समय : दो कविताएं
(1)
समय जम गया था
मैंने अपना पूरा ताप दिया
समय पिघल कर नदी बन गया
और मैं बन गया
किनारे पर हिमशिला
(2)
समय था
समय नहीं है
समय राख हो गया !
हम दोनों एक-दूसरे को बर्बाद करते रहे
समय मुझे कभी
मैं समय को कभी -
और समय राख होता रहा - -
समय-जो था
समय-जो रहेगा
अभी राख हो गया है !
पर चेतना की आँधी में
समय की राख उड़ती है
जहाँ-जहाँ गिरती है
(मुझको छूती है)
फफोले उग आते हैं
और समय जिन्दा हो जाता है
-मैं जल जाता हूँ !
- शिवदयाल
(1)
समय जम गया था
मैंने अपना पूरा ताप दिया
समय पिघल कर नदी बन गया
और मैं बन गया
किनारे पर हिमशिला
(2)
समय था
समय नहीं है
समय राख हो गया !
हम दोनों एक-दूसरे को बर्बाद करते रहे
समय मुझे कभी
मैं समय को कभी -
और समय राख होता रहा - -
समय-जो था
समय-जो रहेगा
अभी राख हो गया है !
पर चेतना की आँधी में
समय की राख उड़ती है
जहाँ-जहाँ गिरती है
(मुझको छूती है)
फफोले उग आते हैं
और समय जिन्दा हो जाता है
-मैं जल जाता हूँ !
- शिवदयाल
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