Saturday, 26 October 2013

निर्माण
                              - शिवदयाल 

यह तने हुए
इठलाते झूमते हो
जरा नत होते
तो देखते
कितना विवर्ण
वह दीखता है ढाक का पौधा
जहाँ तक छाँह जाती है तुम्हारी
कोरी मिट्टी है
नहीं है एक तृण तक
सहम कर देखते हैं उदीयमान
कुछ दूर से वे झाड़-वनस्पति
कि जाने कौन-सी, कितनी ऊँचाई
भाग्य में लिखी

हे  वृक्ष
तुम्हारे उमगने में
किनने चुकाई कीमत कितनी
कभी भी जान पाओगे?
तनिक नत होते
तो देख पाते
एक निर्माण में तुम्हारे
कितने खाद-पानी-धूप की
वंचना हुई है
अगनित कोंपलों की ...

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