यथास्थिति
- शिवदयाल
धुएँ में लगातार देखने से
एक दृष्टि-मोह बनता है,
चीजों को स्पष्ट देखने की बजाए
लगातार धुएँ से लिपटे रहने में
एक अलग ही आनंद है
कल्पना के सुंदर घर में
पलंग पर लेटे-लेटे
खिड़की से आकाश देखने में
वक्त अच्छा कटता है
यथार्थ भूले हुए
सपने की तरह
नींद में दस्तक देता है
कोई खलल क्यों
पहलकदमी किस लिए ?
(पहले की एक रचना .)
- शिवदयाल
धुएँ में लगातार देखने से
एक दृष्टि-मोह बनता है,
चीजों को स्पष्ट देखने की बजाए
लगातार धुएँ से लिपटे रहने में
एक अलग ही आनंद है
कल्पना के सुंदर घर में
पलंग पर लेटे-लेटे
खिड़की से आकाश देखने में
वक्त अच्छा कटता है
यथार्थ भूले हुए
सपने की तरह
नींद में दस्तक देता है
कोई खलल क्यों
पहलकदमी किस लिए ?
(पहले की एक रचना .)
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