Saturday, 26 January 2013

शहीद
                           -शिवदयाल

लो शत्रु का शीश
या फिर बनो हविष्य
कि आज आहुति देनी भारी
बलिदानी,
अब की तुम्हारी बारी !

मिटो उनके कल के लिए आज
कि जिनके सजल लोचनों
और मधु-मुस्कानों पर
मरते-मिटते रहे आज तक
मरो कि बचें वे करोड़ों प्राण -
कोटि-कोटि नर-नारियाँ-नौनिहाल
जिन्हें न कभी देखा न सुना
न देख पाओगे न सुन पाओगे
जीते बचे तब भी,
जिनसे बस मिट्टी का है रिश्ता  !
और उनके लिए भी मिटो
जो तुम्हारे उत्सर्ग पर
बोलियाँ लगाने वाले हैं
लाख-दस लाख की
नौकरी-चाकरी, जमीन-जायदाद की ।

मिटो जवान कि
हर किसी के भाग्य में नहीं होता
मातृ-ऋण से उऋण हो जाना ।

तुम खेत रहो
कि खेतों में बची रहें बालियाँ
काम पर रोजाना  जाते रहें
 कामकाजी स्त्री-पुरुष , मजदूर
भिनसारे की  ताजी हवा से
नवजीवन पाते रहें बुजुर्ग
और शाम को
निश्चिन्त  प्रतीक्षा करती रहें स्त्रियाँ
काम  से लौटते पतियों
और खेल के मैदान में
किलकारियाँ मारते बच्चों की ।

तुम गिरों वीर
कि उठते रहें अमराइयों में
सावन के झूले
बेखटके लगते रहें हाट-बाजार-मेले
गौरैयों   की चोंच में
भरा रहे दाना
निरापद बना रहे पथिकों का
पीपल की पाँव में सुस्ताना !

तुम ही कटो  सेनानी
कि रहें मस्तक ऊँचे
तुम्हारे हमवतनों के
बनते  रहें महल उनके
सुख-सपनों के
मातृ-भूमि की रक्षा में
न पड़े तरूण-लहू कम
लड़ो कि जबतक है
दम में दम..

लड़ों कि एक शहीद के गिरते ही
रक्त में सनकर
एक राष्ट्र होता है खड़ा
और भी तन कर !
                                         (कारगिल युद्ध के समय रचित।)
                                        -शिवदयाल


Friday, 18 January 2013


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                -शिवदयाल 
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                         ((दस्तावेज में प्रकाशित 

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Tuesday, 8 January 2013

तिलिस्म
                             -शिवदयाल

री ...
तूने यह क्या जीया
कि जितना जीया
अपने ही खिलाफ जीया

री ...
तूने यह क्या सिरजा
कि जो भी सिरजा
अपने ही खिलाफ सिरजा

री ...
तूने यह कितना बरजा
कि जो भी बरजा
अपने ही खिलाफ बरजा

री ...
तोड़, अब
अपने ही खिलाफ
इस तिलिस्म को तोड़
अपने से भी अपने को जोड़ !

Monday, 7 January 2013

शिवदयाल की कहानियाँ: विमर्श गोष्ठी
 (संदर्भ: भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित कहानी संग्रह ‘मुन्ना बैंडवाले उस्ताद’)

विगत 28 नवम्बर, 2009 को पटना के राज्य अभिलेखागार के सेमिनार हॉल में ‘शिवदयाल की कहानियाँ’ (संदर्भ - भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित कहानी संग्रह मुन्ना बैंडवाले उस्ताद) पर एक विमर्श गोष्ठी का आयोजन हुआ।
चर्चा की शुरूआत करते हुए अंग्रेजी एवं हिन्दी के प्रख्यात विद्वान व समीक्षक डा. शैलेश्वर सती प्रसाद ने कहा कि शिवदयाल की कहानियाँ वैचारिक, राजनीतिक एवं कलात्मक स्तर पर हिन्दी कहानी को नवीन आयाम देती हैं और यह संग्रह इस दशक की संभवतः सर्वश्रेष्ठ कथाकृति है। उन्होंने कहा कि शीर्षक कथा ‘मुन्ना बैंडवाले उस्ताद’ अद्भुत कहानी है और यह प्रेमचंद की ईदगाह से कमजोर नहीं। डा. प्रसाद ने विचार व्यक्त किया कि शिवदयाल की कहानियों में मध्यवर्ग की त्रासदी अत्यंत मार्मिकता के साथ चित्रित हुई है, लेकिन इनकी कहानियों में कमजोर वर्ग के पात्रा, उनकी जीवन-स्थितियाँ, जनसंगठन और संघर्ष भी प्रमुखता पाते हैं।

समकालीन हिन्दी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर आलोक धन्वा   ने कहा कि शिवदयाल आंदोलनों की पृष्ठभूमि से आए रचनाकार हैं। इनकी कहानियों में विचार और संवेदना की यात्रा साथ-साथ चलती है, ऐसा बहुत कम होता है। इनकी कहानी ‘नॉस्टैल्जिया’ महादेशों की यात्रा करती है। इनकी संवेदना देश की सीमाओं को लाँघकर - इराक, अपफगानिस्तान, बाँग्लादेश और यूरोप-अमेरिका तक विस्तार पाती हैं और वास्तव में उन स्थानों की हलचलों और घटनाओं को हमारे अपने जीवन का हिस्सा बना देती हैं। उन्होंने कहा कि शिवदयाल की कहानियाँ व्यापक सामाजिक आलोचना का आधर तैयार करती हैं, इस काम में वे पर्याप्त संयम और आत्मानुशासन से काम लेते हैं। इससे उनकी रचनाओं का शास्त्राीय आधर तैयार होता है। वे हमारे समय के जेनुइन लेखक है।
प्रख्यात कथाकार उषाकिरण खान ने भी संग्रह को इस दशक की श्रेष्ठ कथाकृति बताते हुए कहा कि हर कहानी मँझी हुई है। शिवदयाल ने मध्यवर्ग की त्रासदियों और विडम्बनाओं को अत्यंत परिपक्वता और कलात्मकता के साथ उजागर किया है। उन्होंने आलोक, मुन्ना बैंडवाले उस्ताद, चंदन खुशबू की दुकान तथा नॉस्टैल्जिया कहानियों का जिक्र करते हुए कहा कि नॉस्टैल्जिया हमारे समय की भयानक कहानी कहती है।

वरिष्ठ उपन्यासकार एवं भा.प्र.से. के अध्किारी व्यास मिश्र ने विशेष रूप से ‘आलोक’ और ‘खबर’ कहानी की चर्चा की। उन्होंने कथाकार के सूक्ष्म प्रेक्षा और बारीक विश्लेषण की क्षमता को रेखांकित करते हुए कहा कि जहाँ आलोक का विषय और अपील सर्वव्यापी है, वहीं ‘खबर’ में खबरों का आतंक बड़े प्रभावी ढंग से चित्रित हुआ है। उन्होंने कहा कि ऐक्टिविस्ट रहने के बावजूद शिवदयाल ने विषयों के चुनाव में कोई सीमा नहीं मानी है और प्रायः हर तबके के पात्र  इनकी कहानियों में स्थान पाते हैं। उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से यह पुस्तक दशक की सर्वश्रेष्ठ कथाकृतियों में शामिल होने जा रही है।
सहयात्राी पत्रिका से जुड़े अरुण कुमार सिंह, प्रधन महालेखाकार ने संग्रह की चंदन खुशबू की दुकान, एक सफर का साथ, तथा नॉस्टैल्जिया का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि शिवदयाल हमारे समय की सच्चाइयों से हमें आमने-सामने करते हैं, वह भी पूरी संवेदनात्मक एवं कलात्मक आवेग के साथ।

हिन्दी-उर्दू के शायर संजय कुमार कुंदन ने शिवदयाल को मानवीय मूल्यों का चितेरा बताते हुए कहा कि इनकी रचनाओं को पढ़ना शरीपफ आदमी की संगत की तरह है। भाषा पर इनकी पकड़ अद्भुत है और इसमें वे बहुत संयम बरतते हैं।
वरिष्ठ कवि डा. निखिलेश्वर प्रसाद वर्मा ने शिवदयाल को एक खुद्दार और ईमानदार रचनाकार बताया। उन्होंने कहा कि कहानियों में वे स्वयं कुछ नहीं कहते, परिस्थितियाँ और पात्रा ही सच को उद्घाटित करते हैं।

राज्य अभिलेखागार के निदेशक विजय कुमार ने साहित्यिक रचनाओं को इतिहास का स्रोत स्वीकार किए जाने पर जोर दिया और कहा कि साहित्यिक रचनाएँ अपने समय का विश्वसनीय संदर्भ-स्रोत व दस्तावेज हैं।

विमर्श गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार शेखर ने की। उन्होंने ‘मुन्ना बैंडवाले उस्ताद’ को एक ‘मेजर’ कहानी के रूप में स्वीकार किया, इसके लिए उन्होंने शिवदयाल को विशेष रूप से बधई दी। साथ ही उन्होंने कहा कि एक्टिविज्म की पृष्ठभूमि की कहानी ‘आलोक’ में आलोक और सुधा के चरित्रा का अभी और विकास किया जाना चाहिए था।
अपने वक्तव्य में शिवदयाल ने विमर्श गोष्ठी में उपस्थित सभी लोगों के प्रति आभार प्रकट किया। उन्होंने कहा कि संग्रह में वास्तव में उथल-पुथल से भरे तीन दशक समाए हुए हैं।
इस विमर्श गोष्ठी का आयोजन ‘वातायन’ ने किया था और गोष्ठी का संचालन इसके निदेशक वरिष्ठ कवि  राजेश शुक्ला ने किया।
 गोष्ठी की शुरूआत में शिवदयाल ने अपनी कहानी ‘आलोक’ का पाठ भी किया। इस अवसर पर योगानंद हीरा, प्रो. किरण बाला प्रसाद, आभा सिन्हा, मुसापिफर बैठा, सुनील सिन्हा, राकेश प्रियदर्शी, रामयतन यादव, अनीस अंकुर, नवीन, सृष्टि दयाल, कमलेश कुमार, अखिलेश कुमार, बादशाह चौबे, राजीव रंजन प्रसाद, उदय ठाकुर, रवीन्द्र नाथ बैठा तथा अरुण नारायण आदि कई वरिष्ठ एवं युवा रचनाकार, संस्कृतिकर्मी तथा एक्टिविस्ट समूह के लोग उपस्थित थे।
- अरुण नारायण
प्रकाशन विभाग, बिहार विधन परिषद्, पटना।( पाखी में प्रकाशित)

Friday, 7 December 2012

 अंत, अंत हे गर्दनीबाग !

विकास की भेंट  चढ़ते अनेक इलाकों में से एक का आर्तनाद.... 

 1912 में अलग बिहार राज्य बनने के बाद सचिवालय  बना  और वर्ग-2 अधीनस्थ ,वर्ग-3 तथा वर्ग-4 कर्मचारियों के लिए एक  सुन्दर और व्यवस्थित आवासीय कॉलोनी बनाई  गयी हावरा-दिल्ली रेल लाइन के दक्खिन गर्दनीबाग में। लाइन के उत्तर में साहब  लोग बसाये गए जो आज भी आबाद हैं हार्डिंग रोड और उसके  आस-पास। यह इलाका खूब हरा-भरा  और शहर से लगा हुआ है। धीरे -धीरे रखरखाव के अभाव में ,साथ ही  अतिक्रमण के कारण गर्दनीबाग़ का बड़ा  हिस्सा आज बुरी अवस्था  में है।
गर्दनीबाग़ के नवनिर्माण की योजना बनी है जिस से पुराने मोहल्ले का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। इसका
'हेरिटेज कॉलोनी ' के रूप में जीर्णोद्धार हो सकता है जो एक खूबसूरत बात होती .लेकिन विकास के पैरोकारों को यह बात 'सूट' नहीं करती।
साल भर की उम्र से लेकर बाइस साल तक मैं गर्दनीबाग के एक क्वार्टर में रहा। आज भी मुझे वहीँ के सपने आते हैं।
तो यह कविता देखिये : "अंत , अंत हे गर्दनीबाग !"   विकास की भेंट  चढ़ते अनेक इलाकों में से एक का आर्तनाद.... 

 अंत, अंत हे गर्दनीबाग!
                                                                                                                -शिवदयाल

इस वसंत
      अंतिम बार फुलाया है सेमल
      सुग्गों-कठफोड़वों की
      अंतिम चहचहाहट है यह
      सेमल के फूलों की लाल-लाल
       लहलहाहट में
       कैसे लहालोट हो रहे हैं पंछी -
       अंतिम बार, अंतिम बार!

पुटुस की झाड़ियों की
      खटतूरस गंध
      अब हमेशा -हमेशा के लिए
      शेष होने वाली है
      न मालूम
      रंगबदलू गिरगिटान
      अब कहाँ ठौर पाएँगे
      किस देश जाएँगी
      उधेड़बुन में दौड़ लगातीं,
      एक-दूसरे को छकातीं
      ढीठ गिलहरियाँ

अबकी गर्मी तक
     सिरफल वृक्षों को
     अपनी उदारता दिखाने का
     मौका शायद ही मिले
     लू के थपेड़ों से जूझती टिटिहरी
     थक कर किस डाल बैठेगी
     कौन जानता है

ऊँची घास के नम घेरों में
     चें-चें करतीं, जाने क्या सहेजतीं
     खोजतीं-बीनतीं
     पनमुर्गियों का विहार
     अंतिम बार!

कसैले नीम के नन्हें फूलों पर
     मँडराती मधुमक्खियों और
     अमलतास के स्वर्ण-पुष्पों का
     पराग लूटते मदमस्त भौरों का गुँजन
     बस अंतिम बार!

  गोधूलि में
     बूढ़े पीपल पर
     कौओं की यह अंतिम पंचायत!
     चैत-बैसाख की धूप-हवा में पकीं
     कँटीली फुनगियों से लटकती
     गुलाबी, लच्छेदार जलेबियों की
     खग-वृन्द की यह अंतिम दावत!

आम के पत्तों-पल्लवों से
     ढँके-छिपे प्रणयातुर पंडुक
     निकलने वाले हैं
     अंतहीन प्रवास पर
     जाने किस दिशा  में

अगली बार
    अचरज और शोक से देखेंगे
    आसमान में चक्कर काटते
    नई-नई व्यूह रचनाओं का संधान करते
    सुंदर-सजीले बगुले -
    यह वही जगह तो नहीं
    जहाँ पाँख खुजाते, सुखाते
    सुस्ताते और ध्यान लगाते
    बिताया था चातुर्मास

बाल-बच्चों को संग ले
    इस ढूह से उस ढूह घूमते
    रुक-रुक कर मुँह उठाते
    अपनी ही दुनिया को पुनः-पुनः
    देखते-आँकते
    नेवलों की यह अंतिम तफरीह

कहीं कुछ ऊबड़-खाबड़ नहीं
    सब समतल हो जाने वाला है
    अबकी बारिश  में जगह-जगह
    नहीं जमा होंगे पानी के चहबच्चे
    जिनमें अपनी छवि देखने को
    बार-बार उद्धत हो
    झुण्डों में घूमती
    अपनी लंबी पूँछ के भार से दबी जाती
    पुँछल्ली ड्रैगनफ्लाई

अगली बरसात में
    धरती की कोख में ही दुबके रहेंगे
    शरीफ-शीलवान ढाबुस-दादुर
    उनका यह अंतिम मेघ -मल्हार

अपने में खोई कोलतार की
     सूनी सड़कों का एकाकीपन
     चौड़े में जमे गो कि झडे़, उधड़े
     बाबुओं के क्वार्टरों का
     डूबती नब्जों के बीच आत्मालाप
     जिनकी स्मृतियों में अभी जीवित हैं
     अंग्रेज बहादुर और लोहा सिंह
    -यह छोटी होती दुनिया में
     ऊँचे पेड़ों की गरिमा
    -यह सिकुड़ते स्पेस में
     खुले में रहने की जीवटता -
     सब अंत को संक्रमित

राजकुमार की
    चाय की दुकान पर
    चाय की यह रसीली अंतिम घूँट
    आँखों में पानी ला देती
    कड़ाही में तली जाती कचरी की
    यह अंतिम झाँस

जिन्होंने अपनी बुभुक्षा
    और लिप्सा में इस वसुंधरा को
    माता से भोग्या बना दिया
    सब कुछ रौंदता
    अपने घर्घर नाद में
    आर्त पुकारों को सोखता जाता
    ‘नई’, दौलतमंद दुनिया की
    जमीन तैयार करता उनका विकास-रथ
    अब गर्दनीबाग के सीवान तक आ पहुँचा है

अपनी मिट्टी
      हवा, धूप और आकाश
      अपने खग-विहग, जीव-जंतु
      अपनी हरीतिमा और विश्रान्ति
      अपनी खुषबू और फैल
      सुंदरता, कोमलता और नैसर्गिक मोहकता
      अपनी संपन्नता और पूरेपन के साथ
      उत्सर्ग को तैयार है
      गर्दनीबाग -
      जीवन की बहुतेरी छवियों,
      कोमल आहटों और गुंजारों से स्पंदित
      एक मोहल्ला जो बदकिस्मती से
     ‘बेशकीमती जमीन’ पर आबाद है

जिनके देह लगी हो इसकी माटी
     जिनके नासापुटों में बसी हो हरी घास की महक
     जिनका रहा हो यह क्रीड़ांगन
     यहाँ से गुजरते
     ठंडी छुअन से भरा हो
     जिनका जला हुआ मन

जो भुतहा बहेड़ा के नीचे से
     कभी डर कर गुजरे हों
     झड़बेरी और करौंदे की काँटेदार टहनियों से
     जिनकी आस्तीनें छिली हों

जिनके सपनों में आया हो
     बहुरुपिया - कच्चे खाँव
     जो भागे हों फेरी वाले की
     उस आवाज के पीेछे -
     एक पैसे में दो बटन, सिन्दू ऽ ऽ र ऽ ऽ ..   
     जो कभी भय तो कभी जुगुप्सा से
     साधुओं-सँपेरों-फकीरों का चुपके-चुपके
     पीछा करते रहे हों

  जो टमटम की सवारी का मजा लूटते
      घोड़े की पीठ पर पड़ते चाबुक से
      कभी खुद भी दहले हों
      गहन रात्रि में
      टीसन से खाली लौटते
      ताड़ी के नशे में
      सातवें सुर में अलाप लगाते
      टमटम वाले की तान और उस पर
      ताल बैठाते घोड़े की लयबद्ध टापों से
      जिनकी नींद उचटी हो

चितकोहरा पड़ाव पर
      खाली-खाली-सी दोपहरियों में
     अपने खोखे में
     बीड़ियाँ बनाते, बाँधते, सेंकते
     किसी वीतरागी से नसीब मियाँ को
     शाम की कव्वाली में सुर उठाते देख
     जो विस्मित रह गए हों

जिन्होंने यहीं देखी थी कोई छब
     और हमेशा  के लिए खुद को
     रख-छोड़ आए थे यहीं
     सुनते रहे थे जो रात की निविड़ता में
     छायागीत और बिनाका गीतमाला
     जो रोए थे चुपके-चुपके
     जिनकी रह गई बहुत कुछ अनकही

जिन्होंने यहीं की सड़कों पर
        मुट्ठी तानना सीखा था
        जिन्होंने यहीं,
        ठीक यहीं से देखनी शुरू की थी दुनिया
        जिनके केश सन के खेत हुए
        यहीं की धूप में
        जो यहीं से खो जाना चाहते हैं
        बहुत नीले आसमान की निस्सीमता में
        जिनके लिए शुरू होती है
        अनंत की यात्रा यहीं से
  
 उन्हें, उन सबको
        गर्दनीबाग का
       अंतिम प्रणाम्!


(जनसत्ता वार्षिक अंक 2012 में प्रकाशित।)


       

Sunday, 25 November 2012

खरीदारी
                  -शिवदयाल 


डिपार्टमेंटल स्टोर में
आइटम पसंद आ जाने पर
उन्होंने सेल्समैन को
आदेश  दिया - पैक कर दो !

काउंटर पर
पर्स हाथ में ले
उन्होंने मैनेजर से पूछा -
हाउ मच ?

पेमेंट रिसीव कर
मैनेजर ने जब ‘थैक्स’ कहा
तो मचलते हुए सामान उठाए
वे बाहर निकल आए।

लौटते हुए
उन्होंने खरीदी तरकारी
और मोल-भाव कर
डेढ़ रुपए की बचत कर ली
साथ में गंदे नोटों के लिए
सब्जी वाले को धिक्कारा ।

ऐन गली के नुक्कड़ पर
लड़के से फी दर्जन अंडों पर
अठन्नी कम कराकर
इतराते हुए घर आ गए।

उस दिन
ऐसे की उन्होंने खरीदारी
छोटे मुनाफों में की हिस्सेदारी
और खुश  हुए !

Monday, 12 November 2012

मेरा दीया पथ आलोकित करे तुम्हारा 
और हरे कुछ तमस अंतर का .....          
                                                            !! शुभ दीपावली !!


Thursday, 8 November 2012

कहानी                                                            दायरा 
                                                                                                                                          - शिवदयाल



आज तीसरा दिन है। न वो कॉलेज आई न उसका कोई फोन ही आया। वही बात है। और कोई बात हो नहीं सकती। पहले कभी ऐसा नहीं हुआ पिछले दो सालों में। लगभग हर दिन अगर मुलाकात नहीं हुई तो बात जरूर हुई। आज यह एकदम से क्या हो गया!
वही बात है! शीरीं का मन बुझ गया। आँखें भर आईं। उसकी ऐसी कोई सहेली आज तक नहीं हुई, सुरभि जैसी। लेकिन इन कम्बख्तों के चलते उसकी ये खूबसूरत दोस्ती भी गई। अब वह किसे अपना कहे। यह सवाल पिछले पाँच-छह सालों से उसे कदम-कदम पर चिढ़ाता रहा है -  तुम्हारा कौन है? कौन है तुम्हारा अपना? फिर मिली सुरभि, यानी महक, और उसकी जिन्दगी में खुशबू फैल गई। पहले सुरभि अपनी हुई, फिर सुरभि की जो चीजें अपनी थीं वे भी  जैसे उसकी उतनी ही अपनी होती गईं। जिन्दगी जैसे फैल कर बड़ी हो गई।

धमाका 18 को हुआ, सत्तर के करीब लोग मारे गए, जख्मी भी हुए बहुत सारे लोग। उस दिन सुबह उससे बात हुई थी मोबाइल पर कि वह कॉलेज नहीं आ रही, उसे कहीं जाना है। तब उसने भी कॉलेज का प्रोग्राम ड्राप कर दिया। और उसके बाद से आज यह तीसरा दिन है।
हर धमाका जैसे वजूद को हिला देता है। घर में भी यकायक एक सहमी हुई चुप्पी पसर जाती हैं। ‘‘लो आज फिर ---, या खुदा ---’’ गुस्से और बेबसी में पापा की जुबान से यही कुछ निकलता है। एक अनजाना डर जैसे पूरे घर को जकड़ लेता है। मम्मी सख्त ताकीद करती है, पहले पापा को फिर  मुझे, फिर  जावेद को, कि घर से बाहर जरूरत होने पर ही निकला जाए और हर एहतियात बरती जाए। पापा माहौल को हल्का करने की गरज से मम्मी को चिढ़ाते हैं  -  ‘ऐसा फरमान जारी करते हुए तुम बकरे की अम्मा जैसी हो जाती हो। लेकिन वह खैर मनाती होगी और तुम सबको होशियार करती हो।’ लेकिन पापा का यह मजाक दिल में नश्तर की तरह चुभता है। मतलब वाकई हम सब ---!
‘‘पापा हम माइनॉरिटी क्यों हैं? क्या मतलब है इसका?’’ खीझकर एक दिन शीरी ने पूछा था तो पापा यकबयक कुछ बोल नहीं पाए थे। फिर  थोड़ा रुककर उन्होंने कहा था - ‘‘आप अब बी.ए. में पढ़ती हैं, इतना जो जरूर जानती हैं। लेकिन बेटे, देखने और समझने की बात यह भी है कि हमारा नजरिया क्या है इस सवाल को देखने का। पूरे मुल्क में मजहब को पैमाना माने तो शीरीं नाम की यह शख्स माइनॉरिटी को बिलांग करती है। यही शीरीं अपने शहर के इस मोहल्ले में मेजॉरिटी कम्यूनिटी से ताल्लुक रखती है, बल्कि कुछ शहरों और सूबों में आप मेजॉरिटी को रिप्रेजेन्ट करती हैं। दरअसल हमारे मुल्क में कोई भी सोशल यूनिट ऐसा नहीं जो हर कहीं मेजॉरिटी होने का दावा कर सके। वह एक जगह एक नजरिए से मेजॉरिटी है तो दूसरी जगह दूसरे नजरिए से माइनॉरिटी। हमारा मुल्क तो माइनॉरिटीज का ही एक ' कम्प्लेक्स होल' है। हम ही नहीं इस मुल्क का मेजॉरिटी कम्यूनिटी भी माइनॉरिटज्म या माइनॉरिटी फीलिंग का शिकार है, हम तो हैं ही।’’ पापा ने उसे बहलाया ही तो था, वह क्या नहीं समझती।
जब ऐसा वाक्या घट जाता है, लगता है जैसे हर शख्स शहर का सवाल कर रहा है उससे, वह जैसे किसी का सामना करने से कतराती है। एक तो धमाके के बाद की चीख-पुकार से दिल दहल जाता है और दूसरी ओर एक अपराध्-बोध् जाने कहाँ से उसे अपनी गिरफ्त में लेने लगता है। उसे कुछ समझ में नहीं आता, ऐसा क्यों होता है। वह पहले पापा से कितने सवाल पूछा करती थी। अब उनसे पूछने की भी हिम्मत नहीं होती। एक दिन उसने उन्हें भी मम्मी से ऐसा ही कुछ कहते सुना था - ‘‘मैं इन धमाकों से बहुत डरता हूँ, आस-पास के लोग कभी-कभी अजीब निगाहों से देखते हैं, सिर्फ अजनबीपन से नहीं, कहीं हिकारत...’’

उसने सुरभि से पूछा एक दिन -  ‘‘हमारी दोस्ती पर तुम्हारे घर वाले एतराज तो नहीं करते?’’
‘‘नहीं, क्यों?’’
‘‘यों ही पूछा!’’
‘‘बस कभी-कभी खाने-पीने में सावधनी बरतने को कहते हैं, दादी कहती है, और कोई नहीं! और-तुम्हारे घर वाले?’’
‘‘वो तो खुश होते हैं, मन ही मन तुम्हारा इंतजार करते हैं। हमारी दोस्ती की लंबी उम्र के लिए दुआ करते हैं।’’
‘‘अच्छा? जानती हो, मेरे पापा को अपने एक पुराने दोस्त की याद ताजा हो जाती है ...’’
‘‘मेरी दादी कभी-कभी मेरे कपड़ों को लेकर परेशान रहती है और मम्मी को जाने क्या-क्या कहती हैं। मम्मी हँसती रहती है, उनकी बात का जवाब नहीं देती।’’
‘‘क्यों, तुम्हें सानिया मिर्जा तो नहीं समझतीं?’’ सुरभि ने उसे चिकोटी काटी।
‘‘ध्त्!’’ शीरीं शर्मा गई तो सुरभि हँसने लगी।
‘‘तुम तो ऐसे शर्मा गई जैसे तुम्हारी शादी की बात कर दी हो?’’
‘‘शादी से कौन शर्माता है?’’
‘‘क्यों, तय है क्या पहले से? हमें तो भाई इंतजार करना होगा।’’
‘‘नहीं, अभी तो ऐसी कोई बात ही नहीं है, मम्मी-पापा कहते हैं, बी.ए. में रिजल्ट कैसा होता है, इसी पर डिपेन्ड करेगा कि मेरी शादी कर दी जाए, या फिर  आगे पढ़ाई जारी रखूँ।’’
‘‘वाह-वाह, क्या बात है! दिक्कत भी क्या है, दुल्हा तो आस-पास से ही निकल आएगा तुम्हारा?’’
‘‘आस-पास से क्यों? तुम तो जानती हो मेरा कोई अफेयर नहीं!’’
‘‘अरे, तुम लोगों में रिश्तेदारियों में भी तो शादियाँ होती हैं, कि नहीं?’’
‘‘हर खानदान में ऐसा नहीं होता। मेरे यहाँ इसे पसन्द नहीं किया जाता!’’
‘‘चल, ठीक ही है, कम से कम एक फ्रेश  शक्ल तो दिखेगी तुझे।’’
‘‘चलो हटो!’’ शीरीं फिर  लजाई और सुरभि की पीठ पर एक धौल जमा दिया।
‘‘तुम कितने दिनों से घर नहीं आई।’’ शीरीं ने शिकायत की।
‘‘क्या करें, ऐसे इलाके में रहती हो, घरवाले परेशान हो जाते हैं नाम सुनते ही। उन्हें डर लगता है, और मुझे भी।’’
‘‘हमारा तो पुश्तैनी मकान है न! ... लेकिन मैं तो नहीं डरती तुम्हारे घर जाने में?’’
‘‘अरे तू क्यों डरेगी बेवकूफ? जिन मुहल्लों में अलग-अलग तरह के लोग रहते हैं उनमें डर नहीं लगता।’’
‘‘हाँ, यह तो है! पापा भी कहते हैं, मुहल्ले अलग रहने से कुछ हासिल नहीं होता, बल्कि नुकसान होता है, दूरियाँ बढ़ती हैं।’’

आज जब शीरीं कॉलेज गई तो रास्ता जाम था। जुलूस निकला था धमाकों के खिलापफ। लोग पुतले जला रहे थे। हुजूम में कुछ दुपल्ली टोपियाँ भी दिखीं तो उसे जैसे बहुत राहत महसूस हुई। थोड़ी ही देर पहले जब ऑटो में सवार एक आदमी ने गद्दारों को सबक सिखाने की पैरवी की तब वह बेहद डर गई थी। उसने देखा, उन्हें देखकर वह आदमी भी कुछ हैरत में था जैसे। शीरी की मुट्ठियाँ भिंच गईं जैसे कि खिलाड़ियों के भिंच जाती हैं गेम जीतने के बाद।
बडे़ हौसले से उसने सुरभि को चारों ओर खोजा। लड़कियों से पता किया, लेकिन कुछ नहीं। कम्बख्त फोन तक नहीं करती। मिस्ड कॉल ही कर देती! उसने एक बार फिर  सुरभि को फोन लगाया, तो  जवाब आया -  ‘‘दि ... कस्टमर यू आर कॉलिंग इज आउट ऑफ रेंज।’’ चीजें आउट ऑपफ रेंज क्यों हो जाती हैं? जिन्हें वाकई हमारे दायरे के बाहर होना चाहिए, उनमें ही हम घिरे रहते हैं और जो चीज सचमुच हमारे बिल्कुल पास होनी चाहिए - वही आउट ऑफ रेंज, पहुँच के बाहर! सुरभि आउट ऑफ रेंज। सुरभि के बहाने उसकी आँखों से देखी गई दुनिया भी आउट ऑफ रेंज! रेंज में क्या है - नफरत, जिल्लत, जहालत, तंगख्याली और .... धमाके!

कॉलेज में शीरीं का बिल्कुल मन नहीं लगा। उसने अनमने भाव से क्लासेज किए। और घर की राह पकड़ी। सुबह जो उत्साह मन में जगा था, वह इस समय तक मानो एकदम बुझ गया। मम्मी उसे देखकर खुश हुई लेकिन उसे जावेद और पापा का अभी इंतजार करना था। जब सब लोग घर में आ जाएँ तभी जैसे जिन्दगी शुरू होती है वरना ‘सस्पेंड’ रहती है कॉलेज के क्लासेज की तरह।
वही बात है! सुरभि ने भी आखिरकार मुझे वही समझा। उसे तो मेरे मुहल्ले में आने में भी डर लगता था .... उसके लिए मेरी दोस्ती जैसे एक अलग तरह का टाइम पास थी। उसे तो डिफरेंट चीजें करने में मजा आता है। दोस्ती भी की तो शीरीं से। पिछली बार जब धमाके हुए थे तो उसने शायद मजाक में यह नहीं कहा था -  ‘‘यार, अपने भाइयों को जरा समझाती क्यों नहीं?’’ क्या पता वह दिल की गहराइयों से ऐसा कह रही हो। ओफ! किसी चीज पर भरोसा नहीं जमता, अपने पर तो बिल्कुल नहीं।

शीरीं अपने कमरे में थी। ड्राइंग रूम में टीवी देखते सब लोग गपशप कर रहे थे। लेकिन उसका ध्यान उनकी ओर नहीं था। टीवी तो उसने दो दिनों से देखा तक नहीं था। वह क्लास नोट्स उलटते-पलटते क्या-क्या उलजलूल सोचे जा रही थी कि उसका मोबाइल बजा। उसने जैसे झपट्टा मार कर उसे टेबुल पर से उठाया। कोई अनजाना नंबर था। उसका दिल धक्-से हो गया। उसने फौरन स्वीच ऑफ कर दिया और घबराहट में अंगुलियाँ चटखाने लगी। फिर  उसे क्या सूझा कि उसने मोबाइल ऑन करके रिंगिंग वॉल्यूम ऑफ कर दिया। थोड़ी देर के बाद फोन पर फिर  वही नंबर उगा। बाहर का नंबर लगता था। इन दिनों अनजान कॉल्स अटेंड करना आफत मोल लेना है। उसने फोन वहीं छोड़ दिया और डर दूर करने के लिए ड्राइंग रूम में ही आ गई।
पता चला कि कल, यानी अगली सुबह आतंक के खिलाफ मुहल्ले के लोग एक जुलूस निकालने वाले थे। इसे लेकर पापा तो बहुत उत्साह में थे लेकिन मम्मी पता नहीं क्यों डरी हुई थीं। वे उसे समझाने की कोशिश कर रहे थे -
‘‘इस मौके पर लोगों को बाहर आना ही चाहिए। तुम बेकार में परेशान हो रही हो ....’’
‘‘पापा, हम भी चल सकते हैं जुलूस में?’’ अचानक शीरी ने पूछा तो पापा तुरंत कोई जवाब नहीं दे पाए। तभी उनका मोबाइल बजा। सबका ध्यान उसकी ओर गया।
‘‘कौन बोल रहे हैं? किससे बात करनी है?’’ पापा ने अनजान कॉलर से पूछा तो शीरीं बिल्कुल घबरा गई। उसने पापा को फोन ऑफ करने का इशारा किया कि पापा हँस पड़े -
‘‘अच्छा-अच्छा, तो तुम हो! लो भई लो, तुम्हारा शिकार यहीं है।’’ उन्होंने फोन शीरीं को बढ़ा दिया। काँपते हाथों से उसने फोन पकड़ा- ‘‘इडियट, फोन क्यों नहीं उठाती? आधे   घंटे से ट्राई कर रही हूँ। ... अब बोलती क्यों नहीं? ... अरे, क्या हुआ?’’
शीरीं उछल कर खड़ी हुई और भाग कर अपने कमरे में आ गई। वह क्या बोले! उसके मुँह से तो आवाज ही नहीं निकलती, बस आँखें उमड़ती चली आ रही हैं।
‘‘तीन दिनों से तू थी कहाँ? मैं तुझे फोन करते-करते ...’’ और वह अपने को जब्त न कर सकी।
‘‘तू वही की वही रहेगी कम्बख्त! मैं तो अपने मामा के पास चली गई थी, तुझे बताने का मौका ही नहीं मिला। मेरा फोन खराब हो गया। यह रिमोट एरिया है यार, कोई नेटवर्क काम ही नहीं करता ठीक से। अभी तो बूथ से कर रही हूँ।’’
‘‘तो तू यहाँ नहीं है?’’
‘‘और मैं कह क्या रही हूँ तबसे? पागल हो गई है क्या?’’
‘‘देख सुरभि, अबसे तू कभी आउट ऑफ रेंज मत होना यार ... अच्छा नहीं लगता कुछ भी ...’’ सुबकते-सुबकते शीरीं ने कहा तो उधर  से सुरभि ठहाका मार कर हँस पड़ी -
‘‘ये जुमले अपने होने वाले के लिए बचा कर रख ...। इसी से कहती हूँ कोई ब्वॉयप्रेंफड कर ले ... लेकिन तू तो रहेगी वही ....’’
शीरीं भी हँस पड़ी और हँसती चली गई। दोनों सखियाँ देर तक बातें करती रहीं। अभी मानों चीजें हाथ के बाहर नहीं थी। और इससे बहुत सुकून था, आश्वस्ति थी।  (जनसत्ता वार्षिक अंक 2009)                                    

Thursday, 1 November 2012

ड्राप आउट
                          -शिवदयाल
मुजफ्फरपुर का एक गाँव .     फोटो : सृष्टि









सोचा था
तुम पर लिखूँगा एक कहानी

खूब सोचा जब इस बात पर
तो पाया
तुम तो कविता का विषय हो
ए सरिता !

तुमसे भी कहा था
वादा किया था मैंने
कि लिखूँगा जरूर एक कहानी
कि कैसे बनती फिरती है
एक छोटी-सी किशोरवय लड़की
गाँव भर की नानी

लेकिन मेरे कहन पर
भारी पड़ती है तुम्हारी नादानी,
और वह कौतुकपूर्ण विश्वास
‘हमें भी जरूर बताइएगा चाचा - !’

ओह, मैं कैसे पिरोऊँ कथा में यह सब -
जैसे कि
खेल-खेल में तुम जो
इतने सारे काम करती जाती हो -
रोपनी, सोहनी, कटनी, दँवनी
तुम्हारी देह-भंगिमाओं में
व्याख्यायित होता है ऋतु-चक्र

तुमने मास्साहब को कैसे छकाया
और स्कूल जाने से इनकार कर दिया
चारा ढोते कैसे सीधी की
कितकित की उलटी गोटी -
मैं कैसे लिखूँ
कैसे कहुँ कि
भुअरी गइया की बाछी की
आखिर तुम लगती कौन हो !

तुम तो हो
स्कूल से ‘ड्राप आउट’
और लिख सकती हो
बस स से सरिता
लेकिन यह तो बताओ
कि गाँव भर के जनावर
और चिरई-चुरुँग
कैसे समझ लेते हैं तुम्हारी भाषा ?

कागज चबाती बकरी
मुर्गियों पर झपट्टा मारता कुत्ता
आपस में सींग लड़ाती गऊएँ
झट मान लेते हैं तुम्हारी बात ?

तुमने आखिर
कौन-सी पढ़ाई पढ़ी है
ए सरिता
तुम पर लिखी जा सकती है
सिर्फ कविता !

सच सरिता,
किसी कथानक में नहीं समाते
तुम्हारे नन्हें-नन्हें सरोकार
जिनसे चलता है वास्तव में
जगत का  जीवन-व्यापार !
                           
         (’ कवि के गाँव शीतलपुरा , सीवान की एक बच्ची)

  नव-चैतन्य के महावट - रवींद्रनाथ                                 - शिवदयाल  ब चपन में ही जिन विभूतियों की छवि ने मन के अंदर अपना स्थाई निवा...