयोगशाला बना रहा, कि देश बदले, दुनिया बदले। चाहे वह पचास के दशक का भूदान आंदोलन हो, संपूर्ण क्रांति का आंदोलन हो, नक्सली आंदोलन हो या अन्य कम्युनिस्ट आंदोलन - सब सिर्फ बिहार नहीं, देश में सार्थक परिवर्तन लाने को लक्षित रहे। देश ने बिहार को आशा भरी नजरों से देखा तो इसीलिए देखा।
लेकिन शायद आज भूमंडलीकरण, बाजारवाद और विकास की ललक ने राजनीति की प्राथमिकताएँ ही नहीं बदली हैं, बल्कि मूल्य, आदर्श और दृष्टि भी बदल डाली है। बिहार के बच्चे अब राष्ट्रगान के साथ ही ‘राज्यगान’ में राज्य की महिमा गाएँगे ताकि बिहारीयत मजबूत हो। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ द्वारा रचित हमारे राष्ट्रगान में राष्ट्र की जयगाथा ही नहीं संघवाद का आदर्श भी है। राज्यगानों की परम्परा संघवाद को नए सिरे से परिभाष्ति कर रही है, परिणाम क्या होगा, अभी से कहा नहीं जा सकता। वास्तव में बिहारी राष्ट्रवाद का विचार बिहार की राजनीतिक-सांस्कृतिक परम्परा, विरासत और इतिहास बोध से मेल नहीं खाता।('शुक्रवार' के 'बिहार अंक' 22 मार्च ,में प्रकाशित।)


Sunday, 23 September 2012

प्रतीक्षा
                                    -शिवदयाल

प्रियजन-स्वजन सारे छूट गए,
मेरी सूनी-रातों के तारे
हाय बुझ गए !
इस एकाकी अन्धियारे पथ पर
एक टिमटिमाते प्रकाश -स्तम्भ के नीचे
तब भी प्रतीक्षा करती- सी
मैं क्या जानूँ कि तुम ?
हाँ तुम ही खड़ी हो !

Saturday, 22 September 2012

                                      मनुष्यता की जय!
                                                                                                                                         शिवदयाल
कोसी ने करवट बदली और हाहाकार मच गया। नदी जब मर्यादाएँ लाँघती है तो बाढ़ आती है, और जब करवट बदलती है तो प्रलय आता है। यह पता करना मुष्किल है कि करवट बदलने के लिए नदी को बाध्य किया जाता है, या फिर यह उसका शगल है - ऐसा शगल जो उसे वर्षों में कभी-कभी याद आता है। संभवतः दोनों ही बातें अपनी जगह सही हों, लेकिन इतना तो तय है कि नदी का मर्म जानना एक विषम चुनौती है। नदियाँ धरती की धमनियाँ हैं जिनमें प्रवहमान जल का नियंता है समुद्र। हर नदी समुद्र से मिलने को बेकल है - कभी धीर-गंभीर मंथर गति से तो कभी उछलती-कूदती अल्हड़ नवयौवना-सी। यह प्रकृति की स्वाभाविक गति है जिससे हमारा जीवन चलता है, उसमें लय बनती है और जिस कारण प्रकृति सुंदर है और दिव्य। लेकिन प्रकृति संुदर ही नहीं विकराल भी है। पता नहीं विनाष और रचना का कौन-सा द्वन्द्व इसके अंदर चलता है, न जाने कौन-सा रहस्य है। जीवनदायिनी प्रकृति विध्वंसक हो उठती है हठात्, और कोई अवसर नहीं देती।
मानव जाति का इतिहास प्रकृति के साथ अनुकूलन का ही इतिहास नहीं है बल्कि प्रकृति को अपने अनुकूल बनाने का इतिहास भी है। मनुष्य की जिजीविषा वे एक अलग ही संसार रच डाला। उसकी इच्छाषक्ति ने अगम को सुगम बनाया और असाध्य को साध्य। आज की दुनिया एक प्रति-सृष्टि है। इस प्रति-सृष्टि में भी रचना और ध्वंस की शक्ति साथ-साथ उपस्थित है। आदमी रचता है, रचता जाता है, उसी तरह तोड़ता भी है, तोड़ता जाता है। रचना के साथ-साथ उसने ध्वंस की अपरिमित शक्ति अर्जित कर ली है। अपनी रचना-षक्ति से वह अपनी ही नहीं, ईष्वर की दुनिया में भी कुछ जोड़ता जाता है, जबकि उसकी विनाषक क्षमता से ईष्वर की ही नहीं, उसकी अपनी दुनिया भी बर्बाद होती है। प्राकृतिक आपदाओं में ही नहीं युद्धों और संघर्षों में भी बर्बादी होती है। एक ओर कैटरीना और सुनामी का तांडव मचता है तो दूसरी ओर बमों-गोलों से शहर के शहर बर्बाद हो रहे हैं। स्थिति यहाँ तक आ पहुँची है कि जान लेने की उत्कटता में मानव ने स्वयं को ही ‘बम’ के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। मनुष्य-समाज की अतिषय सक्रियता ने खुद उसके और प्रकृति के समक्ष गंभीर संकट खड़े कर दिए है। मानवीय प्रयास भी प्राकृतिक आपदाओं का आधार तैयार कर रहे हैं। किन्तु अन्तिम भोक्ता कौन है ?
कोसी के कोप से त्रस्त एक बूढ़े मजदूर (नाम ....... साव) की छवि सामने आ जाती है जिसे एक प्रादेषिक टीवी चैनल ने प्रसारित किया। साव जी से बात करने की कोषिष की गई। लेकिन प्रत्युत्तर में उन्होंने सिर्फ हाथ जोड़ दिए। दस-बारह दिन की बढ़ी खिचड़ी दाढ़ी, मैले-कुचैले कपड़े, लुटा-पिटा निस्तेज मुखमण्डल और डबडबाई आँखें। यह चित्र अंदर से हिलाकर रख देता है। मनुष्य की ऐसी पराजित-अवसन्न मुद्रा सिर्फ हिला ही नहीं देती, डरा भी देती है। सिर्फ करुणा ही नहीं भय भी उपजता है। आदमी की ऐसी टूटी हुई, गिरी हुई, बेबस और निरीह छवि सहन नहीं होती है। लगता है मानो हम स्वयं उसी पराजय और अवषता में घिरते चले जा रहे हैं। दुनिया में आजतक जो भी उद्धारक, सुधारक, व मुक्तिदाता हुए हैं उन्हें मनुष्य की ऐसी ही मुद्रा ने विचलित किया होगा और उन्होंने मनुष्यता को उठाने, उसे गरिमा दिलाने में अपना जीवन खपाया। राम मोहन राय ने सती होती स्त्री की विवषता देखी, मोहनदास करमचंद गांधी ने परतंत्रता का संताप देखा, विवेकानंद ने स्मृतिहीन, आत्महीन, विवर्ण जनसमूह देखे, मंडेला ने गुलामी की जलालत भोगती आबादियों को देखा .... और अपने हिसाब से दुनिया को बदलने के महान प्रयत्नों में लगे। इन सबको और अन्य क्रांतिवीरों को अपने लोगों के निस्तेज मुखमण्डलों और पराजित भंगिमाओं ने उद्वेलित किया होगा।
ऐसे ही एक और चित्र ने अंतर में हलचल मचा दी थी। एक प्रमुख साप्ताहिक पत्रिका के आवरण पृष्ठ पर गुजरात दंगों  के शिकार एक व्यक्ति का चित्र। साँवला चेहरा, आँसुओं से लबरेज आँखें, जुड़े हुए विनती करते हाथ - बस, अब और नहीं! यह इन्तिहा है, पराकाष्ठा है, इसके बाद फिर क्या-कुछ बच रहेगा! अब और नहीं। यहाँ कोसी की उत्तप्त धारा से हारते हुए या भुज के विनाषकारी भूकम्प में सबकुछ गँवा चुके आदमी का चित्र नहीं था। यह था अपने ही शहर और पास-पड़ोस के लोगों के नृषंस हमलों के एक निरीह शिकार का चेहरा जो हम कह रहा है - अब बस करो! आखिर कितनी यंत्रणा, कितना त्रास ? हाल के आतंकवादी हमलों के षिकार लोगों और उनके परिजनों के चेहरों पर भी बेबसी और हताषा के यही भाव थे। लेकिन ऐसे कितने ही चेहरे हैं जो हमारे सामने नहीं आ पाते, अलग-अलग कारणों से जिनपर हताशा  और हार की इबारत लिखी हुई है।
हमारे समवेदना से भरे हुए दिल और सहारे के लिए बढ़े हुए हाथ ही एकमात्र आष्वासन हैं कि हममें रचने की शक्ति अभी चुक नहीं गई, कि करुणा की धारा अभी सूखी नहीं। मनुष्य की विजय अंततः मनुष्यता की जय में है.।                                                              ( 'दोआब ' में 'हार की इबारत ' शीर्षक से प्रकाशित। )

Thursday, 20 September 2012

 प्रतिबद्धता

कुछ नहीं
कहीं कुछ नहीं
इस उबड़- खाबड़
अंतहीन रास्ते पर
दृष्टिहीन कर देनेवाले
अंधियारे में
पसरा हुआ सन्नाटा है
जिसमें हमारी
उखड़ती साँसों का शोर है
बस !

पर अभी पुतलियों में शेष है 
उसकी रश्मियों की थिरकन 
जिस प्रकाश के लिए 
हम इतनी दूर चले ..  

(1982-83 में 'प्रक्रिया' में प्रकाशित मेरी  कविता )
शिवदयाल 
Sheodayal



कई चर्चित कहानियों एवं उपन्यास समेत दर्जनों वैचारिक निबंध प्रकाशित । बहुविधात्मक लेखन। लोकतंत्र, गत्यात्मकता, विपथगमन एवं विकास जैसे विषयों में विशेष  रुचि।
प्रारम्भिक शिक्षा के सृजनात्मक पक्ष से जुड़ाव। बच्चों की एवं शिक्षकों की पत्रिकाओं का सम्पादन। वंचित बच्चों के लिए पाठ्य-पुस्तक का निर्माण।
पंचायत राज, गवर्नेंस एवं विकास आदि विषयों पर पुस्तकों/प्रशिक्षण सामग्री का निर्माण एवं संपादन।

अनेक राष्ट्रीय-&अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में  व्याख्यान।
गत्यात्मकता एवं विकास पर केन्द्रित पत्रिका 'विकास सहयात्री' तथा बच्चों की  मासिक पत्रिका 'बाल किलकारी' के संपादक ।
 

 प्रकाशित  पुस्तकें 

एक और दुनिया होती - उपन्यास , अनन्य प्रकाशन , दिल्ली दिल्ली। 
छिनते पल छिन -  उपन्यास, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली।
मुन्ना बैंडवाले उस्ताद  -   कहानी संग्रह
, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी  दिल्ली
बिहार की विरासत (सं) -  बिहार पर महत्वपूर्ण वैचारिक पुस्तक, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली।
बिहार में आंदोलन, राजनीति और  विकास - कांति प्रकाशन,अशोक राजपथ, पटना कॉलेज के सामने, पटना। 
राजनीतिशास्त्र भाग एक एवं दो -  नवीं एवं दसवीं कक्षा के लिए  पाठ्य-पुस्तक ,ज्ञान गंगा पब्लिकेशन,
पटना।  

संपर्क - 101, अनंत विकास अपार्टमेंट, वेद नगर, रूकनपुरा, बेली रोड,
पटना-800014

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  नव-चैतन्य के महावट - रवींद्रनाथ                                 - शिवदयाल  ब चपन में ही जिन विभूतियों की छवि ने मन के अंदर अपना स्थाई निवा...