Saturday, 1 February 2014

आज 1 फरवरी 2014 के जनसत्ता में मेरा लेख "यह संसदीय लोकतंत्र का रास्ता नहीं " नीचे दिए लिंक पर
देख सकते हैं :
http://epaper.jansatta.com/222473/Jansatta.com/01-Febuary-2014#page/1/1

मैं चाहता हूँ कि यह बहस और खुले। प्रतिक्रिया का स्वागत है। 

Tuesday, 7 January 2014

नॉस्टैल्जिया
गद्य कोश में मेरी लम्बी कहानी देख सकते हैं । यह कहानी ' मुन्ना बैंडवाले उस्ताद 'में संकलित है।
आपकी प्रतिक्रिया प्रसन्नता देगी।
लिंक नीचे है : 
 http://www.gadyakosh.org/gk/%E0%A4%A8%E0%A5%89%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE_/_%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%A6%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B2#.UswgePQW2ps

............आभास देर रात को घर लौटा । बोस्टन वाली घटना के बाद पहली बार वह इतनी देर बाहर रहा। सनफ्रांसिस्को  की रात का नजारा करते हुए वह सोचता रहा ..." मैं यहाँ क्यों हूँ, किसलिए ? मुझे यहाँ क्यों होना चाहिए ? मुझे जीवन से क्या चाहिए ? मैं किसके लिए क्या कर रहा हूँ ? मैं यहाँ क्या आजीविका के लिए
 हूँ ? मैं यहाँ सिर्फ पैसे के लिए हूँ - किसी भी कीमत पर कमाया गया पैसा ? पैसे की मुझे क्या दरकार, खाते-पीते परिवार के अकेले वारिस को कितना कुछ चाहिए अपने सभ्य-सुसंस्कृत अस्तित्व के लिए ? मैं देवयानी के लिए यह देश न छोड़ सका, क्या मैं सपना के लिए अपना देश छोड़ दूँ ?".............

Thursday, 14 November 2013

बाल दिवस पर एक रचना :

वे हैं तो 

वे खिलखिलाएंगे तो
ओझल हो जाएँगी
गालों पर आंसुओं की सूखी लकीरें
उनकी भोली आँखों कि चमक में
धुंधली पड़ जायेगी
हर चोट कि कसक

चाहे जितनी उठाते रहे मुसीबतें
 रोना-पछताना नहीं बन पाता
 उनका स्थायी भाव,
चाव व दिलचस्पी
के साथ ही देखेंगे
जब भी देखेंगे वे
दुनिया व कुदरत के नज़ारे !

चाहे हम-आप उनसे
जितने भी हों रूठे , रूखे
वे खड़ा करते ही रहेंगे
अपने सपनों का संसार

बस यही आश्वस्ति है कल के लिए !
वे हैं तो
बालू के मैदान में हरी दूब का आसरा है
वे हैं तो
आतपों का उत्सव में बदल जाने का आश्वासन है
वे गोकुल के लिए कृष्ण की कानी अंगुली हैं !

कल के लिए जो है
- यही है !

('थोड़े से बच्चे और बाकी बच्चे' में संगृहीत, संपादक : डॉ विनोदानंद झा )

Saturday, 26 October 2013

निर्माण
                              - शिवदयाल 

यह तने हुए
इठलाते झूमते हो
जरा नत होते
तो देखते
कितना विवर्ण
वह दीखता है ढाक का पौधा
जहाँ तक छाँह जाती है तुम्हारी
कोरी मिट्टी है
नहीं है एक तृण तक
सहम कर देखते हैं उदीयमान
कुछ दूर से वे झाड़-वनस्पति
कि जाने कौन-सी, कितनी ऊँचाई
भाग्य में लिखी

हे  वृक्ष
तुम्हारे उमगने में
किनने चुकाई कीमत कितनी
कभी भी जान पाओगे?
तनिक नत होते
तो देख पाते
एक निर्माण में तुम्हारे
कितने खाद-पानी-धूप की
वंचना हुई है
अगनित कोंपलों की ...

Monday, 30 September 2013


प्रथम पुण्यतिथि पर प्रकाशित लेख
                                     किशन पटनायक
       विकल्प की तलाश  जारी रखनी होगी
                                                                                                                                                                                  -शिवदयाल

इकहरा बदन, औसत कद, साधारण पहनावा - आम तौर पर खादी का कुर्ता-पायजामा - आम होने का आभास देता एक बहुत खास व्यक्तित्व! पहली नजर में संभव है किसी समूह में आप उनका नोटिस नहीं ले पाएँ, बषर्तें आपकी उनसे नजरें न मिली हों, उन गहरी, स्थिर आँखों का साक्षात् न हुआ हो। बातचीत में भी वे उतने ही सरल और विनम्र प्रतीत होंगे - आप उस खास को आम समझने लग सकते हैं, लेकिन जब आप उनसे विदा लेकर अपने गंतव्य का रुख करेंगे तो अनुभव होगा कि आप कितने भरे-भरे लग रहे हैं। उनकी पानीदार आँखें, विचार-तरंगों में डूबती-उतराती उनकी खनकदार वाणी का ओज, हाव-भाव में एक ठहराव, व्यवहार में सौम्यता - सचमुच एक विरल व्यक्तित्व ! उनकी अनुपस्थिति का सूनापन कभी-कभी आक्रांत करता है - निजी स्तर पर भी, और सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर भी। किशान   पटनायक एक नेता, चिंतक-विचारक ही नहीं, एक योद्धा-व्यक्तित्व का नाम भी है जो आजीवन विषमता और अन्याय के विरुद्ध व्यूह-रचना में लगा रहा।
किशन  जी के व्यक्तित्व के कई पहलू हैं जो अलग-अलग स्तरों पर प्रभावित करते हैं। उन्होंने अंततः अपने को एक राजनीतिक व्यक्ति ही माना है क्योंकि राजनीति ही व्यवस्था बदलने का सबसे कारगर और सुलभ औजार है। लेकिन 1952 में सोशलिस्ट पार्टी का कार्यकर्त्ता बनकर राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले किषन पटनायक की रुचि और प्रवृत्ति मूल प्रष्नों से दो-चार होने की थी इसलिए अध्ययन और लेखन को उन्होंने हमेषा अपने काम का जरूरी अंग माना। आगे चलकर उनकी गिनती देष के चोटी के बुद्धिजीवियों, चिंतकों में होने लगी। बल्कि सन 74 के आंदोलन में शामिल होने के लिए वे पटना आए तो युवाओं का समूह उन्हें चिंतक ज्यादा और नेता कम समझता था, और कहना होगा कि उनके प्रति एक विशेष किस्म का ‘क्रेज’ या झुकाव था। सच तो यह है कि किशन जी के साथ प्रतिभाश ली युवाओं का एक समूह हर समय, हर दौर में उनके साथ लगा रहा। उनमें एक खास बात थी कि वे युवाओं को कुछ नया सोचने और करने के लिए जैसे कभी-कभी ‘प्रोवोक’ करते , उकसाते। प्रायः हर भाषण और वार्लालाप में वे श्रोता के सोच का दायरा बढ़ा देते थे। अपने अकाट्य तर्कों और विषिष्ट वक्तृता के बल पर ऐसा कर पाते थे।
उन्होंने राजनीति के माध्यम से जीवन और जगत-व्यवहार को जानने-समझने की कोशिश  की। समाजवाद उनके जीवन का लक्ष्य था - समता और नैतिकता पर आधृत मानव-समाज! यह लक्ष्य उनके जीवन की साध्य-वेला में और भी दुष्कर और अलभ्य होता गया। बीसवीं सदी में देखे गए स्वपन फलित होने के पहले ही चकनाचूर हो गए। विकासशील देशों ने भी पष्चिमी पूँजीवादी मूल्यों को अपनाना शुरू कर दिया। विद्रोहों से प्रेरित और अनुस्यूत देशीय चिंतन-प्रणाली अवरूद्ध होती गई और भूमंडलीकरण का विष्व-चिंतन उसका स्थान लेने लगा। समता, न्याय, समाजवाद - असंभव लक्ष्य बनते गए। मनुष्य की श्रेष्ठता की कसौटी उसका शील-गुण और सृजनशीलता नहीं वरन आधुनिक तकनीक के उपयोग और उपभोग की क्षमता बन गई। समाज में बाजार नहीं रहा, बाजार में समाज समाता गया। यानी - ठीक उल्टी दिशा  में मानव-समाज का प्रस्थान। स्वयं किशन जी आषंका व्यक्त करते हैं - ‘‘... विकास और जीवन-स्तर में बढ़ोतरी की दर बनाए रखने के लिए करोड़ों-करोड़ों लोगों का बलिदान करना होगा। बहुत सारी स्थानीय आबादियों का सफाया करना पड़ सकता है, जिस तरह उत्तरी अमेरिका में एक बार हुआ था (उससे छोटे पैमाने पर सोवियत रूप में भी एक बार हुआ था; जरमनी में भी एक बार हुआ था... यानी यूरोपीय लोग इस तरह की कार्रवाइयों से अपरिचित नहीं हैं)। महाहत्याओं और नरसंहार की बजाए आर्थिक योजनाएँ ही ऐसी बनाई जाएँगी कि सफाया अपने आप होने लगेगा। कोई प्रतिकार न होने पर लगातार भुखमरी, महामारी या प्यास से झुंड के झुंड लोग तड़प कर स्पष्ट लेकिन धीमी गति या मात्रा (परिमाण) में मरने लगेंगे, तब इक्कीसवीं सदी में इसको दैवी विनाष या विकास की कीमत कहकर चर्चा से ओझल कर दिया जाएगा।’’ यह तो विश्व -परिदृश्य  है, लेकिन देश  के अंदर भी जो आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य  बनता गया वह कम विचलित करने वाला नहीं था। नब्बे के दशक में एक ओर आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई तो दूसरी ओर साम्प्रदायिकता एक गंभीर चुनौती के रूप में आ खड़ी हुई। किषन पटनायक ने आरक्षण-आंदोलन को इसकी एक काट या जवाब के रूप में देखा लेकिन सत्ता-षीर्ष पर पहुँचे शुद्र नेतृत्व ने इन्हें बहुत निराष किया। मंडल आंदोलन ने उत्तर भारत की राजनीति तो बदल डाली लेकिन ऐसा नेतृत्व खड़ा न कर सका जो पिछड़ों-दलितों की चेतना को सिर्फ सत्ता-प्राप्ति का माध्यम भर न बनाकर एक बड़े सामाजिक-आर्थिक बदलाव का औजार बनाता। उल्टे भ्रष्टाचार और अपराध ने शुद्र राजनीति की रही-सही संभावनाओं को भी धूमिल बना डाला। इन आंतरिक परिस्थितियों ने वैष्विक स्तर पर जारी अमेरीका और पश्चिम परस्त नीतियों को ही प्रकारांतर से पुष्ट किया। गुजरात के तांडव ने तो जैसे यह साबित कर दिया कि लोकतंत्रीय व्यवस्था में भी एक खास मानव-समूह या समुदाय को सुनियोजित ढंग से पाषविक हिंसा का षिकार बनाया जा सकता है और बहुमत के शासन के नाम पर राज्य-व्यवस्था को भी इसमें परोक्ष रूप से शामिल किया जा सकता है।
अगर किशन पटनायक 70 के दशक के बाद से ही ‘वैकल्पिक राजनीति’ को खड़ा करने की कोषिष में लगे तो दूसरी ओर वैकल्पिक सभ्यता के निर्माण के लिए एक विष्व-दृष्टि का भी विकास करते रहे। पूँजी, आधुनिक तकनीक, बाजारवाद, पर्यावरण विनाष और खासकर भूमंडलीकरण की विपदा उनके चिंतन के केन्द्र में रही। उन्होंने लेकिन सभ्यता के इस संकट को लेकर कभी हताषा व्यक्त नहीं की बल्कि इसका सामना करने के लिए विचारों का संधान करते रहे। यही कारण है कि किषन जी उन गिने-चुने विचारकों में हैं जिन्होंने वैष्विकीकरण की चुनौतियों का सिर्फ रोना नहीं रोया बल्कि उसके विष्वसनीय, सार्थक और संभाव्य विकल्प का मार्ग तलाषते रहे। यहाँ उन्होंने गाँधीजी की अंगुली पकड़ी और आधुनिकता की वर्तमान कसौटियों को धता बताया।
किशनजी संगठन के महत्व को समझते थे इसीलिए संगठन बनाने के काम से वे कभी विरत नहीं हुए। उनका चिंतन और उनका कर्म-दोनों एक-दूसरे को परिपूरित करते थे, परिपुष्ट करते थे। सन् 74 आंदोलन के दौरान और उसके बाद भी परिवर्तनकामी जमात जेपी के बाद उनको अपना नेता मानने को तैयार थी, लेकिन वे स्वयं इसके लिए तैयार नहीं हुए। यों देखें तो जेपी और किशन पटनायक में कुछ बातें समान थीं, कुछ आधारभूत बातें, यथा - दोनों नें सत्ता के लिए सिद्धांतों से कभी कोई समझौता नहीं किया; दोनों आजीवन मानव जीवन की बेहतरी के लिए विकल्पों की तलाष में लगे रहे; दोनों समाजवादी धारा का प्रतिनिधित्व करते थे; दोनों का नैतिकता के प्रति विषेष आग्रह है। लेकिन वहीं दोनों दूर-दूर भी दिखाई देते हैं - जेपी विकल्पों की तलाश  में क्रांतिशोधक की भूमिका का निर्वाह करते हुए विचारधारा की परिधि को तोड़ते हैं, जबकि किशन पटनायक अंत तक समाजवादी बने रहते हैं; जेपी की राजनीति के केन्द्र में पार्टी या दल नहीं स्वयं ‘लोक’ है जबकि किशन जी संसदीय लोकतंत्र में पार्टी की महत्ता स्वीकार करते हैं; जेपी और किषन पटनायक के बीच कहीं लोहिया हैं जो ‘जाति-वर्ण’ को बदलाव का माध्यम बनाना चाहते हैं - किशन पटनायक इसी आइडिया को आगे तक ले जाकर ‘भारत शूद्रों का होगा’ का उदघोष करते हैं; दूसरी ओर जेपी के अंदर का मार्क्सवादी जातीय चेतना की सीमा और भंगुरता के प्रति सशंकित रहता है और वर्ग संगठन के माध्यम से जातीय चेतना कर शोधन करना चाहता है, जो जातीय चेतना का वर्गीय चेतना में रूपांतरण चाहता है ताकि वंचित जातियों के बीच क्षैतिज विभाजन में क्रांति या बदलाव का लक्ष्य-बिंदु ही न लुप्त हो जाए!
इसमें कोई शक नहीं कि अस्सी के दषक से किशन जी भारत में लोकतंत्र और समाजवाद के सबसे प्रखर व ओजस्वी प्रवक्ता व व्याख्याकार रहे। उन्होंने नयी परिस्थितियों में समाजवादी सिद्धांतों के नवीकरण और शोधन का भरसक प्रयास किया और समाजवाद को अब भी एक मूल्य के रूप में बचाने में कामयाब रहे। इतने कठिन समय में यह उनकी महान उपलब्धि मानी जाएगी। उन्होंने आज की जटिल परिस्थितियों को समझने में पूर्व  प्रचलित विचारधारा को असमर्थ बताने की हिम्मत दिखाई और नये शास्त्रों और विचारों के संधान का आग्रह रखा। दूसरी ओर जमीनी आंदोलनों से जुड़े कार्यकर्ताओं के बीच अपनी जीवंत व प्रेरणादायी उपस्थिति से नयी पहलकदमियों की जमीन तैयार की। उनकी अनुपस्थिति में उनका संगठन ‘समाजवादी जन परिषद’ ही नहीं, समाजवादी आंदोलन नेतृतव के संकट से जूझ रहा है। किशनजी के युवजन साथी इस चुनौती को अवष्य स्वीकारेंगे, क्योंकि आखिरकार दुनिया को विकल्पहीनता में नहीं छोड़ा जा सकता! (प्रभात खबर में प्रकाशित )

ई-मेल- sheodayal@rediffmail.com


                        

Friday, 27 September 2013

                                        होना और खोना 
                                                                                                                            - शिवदयाल
सदा सुहागन के पौध को मुर्झाते देख रहा हूं - जीवन में पहली बार। अब तक हर मौसम में सदा सुहागन को गुलाबी, बैंगनी और सफेद फूलों से लहलहाते ही देखा था। नाम भी इसका इसीलिए रखा गया हो - सदा सुहागन, कभी न मुरझाने वाला। हर समय वसंत का अहसास कराने वाला। शीत-घाम-पावस - सबको समान भाव से ग्रहण करने वाला। मौसम की अनुकूलता-प्रतिकुलता से निष्प्रभ सदा हरसाने वाला। फूल भी ऐसे जो ताबड़तोड़ खिलते हैं और खिलते ही फौरन मुरझा नहीं जाते। कम-से-कम दो दिन तो डंठलों से लगे ही रहते हैं, इसी बीच उनके सूखते-मुरझाते दूसरे फूल डालियों में खिल आते हैं। इसीलिए सदा सुहागन इतना पल्लवित-पुष्पित दिखता है - नवब्याहता  ज्यों साज-सिंगार से सजी-धजी ,  अपने पर रीझी ड्योढ़ी पर खड़ी हो। आखिर सदा सुहागन के पफूलों को किसका इंतजार रहता है।
एक बार लम्बे समय तक बाहर रहने के बाद अपने ठिकाने लौटा था - बहुत निराश! पिछवाड़े का दरवाजा खोला तो देखा फर्श पर मिट्टी की एक परत जम गई थी जिसपर खर-पतवार उग आए थे। एक जंगली लतर जालियों पर चढ़कर अंदर बारामदे में जैसे छाया दे रही थी। कुछ क्षणों तक खड़ा मैं सोचता रहा - हमारी अनुपस्थिति भी कितनी उपस्थितियों को संभव बनाती है! तभी कोने में रखे गमले पर दृष्टि गई तो सदा सुहागन की फुनगी पर एक फूल मुस्करा रहा था। मेरी देह में झुरझुरी दौड़ गई। आँखों में आँसु निकल आए। उस अनुभव को व्यक्त करना आसान नहीं। मुझ अकेले की जैसे बाट जोह रहा था सदा सुहागन का वह नन्हा-सा पौधा । मैं झुका, नीचे बैठकर पंखुड़ियों को छुआ, थोड़ी मोटी, गहरे हरे रंग की पत्तियों को भी। उस स्निग्ध् छुअन ने जैसे अंतर का सब क्लेष हर लिया। यह पौध मानो मुझसे कह रहा था - देखो, मैं हूँ! तुम्हारे जाने के बाद का यह लंबा निर्जला उपवास भी मुझे मार न सका। वर्षा के छींटे मिले कभी-कभार, नही तो गर्मियों के तपते दिनों और जाड़ों की ठंडी सूखी रातों से ही पाला पड़ता रहा। जड़ों को पानी न मिला तो हवा से नमी सोखकर मैं जीवित रहा। जीवित रहा कि अपना धर्म  निभाऊँ , अपनी शाखाओं पर फूल खिलाऊँ । चींटियों ने कोंपलों का रस चूसा, भँवरों और मधुमक्खियों ने पराग लूटे। और मेरा होना क्या है! मैं फैला नहीं, छतनार नहीं हुआ, तो क्या। जितने में रहा,  जितना रहा, उतने को इसी के लिए तो बचाकर, सहेजकर रखा!
आँसू पोंछते उठकर मैंने पहला काम किया कि उस गमले में, सदा सुहागन की जड़ों में पानी दिया, अपने को धन्य किया। फिर नये सिरे से अपने को बटोरकर आने वाले कठिनतर दिनों का सामना करने के लिए तैयारी शुरू की। तबसे कहीं भी रहूँ, सदा सुहागन मेरे साथ रहता चला आया है।
यों अब फूल भी ‘उत्पाद’ बन गए हैं। बारहमासा फूलों की कुछ प्रजातियाँ भी विकसित कर ली गई हैं। बचपन में मौसम की पहली बरसात के बाद गेंदे के नवांकुरित पौधें के लिए हम नर्सरियों और कोठियों को छान मारते थे। बड़े जतन से पौधे  को गीली मिट्टी में रोपकर उसके बड़े होने का इंतजार करते। पहली कली निकलते ही ऐसा उत्साह छाता मानो परिवार में किसी नये का आगमन हुआ हो। गेंदा  पहले बरसात का फूल था जो जाड़ा रहते खिलता रहता। आज वह प्रायः बारहमासा पफूल है। भक्तिभाव बढ़ने के साथ पूजा स्थलों पर उसकी विशेष माँग है। लेकिन आश्चर्य है, मुझे अपने शहर में कभी भी सदा सुहागन के फूलों की माला नहीं दिखी। मन को कहीं तसल्ली होती है कि सदा सुहागन के पफूल ‘उत्पाद’ बनने से बचे हुए हैं।
लेकिन सदा सुहागन को सूखते-मुझाते भी तो कभी नहीं देखा था। पहली बार देख रहा हूँ - पहले ऊपर की कोंपलें सूखीं और पिफर पत्ते और डंठल और तना ...। जड़ों से एक शाखा ऐसे निकली है जो मानो किसी और पौधे  का अंग हो। इस पर हरीतिमा अभी बची हुई है। लेकिन तने के बाद अगर जड़ भी सूखने लगे, तब? भादो की भरी बरसात में इस पौधे  का मुर्झाना संतप्त कर रहा है। सर्दी-गर्मी होती तो एक बहाना होता मन को समझाने-बहलाने का। रोज पानी देता हूँ और मन ही मन प्रार्थना करता हूँ कि यह पौधा  बच जाए। प्रार्थना लेकिन बिरथ जा रही है। और मन अभी उस स्तर तक नहीं सध जहाँ कि चीजों के होने और खोने का अंतर मिट जाए। अपनी तरह से यह नई दुनिया भी तो यही आग्रह कर रही है कि जो जा रहा है उसे जाने दो, उसके लिए शोक न करो, विदा-गीत न गाओ, उसे रोकने की कोशिश न करो। उस ओर से निश्चेष्ट हो जाओ और मुक्ति पा लो।
किसी अपशकुन की तरह सदा सुहागन के पौधे  को मुझाते देख रहा हूँ!

(दुनिया मेरे आगे , जनसत्ता ,२४ सितम्बर  २०१३ ) 

Saturday, 21 September 2013

शिवदयाल की कहानियां : विमर्श गोष्ठी 
28 नवम्बर 2009
दो खण्डों में विडियो क्लिपिंग पोस्ट की जा रही है (सम्पादित अंश ). आयोजन की अध्यक्षता अस्सी के दशक के चर्चित कथाकार शेखर ने की. मुख्य अतिथि  हिंदी-अंग्रेजी के  विद्वान , आलोचक  एवं कला  समीक्षक डॉ. शैलेश्वर सती  प्रसाद थे जबकि विशिष्ठ अतिथि थीं  कथाकार उषा किरण खान. संचालन   कवि एवं वातायन मेडिया के राजेश शुक्ल ने की .प्रतिभागियों में प्रमुख थे -  कवि अलोक धन्वा , उपन्यासकार  व्यासजी मिश्र , प्रधान महालेखाकार अरुण कुमार सिंह, इतिहासकार डॉ. विजय कुमार, शायर संजय कुमार कुंदन , कवि डॉ. निखिलेश्वर प्रसाद वर्मा, प्रो. किरणबाला प्रसाद,  नाटककार योगानंद  हीरा , कमलेश, एक्टिविस्ट नवीन,  कवि अरुण नारायण , कवि मुसाफिर बैठा, राकेश नंदन, आभा  सिन्हा , सृष्टि आदि . 




Saturday, 7 September 2013

समय : दो कविताएं
   
(1)
समय जम गया था
मैंने अपना पूरा ताप दिया
समय पिघल कर नदी बन गया
और मैं बन गया
किनारे पर हिमशिला

(2)
समय था
समय नहीं है
समय राख हो गया !
हम दोनों एक-दूसरे को बर्बाद करते रहे
समय मुझे कभी
मैं समय को कभी -
और समय राख होता रहा - -
समय-जो था
समय-जो रहेगा
अभी राख हो गया है !

पर चेतना की आँधी में
समय की राख उड़ती है
जहाँ-जहाँ गिरती है
(मुझको छूती है)
फफोले उग आते हैं
और समय जिन्दा हो जाता है
-मैं जल जाता हूँ !
                                     - शिवदयाल

Tuesday, 27 August 2013

काव्य संगम का आयोजन
राजेंद्र राजन का एकल पाठ  एवं कवि गोष्ठी 

महान स्वतंत्रता सेनानी बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद की स्मृति में स्थापित पटना स्थित श्री ब्रजकिशोर स्मारक प्रतिष्ठान के तत्वावधान में 18 अगस्त, 2013 को ’काव्य संगम’ का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र में दिल्ली से आए चर्चित कवि राजेन्द्र राजन का कविता पाठ हुआ। इस सत्र की अध्यक्षता मूर्धन्य कवि आलोक धन्वा ने की जबकि विषय-प्रवेष एवं संचालन कथाकार शिवदयाल ने किया।

सत्र के प्रारंभ में कवि परिचय कराते हुए शिवदयाल ने कहा कि राजेन्द्र राजन हिन्दी कविता में एक उम्मीद की तरह हैं। वे बेहद जमीनी कवि हैं। जितना जमीनी उनका व्यक्ति है उससे भी ज्यादा जमीनी उनकी कविताई है। उनकी कविताओं का वितान बहुत बड़ा है। वे बिल्कुल सादे ढंग से जटिल विषयों को उठाते हैं और मानो उनका काव्यांतरण कर देते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में कोई शोर-शराबा नहीं होता, न ही वाग्जाल का सहारा लिया जाता है, तब भी राजन न केवल पाठक की संवेदना को झकझोरते हैं बल्कि उसकी सोच की परिधि का विस्तार भी करते हैं। शिवदयाल न कहा कि राजेन्द्र राजन की कविताओं में नई सभ्यता का आवाहन है।


राजेन्द्र राजन ने काव्य पाठ की शुरूआत अपनी चर्चित रचना ’मनुष्यता के मोर्चे पर’ से की और ’श्रेय’, ’इतिहास में जगत’, ’युद्ध’,बाजार में कबीर, विजेता की प्रतीक्षा में ,बस यही एक अच्छी बात है, आदि दर्जन भर से अधिक कविताओं का  पाठ किया। पाठ का अंत उन्होंने अपनी अत्यंत चर्चित कविता ’बामियान में बुद्ध’ से किया।

प्रख्यात कवि आलोक धन्वा ने राजेन्द्र राजन की कविताओं की सराहना करते हुए कहा कि वे बिना अलंकरण अपनी बात में वजन पैदा करते हैं - यह उनका सबसे विषेष गुण है। उन्होंने राजन को हिन्दी कविता का नया नक्षत्र कहा। उन्होंने कहा कि राजेन्द्र राजन जमीनी आंदोलनों से जुडे़ रहे हैं, उनका अनुभव लोक व्यापक है, वे अपनी उम्र से बहुत आगे हैं। उनकी परिपक्वता और दृष्टिसम्पन्नता विस्मित करती है। आलोक धन्वा ने कहा कि वे संस्थान में पहली बार आकर अभिभूत हैं, यह एक ऐतिहासिक स्थान है जो स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण केन्द्र था।
ज्ञातव्य हो कि श्री ब्रजकिषोर स्मारक प्रतिष्ठान, बिहार विद्यापीठ परिसर में  स्थित है, जहाँ राजेन्द्र बाबू ने अंतिम साँसें ली, और दिल्ली राष्ट्रपति भवन जाने के पहले यहीं रहे। बिहार विद्यापीठ महान स्वतंत्रता सेनानी मौलाना मजहरूल हक द्वारा स्थापित सदाकत आश्रम का हिस्सा था। आज इसी परिसर में मौलाना मजहरूल हक पुस्तकालय है जहाँ मूल्यवान पुस्तकें संरक्षित हैं।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में सकल पाठ यानी कविता-गोष्ठी हुई। इस सत्र की अध्यक्षता हिन्दी एवं अंग्रेजी के विद्वान, कला समीक्षक डॉ0 शैलेश्व वर सती प्रसाद ने की जबकि संचालन चर्चित कवि-कथाकार भगवती प्रसाद द्विवेदी ने किया। सत्र के प्रारंभ में ही डॉ0 प्रसाद ने राजेन्द्र राजन की कविताओं पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वे आम आदमी का पक्ष आम आदमी की भाषा में रखते हैं। उनमें कोई बनावटीपन नहीं है, जबकि  उनकी कविताओं  में चिंतनपरकता है।
कविता गोष्ठी में बिहार के चर्चित कवियों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। आरंभ रानी श्रीवास्तव के कविता पाठ से हुआ जिनकी अनाम दामिनी को समर्पित कविता विषेष रूप से सराही गई। ’बैचेनियाँ’ तथा ’एक लड़का मिलने आता है’ के शायर संजय कुमार कुंदन की दो नज्मों ’उदासी की नजम’ और ’अब असली आजादी आई’ ने श्रोताओं की प्रशंसा बटोरी। उर्दू के महत्वपूर्ण शायर आलम खुर्शीद  ने अपनी ताजा गजलों से समा बाँधा - ’रात के खौफ से किस दर्जा परेशाँ  हैं हम / शाम से पहले चिरागों  को जलाए हुए हैं हम।’
 ’पिन कुशन’ और ’आग चखकर लीजिए’ जैसे चर्चित गजल संग्रहों के शायर प्रेम किरण ने अपनी गजल सुनाई -’ ’छू कर गुजरी हैं ठंडी हवाएँ मुझको/इसका मतलब है सब्ज शजर है कोई।’

समकालीन हिन्दी कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर शरद रंजन शरद की रचनाएँ ’नींद का नाटक’ तथा ’सन् 2050’  जैसी सूक्ष्म अनुभूति की कविताएँ  स्रोताओं ने सराहीं । तीन संग्रहों से पहचान बना चुके युवा कवि शहंशाह   आलम ने ’तलाशी  के लिए प्रार्थना’ कविता सुनाकर श्रोताओं की  संवेदना को छुआ। चर्चित युवा कवि राजकिशोर राजन ने लम्बी कविताओं- ’सुनैना चूड़ीहारिन’ तथा ’एक मरणासन्न वृद्धा के नाम’ कविताओं का पाठ किया। दो संग्रहों से चर्चा में आए राकेष प्रियदर्शी  ने विषमता पर केन्द्रित दो कविताएँ - ’इतिहास’ तथा ’गवाही’ सुनाई। वरिष्ठ कवि अरुण शाद्वल ने बाजारवाद पर चोट करती अपनी सुन्दर रचना  का पाठ किया।
चर्चित कवि एवं समीक्षक मुकेष प्रत्युष ने अलग आस्वाद की अपनी रचना - ’मुहावरे में नहीं’ सुनाई। हिन्दी एवं भोजपुरी में लम्बे समय से रचनारत वरिष्ठ रचनाकार सतीश  प्रसाद सिन्हा ने गजल सुनाकर अपनी सहभागिता निभाई। युवा रचनाकार प्रतिभा ने गहरी संवेदना वाली कविता ’जर्जर खिड़की का’ पाठ किया। वरिष्ठ रचनाकार आर. पी. घायल ने दो गजलें सुनाकर कार्यक्रम में अपना महत्वपूर्ण योग दिया। उर्दू पत्रिका ’कसौटी जदीद’ के संपादक और शायर अनवर शमीम ने अपनी गजलों से समा बाँधा। कवि और वातायान मीडिया के निदेषक राजेष शुक्ल ने अपना एक सुंदर गीत - ’दिवस का अवसान’ सुनाकर मन मोह लिया। एक किशोर कवि शिवांग शुक्ल ने भी अपनी सृजनशीलता से प्रभावित किया  और प्रशंसा बटोरी।
पेशे  से चिकित्सक और हृदय से संवेदनशील कवि डॉ0 निखिलेश्ववर प्रसाद वर्मा ने अपनी तीन अनुभूतिपरक रचनाओं ’बाजार’, ’बदलते शहर की तस्वीर’ तथा ’चारमीनार का चूड़ी बाजार’ का पाठ कर श्रोताओं को विस्मित किया। सामाजिक कार्यकर्ता अरुण दास ने कालीन बनाने वाले बच्चे पर केन्द्रित एक कविता सुनाई।

कवि-कथाकार एवं ’विकास सहयात्री’ के संपादक शिवदयाल ने ’कूड़ा-समय’ शीर्षक से निहायत नई संवेदना की दो कविताओं का पाठ किया - ’इस दुनिया से / किसने कितना लिया / कूड़ा इसका हिसाब बताता है’। वरिष्ठ कवि, कथाकार एवं सत्र के संचालक भगवती प्रसाद द्विवेदी के गीत ’साहबजी’ - ’रोबीली गरदन अकड़ाए आए साहब जी, नैनन तीर कमान चढ़ाए आए साहब जी’ में निहित व्यंग्य ने सबको झकझोरा। सत्र की अध्यक्षता कर रहे कवि एवं समीक्षक शैलेश्वरवर सती प्रसाद ने अपनी तीन कविताएँ - ’मैं मुफस्सिल का हूँ’, ’पेड़’ तथा ’चिनकी लालटेन’ सुनाकर सबको मुग्ध कर दिया।
संस्थान के सचिव प्रो0 बी0बी0 मंडल ने  अतिथि कवि राजेन्द्र राजन, सहित सभी रचनाकारों एवं अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया और कहा कि संस्थान भाषा और संस्कृति के महत्व को स्थापित करने वाले ऐसे कार्यक्रमों का समय-समय पर आयोजन करता रहेगा। उन्होंने अलग से राजन की कविताओं का  
समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य भी प्रस्तुत किया।
वर्षा में उफनती गंगा के किनारे स्थित श्री ब्रजकिशोर स्मारक प्रतिष्ठान के भव्य भवन और प्रशांत  वातावरण में ’काव्य संगम’ लगभग चार घंटे चला। कार्यक्रम में महत्वपूर्ण रचनाकारों के अतिरिक्त गण्यमान्य श्रोताओं की उपस्थिति अंत तक बनी रही। सामाजिक, प्रशासनिक, शिक्षा एवं कला क्षेत्र के दर्जनों लोगों ने आयोजन को गरिमा प्रदान की, जिनमें से प्रमुख हैं - सर्वश्री  अरुण कुमार सिंह (उप महालेखा परीक्षक एवं नियंत्रक),
 प्रो0 किरण बाला प्रसाद, प्रो0 विपिन बिहारी मंडल, चक्रवर्ती अषोक प्रियदर्शी , सत्यनारायण मदन, सुनील सिन्हा,अनिल कुमार सिन्हा, जयेन्द्र सिंह, आभा सिन्हा, सृष्टि दयाल,, राजकिशोर राजन, कृष्ण मोहन मिश्र, सुरेशचन्द्र मिश्रा, सीताराम शरण, राकेश
प्रियदर्शी , प्रतिभा वर्मा, शिववचन शर्मा, विनीत कुमार, मोइन आजाद, अनवर शमीम,, सोनू किशन, विवेक कुमार, मणि लाल, मुकेष प्रत्युष ,जुगेश्वर , तरुण कुमार तथा  पप्पू कुमार आदि।
   

Thursday, 4 July 2013

गद्यकोश में मेरी कहानी देख सकते हैं : ' चंदन खुशबू की दुकान ' www.gadyakosh.org/sheodayal

 गद्यकोश में मेरी कहानी देख सकते हैं  :  ' चंदन खुशबू की दुकान '
 www.gadyakosh.org/sheodayal

इस कहानी में बाजारवाद और अंधी स्पर्धा से जूझते परिवार की कथा है, जिसमें दाम्पत्य जीवन का सौंदर्य निखर कर सामने आता है।यह कहानी आधुनिक दाम्पत्य के मूल्यों को परिभाषित और  स्थापित भी करती है।अनेक  पाठकों को यह कहानी पसंद आई। प्रख्यात आलोचक विजेंद्र नारायण सिंह जी को यह कहानी बहुत प्रिय थी।

 आखिरकार सब कहीं से थककर मैंने एक दुकान खोल ली। पिता ने इसके लिए मकान के सामने की जमीन पर दस बटा आठ का एक कामचला कमरा खड़ा कर दिया। उसमें दरवाजे की जगह शटर लगवा दिया। पहले मैंने सोचा कि शायद किराए के लिए दुकान बनवा रहे हों, गाड़ी के लिए गैराज तो बनवा नहीं सकते। लेकिन नहीं, उनकी गरज तो कुछ और थी। एक दिन उन्होंने मुझे बुलवाया। काम की हड़बड़ी थी, फिर भी गया।

‘‘अब तक तुम कितनी कम्पनियाँ बदल चुके हो?’’ हठात् यह प्रश्न सुनकर मैं तो गिनती ही भूल गया। फिर सोचा, बूढ़े भी पता नहीं क्या-क्या लेकर बैठ जाते हैं।
‘‘यही कोई सात-आठ ...’’
‘‘अभी किस कम्पनी में हो?’’
लो, यह तो पकड़े गए। दो महीने से एक तरह से खाली ही था।
‘‘अच्छा छोड़ो, कितना कमा लेते हो?’’
कमजोरी पकड़े जाने पर ताकत दिखाने का हौसला भी बनता है। मैं कुछ तन कर बोला -
‘‘ठीक ही ठाक चल रहा है। नरम-गरम सब खुद ही तो झेल रहा हूँ। कभी आपसे कुछ कहा ?’’
बच्चा था तो कभी-कभी बैलून फुलाते हुए बैलून की हवा वापस मुँह में चली आती थी।
‘‘बकवास बंद करो। बीवी की कमाई पर अकड़ दिखाते हो, वह भी अपने बाप को। दो-दो बच्चे हो गए और अभी भी मिजाज स्कूली लौंडों वाला है.....’’
वे आगे भी कुछ बुदबुदाए, जरूर मुझे गाली दी होगी। वे कभी-कभी हम भाइयों को गालियाँ दिया करते थे।
‘‘मुझे किसलिए बुलाया आपने?’’
‘‘यह जो दुकान है, तैयार हो रही है, इसे संभालो अब। आवारागर्दी से बाज आओ। इसमें स्टेशनरी लगाओ, एक फोटो कॉपियर भी रखो। बाद में चाहो तो पी.सी.ओ. भी लगा लेना। दवाइयाँ बहुत बेच चुके, और भी जाने क्या-क्या बेचा होगा !’’
शाम में घर लौटा खाली हाथ। कमीशन के चेक की प्रत्याशा थी, नहीं मिला। बड़े बच्चे पर झुँझलाया, छोटे को झिड़की दी। पत्नी ने देखा तो लक्षणा-व्यंजना वाली अपनी शैली में सवाल दागा - ‘‘यह मुँह फुलाए कहाँ से चले आ रहे हो?’’
‘‘तुमने यह क्यों नहीं पूछा कि मुँह उठाए कहाँ से चले आ रहे हो?’’ मैंने सवाल वापस किया।
‘‘छिः, मैं ऐसा कैसे पूछती? वैसे भी तुम्हारा चेहरा तो बिल्कुल गिरा हुआ है!'' वह हँसकर बोली तो मैं भी कुछ हल्का हुआ।
‘‘अब बोलो भी, बात क्या है?’’ वह चाय लिए आ गई।
‘‘बात क्या होगी। अब तो अपने दुःख दूर होने वाले हैं।’’
‘‘सच? वह कैसे?’’
‘‘मेरे बाप से पूछो! मेरे लिए दुकान खोल रहे हैं।’’
‘‘दुकान खोल रहे हैं? कहाँ, किस मार्केट में?’’ उसकी हर्ष भरी उत्सुकता देख मुझे बहुत चिढ़ हुई।
‘‘किस मार्केट में ! अरे यह जो फाटक के बगल में कमरा बन रहा है, वहीं अपनी दुकान लगेगी। गद्दी पर बैठकर अब सौदा-सामान बेचने के दिन आए!’’
‘‘तो क्या! पहले भी तो अब तक तुम सामान ही बेचते रहे हो! ठीक तो है, अब घर बैठे सामान बेचा करो। वाह! अच्छा आइडिया है। इसी से घर में बूढ़े-बुजुर्गों का साया जरूर ही होना चाहिए। हमेशा संतान के सुख की ही कामना करते हैं। देखो, बाबूजी ने हमारे लिए कितनी अच्छी बात सोची।’’
‘‘अरे, मेरे पास मार्केटिंग का डिप्लोमा है यार! वह क्या इसीलिए है कि मैं घर में दुकान खोलकर बैठ जाऊँ ?’’
‘‘तो अब तक कौन-सा तीर मार लिया, बताओ? अपनी दुकान से तुम्हें क्या परेशानी है आखिर? दूसरे दुकानों की खाक छानने से तो यह लाख गुना बेहतर है। हाँ, तुम इतना करना कि राशन-तेल लेकर न बैठ जाना?’’
‘‘क्यों? उसमें तुम्हें क्या परेशानी है, जरा सुनुँ तो?’’
‘‘बू आएगी! बस, मुझे अच्छा नहीं लगेगा! तुम्हारे बदन से तेल-मसालों की गंध् मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती।’’ यह बात उसने इस अदा से शर्माते हुए कही कि मेरा दिल जल गया।
‘‘तो ऐसा करता हूँ। यह दुकान मैं तुम्हारे ही नाम पर खोल लेता हूँ - खुशबू जेनरल स्टोर्स। ठीक न?’’
‘‘नहीं जी, दुकान तो अपनी स्वर्गीया माताजी के नाम पर ही रखो, बरकत होगी।’’ वह साफ बच निकली।
आखिर वही होकर रहा। मेरे घर में ही दुकान खुल गई - शांति स्टोर्स - स्टेशनरी एवं फोटो स्टेट के लिए पधारें! बड़ी झिझक के साथ मैंने ‘गद्दी’ संभाली - एक छोटी-सी खूबसूरत, गद्देदार रिवॉल्विंग  चेयर। निहायत अवास्तविक प्रतीत होने वाली वास्तविकता से साक्षात! पूजा-पाठ, धूप-बत्ती के बाद ‘गद्दी’ पर बैठा तो दोनों बच्चों ने मिलकर कितने ही चक्कर खिलाए। उनकी माँ खिल-खिल कर हँसती रही और उनके बाबा और अन्य लोग मुस्कराते खड़े तमाशा देखते रहे। भीड़ छँटी तो खुशबू रानी ने पास आकर कुर्सी के दोनों हत्थों पर झुकते हुए कहा - ‘‘यह तो बड़ा अच्छा किया जी, रिवॉल्विंग चेयर ले आए। तुम्हें तो घूमने की आदत रही है न? अब बैठे-बैठे चक्कर खाते रहना।’’
वैसे खुशबू ने दुकान जमाने में खूब मदद की। सबसे पहले तो उसने एक छोटी-सी बेंत की छड़ी में पुराना कपड़ा बाँध कर ‘झाड़न’ बनाया, मुझे धूल झाड़ने की तरकीब भी बताई। उसने खुद ही दो छोटे बोर्ड भी बनाए। एक पर लिखा - ‘आज नगद, कल उधर’ और दूसरे पर - ‘उधर माँग कर शर्मिन्दा न करें।’ मैंने आपत्ति की और मुँह बिचकाया तो उसने मुझे लगभग डाँटते हुए समझाया - उधार वालों से बचकर रहना, उन पर कोई रियायत नहीं करना। एक बार जो तुमने छूट दी तो समझना - यू आर फिनिश्ड! अपना से अपना आदमी भी उधर माँगे तो कहो - क्या बताएँ, हम पर तो खुद यह पूरी दुकान ही उधार चढ़ी है। ‘‘मुझे ताज्जुब हुआ। खुशबू को दुकानदारी का तजुर्बा कब हुआ आखिर? पूछने पर उसने बताया, उसके चचेरे भाई ने अकेले तीन-तीन दुकानों का बेड़ा गर्क किया था! बहुत खूब!.............

  नव-चैतन्य के महावट - रवींद्रनाथ                                 - शिवदयाल  ब चपन में ही जिन विभूतियों की छवि ने मन के अंदर अपना स्थाई निवा...