Thursday, 4 July 2013

गद्यकोश में मेरी कहानी देख सकते हैं : ' चंदन खुशबू की दुकान ' www.gadyakosh.org/sheodayal

 गद्यकोश में मेरी कहानी देख सकते हैं  :  ' चंदन खुशबू की दुकान '
 www.gadyakosh.org/sheodayal

इस कहानी में बाजारवाद और अंधी स्पर्धा से जूझते परिवार की कथा है, जिसमें दाम्पत्य जीवन का सौंदर्य निखर कर सामने आता है।यह कहानी आधुनिक दाम्पत्य के मूल्यों को परिभाषित और  स्थापित भी करती है।अनेक  पाठकों को यह कहानी पसंद आई। प्रख्यात आलोचक विजेंद्र नारायण सिंह जी को यह कहानी बहुत प्रिय थी।

 आखिरकार सब कहीं से थककर मैंने एक दुकान खोल ली। पिता ने इसके लिए मकान के सामने की जमीन पर दस बटा आठ का एक कामचला कमरा खड़ा कर दिया। उसमें दरवाजे की जगह शटर लगवा दिया। पहले मैंने सोचा कि शायद किराए के लिए दुकान बनवा रहे हों, गाड़ी के लिए गैराज तो बनवा नहीं सकते। लेकिन नहीं, उनकी गरज तो कुछ और थी। एक दिन उन्होंने मुझे बुलवाया। काम की हड़बड़ी थी, फिर भी गया।

‘‘अब तक तुम कितनी कम्पनियाँ बदल चुके हो?’’ हठात् यह प्रश्न सुनकर मैं तो गिनती ही भूल गया। फिर सोचा, बूढ़े भी पता नहीं क्या-क्या लेकर बैठ जाते हैं।
‘‘यही कोई सात-आठ ...’’
‘‘अभी किस कम्पनी में हो?’’
लो, यह तो पकड़े गए। दो महीने से एक तरह से खाली ही था।
‘‘अच्छा छोड़ो, कितना कमा लेते हो?’’
कमजोरी पकड़े जाने पर ताकत दिखाने का हौसला भी बनता है। मैं कुछ तन कर बोला -
‘‘ठीक ही ठाक चल रहा है। नरम-गरम सब खुद ही तो झेल रहा हूँ। कभी आपसे कुछ कहा ?’’
बच्चा था तो कभी-कभी बैलून फुलाते हुए बैलून की हवा वापस मुँह में चली आती थी।
‘‘बकवास बंद करो। बीवी की कमाई पर अकड़ दिखाते हो, वह भी अपने बाप को। दो-दो बच्चे हो गए और अभी भी मिजाज स्कूली लौंडों वाला है.....’’
वे आगे भी कुछ बुदबुदाए, जरूर मुझे गाली दी होगी। वे कभी-कभी हम भाइयों को गालियाँ दिया करते थे।
‘‘मुझे किसलिए बुलाया आपने?’’
‘‘यह जो दुकान है, तैयार हो रही है, इसे संभालो अब। आवारागर्दी से बाज आओ। इसमें स्टेशनरी लगाओ, एक फोटो कॉपियर भी रखो। बाद में चाहो तो पी.सी.ओ. भी लगा लेना। दवाइयाँ बहुत बेच चुके, और भी जाने क्या-क्या बेचा होगा !’’
शाम में घर लौटा खाली हाथ। कमीशन के चेक की प्रत्याशा थी, नहीं मिला। बड़े बच्चे पर झुँझलाया, छोटे को झिड़की दी। पत्नी ने देखा तो लक्षणा-व्यंजना वाली अपनी शैली में सवाल दागा - ‘‘यह मुँह फुलाए कहाँ से चले आ रहे हो?’’
‘‘तुमने यह क्यों नहीं पूछा कि मुँह उठाए कहाँ से चले आ रहे हो?’’ मैंने सवाल वापस किया।
‘‘छिः, मैं ऐसा कैसे पूछती? वैसे भी तुम्हारा चेहरा तो बिल्कुल गिरा हुआ है!'' वह हँसकर बोली तो मैं भी कुछ हल्का हुआ।
‘‘अब बोलो भी, बात क्या है?’’ वह चाय लिए आ गई।
‘‘बात क्या होगी। अब तो अपने दुःख दूर होने वाले हैं।’’
‘‘सच? वह कैसे?’’
‘‘मेरे बाप से पूछो! मेरे लिए दुकान खोल रहे हैं।’’
‘‘दुकान खोल रहे हैं? कहाँ, किस मार्केट में?’’ उसकी हर्ष भरी उत्सुकता देख मुझे बहुत चिढ़ हुई।
‘‘किस मार्केट में ! अरे यह जो फाटक के बगल में कमरा बन रहा है, वहीं अपनी दुकान लगेगी। गद्दी पर बैठकर अब सौदा-सामान बेचने के दिन आए!’’
‘‘तो क्या! पहले भी तो अब तक तुम सामान ही बेचते रहे हो! ठीक तो है, अब घर बैठे सामान बेचा करो। वाह! अच्छा आइडिया है। इसी से घर में बूढ़े-बुजुर्गों का साया जरूर ही होना चाहिए। हमेशा संतान के सुख की ही कामना करते हैं। देखो, बाबूजी ने हमारे लिए कितनी अच्छी बात सोची।’’
‘‘अरे, मेरे पास मार्केटिंग का डिप्लोमा है यार! वह क्या इसीलिए है कि मैं घर में दुकान खोलकर बैठ जाऊँ ?’’
‘‘तो अब तक कौन-सा तीर मार लिया, बताओ? अपनी दुकान से तुम्हें क्या परेशानी है आखिर? दूसरे दुकानों की खाक छानने से तो यह लाख गुना बेहतर है। हाँ, तुम इतना करना कि राशन-तेल लेकर न बैठ जाना?’’
‘‘क्यों? उसमें तुम्हें क्या परेशानी है, जरा सुनुँ तो?’’
‘‘बू आएगी! बस, मुझे अच्छा नहीं लगेगा! तुम्हारे बदन से तेल-मसालों की गंध् मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती।’’ यह बात उसने इस अदा से शर्माते हुए कही कि मेरा दिल जल गया।
‘‘तो ऐसा करता हूँ। यह दुकान मैं तुम्हारे ही नाम पर खोल लेता हूँ - खुशबू जेनरल स्टोर्स। ठीक न?’’
‘‘नहीं जी, दुकान तो अपनी स्वर्गीया माताजी के नाम पर ही रखो, बरकत होगी।’’ वह साफ बच निकली।
आखिर वही होकर रहा। मेरे घर में ही दुकान खुल गई - शांति स्टोर्स - स्टेशनरी एवं फोटो स्टेट के लिए पधारें! बड़ी झिझक के साथ मैंने ‘गद्दी’ संभाली - एक छोटी-सी खूबसूरत, गद्देदार रिवॉल्विंग  चेयर। निहायत अवास्तविक प्रतीत होने वाली वास्तविकता से साक्षात! पूजा-पाठ, धूप-बत्ती के बाद ‘गद्दी’ पर बैठा तो दोनों बच्चों ने मिलकर कितने ही चक्कर खिलाए। उनकी माँ खिल-खिल कर हँसती रही और उनके बाबा और अन्य लोग मुस्कराते खड़े तमाशा देखते रहे। भीड़ छँटी तो खुशबू रानी ने पास आकर कुर्सी के दोनों हत्थों पर झुकते हुए कहा - ‘‘यह तो बड़ा अच्छा किया जी, रिवॉल्विंग चेयर ले आए। तुम्हें तो घूमने की आदत रही है न? अब बैठे-बैठे चक्कर खाते रहना।’’
वैसे खुशबू ने दुकान जमाने में खूब मदद की। सबसे पहले तो उसने एक छोटी-सी बेंत की छड़ी में पुराना कपड़ा बाँध कर ‘झाड़न’ बनाया, मुझे धूल झाड़ने की तरकीब भी बताई। उसने खुद ही दो छोटे बोर्ड भी बनाए। एक पर लिखा - ‘आज नगद, कल उधर’ और दूसरे पर - ‘उधर माँग कर शर्मिन्दा न करें।’ मैंने आपत्ति की और मुँह बिचकाया तो उसने मुझे लगभग डाँटते हुए समझाया - उधार वालों से बचकर रहना, उन पर कोई रियायत नहीं करना। एक बार जो तुमने छूट दी तो समझना - यू आर फिनिश्ड! अपना से अपना आदमी भी उधर माँगे तो कहो - क्या बताएँ, हम पर तो खुद यह पूरी दुकान ही उधार चढ़ी है। ‘‘मुझे ताज्जुब हुआ। खुशबू को दुकानदारी का तजुर्बा कब हुआ आखिर? पूछने पर उसने बताया, उसके चचेरे भाई ने अकेले तीन-तीन दुकानों का बेड़ा गर्क किया था! बहुत खूब!.............

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