Sunday, 14 October 2012

घोंघा
                          शिवदयाल 

घोंघे को मिला है कवच
जो बसेरा भी है उसका !

घोंघा अपना कवच
साथ लिए चलता है
अगर चलने की दरकार हो

जरा-सी आपदा की
आहट हो या
कोई अजनबी स्पर्श
घोंघा दुबक आता है
अपने खोल में
अगर किसी विवशता में
जरा देर के लिए
आ भी जाए बाहर ।

घोंघा जी नहीं सकता
निष्कवच
घोंघा अपने कवच में ही
मर जाना चाहता है ।

- आदमी अंदर से कहीं
घोंघा होता है !

(समकालीन कविता के प्रथमांक में।)

No comments:

Post a Comment

  नव-चैतन्य के महावट - रवींद्रनाथ                                 - शिवदयाल  ब चपन में ही जिन विभूतियों की छवि ने मन के अंदर अपना स्थाई निवा...