बाल दिवस पर एक रचना :
वे हैं तो
वे खिलखिलाएंगे तो
ओझल हो जाएँगी
गालों पर आंसुओं की सूखी लकीरें
उनकी भोली आँखों कि चमक में
धुंधली पड़ जायेगी
हर चोट कि कसक
चाहे जितनी उठाते रहे मुसीबतें
रोना-पछताना नहीं बन पाता
उनका स्थायी भाव,
चाव व दिलचस्पी
के साथ ही देखेंगे
जब भी देखेंगे वे
दुनिया व कुदरत के नज़ारे !
चाहे हम-आप उनसे
जितने भी हों रूठे , रूखे
वे खड़ा करते ही रहेंगे
अपने सपनों का संसार
बस यही आश्वस्ति है कल के लिए !
वे हैं तो
बालू के मैदान में हरी दूब का आसरा है
वे हैं तो
आतपों का उत्सव में बदल जाने का आश्वासन है
वे गोकुल के लिए कृष्ण की कानी अंगुली हैं !
कल के लिए जो है
- यही है !
('थोड़े से बच्चे और बाकी बच्चे' में संगृहीत, संपादक : डॉ विनोदानंद झा )
वे हैं तो
वे खिलखिलाएंगे तो
ओझल हो जाएँगी
गालों पर आंसुओं की सूखी लकीरें
उनकी भोली आँखों कि चमक में
धुंधली पड़ जायेगी
हर चोट कि कसक
चाहे जितनी उठाते रहे मुसीबतें
रोना-पछताना नहीं बन पाता
उनका स्थायी भाव,
चाव व दिलचस्पी
के साथ ही देखेंगे
जब भी देखेंगे वे
दुनिया व कुदरत के नज़ारे !
चाहे हम-आप उनसे
जितने भी हों रूठे , रूखे
वे खड़ा करते ही रहेंगे
अपने सपनों का संसार
बस यही आश्वस्ति है कल के लिए !
वे हैं तो
बालू के मैदान में हरी दूब का आसरा है
वे हैं तो
आतपों का उत्सव में बदल जाने का आश्वासन है
वे गोकुल के लिए कृष्ण की कानी अंगुली हैं !
कल के लिए जो है
- यही है !
('थोड़े से बच्चे और बाकी बच्चे' में संगृहीत, संपादक : डॉ विनोदानंद झा )

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