Wednesday, 10 October 2012

नाव
                                            शिवदयाल 

कागज की है
यह नाव
ओ लहरों ....
देखना,
अपनी तरंगों की गति में
कहीं इसे ले न डूबना
यह नाव कागज की है !

चलेगी थोड़ी दूर,
भीगेगी, फूलेगी
धीरे-धीरे इसमें रिसेगा पानी
फिर खुद ही ढूँढ लेगी सतह

तब तक लिए जाना
इसे नजरों से दूर
और करने देना किल्लोलें
शिशु -मन को !
ओ लहरों ...
          
(दस्तावेज में प्रकाशित )

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