शिवदयाल की कहानियाँ: विमर्श गोष्ठी
(संदर्भ: भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित कहानी संग्रह ‘मुन्ना बैंडवाले उस्ताद’)
विगत 28 नवम्बर, 2009 को पटना के राज्य अभिलेखागार के सेमिनार हॉल में ‘शिवदयाल की कहानियाँ’ (संदर्भ - भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित कहानी संग्रह मुन्ना बैंडवाले उस्ताद) पर एक विमर्श गोष्ठी का आयोजन हुआ।
चर्चा की शुरूआत करते हुए अंग्रेजी एवं हिन्दी के प्रख्यात विद्वान व समीक्षक डा. शैलेश्वर सती प्रसाद ने कहा कि शिवदयाल की कहानियाँ वैचारिक, राजनीतिक एवं कलात्मक स्तर पर हिन्दी कहानी को नवीन आयाम देती हैं और यह संग्रह इस दशक की संभवतः सर्वश्रेष्ठ कथाकृति है। उन्होंने कहा कि शीर्षक कथा ‘मुन्ना बैंडवाले उस्ताद’ अद्भुत कहानी है और यह प्रेमचंद की ईदगाह से कमजोर नहीं। डा. प्रसाद ने विचार व्यक्त किया कि शिवदयाल की कहानियों में मध्यवर्ग की त्रासदी अत्यंत मार्मिकता के साथ चित्रित हुई है, लेकिन इनकी कहानियों में कमजोर वर्ग के पात्रा, उनकी जीवन-स्थितियाँ, जनसंगठन और संघर्ष भी प्रमुखता पाते हैं।
समकालीन हिन्दी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर आलोक धन्वा ने कहा कि शिवदयाल आंदोलनों की पृष्ठभूमि से आए रचनाकार हैं। इनकी कहानियों में विचार और संवेदना की यात्रा साथ-साथ चलती है, ऐसा बहुत कम होता है। इनकी कहानी ‘नॉस्टैल्जिया’ महादेशों की यात्रा करती है। इनकी संवेदना देश की सीमाओं को लाँघकर - इराक, अपफगानिस्तान, बाँग्लादेश और यूरोप-अमेरिका तक विस्तार पाती हैं और वास्तव में उन स्थानों की हलचलों और घटनाओं को हमारे अपने जीवन का हिस्सा बना देती हैं। उन्होंने कहा कि शिवदयाल की कहानियाँ व्यापक सामाजिक आलोचना का आधर तैयार करती हैं, इस काम में वे पर्याप्त संयम और आत्मानुशासन से काम लेते हैं। इससे उनकी रचनाओं का शास्त्राीय आधर तैयार होता है। वे हमारे समय के जेनुइन लेखक है।
प्रख्यात कथाकार उषाकिरण खान ने भी संग्रह को इस दशक की श्रेष्ठ कथाकृति बताते हुए कहा कि हर कहानी मँझी हुई है। शिवदयाल ने मध्यवर्ग की त्रासदियों और विडम्बनाओं को अत्यंत परिपक्वता और कलात्मकता के साथ उजागर किया है। उन्होंने आलोक, मुन्ना बैंडवाले उस्ताद, चंदन खुशबू की दुकान तथा नॉस्टैल्जिया कहानियों का जिक्र करते हुए कहा कि नॉस्टैल्जिया हमारे समय की भयानक कहानी कहती है।
वरिष्ठ उपन्यासकार एवं भा.प्र.से. के अध्किारी व्यास मिश्र ने विशेष रूप से ‘आलोक’ और ‘खबर’ कहानी की चर्चा की। उन्होंने कथाकार के सूक्ष्म प्रेक्षा और बारीक विश्लेषण की क्षमता को रेखांकित करते हुए कहा कि जहाँ आलोक का विषय और अपील सर्वव्यापी है, वहीं ‘खबर’ में खबरों का आतंक बड़े प्रभावी ढंग से चित्रित हुआ है। उन्होंने कहा कि ऐक्टिविस्ट रहने के बावजूद शिवदयाल ने विषयों के चुनाव में कोई सीमा नहीं मानी है और प्रायः हर तबके के पात्र इनकी कहानियों में स्थान पाते हैं। उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से यह पुस्तक दशक की सर्वश्रेष्ठ कथाकृतियों में शामिल होने जा रही है।
सहयात्राी पत्रिका से जुड़े अरुण कुमार सिंह, प्रधन महालेखाकार ने संग्रह की चंदन खुशबू की दुकान, एक सफर का साथ, तथा नॉस्टैल्जिया का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि शिवदयाल हमारे समय की सच्चाइयों से हमें आमने-सामने करते हैं, वह भी पूरी संवेदनात्मक एवं कलात्मक आवेग के साथ।
हिन्दी-उर्दू के शायर संजय कुमार कुंदन ने शिवदयाल को मानवीय मूल्यों का चितेरा बताते हुए कहा कि इनकी रचनाओं को पढ़ना शरीपफ आदमी की संगत की तरह है। भाषा पर इनकी पकड़ अद्भुत है और इसमें वे बहुत संयम बरतते हैं।
वरिष्ठ कवि डा. निखिलेश्वर प्रसाद वर्मा ने शिवदयाल को एक खुद्दार और ईमानदार रचनाकार बताया। उन्होंने कहा कि कहानियों में वे स्वयं कुछ नहीं कहते, परिस्थितियाँ और पात्रा ही सच को उद्घाटित करते हैं।
राज्य अभिलेखागार के निदेशक विजय कुमार ने साहित्यिक रचनाओं को इतिहास का स्रोत स्वीकार किए जाने पर जोर दिया और कहा कि साहित्यिक रचनाएँ अपने समय का विश्वसनीय संदर्भ-स्रोत व दस्तावेज हैं।
विमर्श गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार शेखर ने की। उन्होंने ‘मुन्ना बैंडवाले उस्ताद’ को एक ‘मेजर’ कहानी के रूप में स्वीकार किया, इसके लिए उन्होंने शिवदयाल को विशेष रूप से बधई दी। साथ ही उन्होंने कहा कि एक्टिविज्म की पृष्ठभूमि की कहानी ‘आलोक’ में आलोक और सुधा के चरित्रा का अभी और विकास किया जाना चाहिए था।
अपने वक्तव्य में शिवदयाल ने विमर्श गोष्ठी में उपस्थित सभी लोगों के प्रति आभार प्रकट किया। उन्होंने कहा कि संग्रह में वास्तव में उथल-पुथल से भरे तीन दशक समाए हुए हैं।
इस विमर्श गोष्ठी का आयोजन ‘वातायन’ ने किया था और गोष्ठी का संचालन इसके निदेशक वरिष्ठ कवि राजेश शुक्ला ने किया।
गोष्ठी की शुरूआत में शिवदयाल ने अपनी कहानी ‘आलोक’ का पाठ भी किया। इस अवसर पर योगानंद हीरा, प्रो. किरण बाला प्रसाद, आभा सिन्हा, मुसापिफर बैठा, सुनील सिन्हा, राकेश प्रियदर्शी, रामयतन यादव, अनीस अंकुर, नवीन, सृष्टि दयाल, कमलेश कुमार, अखिलेश कुमार, बादशाह चौबे, राजीव रंजन प्रसाद, उदय ठाकुर, रवीन्द्र नाथ बैठा तथा अरुण नारायण आदि कई वरिष्ठ एवं युवा रचनाकार, संस्कृतिकर्मी तथा एक्टिविस्ट समूह के लोग उपस्थित थे।
- अरुण नारायण
प्रकाशन विभाग, बिहार विधन परिषद्, पटना।( पाखी में प्रकाशित)
(संदर्भ: भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित कहानी संग्रह ‘मुन्ना बैंडवाले उस्ताद’)
विगत 28 नवम्बर, 2009 को पटना के राज्य अभिलेखागार के सेमिनार हॉल में ‘शिवदयाल की कहानियाँ’ (संदर्भ - भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित कहानी संग्रह मुन्ना बैंडवाले उस्ताद) पर एक विमर्श गोष्ठी का आयोजन हुआ।
चर्चा की शुरूआत करते हुए अंग्रेजी एवं हिन्दी के प्रख्यात विद्वान व समीक्षक डा. शैलेश्वर सती प्रसाद ने कहा कि शिवदयाल की कहानियाँ वैचारिक, राजनीतिक एवं कलात्मक स्तर पर हिन्दी कहानी को नवीन आयाम देती हैं और यह संग्रह इस दशक की संभवतः सर्वश्रेष्ठ कथाकृति है। उन्होंने कहा कि शीर्षक कथा ‘मुन्ना बैंडवाले उस्ताद’ अद्भुत कहानी है और यह प्रेमचंद की ईदगाह से कमजोर नहीं। डा. प्रसाद ने विचार व्यक्त किया कि शिवदयाल की कहानियों में मध्यवर्ग की त्रासदी अत्यंत मार्मिकता के साथ चित्रित हुई है, लेकिन इनकी कहानियों में कमजोर वर्ग के पात्रा, उनकी जीवन-स्थितियाँ, जनसंगठन और संघर्ष भी प्रमुखता पाते हैं।
समकालीन हिन्दी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर आलोक धन्वा ने कहा कि शिवदयाल आंदोलनों की पृष्ठभूमि से आए रचनाकार हैं। इनकी कहानियों में विचार और संवेदना की यात्रा साथ-साथ चलती है, ऐसा बहुत कम होता है। इनकी कहानी ‘नॉस्टैल्जिया’ महादेशों की यात्रा करती है। इनकी संवेदना देश की सीमाओं को लाँघकर - इराक, अपफगानिस्तान, बाँग्लादेश और यूरोप-अमेरिका तक विस्तार पाती हैं और वास्तव में उन स्थानों की हलचलों और घटनाओं को हमारे अपने जीवन का हिस्सा बना देती हैं। उन्होंने कहा कि शिवदयाल की कहानियाँ व्यापक सामाजिक आलोचना का आधर तैयार करती हैं, इस काम में वे पर्याप्त संयम और आत्मानुशासन से काम लेते हैं। इससे उनकी रचनाओं का शास्त्राीय आधर तैयार होता है। वे हमारे समय के जेनुइन लेखक है।
प्रख्यात कथाकार उषाकिरण खान ने भी संग्रह को इस दशक की श्रेष्ठ कथाकृति बताते हुए कहा कि हर कहानी मँझी हुई है। शिवदयाल ने मध्यवर्ग की त्रासदियों और विडम्बनाओं को अत्यंत परिपक्वता और कलात्मकता के साथ उजागर किया है। उन्होंने आलोक, मुन्ना बैंडवाले उस्ताद, चंदन खुशबू की दुकान तथा नॉस्टैल्जिया कहानियों का जिक्र करते हुए कहा कि नॉस्टैल्जिया हमारे समय की भयानक कहानी कहती है।
वरिष्ठ उपन्यासकार एवं भा.प्र.से. के अध्किारी व्यास मिश्र ने विशेष रूप से ‘आलोक’ और ‘खबर’ कहानी की चर्चा की। उन्होंने कथाकार के सूक्ष्म प्रेक्षा और बारीक विश्लेषण की क्षमता को रेखांकित करते हुए कहा कि जहाँ आलोक का विषय और अपील सर्वव्यापी है, वहीं ‘खबर’ में खबरों का आतंक बड़े प्रभावी ढंग से चित्रित हुआ है। उन्होंने कहा कि ऐक्टिविस्ट रहने के बावजूद शिवदयाल ने विषयों के चुनाव में कोई सीमा नहीं मानी है और प्रायः हर तबके के पात्र इनकी कहानियों में स्थान पाते हैं। उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से यह पुस्तक दशक की सर्वश्रेष्ठ कथाकृतियों में शामिल होने जा रही है।
सहयात्राी पत्रिका से जुड़े अरुण कुमार सिंह, प्रधन महालेखाकार ने संग्रह की चंदन खुशबू की दुकान, एक सफर का साथ, तथा नॉस्टैल्जिया का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि शिवदयाल हमारे समय की सच्चाइयों से हमें आमने-सामने करते हैं, वह भी पूरी संवेदनात्मक एवं कलात्मक आवेग के साथ।
हिन्दी-उर्दू के शायर संजय कुमार कुंदन ने शिवदयाल को मानवीय मूल्यों का चितेरा बताते हुए कहा कि इनकी रचनाओं को पढ़ना शरीपफ आदमी की संगत की तरह है। भाषा पर इनकी पकड़ अद्भुत है और इसमें वे बहुत संयम बरतते हैं।
वरिष्ठ कवि डा. निखिलेश्वर प्रसाद वर्मा ने शिवदयाल को एक खुद्दार और ईमानदार रचनाकार बताया। उन्होंने कहा कि कहानियों में वे स्वयं कुछ नहीं कहते, परिस्थितियाँ और पात्रा ही सच को उद्घाटित करते हैं।
राज्य अभिलेखागार के निदेशक विजय कुमार ने साहित्यिक रचनाओं को इतिहास का स्रोत स्वीकार किए जाने पर जोर दिया और कहा कि साहित्यिक रचनाएँ अपने समय का विश्वसनीय संदर्भ-स्रोत व दस्तावेज हैं।
विमर्श गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार शेखर ने की। उन्होंने ‘मुन्ना बैंडवाले उस्ताद’ को एक ‘मेजर’ कहानी के रूप में स्वीकार किया, इसके लिए उन्होंने शिवदयाल को विशेष रूप से बधई दी। साथ ही उन्होंने कहा कि एक्टिविज्म की पृष्ठभूमि की कहानी ‘आलोक’ में आलोक और सुधा के चरित्रा का अभी और विकास किया जाना चाहिए था।
अपने वक्तव्य में शिवदयाल ने विमर्श गोष्ठी में उपस्थित सभी लोगों के प्रति आभार प्रकट किया। उन्होंने कहा कि संग्रह में वास्तव में उथल-पुथल से भरे तीन दशक समाए हुए हैं।
इस विमर्श गोष्ठी का आयोजन ‘वातायन’ ने किया था और गोष्ठी का संचालन इसके निदेशक वरिष्ठ कवि राजेश शुक्ला ने किया।
गोष्ठी की शुरूआत में शिवदयाल ने अपनी कहानी ‘आलोक’ का पाठ भी किया। इस अवसर पर योगानंद हीरा, प्रो. किरण बाला प्रसाद, आभा सिन्हा, मुसापिफर बैठा, सुनील सिन्हा, राकेश प्रियदर्शी, रामयतन यादव, अनीस अंकुर, नवीन, सृष्टि दयाल, कमलेश कुमार, अखिलेश कुमार, बादशाह चौबे, राजीव रंजन प्रसाद, उदय ठाकुर, रवीन्द्र नाथ बैठा तथा अरुण नारायण आदि कई वरिष्ठ एवं युवा रचनाकार, संस्कृतिकर्मी तथा एक्टिविस्ट समूह के लोग उपस्थित थे।
- अरुण नारायण
प्रकाशन विभाग, बिहार विधन परिषद्, पटना।( पाखी में प्रकाशित)
No comments:
Post a Comment