Sunday, 12 May 2013

स्मृति में माँ
..                         -शिवदयाल

मारूँ जामुन की टहनी पर झटास
चाटूँ करौंदे की फाँक पर  नमक

बीन आऊँ भिनसारे
रात के अंधड़ में गिरे टिकोले
गूदा खाकर सिरफल के खोइए में
पानी पीऊँ भरपेट

लेकिन किस तरह छुपाऊँ
छिले हुए घुटने
और दाग लगी बुश्शर्ट की जेब

आज तो माँ मारेगी जरूर !

तितली की पूँछ में बाँधूँ धागा
चुराऊँ ग्वाले की बोरसी से लिट्टी
बकरी के थन में मारूँ मुँह
करूँ टमटमवाले के चरते घोड़े की सवारी

और डरूँ कि
मेरे घर पहुँचने के पहले
आज उलाहना पहुँचेगी जरूर
आज तो माँ मारेगी जरूर !

झींसी की फुलेल में
निकलूँ दबे कदम चुपचाप
भर दिन खेऊँ कागज की नावें
बोरे की बरसाती में
बंसी लिए फिरूँ ताल-तलैयों में
शिकार बंद करूँ मर्त्तबान में

आज छिपने का नहीं कसूर
आज तो माँ मारेगी जरूर !

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