घोंघा
शिवदयाल
घोंघे को मिला है कवच
जो बसेरा भी है उसका !
घोंघा अपना कवच
साथ लिए चलता है
अगर चलने की दरकार हो
जरा-सी आपदा की
आहट हो या
कोई अजनबी स्पर्श
घोंघा दुबक आता है
अपने खोल में
अगर किसी विवशता में
जरा देर के लिए
आ भी जाए बाहर ।
घोंघा जी नहीं सकता
निष्कवच
घोंघा अपने कवच में ही
मर जाना चाहता है ।
- आदमी अंदर से कहीं
घोंघा होता है !
(समकालीन कविता के प्रथमांक में।)
शिवदयाल
घोंघे को मिला है कवच
जो बसेरा भी है उसका !
घोंघा अपना कवच
साथ लिए चलता है
अगर चलने की दरकार हो
जरा-सी आपदा की
आहट हो या
कोई अजनबी स्पर्श
घोंघा दुबक आता है
अपने खोल में
अगर किसी विवशता में
जरा देर के लिए
आ भी जाए बाहर ।
घोंघा जी नहीं सकता
निष्कवच
घोंघा अपने कवच में ही
मर जाना चाहता है ।
- आदमी अंदर से कहीं
घोंघा होता है !
(समकालीन कविता के प्रथमांक में।)
No comments:
Post a Comment