Thursday, 20 September 2012

 प्रतिबद्धता

कुछ नहीं
कहीं कुछ नहीं
इस उबड़- खाबड़
अंतहीन रास्ते पर
दृष्टिहीन कर देनेवाले
अंधियारे में
पसरा हुआ सन्नाटा है
जिसमें हमारी
उखड़ती साँसों का शोर है
बस !

पर अभी पुतलियों में शेष है 
उसकी रश्मियों की थिरकन 
जिस प्रकाश के लिए 
हम इतनी दूर चले ..  

(1982-83 में 'प्रक्रिया' में प्रकाशित मेरी  कविता )

2 comments:

  1. ब्लॉग की दुनिया में प्रवेश का स्वागत.कविता बहुत अच्छी है.

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