Thursday, 1 November 2012

ड्राप आउट
                          -शिवदयाल
मुजफ्फरपुर का एक गाँव .     फोटो : सृष्टि









सोचा था
तुम पर लिखूँगा एक कहानी

खूब सोचा जब इस बात पर
तो पाया
तुम तो कविता का विषय हो
ए सरिता !

तुमसे भी कहा था
वादा किया था मैंने
कि लिखूँगा जरूर एक कहानी
कि कैसे बनती फिरती है
एक छोटी-सी किशोरवय लड़की
गाँव भर की नानी

लेकिन मेरे कहन पर
भारी पड़ती है तुम्हारी नादानी,
और वह कौतुकपूर्ण विश्वास
‘हमें भी जरूर बताइएगा चाचा - !’

ओह, मैं कैसे पिरोऊँ कथा में यह सब -
जैसे कि
खेल-खेल में तुम जो
इतने सारे काम करती जाती हो -
रोपनी, सोहनी, कटनी, दँवनी
तुम्हारी देह-भंगिमाओं में
व्याख्यायित होता है ऋतु-चक्र

तुमने मास्साहब को कैसे छकाया
और स्कूल जाने से इनकार कर दिया
चारा ढोते कैसे सीधी की
कितकित की उलटी गोटी -
मैं कैसे लिखूँ
कैसे कहुँ कि
भुअरी गइया की बाछी की
आखिर तुम लगती कौन हो !

तुम तो हो
स्कूल से ‘ड्राप आउट’
और लिख सकती हो
बस स से सरिता
लेकिन यह तो बताओ
कि गाँव भर के जनावर
और चिरई-चुरुँग
कैसे समझ लेते हैं तुम्हारी भाषा ?

कागज चबाती बकरी
मुर्गियों पर झपट्टा मारता कुत्ता
आपस में सींग लड़ाती गऊएँ
झट मान लेते हैं तुम्हारी बात ?

तुमने आखिर
कौन-सी पढ़ाई पढ़ी है
ए सरिता
तुम पर लिखी जा सकती है
सिर्फ कविता !

सच सरिता,
किसी कथानक में नहीं समाते
तुम्हारे नन्हें-नन्हें सरोकार
जिनसे चलता है वास्तव में
जगत का  जीवन-व्यापार !
                           
         (’ कवि के गाँव शीतलपुरा , सीवान की एक बच्ची)

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