Thursday, 8 November 2012

कहानी                                                            दायरा 
                                                                                                                                          - शिवदयाल



आज तीसरा दिन है। न वो कॉलेज आई न उसका कोई फोन ही आया। वही बात है। और कोई बात हो नहीं सकती। पहले कभी ऐसा नहीं हुआ पिछले दो सालों में। लगभग हर दिन अगर मुलाकात नहीं हुई तो बात जरूर हुई। आज यह एकदम से क्या हो गया!
वही बात है! शीरीं का मन बुझ गया। आँखें भर आईं। उसकी ऐसी कोई सहेली आज तक नहीं हुई, सुरभि जैसी। लेकिन इन कम्बख्तों के चलते उसकी ये खूबसूरत दोस्ती भी गई। अब वह किसे अपना कहे। यह सवाल पिछले पाँच-छह सालों से उसे कदम-कदम पर चिढ़ाता रहा है -  तुम्हारा कौन है? कौन है तुम्हारा अपना? फिर मिली सुरभि, यानी महक, और उसकी जिन्दगी में खुशबू फैल गई। पहले सुरभि अपनी हुई, फिर सुरभि की जो चीजें अपनी थीं वे भी  जैसे उसकी उतनी ही अपनी होती गईं। जिन्दगी जैसे फैल कर बड़ी हो गई।

धमाका 18 को हुआ, सत्तर के करीब लोग मारे गए, जख्मी भी हुए बहुत सारे लोग। उस दिन सुबह उससे बात हुई थी मोबाइल पर कि वह कॉलेज नहीं आ रही, उसे कहीं जाना है। तब उसने भी कॉलेज का प्रोग्राम ड्राप कर दिया। और उसके बाद से आज यह तीसरा दिन है।
हर धमाका जैसे वजूद को हिला देता है। घर में भी यकायक एक सहमी हुई चुप्पी पसर जाती हैं। ‘‘लो आज फिर ---, या खुदा ---’’ गुस्से और बेबसी में पापा की जुबान से यही कुछ निकलता है। एक अनजाना डर जैसे पूरे घर को जकड़ लेता है। मम्मी सख्त ताकीद करती है, पहले पापा को फिर  मुझे, फिर  जावेद को, कि घर से बाहर जरूरत होने पर ही निकला जाए और हर एहतियात बरती जाए। पापा माहौल को हल्का करने की गरज से मम्मी को चिढ़ाते हैं  -  ‘ऐसा फरमान जारी करते हुए तुम बकरे की अम्मा जैसी हो जाती हो। लेकिन वह खैर मनाती होगी और तुम सबको होशियार करती हो।’ लेकिन पापा का यह मजाक दिल में नश्तर की तरह चुभता है। मतलब वाकई हम सब ---!
‘‘पापा हम माइनॉरिटी क्यों हैं? क्या मतलब है इसका?’’ खीझकर एक दिन शीरी ने पूछा था तो पापा यकबयक कुछ बोल नहीं पाए थे। फिर  थोड़ा रुककर उन्होंने कहा था - ‘‘आप अब बी.ए. में पढ़ती हैं, इतना जो जरूर जानती हैं। लेकिन बेटे, देखने और समझने की बात यह भी है कि हमारा नजरिया क्या है इस सवाल को देखने का। पूरे मुल्क में मजहब को पैमाना माने तो शीरीं नाम की यह शख्स माइनॉरिटी को बिलांग करती है। यही शीरीं अपने शहर के इस मोहल्ले में मेजॉरिटी कम्यूनिटी से ताल्लुक रखती है, बल्कि कुछ शहरों और सूबों में आप मेजॉरिटी को रिप्रेजेन्ट करती हैं। दरअसल हमारे मुल्क में कोई भी सोशल यूनिट ऐसा नहीं जो हर कहीं मेजॉरिटी होने का दावा कर सके। वह एक जगह एक नजरिए से मेजॉरिटी है तो दूसरी जगह दूसरे नजरिए से माइनॉरिटी। हमारा मुल्क तो माइनॉरिटीज का ही एक ' कम्प्लेक्स होल' है। हम ही नहीं इस मुल्क का मेजॉरिटी कम्यूनिटी भी माइनॉरिटज्म या माइनॉरिटी फीलिंग का शिकार है, हम तो हैं ही।’’ पापा ने उसे बहलाया ही तो था, वह क्या नहीं समझती।
जब ऐसा वाक्या घट जाता है, लगता है जैसे हर शख्स शहर का सवाल कर रहा है उससे, वह जैसे किसी का सामना करने से कतराती है। एक तो धमाके के बाद की चीख-पुकार से दिल दहल जाता है और दूसरी ओर एक अपराध्-बोध् जाने कहाँ से उसे अपनी गिरफ्त में लेने लगता है। उसे कुछ समझ में नहीं आता, ऐसा क्यों होता है। वह पहले पापा से कितने सवाल पूछा करती थी। अब उनसे पूछने की भी हिम्मत नहीं होती। एक दिन उसने उन्हें भी मम्मी से ऐसा ही कुछ कहते सुना था - ‘‘मैं इन धमाकों से बहुत डरता हूँ, आस-पास के लोग कभी-कभी अजीब निगाहों से देखते हैं, सिर्फ अजनबीपन से नहीं, कहीं हिकारत...’’

उसने सुरभि से पूछा एक दिन -  ‘‘हमारी दोस्ती पर तुम्हारे घर वाले एतराज तो नहीं करते?’’
‘‘नहीं, क्यों?’’
‘‘यों ही पूछा!’’
‘‘बस कभी-कभी खाने-पीने में सावधनी बरतने को कहते हैं, दादी कहती है, और कोई नहीं! और-तुम्हारे घर वाले?’’
‘‘वो तो खुश होते हैं, मन ही मन तुम्हारा इंतजार करते हैं। हमारी दोस्ती की लंबी उम्र के लिए दुआ करते हैं।’’
‘‘अच्छा? जानती हो, मेरे पापा को अपने एक पुराने दोस्त की याद ताजा हो जाती है ...’’
‘‘मेरी दादी कभी-कभी मेरे कपड़ों को लेकर परेशान रहती है और मम्मी को जाने क्या-क्या कहती हैं। मम्मी हँसती रहती है, उनकी बात का जवाब नहीं देती।’’
‘‘क्यों, तुम्हें सानिया मिर्जा तो नहीं समझतीं?’’ सुरभि ने उसे चिकोटी काटी।
‘‘ध्त्!’’ शीरीं शर्मा गई तो सुरभि हँसने लगी।
‘‘तुम तो ऐसे शर्मा गई जैसे तुम्हारी शादी की बात कर दी हो?’’
‘‘शादी से कौन शर्माता है?’’
‘‘क्यों, तय है क्या पहले से? हमें तो भाई इंतजार करना होगा।’’
‘‘नहीं, अभी तो ऐसी कोई बात ही नहीं है, मम्मी-पापा कहते हैं, बी.ए. में रिजल्ट कैसा होता है, इसी पर डिपेन्ड करेगा कि मेरी शादी कर दी जाए, या फिर  आगे पढ़ाई जारी रखूँ।’’
‘‘वाह-वाह, क्या बात है! दिक्कत भी क्या है, दुल्हा तो आस-पास से ही निकल आएगा तुम्हारा?’’
‘‘आस-पास से क्यों? तुम तो जानती हो मेरा कोई अफेयर नहीं!’’
‘‘अरे, तुम लोगों में रिश्तेदारियों में भी तो शादियाँ होती हैं, कि नहीं?’’
‘‘हर खानदान में ऐसा नहीं होता। मेरे यहाँ इसे पसन्द नहीं किया जाता!’’
‘‘चल, ठीक ही है, कम से कम एक फ्रेश  शक्ल तो दिखेगी तुझे।’’
‘‘चलो हटो!’’ शीरीं फिर  लजाई और सुरभि की पीठ पर एक धौल जमा दिया।
‘‘तुम कितने दिनों से घर नहीं आई।’’ शीरीं ने शिकायत की।
‘‘क्या करें, ऐसे इलाके में रहती हो, घरवाले परेशान हो जाते हैं नाम सुनते ही। उन्हें डर लगता है, और मुझे भी।’’
‘‘हमारा तो पुश्तैनी मकान है न! ... लेकिन मैं तो नहीं डरती तुम्हारे घर जाने में?’’
‘‘अरे तू क्यों डरेगी बेवकूफ? जिन मुहल्लों में अलग-अलग तरह के लोग रहते हैं उनमें डर नहीं लगता।’’
‘‘हाँ, यह तो है! पापा भी कहते हैं, मुहल्ले अलग रहने से कुछ हासिल नहीं होता, बल्कि नुकसान होता है, दूरियाँ बढ़ती हैं।’’

आज जब शीरीं कॉलेज गई तो रास्ता जाम था। जुलूस निकला था धमाकों के खिलापफ। लोग पुतले जला रहे थे। हुजूम में कुछ दुपल्ली टोपियाँ भी दिखीं तो उसे जैसे बहुत राहत महसूस हुई। थोड़ी ही देर पहले जब ऑटो में सवार एक आदमी ने गद्दारों को सबक सिखाने की पैरवी की तब वह बेहद डर गई थी। उसने देखा, उन्हें देखकर वह आदमी भी कुछ हैरत में था जैसे। शीरी की मुट्ठियाँ भिंच गईं जैसे कि खिलाड़ियों के भिंच जाती हैं गेम जीतने के बाद।
बडे़ हौसले से उसने सुरभि को चारों ओर खोजा। लड़कियों से पता किया, लेकिन कुछ नहीं। कम्बख्त फोन तक नहीं करती। मिस्ड कॉल ही कर देती! उसने एक बार फिर  सुरभि को फोन लगाया, तो  जवाब आया -  ‘‘दि ... कस्टमर यू आर कॉलिंग इज आउट ऑफ रेंज।’’ चीजें आउट ऑपफ रेंज क्यों हो जाती हैं? जिन्हें वाकई हमारे दायरे के बाहर होना चाहिए, उनमें ही हम घिरे रहते हैं और जो चीज सचमुच हमारे बिल्कुल पास होनी चाहिए - वही आउट ऑफ रेंज, पहुँच के बाहर! सुरभि आउट ऑफ रेंज। सुरभि के बहाने उसकी आँखों से देखी गई दुनिया भी आउट ऑफ रेंज! रेंज में क्या है - नफरत, जिल्लत, जहालत, तंगख्याली और .... धमाके!

कॉलेज में शीरीं का बिल्कुल मन नहीं लगा। उसने अनमने भाव से क्लासेज किए। और घर की राह पकड़ी। सुबह जो उत्साह मन में जगा था, वह इस समय तक मानो एकदम बुझ गया। मम्मी उसे देखकर खुश हुई लेकिन उसे जावेद और पापा का अभी इंतजार करना था। जब सब लोग घर में आ जाएँ तभी जैसे जिन्दगी शुरू होती है वरना ‘सस्पेंड’ रहती है कॉलेज के क्लासेज की तरह।
वही बात है! सुरभि ने भी आखिरकार मुझे वही समझा। उसे तो मेरे मुहल्ले में आने में भी डर लगता था .... उसके लिए मेरी दोस्ती जैसे एक अलग तरह का टाइम पास थी। उसे तो डिफरेंट चीजें करने में मजा आता है। दोस्ती भी की तो शीरीं से। पिछली बार जब धमाके हुए थे तो उसने शायद मजाक में यह नहीं कहा था -  ‘‘यार, अपने भाइयों को जरा समझाती क्यों नहीं?’’ क्या पता वह दिल की गहराइयों से ऐसा कह रही हो। ओफ! किसी चीज पर भरोसा नहीं जमता, अपने पर तो बिल्कुल नहीं।

शीरीं अपने कमरे में थी। ड्राइंग रूम में टीवी देखते सब लोग गपशप कर रहे थे। लेकिन उसका ध्यान उनकी ओर नहीं था। टीवी तो उसने दो दिनों से देखा तक नहीं था। वह क्लास नोट्स उलटते-पलटते क्या-क्या उलजलूल सोचे जा रही थी कि उसका मोबाइल बजा। उसने जैसे झपट्टा मार कर उसे टेबुल पर से उठाया। कोई अनजाना नंबर था। उसका दिल धक्-से हो गया। उसने फौरन स्वीच ऑफ कर दिया और घबराहट में अंगुलियाँ चटखाने लगी। फिर  उसे क्या सूझा कि उसने मोबाइल ऑन करके रिंगिंग वॉल्यूम ऑफ कर दिया। थोड़ी देर के बाद फोन पर फिर  वही नंबर उगा। बाहर का नंबर लगता था। इन दिनों अनजान कॉल्स अटेंड करना आफत मोल लेना है। उसने फोन वहीं छोड़ दिया और डर दूर करने के लिए ड्राइंग रूम में ही आ गई।
पता चला कि कल, यानी अगली सुबह आतंक के खिलाफ मुहल्ले के लोग एक जुलूस निकालने वाले थे। इसे लेकर पापा तो बहुत उत्साह में थे लेकिन मम्मी पता नहीं क्यों डरी हुई थीं। वे उसे समझाने की कोशिश कर रहे थे -
‘‘इस मौके पर लोगों को बाहर आना ही चाहिए। तुम बेकार में परेशान हो रही हो ....’’
‘‘पापा, हम भी चल सकते हैं जुलूस में?’’ अचानक शीरी ने पूछा तो पापा तुरंत कोई जवाब नहीं दे पाए। तभी उनका मोबाइल बजा। सबका ध्यान उसकी ओर गया।
‘‘कौन बोल रहे हैं? किससे बात करनी है?’’ पापा ने अनजान कॉलर से पूछा तो शीरीं बिल्कुल घबरा गई। उसने पापा को फोन ऑफ करने का इशारा किया कि पापा हँस पड़े -
‘‘अच्छा-अच्छा, तो तुम हो! लो भई लो, तुम्हारा शिकार यहीं है।’’ उन्होंने फोन शीरीं को बढ़ा दिया। काँपते हाथों से उसने फोन पकड़ा- ‘‘इडियट, फोन क्यों नहीं उठाती? आधे   घंटे से ट्राई कर रही हूँ। ... अब बोलती क्यों नहीं? ... अरे, क्या हुआ?’’
शीरीं उछल कर खड़ी हुई और भाग कर अपने कमरे में आ गई। वह क्या बोले! उसके मुँह से तो आवाज ही नहीं निकलती, बस आँखें उमड़ती चली आ रही हैं।
‘‘तीन दिनों से तू थी कहाँ? मैं तुझे फोन करते-करते ...’’ और वह अपने को जब्त न कर सकी।
‘‘तू वही की वही रहेगी कम्बख्त! मैं तो अपने मामा के पास चली गई थी, तुझे बताने का मौका ही नहीं मिला। मेरा फोन खराब हो गया। यह रिमोट एरिया है यार, कोई नेटवर्क काम ही नहीं करता ठीक से। अभी तो बूथ से कर रही हूँ।’’
‘‘तो तू यहाँ नहीं है?’’
‘‘और मैं कह क्या रही हूँ तबसे? पागल हो गई है क्या?’’
‘‘देख सुरभि, अबसे तू कभी आउट ऑफ रेंज मत होना यार ... अच्छा नहीं लगता कुछ भी ...’’ सुबकते-सुबकते शीरीं ने कहा तो उधर  से सुरभि ठहाका मार कर हँस पड़ी -
‘‘ये जुमले अपने होने वाले के लिए बचा कर रख ...। इसी से कहती हूँ कोई ब्वॉयप्रेंफड कर ले ... लेकिन तू तो रहेगी वही ....’’
शीरीं भी हँस पड़ी और हँसती चली गई। दोनों सखियाँ देर तक बातें करती रहीं। अभी मानों चीजें हाथ के बाहर नहीं थी। और इससे बहुत सुकून था, आश्वस्ति थी।  (जनसत्ता वार्षिक अंक 2009)                                    

2 comments:

  1. बहुत ही सुंदर और मार्मिक कहानी। सच कहूं तो अल्पसंख्यक समुदाय का बड़ा तबका इसी असुरक्षा बोध का शिकार है। जो चीज़ें हमारे आसपास घटती हैं और उसके बाद का जो इंस्टैंट रिएक्शन होता है... वो इसके लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार है। आप इसको एक किस्म का मनोरोग कह सकते हैं... जहां सन्नाटा या चुप्पी भी साजिशें बुनती हैं। कहानी में फ्लो है और बिल्कुल बांध लेती हैं। बहुत बहुत धन्यवाद एक अच्छी कहानी पढ़ाने के लिए।

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  2. itni saargarbhit pratikriya ke liye dhanyavad..aap kahani ke marm tak pahunche.

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