शरणार्थी बच्चा
-शिवदयाल
एजीयन सगर की फेनिल लहरों से टकराती
बोडरम तट पर निस्पंद पड़ी
तेरी देह - नन्हीं-सी
धरती पर संवेदना के लिए
करुणा के लिए, दया के लिए
और प्रेम के लिए
दोबारा जगह भर रही है
चिरनिद्रा में लीन बालक
तू इस सोते संसार को जगा रहा है
देख, कैसे तंद्रा टूटी है तुर्की की
कैसे यूरोप अपना वैभव-विलासजड़ित आलस तोड़ अंगड़ाई ले रहा है
कैसे सिहर रहे हैं तेरी देह देख
एशिया-अफ्रीका के लहूलुहान देश
यहां से वहां तक फैले मानवता के महासागर में तेरी छवि से हिलोरें उठ रही हैं
एेशगाह बोडरम तट पर
तुझे जगाने को मचलती लहरों की नाकाम कोशिशें एेसी ही हैं
जैसे रक्तपिपासुओं व युद्धोन्मादियों के लिए
मानवता की, शांति की, सहिष्णुता की अनसुनी अपीलें
शरणार्थी कहीं से कहीं चले जाते हैं
वे धरती पर एेसे चरवाहे हैं
जो संवेदना की नई जमीनें तलाशते रहते हैं
वे वहां से चलते हैं जहां
हो गई होती है धरती संवेदना से खाली
वे कहां-कहां से चले आ रहे हैं
कहां-कहां तक पहुंचने को
वे कुर्द हैं, अफगान हैं, सहरावी हैं
यजीदी हैं, फिलीस्तीनी हैं
चकमा हैं वे
वे रोहिंग्या हैं
वे सोमाली हैं, बुरुंडियन हैं
वे केन्या से चले आ रहे हैं
अंगोलासे खदेड़े जा रहे हैं
सुडान से कतारें,निकल रही हैं उनकी
वे होंडुरास ,ग्वाटेमाला, मेक्सिको से
भागे चले आ रहे हैं
वे वहां से भी मारे-भगाए जा रहे हैं
जहां तक हमारी धुंधली नजर नहीं पहुंचती
आखिरकार यह धरती, इसके कोने-अंतरे
इन्हीं से भरकर रह जाने वाले हैं
वे मानो भाग-भागकर
हम्हीं तक वापस पहुंचनेवाले हैं
हम शरणार्थियों की धरती के वाशिंदे बन
एक दिन मानो खुद भी खदेड़ दिए जानेवाले हैं
बेदखल अपनी जमीन से और बसी-बसाई दुनिया से
भगाए गए इन लोगों में तुम ही नहीं,
शामिल हम भी हैं
गोकि अपनी-अपनी पारियों का इंतजार करते...
यों तुम किसी भी देश के हो सकते थे,
किसी भी जात मजहब के
तुम अपने देश में नहीं मरे बच्चे
जिन लहरों ने तुम्हें डुबोया
वे तुम्हारे देश के पानी में नहीं उठी थीं
लेकिन तुम्हारी देह ने तुम्हारा ठिकाना बदल दिया
बदल दी तुम्हारी पहचान
अब प्रशांत-अंध-हिंद महासागरों का जल
तुम्हारा जल है
छहों महादेश की मिट्टी
तुम्हारी मिट्टी है
इस धरा पर जितनी हवा है, आग है
वह सब तुम्हारा है बच्चे
और हमसब पर यह सबकुछ
तुम्हारा कर्ज है -
एक और कर्ज उन कर्जों की फेहरिस्त में
जो हमपर अवतारों-मसीहाओं-देवदूतों के
पहले से चढ़े हुए हैं!
तुम शरणार्थी नहीं मरे बच्चे
सब दुनिया की संवेदना
इतनी-सी तुम्हारी निर्जीव देह में
स्वयं शरण पा रही हैं!
-- शिवदयाल
( Published in Jansatta, Sep13, 2015)


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