शहीद
-शिवदयाल
लो शत्रु का शीश
या फिर बनो हविष्य
कि आज आहुति देनी भारी
बलिदानी,
अब की तुम्हारी बारी !
मिटो उनके कल के लिए आज
कि जिनके सजल लोचनों
और मधु-मुस्कानों पर
मरते-मिटते रहे आज तक
मरो कि बचें वे करोड़ों प्राण -
कोटि-कोटि नर-नारियाँ-नौनिहाल
जिन्हें न कभी देखा न सुना
न देख पाओगे न सुन पाओगे
जीते बचे तब भी,
जिनसे बस मिट्टी का है रिश्ता !
और उनके लिए भी मिटो
जो तुम्हारे उत्सर्ग पर
बोलियाँ लगाने वाले हैं
लाख-दस लाख की
नौकरी-चाकरी, जमीन-जायदाद की ।
मिटो जवान कि
हर किसी के भाग्य में नहीं होता
मातृ-ऋण से उऋण हो जाना ।
तुम खेत रहो
कि खेतों में बची रहें बालियाँ
काम पर रोजाना जाते रहें
कामकाजी स्त्री-पुरुष , मजदूर
भिनसारे की ताजी हवा से
नवजीवन पाते रहें बुजुर्ग
और शाम को
निश्चिन्त प्रतीक्षा करती रहें स्त्रियाँ
काम से लौटते पतियों
और खेल के मैदान में
किलकारियाँ मारते बच्चों की ।
तुम गिरों वीर
कि उठते रहें अमराइयों में
सावन के झूले
बेखटके लगते रहें हाट-बाजार-मेले
गौरैयों की चोंच में
भरा रहे दाना
निरापद बना रहे पथिकों का
पीपल की पाँव में सुस्ताना !
तुम ही कटो सेनानी
कि रहें मस्तक ऊँचे
तुम्हारे हमवतनों के
बनते रहें महल उनके
सुख-सपनों के
मातृ-भूमि की रक्षा में
न पड़े तरूण-लहू कम
लड़ो कि जबतक है
दम में दम..
लड़ों कि एक शहीद के गिरते ही
रक्त में सनकर
एक राष्ट्र होता है खड़ा
और भी तन कर !
(कारगिल युद्ध के समय रचित।)
-शिवदयाल
-शिवदयाल
लो शत्रु का शीश
या फिर बनो हविष्य
कि आज आहुति देनी भारी
बलिदानी,
अब की तुम्हारी बारी !
मिटो उनके कल के लिए आज
कि जिनके सजल लोचनों
और मधु-मुस्कानों पर
मरते-मिटते रहे आज तक
मरो कि बचें वे करोड़ों प्राण -
कोटि-कोटि नर-नारियाँ-नौनिहाल
जिन्हें न कभी देखा न सुना
न देख पाओगे न सुन पाओगे
जीते बचे तब भी,
जिनसे बस मिट्टी का है रिश्ता !
और उनके लिए भी मिटो
जो तुम्हारे उत्सर्ग पर
बोलियाँ लगाने वाले हैं
लाख-दस लाख की
नौकरी-चाकरी, जमीन-जायदाद की ।
मिटो जवान कि
हर किसी के भाग्य में नहीं होता
मातृ-ऋण से उऋण हो जाना ।
तुम खेत रहो
कि खेतों में बची रहें बालियाँ
काम पर रोजाना जाते रहें
कामकाजी स्त्री-पुरुष , मजदूर
भिनसारे की ताजी हवा से
नवजीवन पाते रहें बुजुर्ग
और शाम को
निश्चिन्त प्रतीक्षा करती रहें स्त्रियाँ
काम से लौटते पतियों
और खेल के मैदान में
किलकारियाँ मारते बच्चों की ।
तुम गिरों वीर
कि उठते रहें अमराइयों में
सावन के झूले
बेखटके लगते रहें हाट-बाजार-मेले
गौरैयों की चोंच में
भरा रहे दाना
निरापद बना रहे पथिकों का
पीपल की पाँव में सुस्ताना !
तुम ही कटो सेनानी
कि रहें मस्तक ऊँचे
तुम्हारे हमवतनों के
बनते रहें महल उनके
सुख-सपनों के
मातृ-भूमि की रक्षा में
न पड़े तरूण-लहू कम
लड़ो कि जबतक है
दम में दम..
लड़ों कि एक शहीद के गिरते ही
रक्त में सनकर
एक राष्ट्र होता है खड़ा
और भी तन कर !
(कारगिल युद्ध के समय रचित।)
-शिवदयाल
Wonderful poetry...indeed a master stroke..kudos....
ReplyDelete