Sunday, 19 May 2013

                        याद 
                                                 -शिवदयाल 
  
                                       *
                              फिर सुलझाने बैठे 
                              बेतरह उलझा
                              हिसाब-किताब 
                               कि  क्या दिया 
                               क्या पाया !
   
                                         *
                               थक कर 
                               सुस्ताने के बहाने 
                               घूमा किये 
                               और देखा किये 
                               वे सडकें , वे गलियां 
                               वे मकां , वे लोग 
                               जो सालों में 
                               नहीं बदले 
                               नहीं बद्ले… !
      
                                           *
                               रात देखा 
                               कटता हुआ चाँद 
                               झूमती हुई हवा 
                               आखों में तैर आये 
                               कैसे-कैसे दिन 
                               कैसी-कैसी रातें 
                               लमहे बहते रहे बूँद-बूँद .....! 



Sunday, 12 May 2013

स्मृति में माँ
..                         -शिवदयाल

मारूँ जामुन की टहनी पर झटास
चाटूँ करौंदे की फाँक पर  नमक

बीन आऊँ भिनसारे
रात के अंधड़ में गिरे टिकोले
गूदा खाकर सिरफल के खोइए में
पानी पीऊँ भरपेट

लेकिन किस तरह छुपाऊँ
छिले हुए घुटने
और दाग लगी बुश्शर्ट की जेब

आज तो माँ मारेगी जरूर !

तितली की पूँछ में बाँधूँ धागा
चुराऊँ ग्वाले की बोरसी से लिट्टी
बकरी के थन में मारूँ मुँह
करूँ टमटमवाले के चरते घोड़े की सवारी

और डरूँ कि
मेरे घर पहुँचने के पहले
आज उलाहना पहुँचेगी जरूर
आज तो माँ मारेगी जरूर !

झींसी की फुलेल में
निकलूँ दबे कदम चुपचाप
भर दिन खेऊँ कागज की नावें
बोरे की बरसाती में
बंसी लिए फिरूँ ताल-तलैयों में
शिकार बंद करूँ मर्त्तबान में

आज छिपने का नहीं कसूर
आज तो माँ मारेगी जरूर !

Saturday, 13 April 2013

कुछ छोटी कविताएँ 

जीवन 

एक बूँद प्यास 
एक तिनका आस 

बीत गयी साँस !

नेह
  
मैं 
वह सुन्दर दीप्ति 
हो सकता हूँ 
जिसे नेह से 
बार-बार छूकर 
तुम 
अपना हाथ जला लोगे. .


देर में  

देर में 
रुकी हवा बह चली 
देर में महमह हुई रात 
देर में   भीगी दूब  पर 
बिछे हरसिंगार 
देर में 
मकरंद से लिपटा  भौंरा 

देर में 
जरा देर में 
तुमसे मैं कह सका -

मुझे तुमसे प्यार है ! 
               

-शिवदयाल 
 



  




Monday, 25 March 2013

                रंग और नूर 
                                                                   -शिवदयाल 


सूरज की किरणें वर्षा की बूँदों पर पड़ती हैं और सात रंगों में विभक्त होकर क्षितिज पर उत्तर से दक्खिन दिशा में धनुष के रूप में तन जाती हैं। इन्द्रधनुष है तो इसका मतलब है कि कहीं जल है, तृप्ति है,  कि पिपासा और तृष्णा का अंत होने वाला है। प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुईं, अम्बर से अमृत-बूँदें बरसने ही को हैं। फिर तो वर्षा-जल से आप्यायित धरती पर सृजन का कारोबार शुरू ही हो जाएगा । हमारे यहाँ श्रमण और साधु  जो कभी नहीं रुकते-ठहरते - रमता जोगी बहता पानी - बरसात के चार महीने एक जगह ठहरकर ‘चातुर्मास’ बिताते हैं। सिर्फ अपनी सुविधा  के लिए नहीं बल्कि इसलिए भी कि उनकी गतिविधियाँ  इस ‘सृजन-उत्सव’ में कहीं से भी बाधक न बनें। प्रकृति और प्रतिवेश के प्रति इस एकात्मता-बोध् से चलकर आज हम यह कहाँ आ पहुँचे हैं कि ‘पर्यावरण दिवस’ और ‘पृथ्वी दिवस’ के नाम पर खुद को ही बचाने की गुहार लगा रहे हैं।

इन्द्रधनुष देख मन उमगता है। मानो अंतर के सारे रंग छलककर क्षितिज पर टँग जाते हैं - सतरंगे धनुष की शक्ल में। इन्द्रधनुष जैसे दिलासा देता है कि बदरंगी में भी रंग है। यों तो जमाना रंगों का है, वह भी चटख रंगों का। सादा और उदास रंगों का जमाना गया। अंतर का रंग फीका पड़ता गया और बाहर चटख रंग फैलते गए। बाहर रंग ही रंग दिखाई देते हैं और वास्तव में हम सभी किसी न किसी प्रकार रंगों के व्यापार में ही रमे हैं। कोई लाल रंग का व्यापार कर रहा है तो कोई हरे रंग का। कोई नीले रंग का तो कोई केसरिया रंग का। जब व्यापार है तो प्रतिस्पर्धा  भी है। और तब आग्रह-दुराग्रह भी हैं, और इसमें हर रंग फीका पड़ रहा है, अपनी पहचान खो रहा है।
चाहे-अनचाहे हम किसी न किसी रंग के प्रति आसक्त हैं, शायद प्रतिबद्ध  भी। हम उस खास रंग से पहचान पाते हैं, बल्कि स्वयं हमारा भी कोई न कोई रंग है, भले ही वह हमें पसंद न हो। जैसे हम खुद काले हों और गोरा रंग हमें पसंद हो, कालों को गोरा बनाने वाली क्रीमों से बाजार पट गए हैं। इसके विपरीत अगर हमें हरा ;या लाल ही सही, रंग पसंद हो तो हर कहीं उसे ही देखना चाहते है, हर चीज को उसी रंग में डुबो देना चाहते हैं। कभी-कभी हमारा आग्रह इस हद तक पहुँच जाता है कि हमें कहीं कोई और रंग दीख ही नहीं पड़ता। वैसे आँखों की एक बीमारी में कोई-कोई रंग कोई और ही रंग प्रतीत होता है, जैसे देख रहे हों लाल और दीख रहा हो केसरिया। इसे रंग-अंधता या वर्ण-अंधता कहते हैं। राजनीति में यों तो यह बीमारी आम है, लेकिन यह राजनीति का चमत्कार ही है कि कभी-कभी यही सच होता है, यानी तौर-तरीके इतने एक-से होते हैं कि रंग का भेद करना मुश्किल हो जाता है। शायद इसलिए कि सत्ता का अपना ही एक रंग होता है, उस पर कोई और रंग नहीं चढ़ता - क्या लाल, क्या हरा और क्या केसरिया।
हमारी रंग-संवेदना हमारी दुनिया को बनाती और बिगाड़ती है। देखें तो दुनिया रंग-संवेदना का ही कारोबार है। कवि-कलाकार से लेकर राजनेता, और धर्म  के पहरूए तक इसी कारोबार में रमे हैं। अलग-अलग रंग और अलग-अलग दुकानें। सभी रंगों में अपनी पहचान ढूँढ रहे हैं, सभी रंगों से पहचाने जा रहे है। सभी रंगों की कमाई कर रहे हैं। हमारे यहाँ ‘रंग जमाने’ की कोशिशें होती हैं, ‘रंगदार’ होते हैं जो मुहल्लों-टोलों में रंगदारी टैक्स वसूलते हैं।
यह उत्तर से दक्खिन तक क्षितिज पर तनी सतरंगी धन्वाकार रेखा ‘नार्थ-साउथ’ का कोई भेद नहीं मानती, बल्कि उन्हें परस्पर जोड़ती है। सबके मन के आकाश में तनता है इंद्रधनुष, चाहे वह कितना ही सूना हो, कितना ही फीका हो, या एकाकी!  लेकिन इंद्रध्नुष है तो उसमें सात रंग हैं। वह छह, पाँच या कम, बल्कि आठ रंगों का भी नहीं हो सकता। कोई गूढ़ बात है, रहस्य जीवन का। इंद्रधनुष के सात रंग, जैसे सात सुर, जैसे सात समुद्र, जैसे सात जन्म ...! सात घोड़े सूरज के! सप्ताह के दिन भी सात ही।
हमारा लोक-मन भी कितना रंगीला है। वह रंगों का उत्सव-पर्व मनाता है। कृष्ण की रास-लीला भी तो रंग-लीला ही है। वह गोपियों के संग रास ही नहीं रचाते, होली भी खेलते हैं। गुरु-दर्शन से आह्लादित हजरत अमीर खुसरो कह उठते हैं - आज रंग है! राजस्थान की मरूभूमि पर भी चुनरियों के छींटदार रंग छिटके पड़े हैं। वास्तव में हमारे लोक जीवन में ही रंगों को देखने की एक ‘दृष्टि’ है। इसमें किसी एक रंग के प्रति आग्रह नहीं दिखता, बल्कि मन अपने ‘इष्ट’ के रंग में ही रंग जाना चाहता है और यह जीवन की चरम उपलब्धि है। वह ‘इष्ट’ चाहे फिर देवता हो या मनुष्य। वहाँ हर रंग अलग-अलग कारणों से अलग-अलग संदर्भों में समादृत है। क्योंकि यह दुनिया एक रंग की नहीं बनी, नहीं बनाई जा सकती। यह दुनिया रंग-बिरंगी है और बनी रहेगी। हर रंग दूसरे रंग के होने से ही पहचान पाता है, अर्थ पाता है। रंगों की कैसी विस्तीर्ण और अद्भुत छटा बन सकती है, इसका प्रमाण स्वयं हमारा भारतीय समाज है।

इंद्रधनुष अपने आप में एक मूल्य है। यह चातक की पिपासा को स्वाति की बूँद का आश्वासन है। इंद्रधनुष में सृजन के रंग समाहित हैं। इसके सात रंग परस्पर मिलकर असंख्य रंग-वर्णों की सृष्टि करते है, जबकि सात रंग वास्तव में निखरी हुई उजली धूप  के सात टुकड़े हैं। इंद्रधनुष धूप के टुकड़ों से ही तो बनता है। सातों रंग मिलकर धूप बन जाते हैं जिसकी ऊष्मा  और आँच से जगत का कार्य-व्यापार चल रहा है, जिसके आलोक से हमारी दुनिया प्रभासित हो रही है।
इंद्रधनुष सृष्टि की बाहों का घेरा है - व्यष्टि से लेकर समष्टि तक को अपने में समेट लेने को आतुर!   (जनसता में प्रकाशित।फोटो इन्टरनेट से।)                                                                                                                                                     

Saturday, 16 March 2013

       बांग्लादेश की नई राह
                                                                                                                                   -शिवदयाल
शाहबाग की क्रांति कई मायनों में खास है।  ढाका के इस व्यस्त चौक पर जो लोग उमड़-उमड़ कर आ रहे हैं उनका वास्ता वर्तमान से कम, इतिहास से ज्यादा है। वे अरब वसंत के क्रांतिकारियों की तरह जनविरोधी सरकार को उखाड़ फंेकने नहीं आ रहे, बल्कि चालीस  साल पहले मुक्ति संग्राम के दौर में पाकिस्तानी सेना की छत्रछाया में अपने ही देश के नर-नारियों को मारने और सताने वाले चरमपंथी युद्ध-अपराधियों को दंडित करवाने के लिए उन्होंने कमर कस ली है जो आज तक आजाद घूम रहे हैं। इन पर देशद्रोह और मानवता के विरुद्ध अपराध का मुकदमा चल रहा है। बांग्लादेश की युवा पीढ़ी इस मामले पर अधिक संवेदनशील और मुखर दिखाई दे रही है। शाहबाग की लड़ाई बंगाली राष्ट्रवाद और इस्लामी कट्टरपंथ की बीच है। वहाँ की सरकार अभी स्वयं बंगाली राष्ट्रवाद का प्रतीक बनी हुई है और मुक्ति संग्राम के ’निर्दयी विश्वासघातियों’ को कठोर दंड दिलवाने के लिए कटिबद्ध दिखाई दे रही है।
    बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में  जितने नागरिकों को संहार हुआ वह द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का सबसे बड़ा, सबसे भीषण नरसंहार था। गैर सरकारी सूत्र मरने वालों की संख्या तीस लाख से ऊपर बताते हैं, कुछ अन्य सूत्र तीन लाख से ऊपर। स्वयं पाकिस्तान सरकार छब्बीस हजार नागरिकों के संहार की बात स्वीकार करती है। भारत आने वाले पूर्वी पाकिस्तान के शरणार्थियों की संख्या से भी इस बात की पुष्टि होती है कि पाकिस्तानी सेना और उसके द्वारा खड़ी की गई मिलिशिया ने लाखों लोगों को मारा था। यों तो पोलैण्ड और चेकोस्लोवाकिया में सोवियत टैंक उतारे गए थे तब भी नागरिक आबादी निशाना बनी थी। वैसे ही कोरिया और वियतनाम युद्ध में भी बड़ी संख्या में नागरिक हत हुए थे, लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सबसे बड़ा और वीभत्स नरसंहार पूर्वी पाकिस्तान में हुआ माना जा सकता है। इसके बाद अस्सी के दशक में कम्बोडिया के खमेररूज शासन में पोलपोट ने लाखों हमवतनों को मारा। वास्तव में पाकिस्तानी सेना ने भी अपने हमवतनों (भले ही पूर्वी पकिस्तानी, बंगाली) का संहार किया, उनका जिनका पाकिस्तानी राष्ट्र के निर्माण में भारी योगदान था, बल्कि पश्चिमी पाकिस्तान से भी अधिक।
    इस क्षेत्र में ’धार्मिक राष्ट्रीयता’ के बीज तो अंग्रेजों ने 1905 में ही बो दिए थे जब जनसंख्या के धार्मिक चरित्र एवं संकेन्द्रण के आधार पर बंगाल का विभाजन किया था - मुस्लिमबहुल पूर्वी बंगाल और हिन्दूबहुल पश्चिमी बंगाल। हालाँकि राष्ट्रवादी आंदोलन के दबाव में अंग्रेजों को साम्प्रदायिक विभाजन का यह फैसला बदलना पड़ा और बंगाल पुनः 1912 में एक हो गया। लेकिन यह कैसे माना जाए कि बंग-भंग और पाकिस्तान की मांग, और बाद में भारत के विभाजन और पाकिस्तान के जन्म के बीच कोई संबंध नहीं है। बंग-भंग ने यह तो साबित कर ही दिया था किसी इलाके का भूगोल आबादी की धार्मिक आस्थाओं के आधार बदलना संभव है। भारत-विभाजन कहीं न कहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से बंग-भंग की ही एक व्यापकतर, वृहत्तर पुनरावृत्ति था। इसमें पश्चिमी भारत को भी धार्मिक आधार पर शेष भारत से अलग कर दिया गया। वास्तव में बंग-भंग भारत के साम्प्रदायिक आधार पर विभाजन का एक प्रयोग ही था, उसकी पूर्व पीठिका थी। अंग्रेजों को तत्काल हासिल यह था कि काँग्रेस के नेतृत्व में राष्ट्रवादी आंदोलन कमजोर पड़े, मुसलमानों को इससे (काँगेस से) दूर रखकर। बंग-भंग के अगले ही साल 1906 में और वह भी ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। पुनः 1909 में मॉर्ले-मिंटो सुधार के तहत मुसलमानों के लिए साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था का  प्रस्ताव आया। 1907 में ही पूर्वी बंगाल के कोमिल्ला में दंगे हुए, बाद में जिसकी कड़ी भी बनी जमालपुर तथा अन्य स्थानों में। इसी दौरान ऐसे पर्चे भी छापे और बांटे गए जिसमें मुसलमानों से हिन्दुओं से पूरी तरह दूर रहने की अपील की गई। इसकी उग्र प्रतिक्रिया स्वदेशी आंदोलन के कार्यकर्ताओं  में हुई।
    भले ही 1912 में बंगाल का एकीकरण हो गया लेकिन भारत के साम्प्रदायिक विभाजन की नींव पड़ चुकी थी और वह भी बंगाल में। बाद के दशकों में हालाँकि मुस्लिम राजनीति में उत्तर  भारतीय अधिक प्रभावी रहे, और अलीगढ़, लाहौर और फिर कराची जैसे शहर मुस्लिम राजनीति के केन्द्र रहे, लेकिन इस पूरी राजनीति का अभ्युदय ढाका से ही हुआ था। बाद में जिन्ना ने पाकिस्तान के लिए जो ’सीधी कार्रवाई’ की धमकी या चेतावनी दी तो उसके पीछे असली ताकत ढाका और पूर्वी बंगाल की ही थी। सीधी कार्रवाई का सबसे ज्यादा असर भी बंगाल में ही दिखाई दिया।
    पूर्वी बंगाल, भारत विभाजन के पश्चात् पूर्वी पाकिस्तान बना, जो पाकिस्तानी राष्ट्रीयता की उद्भव-भूमि था। क्या विडम्बना है कि पाकिस्तानी राष्ट्रीयता की रक्षा और पाकिस्तानी राष्ट्र को एकजुट रखने के नाम पर पाकिस्तान निर्माण के पच्चीस साल के अंदर ही पूर्वी पाकिस्तान के लाखों लोगों को मारा गया। वजह? पाकिस्तानी राष्ट्रीयता के ऊपर बंगाली राष्टीªयता का हावी होना! विभाजन की राजनीति भी कैसे खेल खेलती है! पक्ष और पाले कैसे बदलते रहते हैं! लेकिन यह बंगाली राष्ट्रीयता अंध ’इस्लामी राष्ट्रीयता’ से अलग कैसे पाँव पसार सकी जिसने भारत विभाजन के माध्यम से हजार साल की साझी विरासत को छिन्न-भिन्न कर दिया था? दरअसल सत्ता  प्राप्ति की मुहिम मे  साझेदारी या उसकी अगुआई का अनिवार्य परिणाम यह नही कि सत्ता  -भोग में भागीदारी, वह भी बराबर की, हो ही। पूर्वी पाकिस्तान गरीब था और समाज के प्रभावशाली तबके में शिक्षक, वकील डाक्टर और किरानी जैसे कुछ पेशेवर लोग थे। पश्चिमी पाकिस्तान संपन्न था। यहाँ रईस थे, इजारेदार थे, कारखानेदार थे, जमींदार थे, और फौजी थे। पाकिस्तानी सेना में लगभग सभी अधिकारी पश्चिमी पाकिस्तानी थे, उसमें भी पंजाबी अधिक थे। पूर्वी पाकिस्तान के अधिकारी नाम-मात्र को थे। बहुत सालों बाद एक मेजन जेनरल हुआ था। नये देश के इस सम्पन्न, प्रभुत्वशाली तबके ने एक ओर तो अधिक से अधिक राजनीतिक और आर्थिक शक्ति अपने हाथों केन्द्रित कर ली, तो दूसरी ओर ये सŸाा के षड़यंत्रों में भी शामिल हो गए, वह भी इस तरह कि राजनीति में लगातार सेना हावी होती चली गई। पाकिस्तानी राष्ट्रीयता की उद्भव-भूमि पूर्वी पाकिस्तान अपने पश्चिमी समकक्ष के पीछे लंग भरता रहा - बढ़ती आबादी, बेकारी, भुखमरी, बाढ़, अकाल व बीमारी से त्रस्त।
    मुस्लिम लीग को अवामी लीग ने विस्थापित कर दिया जो शुरू में तो अपने को अधिक पाकिस्तानी जताती रही, लेकिन राजनीति, अर्थव्यवस्था और प्रशासन में लगातार उपेक्षा से बंगाली राष्ट्रीयता धीरे-धीरे पाकिस्तानी राष्ट्रीयता पर हावी होती चली गई। स्वाभाविक है कि इस नई राजनीति में हिन्दुओं के लिए भी जगह थी जो भले ही संख्या में बहुत कम रह गए थे, तब भी उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर थी। इस नई राजनीति को अल्पसंख्यकों की दरकार थी और इसके लिए उसे साम्प्रदायिक विद्वेष और विभेद की नीति को छोड़ भारत की ’धर्मनिरपेक्ष’ राजनीति का अनुसरण करना था। 1953 में ही ऑल पाकिस्तान अवामी मुस्लिम लीग में से पार्टी ने ’मुस्लिम’ का परित्याग कर दिया। अब तक बांग्ला को पाकिस्तान की एक राजभाषा का दर्जा मिल चुका था गो कि बहुत जद्दोजहद के बाद। 1948 में ही नोटों-सिक्कों, और स्टैम्प टिकटों आदि से बांग्ला लिपि गायब कर दी गई और उसके स्थान पर उर्दू आ गई। भारी आक्रोश पैदा होने के बाद स्वयं जिन्ना को ढाका जाना पड़ा जहाँ उन्होंने निर्णायक रूप से उर्दू की तरफदारी की और उसके पक्ष में फैसला सुना दिया। इसके बाद ही 1952 का बांग्ला भाषा आंदोलन खड़ा हुआ। तब तक 1949 में ऑल पाकिस्तान अवामी मुस्लिम लीग की स्थापना ढाका में हो चुकी थी , मुस्लिम लीग के खिलाफ बंगाली राष्ट्रीयता को मजबूत करना जिसका ध्येय था। बाद में 1956 में पाकिस्तान की नेशनल एसेम्बली में अवामी लीग और रिपब्लिकन पार्टी की गठबंधन सरकार को बहुमत मिलने के बाद लीग के नेता हुसैन शहीद सुहरावर्दी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने जब पूर्वी पाकिस्तान को पश्चिम के समकक्ष लाने की कोशिशें शुरू की तो राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा ने उनसे इस्तीफा ले लिया। इन्हीं मिर्जा ने 1958 में मार्शल ला लागू कर जिस जनरल अयूब खान को मार्शल ला प्रशासक बनाया उसी ने राष्ट्रपति मिर्जा को अपदस्थ कर दिया। बाद में सुहरावर्दी ने अयूब खान के खिलाफ एक गठबंधन बनाया लेकिन 1963 में बेरूत के एक होटल में वे मृत पाए गए।
शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में अवामी लीग की राजनीति पूर्वी पाकिस्तान को पाकिस्तान की मुख्यधारा की राजनीति से लगातार अलग कर रही थी लेकिन इसके लिए जिम्मेवार स्वयं पाकिस्तानी राजनीतिज्ञ और सेना थी। शेख मुजीब के छह सूत्री मांगपत्र पाकिस्तानी सरकार के समक्ष रखते ही समझादारों को अससास हो गया था कि विलगाव में पड़ा पूर्वी भाग अब अलग रास्ता अख्तियार करने के लिए तैयार था। लेकिन विडम्वना यह कि भुट्टो जैसा नेता भी परिस्थिति की गंभीरता का अंदाजा नहीं लगा पा रहा था। 1970 के आम चुनावों में मुजीब की अवामी लीग को पूर्वी पाकिस्तान की 169 में से 167 सीटें मिलीं जबकि पश्चिमी पाकिस्तान की 138 में से एक भी नहीं। सरकार बनाने का मुजीब का दावा खारिज कर दिया गया और इस प्रकार ’बांग्लादेश’ के निर्माण का आधार पूरी तरह तैयार हो गया और इसी के साथ भयानक दमन और उत्पीड़न का वह दौर शुरू हुआ जिसके बारे में ऊपर बताया गया। ’ऑपरेशन सर्चलाइट’ पूर्वी पाकिस्तान को एकदम से रौंद डालने के लिए शुरू किया गया। एक विचित्र बात यह थी कि तब के पूर्वी पाकिस्तान में इस्लामी कट्टरपंथी ’द्विराष्ट्र सिद्धांत’ के आधार पर अब भी ’एक पाकिस्तान’ के पक्षधर थे और पाकिस्तानी सेना का खुलकर साथ दे रहे थे। इनके कई गुट थे, जैसे रजाकार, अलशम्स, अलबद्र इत्यादि। बांग्ला राष्ट्रवादियों एवं उनके समर्थकों को मारने और यातनाएं देने में इन्होंनेे बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। इनपर हजारों बेगुराहों के खून का इल्जाम था, सैकड़ों स्त्रियों के साथ इन्होंने बलात्कार किया था। इन्होंने लोगों के अंग-भंग किए थे।
    1975 में तख्ता पलट और शेख मुजीब की हत्या के बाद बांग्लादेशी समाज के ये तत्व एकदम निर्भय हो गए। लगातार सैन्य शासन के दुष्चक्र में फँसा देश तब भी इनके जुल्म और अपराध नहीं भूल सका। अवामी लीग जो नेपथ्य में चली गई थी, 1990 में मार्शल लॉ हटने के बाद पुनः उभर कर आई और इसने लोगों  को मुक्ति संग्राम की याद दिलाई। अवामी लीग की नेता शेख हसीना वाजेद शेख मुजीब की बेटी हैं। हसीना दूसरी बार प्रधानमंत्री बनी हैं। कट्टरपंथी पहले सैन्य शासन और अब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के साथ हैं। पूर्व राष्ट्रपति जियाउर्रहमान की बेवा खालिदा जिया जिनकी नेता हैं। ये वही जनरल जियाउर्रहमान थे जिन्होंने सैनिक तख्ता पलट कर मुजीब की हत्या के पश्चात गद्दी हथियाई थी।
    2008 के आम चुनाव के पहले देश में सेना समर्थित एक ’केयरटेकर’ सरकार थी जिसपर तटस्थ रहकर चुनाव कराने की जिम्मेदारी भी थी लेकिन जिसने भ्रष्टाचार का बहाना लेकर दो साल चुनाव टाला था। इस सरकार ने मतदाता सूची को बहुत हद तक दुरुस्त कर दिया था और इससे कहीं न कहीं अवामी लीग की ही राह आसान हुई और उसे भारी बहुमत मिला। देश में राजनीतिक स्थिरता, लोकतंत्र की मजबूती तथा कट्टरपंथियों को हाशिए पर डालना इस सरकार की प्राथमिकता रही। हसीना सरकार में महिलाएँ भी हैं, अल्पसंख्यक भी और कुल मिलाकर इस सरकार की उपलब्धियाँ पूर्ववर्ती सरकारों से बेहतर ही रही हैं। सŸाा में आने के पहले भी शेख हसीना ने मुक्ति संग्राम के युद्ध अपराधियों को दण्ड दिलवाने का वादा किया था। सŸाा में आते ही हसीना ने युद्ध अपराधियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई तेज कर दी। दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने केयरटेकर सरकार की व्यवस्था को अपने एक निर्णय में लोकतंात्रिक आदर्शों एवं सिद्धांतों के विरुद्ध ठहराया। इसे देखते हुए हसीना सरकार एक संविधान संशोधन प्रस्ताव लेकर आई, ताकि संसद में प्रचंड बहुमत के रहते इसे पारित  करवा लिया जाए। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने इसके विरुद्ध अभियान छेड़ दिया और  सड़क पर आ गई। कट्टरपंथी और युद्ध अपराधी भी इसमें शामिल हो गए। खालिदा जिया ने तो वाशिंगटन पोस्ट में अमेरिकी सरकार से देश में लोकतंत्र बचाने के लिए हस्तक्षेप तक की अपील कर दी जिसकी व्यापक प्रतिक्रिया हुई और उनपर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की माँग हुई।
इसी बीच 4 फरवरी को ूंत बतपउम जतपइनदंस ने जमाते इस्लामी के सहायक महासचिव अब्दुल कादेर मुल्ला को उम्र कैद की सजा सुनाई। मुल्ला पर तीन सौ हत्याओं का आरोप है। बांग्लादेश के राष्ट्रवादियों तथा आज की युवा पीढ़ी को यह फैसला मान्य नहीं हुआ।युद्ध अपराधियों को मृत्युदंड से कमतर कुछ भी नहीं की माँग करते वे ढाका के शाहवाग चौक पर आ गए और वही डेरा डाल दिया। अब लड़ाई इस्लामी चरमपंथियों और बांग्ला राष्ट्रवादियों के बीच है। इस्लामी तत्वों में हिंसा और खूनखराबा में कोई कसर नहीं छोड़ी है। शाहवाग आंदोलन के एक सक्रिय कार्यकर्ता  व ब्लॉगर की हत्या के बाद आंदोलन और उफान पर आ गया है और अब समूचा बांग्लादेश इसकी गिरफ्त में है। वास्तव में शाहवाग आंदोलनकारी शेख हसीना सरकार को मजबूती प्रदान कर रहे हैं। उसके फैसलों को वैधेता प्रदान कर रहे हैं। हर उम्र, लिंग और वर्ग के लोग, इसमें शामिल हैं लेकिन युवाओं की संख्या सबसे अधिक है, वह भी लड़कियों की। यह लोग एक खुला, लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और स्त्री संवेदी समाज चाहते हैं और इसके लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं। यह आंदोलन की शक्ति का ही परिणाम है कि शेख हसीना सरकार ने बी.एन.पी. और चरमपंथियों के आगे झुकने से मना कर दिया है। उसने केयरटेकर सरकार की व्यवस्था से भी इनकार कर दिया है, चुनावों की निष्पक्षता के लिए उसने मजबूत चुनाव आयोग को पर्याप्त माना है।
    भारत के राष्ट्रपति के हाल की यात्रा शेख हसीना सहित सभी बांग्ला राष्ट्रवादियों के लिए बड़ा सम्बल रही है। इससे वास्तव में बंगाली राष्ट्रवाद को और मजबूती मिली है। कुछ तत्व  भारत में बांग्लादेश के चरमपंथियों का समर्थन कर रहे हैं और उनकी माँगों को जायज ठहरा रहे हैं। ये लोग प्रकारान्तर से आज भी द्विराष्ट्र के सिद्धांत को जायज ठहराने की कोशिश कर रहे हैं जबकि बांग्लादेश के उदय ने इसका खोखलापन चालीस साल पहले ही उजागर कर दिया। हाल के वर्षों में एक भरोसेमंद पड़ोसी मित्र देश के रूप में बांग्लादेश ने भारत की सुरक्षा चिंताओं के प्रति संवेदनशीलता दिखाई है, और तत्परतापूर्वक उन सभी आतंकी एवं चरमपंथी समूहों के खिलाफ कार्रवाई की है जो अपनी गतिविधियाँ उसकी जमीन से संचालित कर रहे थे। दोनों सरकारों का साक्षा लक्ष्य है - क्षेत्र में शांति, स्थिरता और विकास। अब भारत को आगे बढ़कर इस सौहार्द को स्थाई बनाने की कोशिश करनी चाहिए। बांग्लादेश के साथ दोस्ती राष्ट्रहित का मामला है। एक मुख्यमंत्री की जिद और दृष्टिहीनता के कारण भारत तिस्ता नदी जल बँटवारे पर अपनी प्रतिबद्धता पूरी नहीं कर पाया है। इसके बाद भूमि-सीमा विवाद हल करने का वादा राष्ट्रपति मुखर्जी कर आए हैं। पता नहीं इसका क्या अंजाम होगा। भारत की सकारात्मक पहल हर तरह से दोनों देशों के हित में होगी। यह अवसर गँवा देना दोनों देशों के लिए नुकसानदेह साबित होगा।  (जनसत्ता16 मार्च 2013)
                                                                                                                                     - शिवदयाल

Friday, 8 March 2013

मीनू मैम की हँसी
                                -शिवदयाल
बहुत जतन से
बचाई गई कोई चीज
ज्यों दिखा दी जाए
किसी को चौंकाने
या अपना ही आह्लाद दिखाने को
- ऐसे ही फैलती है
थोड़े-से मोटे होठों पर
मीनू मैम की हँसी !

एरियर, इन्क्रीमेन्ट
खाली बस
किसी सहकर्मी की लिफ्ट
बॉस द्वारा प्रशंसा
बच्चों की कभी-कभार की लाग-लपेट और लाड़ व
उनकी उपलब्धियाँ
बुजुर्ग पति की दुर्लभ चेष्टाएँ
व्यस्त दिनचर्या में से निकाली गई कोई  ट्रीट ...

मीनू मैम की हँसी
जैसे उत्सव-क्षणों का निर्वाह है !


मीनू मैम की बिन्दी

भवों के सन्धि-स्थल के ठीक ऊपर
अब सिर्फ हल्का-सा एक दाग है

लम्बे वर्तुल केशों के बीचोंबीच
काढ़ी गई माँग में
खूब चौड़ा सिन्दूर भरती थी कभी मीनू
अँजी हुई पनीली आँखों के ऊपर
तनी हुई भवों के क्षितिज के बीचोंबीच
उठता था जैसे
सुबह का सूरज - टेस लाल

यह मीनू से मैम बनते-बनते में
माथे पर घुलते-फैलते-पसरते
कुमकुम की जगह ले ली
प्लास्टिक की चिपचिपी बिन्दी ने
और इस बिन्दी ने छोड़ा -
यह गोल, कहीं गोरा धब्बा

अब भी कभी-कभी
जो दमक जाती है
मीनू मैम के माथे पर मखमली बिन्दी
वह फुर्सत का  एक रोमानी ‘चेंज’ हैं !

                                                  -शिवदयाल

Thursday, 7 March 2013

मीनू मैम का पर्स  
                                                 - शिवदयाल

घर  से निकलते-निकलते
उसे टाँग लेती हैं वे यंत्रवत्
न जाने कितनी बार
टटोलना पड़ता है उसे
दिन भर में

आइडेन्टिटी कार्ड और
डाक्टर का प्रेस्क्रिपशन
कुछ जरूरी गोलियाँ
नोट और रेजगारियाँ
चुकाए जाने वाले बिल
खरीदे गए सामानों की कुछ रसीदें
टेलीफोन डायरी, नेलकटर...
और पसीने और प्रसाधन की
मिली-जुली गंध वाला
एक लेडिज रूमाल !

पर्स है तो जैसे
मुकाबले का हौसला है ।

घर लौटने पर सबसे पहले
जिस चीज को वह खुद से
अलग करती हैं - उसे सोफे पर दे फेंक
वह है मीनू मैम का पर्स !

जब कि मीनू मैम की पर्स में बंद हैं
मीनू मैम का वजूद !
 

Saturday, 23 February 2013

                             आहत आस्थाओं का देश

                                                                                                                                      - शिवदयाल
आस्था और अभिव्यक्ति को लेकर पिछले कुछ वर्षों में अनेक लज्जाजनक प्रसंग सामने आए हैं, बल्कि आए दिन कुछ न कुछ घटता ही रहता है। एक घाव अभी भरता नहीं कि और खरोचें लग जाती हैं। किसी के कुछ कहने पर कोई न कोई आहत हो रहा है, लेकिन जो कोई आहत हो रहा है वह खुद ही को कोई खास जाति या समुदाय बता रहा है। वह कह रहा है- चूँकि इस बात से मुझे चोट पहुँची इसलिए यह माना जाए कि मैं जिस समुदाय से आता हूँ उसकी भावनाएं भी आहत हुईं। कौन हैं ये लोग? या तो धर्म या संस्कृति के ठेकेदार या पिफर राजनीति के ठेकेदार। अब इस समाज में कुछ विलक्षण बुद्धिजीवी  भी शामिल हो गए हैं लेकिन पिफर भी इस विशेषता के साथ कि इन्हें व्यापक समाज का  बनने से किसी ‘इस’ या ‘उस’ समाज का बुद्धिजीवी कहलाना बेहतर लगता है। ये बुद्धिजीवी भी उपरिलिखित ‘ठेकेदारों’ का ही पिष्टपोषण करते हैं, भले ही वे इस ख्याल में गापिफल रहें कि उनकी कोई अलग स्वायत्तता है। ये लोग किसी समुदाय विशेष की तरपफ से पूरे अधिकार और विश्वास के साथ अपने विचार रखते हैं- आधिकारिक प्रवक्ता के तौर पर जैसे। मजे की बात यह कि उनके कथन भी प्रायः उकसाने या चोट पहुंचाने वाले ही होते हैं।
भारत में अभिव्यक्ति का प्रश्न अब नियंत्रित अभिव्यक्ति बनाम स्वाधीन अभिव्यक्ति को हो गया है। सरकार और अदालतें लोकतंत्रा और संविधान की दुहाई देते हुए ही प्रगट या अप्रगट रूप से नियंत्रित अभिव्यक्ति के पक्ष में ही नजर आती हैं। हम बोलें जरूर, लेकिन ऐसे बोलें जिससे किसी और की ‘भावनाएं आहत न हों’! स्कूलों-कॉलेजों-पंचायतों में अब इस बात के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए कि एक नागरिक के तौर पर हमें  क्या बोलना है, कितना बोलना है और कैसे बोलना है। प्रशिक्षकों के रूप में धार्मिक समूहों और राजनीतिक दलों के नुमाइंदों को नियुक्त किया जा सकता है। आखिर तो ‘भावना’ और ‘आस्था’ के थोक डीलर तो ये ही लोग हैं। ये लोग ही तय करते हैं, किसे आने देना है, किसे निकाल बाहर करना है! अगर सचमुच ऐसी व्यवस्था हो जाए तो कम से कम सरकार का काम आसान हो जाएगा और जनता भी यह बात गांठ बांध लेगी कि वह ‘जनार्दन’ नहीं है, बस प्रजा है इस लोकतंत्रा में, और इसीलिए ढंग से, हिसाब से रहना है। इतना होने पर तो ‘स्वतंत्राचेता’ बुद्धिजीवीयों को अपनी औकात समझ में आ ही जानी है, और इन करतबों का प्रयोजन भी तो आखिरकार यही है।
कभी-कभी मन में विचार आता है कि इस बहुधार्मिक, बहुभाषिक, बहु सांस्कृतिक समाज में भाषाशास्त्रिायों को नई ‘लोकतांत्रिक भाषा’ रचने के लिए तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। ऐसी भाषा जिसमें व्यंजना न हो, मुहावरे न हो, व्यंग्य व उलटबांसियां न हों, जिसमें बात को समझाने के लिए उदाहरणों का प्रयोग न हो और हां, जहां मजाक के लिए भी कोई गुंजाइश न हो। हमारे यहां तो चुटकुले और लतीपफे भी बहुत कहे-सुने जाते हैं जिनमें कोई न कोई समुदाय आ ही जाता है। दाद देनी पड़ेगी हमारे ‘सरदार जी’ भाइयों की जिन्होंने अब तक अपने उफपर गढ़े जाने वाले लतीपफों के लिए मुकदमा नहीं किया। या क्या पता उनकी सहनशीलता भी जवाब दे जाए! हमारे परम सहिष्णु ग्रामीण समाज में विभिन्न जातियों के बारे में एक से बढ़कर एक लोकोक्तियां और मुहावरे प्रचलित हैं। इनमें निम्न जातियों को ही नहीं, उच्च जातियों को भी लक्ष्य बनाया गया है, बल्कि अधिक बनाया गया है- उनके दोहरे मानदंडों, स्वार्थी व आत्मकेन्द्रित स्वभाव, उनके तिकड़मों और काइयांपन को निशाना बनाया गया है। यह सब भी प्रतिबंधित हो जाना चाहिए अब, क्योंकि इससे आखिर किसी न किसी की भावनाएं आहत होती ही हैं।
तो बिल्कुल सादा, सरल, समत्वपूर्ण, लोकतांत्रिक भाषा रचना और बरतना भी हमारा राष्ट्रीय कर्त्तव्य होना ही चाहिए। एक इतना-सा काम हो जाने पर तो लेखकों-लिक्खाड़ों का काम तमाम हो ही जाना है। इससे नियंत्रित अभिव्यक्ति का महान उद्देश्य पूरा हो जाता है। यह रास्ता निरापद है और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुकूल भी ठहरता है। आखिर अपने देश में वैसा कारनामा तो किया नहीं जा सकता, जेसे कि पूर्वी पाकिस्तान के ढाका में सन् 1971 के संभवतः अप्रैल महीने के आखिर में जनरल टिक्का खां की पफौज ने पाकिस्तानी राष्ट्र के ‘व्यापक हित में’ अभियान चलाकर ढाका को लगभग ‘बुद्धिजीवीविहीन’ बना डाला था। रह रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। वैसे होने को क्या नहीं हो सकता। अपने देश में ऐसा सपना देखने वाले न हों- यह कैसे कहा जा सकता है। मौका मिलने की बात है। देश की जनता मौका कमोबेश सबको देती ही है- आज न कल।
जिस देश और समाज ने कुछ अपवादों को छोड़ कभी भी वाणी पर बंधन स्वीकार नहीं किया उसे अब उपदेश देने की कोशिश की जा रही है- क्या बोलो, कैसे बोलो, या पिफर बोलो ही क्यों? संवाद और सायुज्यता जिस समाज व संस्कृति का आधार रहा तो वहां अभिव्यक्ति का पाठ पढ़ाया जा रहा है। आप अभिव्यक्ति को रोकिए, और संवाद खत्म! इतना विशाल देश और समाज क्या संवादहीनता में टिका रह सकता है? क्या हमारे हित और सोच सचमुच इतना परस्पर विरोधी है कि हमें खुलकर अपनी बातें रखने से गुरेज करना चाहिए? यदि हां, तो एक राष्ट्र के रूप में बचे रहने की हमारी कुछ संभावना है?
एक भ्रम पफैलाया जा रहा है, जैसे अभिव्यक्ति की स्वाधीनता का अर्थ दूसरों को चोट पहुंचना ही हो। यह बात तो कोई भी व्यक्ति समझ सकता है, बल्कि बचपन से ही हम पढ़ते-सुनते आए हैं कि हमारी स्वतंत्राता दूसरों पर बंधन भी हो सकती है, वह वहीं तक प्रयोज्य हो सकती है जहां तक दूसरे भी उसका उतना ही अनुभव करें जितना कि हम। उसी तरह गाली-गलौज और धमकी को स्वाधीन अभिव्यक्ति का उदाहरण नहीं माना जा सकता। हमारे बोलने की आजादी का मतलब है हमारे बारे में बोलने की दूसरों को आजादी देना। और क्या अर्थ हो सकता है इसका? यहां हम अथवा कोई अन्य व्यक्ति, समूह या समुदाय इससे बरी नहीं हो सकता- किसी भी आधार पर नहीं। ऐसा नहीं हो सकता कि हम राजनीति में सामाजिक विभाजन को स्वीकार करें और अभिव्यक्ति के मामले में इससे पलट जाएं और ‘दण्डमुक्ति’ के बहाने तलाशें। भारत में लोकतांत्रिक राजनीति का प्रसार हुआ है। इसके क्या नतीजे हुए हैं, अच्छे या बुरे, या जैसे भी, इसका विश्लेषण करने से रोका नहीं जा सकता, न ही उसकी कसौटी बदली जा सकती है। इसकी जरूरत तो कतई नहीं है। अगर आप दलित, पिछड़ा, अल्पसंख्यक या महिला बनकर चुनाव लड़ते हैं और अपनी इस विशिष्ट पहचान से सत्ता प्राप्ति में आपको सहूलियत होती है तो इसी आधार पर अपने कार्यप्रदर्शन या आचरण के मूल्यांकन से परहेज क्यों हो? यहां अभिव्यक्ति का मामला क्योंकर उठना चाहिए? आपको तो जवाब देने के लिए प्रस्तुत होना चाहिए ओर अपनी बात रखनी चाहिए।
याद आता है, संभवतः 1996 में पटना में आयोजित एक सभा में प्रख्यात समाजवादी नेता व चिंतक किशन पटनायक ने राजनीतिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहा था कि यह भारत का दुर्भाग्य है कि राजनीति में जो शूद्र नेतृत्व खड़ा हुआ, वह भी भ्रष्ट हो गया, इससे बदलाव की संभावनाएं धूमिल हो गईं। आज की स्थिति होती तो शायद किशनजी को भी अपने ‘कथन’ का पफल भुगतना पड़ता। देश भर में उनके खिलापफ मुकदमे दायर होते और उन्हें ‘खलनायक’ घोषित कर दिया जाता। उनके कथन की गहराई में उतरा जाए तो पता चलेगा कि किस पीड़ा से उन्होंने यह बात कही। तब तक राजनीतिक अर्थशास्त्रा में भ्रष्टाचार को ‘समकारी कारक’ मानने के आधुनिक सिद्धांत  का प्रवर्तन नहीं हुआ था, उनका कथन तो इस सिद्धांत  के ठीक विपरीत पड़ता है। इसी प्रकार सत्तर से नब्बे के दशक तक आंदोलनकारी समूहों में यह सर्वमान्य बात थी कि महिलाओं के समाज और राजनीति की मुख्यधारा में आने से समाज और व्यवस्था मानवीय बनेगी। क्या इस विश्वास पर देश का महिला नेतृत्व खरा उतर सका? चार-पांच राज्यों में महिला नेतृत्व उभरा तो, लेकिन उसने अपने को किसी भी स्तर पर पूर्ववर्तियों से अलग दिखने का प्रयास भी नहीं किया, बल्कि कभी तो अपने को अधिक सख्त और असंवदेनशील ही सिद्ध  किया। क्या यह असंगत विश्लेषण है और महिला विरोधी है, और ऐसा कहना अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता का दुरुपयोग है?
राजनीतिक जोड़-घटाव व चुनावी लाभ-हानि के पफेर में देश में एक प्रतिबंध की संस्कृति विकसित की गयी है। अदालत भी ‘प्रतिबंध’ की मांग पर अतिशय संवेदनशीलता, बल्कि सदाशयता दिखाती है। यह कौन-सा लोकतंत्रा है जिसमें सरकार कोई पिफल्म देखकर बताए कि वह जनता के देखने योग्य है या नहीं? कोई किताब पढ़कर हमें बताया जाए कि न, यह तुम्हारे पढ़ने योग्य नहीं! क्या सरकार के पास कोई पैमाना है जिससे यह जाना जा सके कि कोई पिफल्म देखने या किताब पढ़ने की इच्छा रखने वाले कितने लोग हैं देश में, और उनकी इच्छा का भी आदर होना चाहिए? कुछ सौ या हजार लोगों के विरोध पर इतने बड़े देश में अभिव्यक्ति का प्रश्न हल किया जाएगा? यह तो नकारात्मकता की हद है! कितनी लज्जाजनक बात है यह कि ‘कामाध्यात्म’ के देश में हम नग्नता को अश्लीलता में रेड्यूस होते देख रहे हैं, और स्वयं अश्लीलता की ओर से आंखें पफेर रखी हैं। हमारे बच्चे पोर्न साइट्स देखते बड़े हो रहे हैं, स्त्राी-पुरुष होने का अर्थ नर-मादा होने में सिमटता जा रहा है, और कुछ सिरपिफरे कलाकारों की बनाई नग्न आकृतियां पर रंग पोत रहे हैं। वैलेंटाइन डे मनाते युवाओं को कान पकड़वाकर उठ-बैठ करवा रहे हैं। हम इन ‘आहत’ लोगों की यह सब स्वतंत्राताएं सह रहे हैं। ये स्वतंत्राताएं सिस्टम को, सरकार को, सत्ताधारी वर्ग को सूट करती हैं। इन्हीं स्वतंत्राताओं की आड़ में एक ओर युवा पीढ़ी को ‘लाइसेंस्ड दारू’ में डुबोया जा रहा है तो दूसरी ओर अखबार मालिकों को सरकारी टेंडरों व विज्ञापनों से मालामाल कर असहमति और विरोध को ढकने की कोशिशें की जा रही हैं। लोकतंत्रा का आभास हो तो ठीक, वह वास्तविक न बनने पाए। अभिव्यक्ति को नियंत्रित करने के ये उदाहरण हैं।
हमारा यह इतना विशाल देश संवादहीनता में अब तक नहीं जीता रहा। हमारी संस्कृति तो संवाद की संस्कृति रही है। अलग-अलग मत और विचार रखते, अलग आचरण और व्यवहार का पालन करते लोग साथ-साथ रहते आए हैं। हमारे यहां तो आस्तिकों ने ईशनिंदा को भी आदर से देखा। चार्वाक जैसे भोगवादी दर्शन के जनक को भी )षि माना। दिगंबरों को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनके प्रति श्र(ा बरती। आत्मा के सामने देह को नगण्य माना। रति को भी सृजन की अपरिमित संभावनाओं के रूप में देखा बल्कि उसे देवोपलब्धि का माध्यम बनाया। हम अपने सामुदायिक आचरण में कितना गिर चुके हैं, यह देखने का साहस अपने अंदर जुटाने का समय आ गया है। परस्पर व्यवहार और विचार-विनिमय के लिए एक जागृत समाज अपने को कानून और सरकार के उफपर नहीं छोड़ सकता।
सार्थक संवाद स्वाधीन अभिव्यक्ति से ही संभव है। बहुलतावादी अथवा बहुसांस्कृतिक समाज अभिव्यक्ति पर नियंत्राण से नहीं बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक सुनम्यता से ही बच पाएगा। यह सुनम्यता तब बढ़ेगी जब प्रत्येक सामाजिक समूह या समुदाय अपने से बाहर देखने की भी कोशिश करेगा, उसमें आलोचना करने का साहस और आलोचना सहने का धैर्य और शक्ति होगी। जो सचमुच लोकतंत्रा और आजादी चाहते हैं उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि अभिव्यक्ति आस्थाओं की बंधक न हो। अभिव्यक्ति पर नियंत्रातण तो आखिरकार समाज को लगातार कट्टरता अथवा कठोरता, अर्थात भंगुरता की ओर ही ले जाएगा।
                                                                                                                                       - शिवदयाल

जनसता, 22 पफरवरी, 2013 में प्रकाशित

Tuesday, 19 February 2013

वसंत                      
                    
                                                                                 - शिवदयाल

                          इस फूलों के मौसम मे
                           पेड़ के पत्ते
                            कितने जवान हो गए हैं
          कि धूप भी
             कैसी सुर्ख हो आई है !

                         ऐसा वसंत  
                            मेरे तुम्हारे बीच
                                कभी नहीं आया
         लेकिन देखो न,
           मौसम रह-रह कर
            मुझसे गिला करता है
                    
                        कि अब भी तुम्हारे साथ बीते
                          पतझड़ के वे दिन ही
                            मेरी आँखों में समाए हुए हैं !

                                                                                                                 २.
                                                                                                 वह देखो
                                                                                                       माँगता अभयारण्य

                              
        गमले में उगी
            सरसों में दुबका वसंत!

Saturday, 26 January 2013

शहीद
                           -शिवदयाल

लो शत्रु का शीश
या फिर बनो हविष्य
कि आज आहुति देनी भारी
बलिदानी,
अब की तुम्हारी बारी !

मिटो उनके कल के लिए आज
कि जिनके सजल लोचनों
और मधु-मुस्कानों पर
मरते-मिटते रहे आज तक
मरो कि बचें वे करोड़ों प्राण -
कोटि-कोटि नर-नारियाँ-नौनिहाल
जिन्हें न कभी देखा न सुना
न देख पाओगे न सुन पाओगे
जीते बचे तब भी,
जिनसे बस मिट्टी का है रिश्ता  !
और उनके लिए भी मिटो
जो तुम्हारे उत्सर्ग पर
बोलियाँ लगाने वाले हैं
लाख-दस लाख की
नौकरी-चाकरी, जमीन-जायदाद की ।

मिटो जवान कि
हर किसी के भाग्य में नहीं होता
मातृ-ऋण से उऋण हो जाना ।

तुम खेत रहो
कि खेतों में बची रहें बालियाँ
काम पर रोजाना  जाते रहें
 कामकाजी स्त्री-पुरुष , मजदूर
भिनसारे की  ताजी हवा से
नवजीवन पाते रहें बुजुर्ग
और शाम को
निश्चिन्त  प्रतीक्षा करती रहें स्त्रियाँ
काम  से लौटते पतियों
और खेल के मैदान में
किलकारियाँ मारते बच्चों की ।

तुम गिरों वीर
कि उठते रहें अमराइयों में
सावन के झूले
बेखटके लगते रहें हाट-बाजार-मेले
गौरैयों   की चोंच में
भरा रहे दाना
निरापद बना रहे पथिकों का
पीपल की पाँव में सुस्ताना !

तुम ही कटो  सेनानी
कि रहें मस्तक ऊँचे
तुम्हारे हमवतनों के
बनते  रहें महल उनके
सुख-सपनों के
मातृ-भूमि की रक्षा में
न पड़े तरूण-लहू कम
लड़ो कि जबतक है
दम में दम..

लड़ों कि एक शहीद के गिरते ही
रक्त में सनकर
एक राष्ट्र होता है खड़ा
और भी तन कर !
                                         (कारगिल युद्ध के समय रचित।)
                                        -शिवदयाल


  नव-चैतन्य के महावट - रवींद्रनाथ                                 - शिवदयाल  ब चपन में ही जिन विभूतियों की छवि ने मन के अंदर अपना स्थाई निवा...