Friday, 27 September 2013

                                        होना और खोना 
                                                                                                                            - शिवदयाल
सदा सुहागन के पौध को मुर्झाते देख रहा हूं - जीवन में पहली बार। अब तक हर मौसम में सदा सुहागन को गुलाबी, बैंगनी और सफेद फूलों से लहलहाते ही देखा था। नाम भी इसका इसीलिए रखा गया हो - सदा सुहागन, कभी न मुरझाने वाला। हर समय वसंत का अहसास कराने वाला। शीत-घाम-पावस - सबको समान भाव से ग्रहण करने वाला। मौसम की अनुकूलता-प्रतिकुलता से निष्प्रभ सदा हरसाने वाला। फूल भी ऐसे जो ताबड़तोड़ खिलते हैं और खिलते ही फौरन मुरझा नहीं जाते। कम-से-कम दो दिन तो डंठलों से लगे ही रहते हैं, इसी बीच उनके सूखते-मुरझाते दूसरे फूल डालियों में खिल आते हैं। इसीलिए सदा सुहागन इतना पल्लवित-पुष्पित दिखता है - नवब्याहता  ज्यों साज-सिंगार से सजी-धजी ,  अपने पर रीझी ड्योढ़ी पर खड़ी हो। आखिर सदा सुहागन के पफूलों को किसका इंतजार रहता है।
एक बार लम्बे समय तक बाहर रहने के बाद अपने ठिकाने लौटा था - बहुत निराश! पिछवाड़े का दरवाजा खोला तो देखा फर्श पर मिट्टी की एक परत जम गई थी जिसपर खर-पतवार उग आए थे। एक जंगली लतर जालियों पर चढ़कर अंदर बारामदे में जैसे छाया दे रही थी। कुछ क्षणों तक खड़ा मैं सोचता रहा - हमारी अनुपस्थिति भी कितनी उपस्थितियों को संभव बनाती है! तभी कोने में रखे गमले पर दृष्टि गई तो सदा सुहागन की फुनगी पर एक फूल मुस्करा रहा था। मेरी देह में झुरझुरी दौड़ गई। आँखों में आँसु निकल आए। उस अनुभव को व्यक्त करना आसान नहीं। मुझ अकेले की जैसे बाट जोह रहा था सदा सुहागन का वह नन्हा-सा पौधा । मैं झुका, नीचे बैठकर पंखुड़ियों को छुआ, थोड़ी मोटी, गहरे हरे रंग की पत्तियों को भी। उस स्निग्ध् छुअन ने जैसे अंतर का सब क्लेष हर लिया। यह पौध मानो मुझसे कह रहा था - देखो, मैं हूँ! तुम्हारे जाने के बाद का यह लंबा निर्जला उपवास भी मुझे मार न सका। वर्षा के छींटे मिले कभी-कभार, नही तो गर्मियों के तपते दिनों और जाड़ों की ठंडी सूखी रातों से ही पाला पड़ता रहा। जड़ों को पानी न मिला तो हवा से नमी सोखकर मैं जीवित रहा। जीवित रहा कि अपना धर्म  निभाऊँ , अपनी शाखाओं पर फूल खिलाऊँ । चींटियों ने कोंपलों का रस चूसा, भँवरों और मधुमक्खियों ने पराग लूटे। और मेरा होना क्या है! मैं फैला नहीं, छतनार नहीं हुआ, तो क्या। जितने में रहा,  जितना रहा, उतने को इसी के लिए तो बचाकर, सहेजकर रखा!
आँसू पोंछते उठकर मैंने पहला काम किया कि उस गमले में, सदा सुहागन की जड़ों में पानी दिया, अपने को धन्य किया। फिर नये सिरे से अपने को बटोरकर आने वाले कठिनतर दिनों का सामना करने के लिए तैयारी शुरू की। तबसे कहीं भी रहूँ, सदा सुहागन मेरे साथ रहता चला आया है।
यों अब फूल भी ‘उत्पाद’ बन गए हैं। बारहमासा फूलों की कुछ प्रजातियाँ भी विकसित कर ली गई हैं। बचपन में मौसम की पहली बरसात के बाद गेंदे के नवांकुरित पौधें के लिए हम नर्सरियों और कोठियों को छान मारते थे। बड़े जतन से पौधे  को गीली मिट्टी में रोपकर उसके बड़े होने का इंतजार करते। पहली कली निकलते ही ऐसा उत्साह छाता मानो परिवार में किसी नये का आगमन हुआ हो। गेंदा  पहले बरसात का फूल था जो जाड़ा रहते खिलता रहता। आज वह प्रायः बारहमासा पफूल है। भक्तिभाव बढ़ने के साथ पूजा स्थलों पर उसकी विशेष माँग है। लेकिन आश्चर्य है, मुझे अपने शहर में कभी भी सदा सुहागन के फूलों की माला नहीं दिखी। मन को कहीं तसल्ली होती है कि सदा सुहागन के पफूल ‘उत्पाद’ बनने से बचे हुए हैं।
लेकिन सदा सुहागन को सूखते-मुझाते भी तो कभी नहीं देखा था। पहली बार देख रहा हूँ - पहले ऊपर की कोंपलें सूखीं और पिफर पत्ते और डंठल और तना ...। जड़ों से एक शाखा ऐसे निकली है जो मानो किसी और पौधे  का अंग हो। इस पर हरीतिमा अभी बची हुई है। लेकिन तने के बाद अगर जड़ भी सूखने लगे, तब? भादो की भरी बरसात में इस पौधे  का मुर्झाना संतप्त कर रहा है। सर्दी-गर्मी होती तो एक बहाना होता मन को समझाने-बहलाने का। रोज पानी देता हूँ और मन ही मन प्रार्थना करता हूँ कि यह पौधा  बच जाए। प्रार्थना लेकिन बिरथ जा रही है। और मन अभी उस स्तर तक नहीं सध जहाँ कि चीजों के होने और खोने का अंतर मिट जाए। अपनी तरह से यह नई दुनिया भी तो यही आग्रह कर रही है कि जो जा रहा है उसे जाने दो, उसके लिए शोक न करो, विदा-गीत न गाओ, उसे रोकने की कोशिश न करो। उस ओर से निश्चेष्ट हो जाओ और मुक्ति पा लो।
किसी अपशकुन की तरह सदा सुहागन के पौधे  को मुझाते देख रहा हूँ!

(दुनिया मेरे आगे , जनसत्ता ,२४ सितम्बर  २०१३ ) 

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