Saturday, 23 February 2013

                             आहत आस्थाओं का देश

                                                                                                                                      - शिवदयाल
आस्था और अभिव्यक्ति को लेकर पिछले कुछ वर्षों में अनेक लज्जाजनक प्रसंग सामने आए हैं, बल्कि आए दिन कुछ न कुछ घटता ही रहता है। एक घाव अभी भरता नहीं कि और खरोचें लग जाती हैं। किसी के कुछ कहने पर कोई न कोई आहत हो रहा है, लेकिन जो कोई आहत हो रहा है वह खुद ही को कोई खास जाति या समुदाय बता रहा है। वह कह रहा है- चूँकि इस बात से मुझे चोट पहुँची इसलिए यह माना जाए कि मैं जिस समुदाय से आता हूँ उसकी भावनाएं भी आहत हुईं। कौन हैं ये लोग? या तो धर्म या संस्कृति के ठेकेदार या पिफर राजनीति के ठेकेदार। अब इस समाज में कुछ विलक्षण बुद्धिजीवी  भी शामिल हो गए हैं लेकिन पिफर भी इस विशेषता के साथ कि इन्हें व्यापक समाज का  बनने से किसी ‘इस’ या ‘उस’ समाज का बुद्धिजीवी कहलाना बेहतर लगता है। ये बुद्धिजीवी भी उपरिलिखित ‘ठेकेदारों’ का ही पिष्टपोषण करते हैं, भले ही वे इस ख्याल में गापिफल रहें कि उनकी कोई अलग स्वायत्तता है। ये लोग किसी समुदाय विशेष की तरपफ से पूरे अधिकार और विश्वास के साथ अपने विचार रखते हैं- आधिकारिक प्रवक्ता के तौर पर जैसे। मजे की बात यह कि उनके कथन भी प्रायः उकसाने या चोट पहुंचाने वाले ही होते हैं।
भारत में अभिव्यक्ति का प्रश्न अब नियंत्रित अभिव्यक्ति बनाम स्वाधीन अभिव्यक्ति को हो गया है। सरकार और अदालतें लोकतंत्रा और संविधान की दुहाई देते हुए ही प्रगट या अप्रगट रूप से नियंत्रित अभिव्यक्ति के पक्ष में ही नजर आती हैं। हम बोलें जरूर, लेकिन ऐसे बोलें जिससे किसी और की ‘भावनाएं आहत न हों’! स्कूलों-कॉलेजों-पंचायतों में अब इस बात के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए कि एक नागरिक के तौर पर हमें  क्या बोलना है, कितना बोलना है और कैसे बोलना है। प्रशिक्षकों के रूप में धार्मिक समूहों और राजनीतिक दलों के नुमाइंदों को नियुक्त किया जा सकता है। आखिर तो ‘भावना’ और ‘आस्था’ के थोक डीलर तो ये ही लोग हैं। ये लोग ही तय करते हैं, किसे आने देना है, किसे निकाल बाहर करना है! अगर सचमुच ऐसी व्यवस्था हो जाए तो कम से कम सरकार का काम आसान हो जाएगा और जनता भी यह बात गांठ बांध लेगी कि वह ‘जनार्दन’ नहीं है, बस प्रजा है इस लोकतंत्रा में, और इसीलिए ढंग से, हिसाब से रहना है। इतना होने पर तो ‘स्वतंत्राचेता’ बुद्धिजीवीयों को अपनी औकात समझ में आ ही जानी है, और इन करतबों का प्रयोजन भी तो आखिरकार यही है।
कभी-कभी मन में विचार आता है कि इस बहुधार्मिक, बहुभाषिक, बहु सांस्कृतिक समाज में भाषाशास्त्रिायों को नई ‘लोकतांत्रिक भाषा’ रचने के लिए तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। ऐसी भाषा जिसमें व्यंजना न हो, मुहावरे न हो, व्यंग्य व उलटबांसियां न हों, जिसमें बात को समझाने के लिए उदाहरणों का प्रयोग न हो और हां, जहां मजाक के लिए भी कोई गुंजाइश न हो। हमारे यहां तो चुटकुले और लतीपफे भी बहुत कहे-सुने जाते हैं जिनमें कोई न कोई समुदाय आ ही जाता है। दाद देनी पड़ेगी हमारे ‘सरदार जी’ भाइयों की जिन्होंने अब तक अपने उफपर गढ़े जाने वाले लतीपफों के लिए मुकदमा नहीं किया। या क्या पता उनकी सहनशीलता भी जवाब दे जाए! हमारे परम सहिष्णु ग्रामीण समाज में विभिन्न जातियों के बारे में एक से बढ़कर एक लोकोक्तियां और मुहावरे प्रचलित हैं। इनमें निम्न जातियों को ही नहीं, उच्च जातियों को भी लक्ष्य बनाया गया है, बल्कि अधिक बनाया गया है- उनके दोहरे मानदंडों, स्वार्थी व आत्मकेन्द्रित स्वभाव, उनके तिकड़मों और काइयांपन को निशाना बनाया गया है। यह सब भी प्रतिबंधित हो जाना चाहिए अब, क्योंकि इससे आखिर किसी न किसी की भावनाएं आहत होती ही हैं।
तो बिल्कुल सादा, सरल, समत्वपूर्ण, लोकतांत्रिक भाषा रचना और बरतना भी हमारा राष्ट्रीय कर्त्तव्य होना ही चाहिए। एक इतना-सा काम हो जाने पर तो लेखकों-लिक्खाड़ों का काम तमाम हो ही जाना है। इससे नियंत्रित अभिव्यक्ति का महान उद्देश्य पूरा हो जाता है। यह रास्ता निरापद है और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुकूल भी ठहरता है। आखिर अपने देश में वैसा कारनामा तो किया नहीं जा सकता, जेसे कि पूर्वी पाकिस्तान के ढाका में सन् 1971 के संभवतः अप्रैल महीने के आखिर में जनरल टिक्का खां की पफौज ने पाकिस्तानी राष्ट्र के ‘व्यापक हित में’ अभियान चलाकर ढाका को लगभग ‘बुद्धिजीवीविहीन’ बना डाला था। रह रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। वैसे होने को क्या नहीं हो सकता। अपने देश में ऐसा सपना देखने वाले न हों- यह कैसे कहा जा सकता है। मौका मिलने की बात है। देश की जनता मौका कमोबेश सबको देती ही है- आज न कल।
जिस देश और समाज ने कुछ अपवादों को छोड़ कभी भी वाणी पर बंधन स्वीकार नहीं किया उसे अब उपदेश देने की कोशिश की जा रही है- क्या बोलो, कैसे बोलो, या पिफर बोलो ही क्यों? संवाद और सायुज्यता जिस समाज व संस्कृति का आधार रहा तो वहां अभिव्यक्ति का पाठ पढ़ाया जा रहा है। आप अभिव्यक्ति को रोकिए, और संवाद खत्म! इतना विशाल देश और समाज क्या संवादहीनता में टिका रह सकता है? क्या हमारे हित और सोच सचमुच इतना परस्पर विरोधी है कि हमें खुलकर अपनी बातें रखने से गुरेज करना चाहिए? यदि हां, तो एक राष्ट्र के रूप में बचे रहने की हमारी कुछ संभावना है?
एक भ्रम पफैलाया जा रहा है, जैसे अभिव्यक्ति की स्वाधीनता का अर्थ दूसरों को चोट पहुंचना ही हो। यह बात तो कोई भी व्यक्ति समझ सकता है, बल्कि बचपन से ही हम पढ़ते-सुनते आए हैं कि हमारी स्वतंत्राता दूसरों पर बंधन भी हो सकती है, वह वहीं तक प्रयोज्य हो सकती है जहां तक दूसरे भी उसका उतना ही अनुभव करें जितना कि हम। उसी तरह गाली-गलौज और धमकी को स्वाधीन अभिव्यक्ति का उदाहरण नहीं माना जा सकता। हमारे बोलने की आजादी का मतलब है हमारे बारे में बोलने की दूसरों को आजादी देना। और क्या अर्थ हो सकता है इसका? यहां हम अथवा कोई अन्य व्यक्ति, समूह या समुदाय इससे बरी नहीं हो सकता- किसी भी आधार पर नहीं। ऐसा नहीं हो सकता कि हम राजनीति में सामाजिक विभाजन को स्वीकार करें और अभिव्यक्ति के मामले में इससे पलट जाएं और ‘दण्डमुक्ति’ के बहाने तलाशें। भारत में लोकतांत्रिक राजनीति का प्रसार हुआ है। इसके क्या नतीजे हुए हैं, अच्छे या बुरे, या जैसे भी, इसका विश्लेषण करने से रोका नहीं जा सकता, न ही उसकी कसौटी बदली जा सकती है। इसकी जरूरत तो कतई नहीं है। अगर आप दलित, पिछड़ा, अल्पसंख्यक या महिला बनकर चुनाव लड़ते हैं और अपनी इस विशिष्ट पहचान से सत्ता प्राप्ति में आपको सहूलियत होती है तो इसी आधार पर अपने कार्यप्रदर्शन या आचरण के मूल्यांकन से परहेज क्यों हो? यहां अभिव्यक्ति का मामला क्योंकर उठना चाहिए? आपको तो जवाब देने के लिए प्रस्तुत होना चाहिए ओर अपनी बात रखनी चाहिए।
याद आता है, संभवतः 1996 में पटना में आयोजित एक सभा में प्रख्यात समाजवादी नेता व चिंतक किशन पटनायक ने राजनीतिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहा था कि यह भारत का दुर्भाग्य है कि राजनीति में जो शूद्र नेतृत्व खड़ा हुआ, वह भी भ्रष्ट हो गया, इससे बदलाव की संभावनाएं धूमिल हो गईं। आज की स्थिति होती तो शायद किशनजी को भी अपने ‘कथन’ का पफल भुगतना पड़ता। देश भर में उनके खिलापफ मुकदमे दायर होते और उन्हें ‘खलनायक’ घोषित कर दिया जाता। उनके कथन की गहराई में उतरा जाए तो पता चलेगा कि किस पीड़ा से उन्होंने यह बात कही। तब तक राजनीतिक अर्थशास्त्रा में भ्रष्टाचार को ‘समकारी कारक’ मानने के आधुनिक सिद्धांत  का प्रवर्तन नहीं हुआ था, उनका कथन तो इस सिद्धांत  के ठीक विपरीत पड़ता है। इसी प्रकार सत्तर से नब्बे के दशक तक आंदोलनकारी समूहों में यह सर्वमान्य बात थी कि महिलाओं के समाज और राजनीति की मुख्यधारा में आने से समाज और व्यवस्था मानवीय बनेगी। क्या इस विश्वास पर देश का महिला नेतृत्व खरा उतर सका? चार-पांच राज्यों में महिला नेतृत्व उभरा तो, लेकिन उसने अपने को किसी भी स्तर पर पूर्ववर्तियों से अलग दिखने का प्रयास भी नहीं किया, बल्कि कभी तो अपने को अधिक सख्त और असंवदेनशील ही सिद्ध  किया। क्या यह असंगत विश्लेषण है और महिला विरोधी है, और ऐसा कहना अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता का दुरुपयोग है?
राजनीतिक जोड़-घटाव व चुनावी लाभ-हानि के पफेर में देश में एक प्रतिबंध की संस्कृति विकसित की गयी है। अदालत भी ‘प्रतिबंध’ की मांग पर अतिशय संवेदनशीलता, बल्कि सदाशयता दिखाती है। यह कौन-सा लोकतंत्रा है जिसमें सरकार कोई पिफल्म देखकर बताए कि वह जनता के देखने योग्य है या नहीं? कोई किताब पढ़कर हमें बताया जाए कि न, यह तुम्हारे पढ़ने योग्य नहीं! क्या सरकार के पास कोई पैमाना है जिससे यह जाना जा सके कि कोई पिफल्म देखने या किताब पढ़ने की इच्छा रखने वाले कितने लोग हैं देश में, और उनकी इच्छा का भी आदर होना चाहिए? कुछ सौ या हजार लोगों के विरोध पर इतने बड़े देश में अभिव्यक्ति का प्रश्न हल किया जाएगा? यह तो नकारात्मकता की हद है! कितनी लज्जाजनक बात है यह कि ‘कामाध्यात्म’ के देश में हम नग्नता को अश्लीलता में रेड्यूस होते देख रहे हैं, और स्वयं अश्लीलता की ओर से आंखें पफेर रखी हैं। हमारे बच्चे पोर्न साइट्स देखते बड़े हो रहे हैं, स्त्राी-पुरुष होने का अर्थ नर-मादा होने में सिमटता जा रहा है, और कुछ सिरपिफरे कलाकारों की बनाई नग्न आकृतियां पर रंग पोत रहे हैं। वैलेंटाइन डे मनाते युवाओं को कान पकड़वाकर उठ-बैठ करवा रहे हैं। हम इन ‘आहत’ लोगों की यह सब स्वतंत्राताएं सह रहे हैं। ये स्वतंत्राताएं सिस्टम को, सरकार को, सत्ताधारी वर्ग को सूट करती हैं। इन्हीं स्वतंत्राताओं की आड़ में एक ओर युवा पीढ़ी को ‘लाइसेंस्ड दारू’ में डुबोया जा रहा है तो दूसरी ओर अखबार मालिकों को सरकारी टेंडरों व विज्ञापनों से मालामाल कर असहमति और विरोध को ढकने की कोशिशें की जा रही हैं। लोकतंत्रा का आभास हो तो ठीक, वह वास्तविक न बनने पाए। अभिव्यक्ति को नियंत्रित करने के ये उदाहरण हैं।
हमारा यह इतना विशाल देश संवादहीनता में अब तक नहीं जीता रहा। हमारी संस्कृति तो संवाद की संस्कृति रही है। अलग-अलग मत और विचार रखते, अलग आचरण और व्यवहार का पालन करते लोग साथ-साथ रहते आए हैं। हमारे यहां तो आस्तिकों ने ईशनिंदा को भी आदर से देखा। चार्वाक जैसे भोगवादी दर्शन के जनक को भी )षि माना। दिगंबरों को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनके प्रति श्र(ा बरती। आत्मा के सामने देह को नगण्य माना। रति को भी सृजन की अपरिमित संभावनाओं के रूप में देखा बल्कि उसे देवोपलब्धि का माध्यम बनाया। हम अपने सामुदायिक आचरण में कितना गिर चुके हैं, यह देखने का साहस अपने अंदर जुटाने का समय आ गया है। परस्पर व्यवहार और विचार-विनिमय के लिए एक जागृत समाज अपने को कानून और सरकार के उफपर नहीं छोड़ सकता।
सार्थक संवाद स्वाधीन अभिव्यक्ति से ही संभव है। बहुलतावादी अथवा बहुसांस्कृतिक समाज अभिव्यक्ति पर नियंत्राण से नहीं बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक सुनम्यता से ही बच पाएगा। यह सुनम्यता तब बढ़ेगी जब प्रत्येक सामाजिक समूह या समुदाय अपने से बाहर देखने की भी कोशिश करेगा, उसमें आलोचना करने का साहस और आलोचना सहने का धैर्य और शक्ति होगी। जो सचमुच लोकतंत्रा और आजादी चाहते हैं उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि अभिव्यक्ति आस्थाओं की बंधक न हो। अभिव्यक्ति पर नियंत्रातण तो आखिरकार समाज को लगातार कट्टरता अथवा कठोरता, अर्थात भंगुरता की ओर ही ले जाएगा।
                                                                                                                                       - शिवदयाल

जनसता, 22 पफरवरी, 2013 में प्रकाशित

1 comment:

  1. Jermany se mitravar Divyaraj Amiya ki email se prapt pratikriya :


    प्रिय शिवदयाल जी,
    इतने सुन्दर निबन्ध के लिए बधाई।
    मैं आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ। बल्कि इस के आगे बढ़ कर मैं कहूंगा कि
    दरअसल मूल सवाल एक आदर्श राज्य या आदर्श समाज की खोजों और प्रयास का है ही नहीं ।
    यह तो अच्छा मज़ाक हो गया है I
    सब से पहले हम राज्य के पास दौड़ते हैं: " हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बचाओ।
    हमारी स्वतंत्रता को बचाओ वह खतरे में है !" दस दिन बाद हम उसी के पास फिर दौड़ते हैं :
    " हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरूपयोग से बचाओ। कुछ/चंद लोग इतने पतित हो सकते हैं, जिस कोई
    हिसाब नहीं है I इन लोगों पर अंकुश लगाओ हे सरकार और हम को अभिव्यक्ति की स्वंतंत्रता के दुरूपयोग
    से बचाओ I "
    मुन्नाभाई हो गए हैं हमसब -- लगे रहने के अर्थ में।
    सवाल सत्ता और शक्ति के सदुपयोग और दुरूपयोग का नहीं है। सवाल सत्ता के उन्मूलन का है।
    नहीं तो हमेशा की तरह एक छोटा-सा तबका बहुसंख्या पर राज करता रहेगा और सवाल को
    सदुपयोग और दुरूपयोग की कसरत में समेट देगा। सभ्यता आखिर एक अल्पसंख्यक के
    बहुसंख्यक और प्रकृति पर राज और उनके लूटने-खसोटने अलावा क्या रही है ?
    इस वेबसाइट पर अपनी राय देंगे :
    www.anhilaal.com
    शुभकामनाओं के साथ,
    दिव्यराज

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