Tuesday, 27 August 2013

काव्य संगम का आयोजन
राजेंद्र राजन का एकल पाठ  एवं कवि गोष्ठी 

महान स्वतंत्रता सेनानी बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद की स्मृति में स्थापित पटना स्थित श्री ब्रजकिशोर स्मारक प्रतिष्ठान के तत्वावधान में 18 अगस्त, 2013 को ’काव्य संगम’ का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र में दिल्ली से आए चर्चित कवि राजेन्द्र राजन का कविता पाठ हुआ। इस सत्र की अध्यक्षता मूर्धन्य कवि आलोक धन्वा ने की जबकि विषय-प्रवेष एवं संचालन कथाकार शिवदयाल ने किया।

सत्र के प्रारंभ में कवि परिचय कराते हुए शिवदयाल ने कहा कि राजेन्द्र राजन हिन्दी कविता में एक उम्मीद की तरह हैं। वे बेहद जमीनी कवि हैं। जितना जमीनी उनका व्यक्ति है उससे भी ज्यादा जमीनी उनकी कविताई है। उनकी कविताओं का वितान बहुत बड़ा है। वे बिल्कुल सादे ढंग से जटिल विषयों को उठाते हैं और मानो उनका काव्यांतरण कर देते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में कोई शोर-शराबा नहीं होता, न ही वाग्जाल का सहारा लिया जाता है, तब भी राजन न केवल पाठक की संवेदना को झकझोरते हैं बल्कि उसकी सोच की परिधि का विस्तार भी करते हैं। शिवदयाल न कहा कि राजेन्द्र राजन की कविताओं में नई सभ्यता का आवाहन है।


राजेन्द्र राजन ने काव्य पाठ की शुरूआत अपनी चर्चित रचना ’मनुष्यता के मोर्चे पर’ से की और ’श्रेय’, ’इतिहास में जगत’, ’युद्ध’,बाजार में कबीर, विजेता की प्रतीक्षा में ,बस यही एक अच्छी बात है, आदि दर्जन भर से अधिक कविताओं का  पाठ किया। पाठ का अंत उन्होंने अपनी अत्यंत चर्चित कविता ’बामियान में बुद्ध’ से किया।

प्रख्यात कवि आलोक धन्वा ने राजेन्द्र राजन की कविताओं की सराहना करते हुए कहा कि वे बिना अलंकरण अपनी बात में वजन पैदा करते हैं - यह उनका सबसे विषेष गुण है। उन्होंने राजन को हिन्दी कविता का नया नक्षत्र कहा। उन्होंने कहा कि राजेन्द्र राजन जमीनी आंदोलनों से जुडे़ रहे हैं, उनका अनुभव लोक व्यापक है, वे अपनी उम्र से बहुत आगे हैं। उनकी परिपक्वता और दृष्टिसम्पन्नता विस्मित करती है। आलोक धन्वा ने कहा कि वे संस्थान में पहली बार आकर अभिभूत हैं, यह एक ऐतिहासिक स्थान है जो स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण केन्द्र था।
ज्ञातव्य हो कि श्री ब्रजकिषोर स्मारक प्रतिष्ठान, बिहार विद्यापीठ परिसर में  स्थित है, जहाँ राजेन्द्र बाबू ने अंतिम साँसें ली, और दिल्ली राष्ट्रपति भवन जाने के पहले यहीं रहे। बिहार विद्यापीठ महान स्वतंत्रता सेनानी मौलाना मजहरूल हक द्वारा स्थापित सदाकत आश्रम का हिस्सा था। आज इसी परिसर में मौलाना मजहरूल हक पुस्तकालय है जहाँ मूल्यवान पुस्तकें संरक्षित हैं।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में सकल पाठ यानी कविता-गोष्ठी हुई। इस सत्र की अध्यक्षता हिन्दी एवं अंग्रेजी के विद्वान, कला समीक्षक डॉ0 शैलेश्व वर सती प्रसाद ने की जबकि संचालन चर्चित कवि-कथाकार भगवती प्रसाद द्विवेदी ने किया। सत्र के प्रारंभ में ही डॉ0 प्रसाद ने राजेन्द्र राजन की कविताओं पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वे आम आदमी का पक्ष आम आदमी की भाषा में रखते हैं। उनमें कोई बनावटीपन नहीं है, जबकि  उनकी कविताओं  में चिंतनपरकता है।
कविता गोष्ठी में बिहार के चर्चित कवियों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। आरंभ रानी श्रीवास्तव के कविता पाठ से हुआ जिनकी अनाम दामिनी को समर्पित कविता विषेष रूप से सराही गई। ’बैचेनियाँ’ तथा ’एक लड़का मिलने आता है’ के शायर संजय कुमार कुंदन की दो नज्मों ’उदासी की नजम’ और ’अब असली आजादी आई’ ने श्रोताओं की प्रशंसा बटोरी। उर्दू के महत्वपूर्ण शायर आलम खुर्शीद  ने अपनी ताजा गजलों से समा बाँधा - ’रात के खौफ से किस दर्जा परेशाँ  हैं हम / शाम से पहले चिरागों  को जलाए हुए हैं हम।’
 ’पिन कुशन’ और ’आग चखकर लीजिए’ जैसे चर्चित गजल संग्रहों के शायर प्रेम किरण ने अपनी गजल सुनाई -’ ’छू कर गुजरी हैं ठंडी हवाएँ मुझको/इसका मतलब है सब्ज शजर है कोई।’

समकालीन हिन्दी कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर शरद रंजन शरद की रचनाएँ ’नींद का नाटक’ तथा ’सन् 2050’  जैसी सूक्ष्म अनुभूति की कविताएँ  स्रोताओं ने सराहीं । तीन संग्रहों से पहचान बना चुके युवा कवि शहंशाह   आलम ने ’तलाशी  के लिए प्रार्थना’ कविता सुनाकर श्रोताओं की  संवेदना को छुआ। चर्चित युवा कवि राजकिशोर राजन ने लम्बी कविताओं- ’सुनैना चूड़ीहारिन’ तथा ’एक मरणासन्न वृद्धा के नाम’ कविताओं का पाठ किया। दो संग्रहों से चर्चा में आए राकेष प्रियदर्शी  ने विषमता पर केन्द्रित दो कविताएँ - ’इतिहास’ तथा ’गवाही’ सुनाई। वरिष्ठ कवि अरुण शाद्वल ने बाजारवाद पर चोट करती अपनी सुन्दर रचना  का पाठ किया।
चर्चित कवि एवं समीक्षक मुकेष प्रत्युष ने अलग आस्वाद की अपनी रचना - ’मुहावरे में नहीं’ सुनाई। हिन्दी एवं भोजपुरी में लम्बे समय से रचनारत वरिष्ठ रचनाकार सतीश  प्रसाद सिन्हा ने गजल सुनाकर अपनी सहभागिता निभाई। युवा रचनाकार प्रतिभा ने गहरी संवेदना वाली कविता ’जर्जर खिड़की का’ पाठ किया। वरिष्ठ रचनाकार आर. पी. घायल ने दो गजलें सुनाकर कार्यक्रम में अपना महत्वपूर्ण योग दिया। उर्दू पत्रिका ’कसौटी जदीद’ के संपादक और शायर अनवर शमीम ने अपनी गजलों से समा बाँधा। कवि और वातायान मीडिया के निदेषक राजेष शुक्ल ने अपना एक सुंदर गीत - ’दिवस का अवसान’ सुनाकर मन मोह लिया। एक किशोर कवि शिवांग शुक्ल ने भी अपनी सृजनशीलता से प्रभावित किया  और प्रशंसा बटोरी।
पेशे  से चिकित्सक और हृदय से संवेदनशील कवि डॉ0 निखिलेश्ववर प्रसाद वर्मा ने अपनी तीन अनुभूतिपरक रचनाओं ’बाजार’, ’बदलते शहर की तस्वीर’ तथा ’चारमीनार का चूड़ी बाजार’ का पाठ कर श्रोताओं को विस्मित किया। सामाजिक कार्यकर्ता अरुण दास ने कालीन बनाने वाले बच्चे पर केन्द्रित एक कविता सुनाई।

कवि-कथाकार एवं ’विकास सहयात्री’ के संपादक शिवदयाल ने ’कूड़ा-समय’ शीर्षक से निहायत नई संवेदना की दो कविताओं का पाठ किया - ’इस दुनिया से / किसने कितना लिया / कूड़ा इसका हिसाब बताता है’। वरिष्ठ कवि, कथाकार एवं सत्र के संचालक भगवती प्रसाद द्विवेदी के गीत ’साहबजी’ - ’रोबीली गरदन अकड़ाए आए साहब जी, नैनन तीर कमान चढ़ाए आए साहब जी’ में निहित व्यंग्य ने सबको झकझोरा। सत्र की अध्यक्षता कर रहे कवि एवं समीक्षक शैलेश्वरवर सती प्रसाद ने अपनी तीन कविताएँ - ’मैं मुफस्सिल का हूँ’, ’पेड़’ तथा ’चिनकी लालटेन’ सुनाकर सबको मुग्ध कर दिया।
संस्थान के सचिव प्रो0 बी0बी0 मंडल ने  अतिथि कवि राजेन्द्र राजन, सहित सभी रचनाकारों एवं अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया और कहा कि संस्थान भाषा और संस्कृति के महत्व को स्थापित करने वाले ऐसे कार्यक्रमों का समय-समय पर आयोजन करता रहेगा। उन्होंने अलग से राजन की कविताओं का  
समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य भी प्रस्तुत किया।
वर्षा में उफनती गंगा के किनारे स्थित श्री ब्रजकिशोर स्मारक प्रतिष्ठान के भव्य भवन और प्रशांत  वातावरण में ’काव्य संगम’ लगभग चार घंटे चला। कार्यक्रम में महत्वपूर्ण रचनाकारों के अतिरिक्त गण्यमान्य श्रोताओं की उपस्थिति अंत तक बनी रही। सामाजिक, प्रशासनिक, शिक्षा एवं कला क्षेत्र के दर्जनों लोगों ने आयोजन को गरिमा प्रदान की, जिनमें से प्रमुख हैं - सर्वश्री  अरुण कुमार सिंह (उप महालेखा परीक्षक एवं नियंत्रक),
 प्रो0 किरण बाला प्रसाद, प्रो0 विपिन बिहारी मंडल, चक्रवर्ती अषोक प्रियदर्शी , सत्यनारायण मदन, सुनील सिन्हा,अनिल कुमार सिन्हा, जयेन्द्र सिंह, आभा सिन्हा, सृष्टि दयाल,, राजकिशोर राजन, कृष्ण मोहन मिश्र, सुरेशचन्द्र मिश्रा, सीताराम शरण, राकेश
प्रियदर्शी , प्रतिभा वर्मा, शिववचन शर्मा, विनीत कुमार, मोइन आजाद, अनवर शमीम,, सोनू किशन, विवेक कुमार, मणि लाल, मुकेष प्रत्युष ,जुगेश्वर , तरुण कुमार तथा  पप्पू कुमार आदि।
   

Thursday, 4 July 2013

गद्यकोश में मेरी कहानी देख सकते हैं : ' चंदन खुशबू की दुकान ' www.gadyakosh.org/sheodayal

 गद्यकोश में मेरी कहानी देख सकते हैं  :  ' चंदन खुशबू की दुकान '
 www.gadyakosh.org/sheodayal

इस कहानी में बाजारवाद और अंधी स्पर्धा से जूझते परिवार की कथा है, जिसमें दाम्पत्य जीवन का सौंदर्य निखर कर सामने आता है।यह कहानी आधुनिक दाम्पत्य के मूल्यों को परिभाषित और  स्थापित भी करती है।अनेक  पाठकों को यह कहानी पसंद आई। प्रख्यात आलोचक विजेंद्र नारायण सिंह जी को यह कहानी बहुत प्रिय थी।

 आखिरकार सब कहीं से थककर मैंने एक दुकान खोल ली। पिता ने इसके लिए मकान के सामने की जमीन पर दस बटा आठ का एक कामचला कमरा खड़ा कर दिया। उसमें दरवाजे की जगह शटर लगवा दिया। पहले मैंने सोचा कि शायद किराए के लिए दुकान बनवा रहे हों, गाड़ी के लिए गैराज तो बनवा नहीं सकते। लेकिन नहीं, उनकी गरज तो कुछ और थी। एक दिन उन्होंने मुझे बुलवाया। काम की हड़बड़ी थी, फिर भी गया।

‘‘अब तक तुम कितनी कम्पनियाँ बदल चुके हो?’’ हठात् यह प्रश्न सुनकर मैं तो गिनती ही भूल गया। फिर सोचा, बूढ़े भी पता नहीं क्या-क्या लेकर बैठ जाते हैं।
‘‘यही कोई सात-आठ ...’’
‘‘अभी किस कम्पनी में हो?’’
लो, यह तो पकड़े गए। दो महीने से एक तरह से खाली ही था।
‘‘अच्छा छोड़ो, कितना कमा लेते हो?’’
कमजोरी पकड़े जाने पर ताकत दिखाने का हौसला भी बनता है। मैं कुछ तन कर बोला -
‘‘ठीक ही ठाक चल रहा है। नरम-गरम सब खुद ही तो झेल रहा हूँ। कभी आपसे कुछ कहा ?’’
बच्चा था तो कभी-कभी बैलून फुलाते हुए बैलून की हवा वापस मुँह में चली आती थी।
‘‘बकवास बंद करो। बीवी की कमाई पर अकड़ दिखाते हो, वह भी अपने बाप को। दो-दो बच्चे हो गए और अभी भी मिजाज स्कूली लौंडों वाला है.....’’
वे आगे भी कुछ बुदबुदाए, जरूर मुझे गाली दी होगी। वे कभी-कभी हम भाइयों को गालियाँ दिया करते थे।
‘‘मुझे किसलिए बुलाया आपने?’’
‘‘यह जो दुकान है, तैयार हो रही है, इसे संभालो अब। आवारागर्दी से बाज आओ। इसमें स्टेशनरी लगाओ, एक फोटो कॉपियर भी रखो। बाद में चाहो तो पी.सी.ओ. भी लगा लेना। दवाइयाँ बहुत बेच चुके, और भी जाने क्या-क्या बेचा होगा !’’
शाम में घर लौटा खाली हाथ। कमीशन के चेक की प्रत्याशा थी, नहीं मिला। बड़े बच्चे पर झुँझलाया, छोटे को झिड़की दी। पत्नी ने देखा तो लक्षणा-व्यंजना वाली अपनी शैली में सवाल दागा - ‘‘यह मुँह फुलाए कहाँ से चले आ रहे हो?’’
‘‘तुमने यह क्यों नहीं पूछा कि मुँह उठाए कहाँ से चले आ रहे हो?’’ मैंने सवाल वापस किया।
‘‘छिः, मैं ऐसा कैसे पूछती? वैसे भी तुम्हारा चेहरा तो बिल्कुल गिरा हुआ है!'' वह हँसकर बोली तो मैं भी कुछ हल्का हुआ।
‘‘अब बोलो भी, बात क्या है?’’ वह चाय लिए आ गई।
‘‘बात क्या होगी। अब तो अपने दुःख दूर होने वाले हैं।’’
‘‘सच? वह कैसे?’’
‘‘मेरे बाप से पूछो! मेरे लिए दुकान खोल रहे हैं।’’
‘‘दुकान खोल रहे हैं? कहाँ, किस मार्केट में?’’ उसकी हर्ष भरी उत्सुकता देख मुझे बहुत चिढ़ हुई।
‘‘किस मार्केट में ! अरे यह जो फाटक के बगल में कमरा बन रहा है, वहीं अपनी दुकान लगेगी। गद्दी पर बैठकर अब सौदा-सामान बेचने के दिन आए!’’
‘‘तो क्या! पहले भी तो अब तक तुम सामान ही बेचते रहे हो! ठीक तो है, अब घर बैठे सामान बेचा करो। वाह! अच्छा आइडिया है। इसी से घर में बूढ़े-बुजुर्गों का साया जरूर ही होना चाहिए। हमेशा संतान के सुख की ही कामना करते हैं। देखो, बाबूजी ने हमारे लिए कितनी अच्छी बात सोची।’’
‘‘अरे, मेरे पास मार्केटिंग का डिप्लोमा है यार! वह क्या इसीलिए है कि मैं घर में दुकान खोलकर बैठ जाऊँ ?’’
‘‘तो अब तक कौन-सा तीर मार लिया, बताओ? अपनी दुकान से तुम्हें क्या परेशानी है आखिर? दूसरे दुकानों की खाक छानने से तो यह लाख गुना बेहतर है। हाँ, तुम इतना करना कि राशन-तेल लेकर न बैठ जाना?’’
‘‘क्यों? उसमें तुम्हें क्या परेशानी है, जरा सुनुँ तो?’’
‘‘बू आएगी! बस, मुझे अच्छा नहीं लगेगा! तुम्हारे बदन से तेल-मसालों की गंध् मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती।’’ यह बात उसने इस अदा से शर्माते हुए कही कि मेरा दिल जल गया।
‘‘तो ऐसा करता हूँ। यह दुकान मैं तुम्हारे ही नाम पर खोल लेता हूँ - खुशबू जेनरल स्टोर्स। ठीक न?’’
‘‘नहीं जी, दुकान तो अपनी स्वर्गीया माताजी के नाम पर ही रखो, बरकत होगी।’’ वह साफ बच निकली।
आखिर वही होकर रहा। मेरे घर में ही दुकान खुल गई - शांति स्टोर्स - स्टेशनरी एवं फोटो स्टेट के लिए पधारें! बड़ी झिझक के साथ मैंने ‘गद्दी’ संभाली - एक छोटी-सी खूबसूरत, गद्देदार रिवॉल्विंग  चेयर। निहायत अवास्तविक प्रतीत होने वाली वास्तविकता से साक्षात! पूजा-पाठ, धूप-बत्ती के बाद ‘गद्दी’ पर बैठा तो दोनों बच्चों ने मिलकर कितने ही चक्कर खिलाए। उनकी माँ खिल-खिल कर हँसती रही और उनके बाबा और अन्य लोग मुस्कराते खड़े तमाशा देखते रहे। भीड़ छँटी तो खुशबू रानी ने पास आकर कुर्सी के दोनों हत्थों पर झुकते हुए कहा - ‘‘यह तो बड़ा अच्छा किया जी, रिवॉल्विंग चेयर ले आए। तुम्हें तो घूमने की आदत रही है न? अब बैठे-बैठे चक्कर खाते रहना।’’
वैसे खुशबू ने दुकान जमाने में खूब मदद की। सबसे पहले तो उसने एक छोटी-सी बेंत की छड़ी में पुराना कपड़ा बाँध कर ‘झाड़न’ बनाया, मुझे धूल झाड़ने की तरकीब भी बताई। उसने खुद ही दो छोटे बोर्ड भी बनाए। एक पर लिखा - ‘आज नगद, कल उधर’ और दूसरे पर - ‘उधर माँग कर शर्मिन्दा न करें।’ मैंने आपत्ति की और मुँह बिचकाया तो उसने मुझे लगभग डाँटते हुए समझाया - उधार वालों से बचकर रहना, उन पर कोई रियायत नहीं करना। एक बार जो तुमने छूट दी तो समझना - यू आर फिनिश्ड! अपना से अपना आदमी भी उधर माँगे तो कहो - क्या बताएँ, हम पर तो खुद यह पूरी दुकान ही उधार चढ़ी है। ‘‘मुझे ताज्जुब हुआ। खुशबू को दुकानदारी का तजुर्बा कब हुआ आखिर? पूछने पर उसने बताया, उसके चचेरे भाई ने अकेले तीन-तीन दुकानों का बेड़ा गर्क किया था! बहुत खूब!.............

Wednesday, 26 June 2013

                             हिमालय भारत का भाल है 
                                                                                                                             -शिवदयाल

इस बार ' विकास सहयात्री ' पत्रिका (अप्रैल-जून ) की आवरण कथा हमने पर्यावरण संकट पर केन्द्रित की , और संयोग ऐसा कि पत्रिका के स्टाल पर पहुँचते न पहुँचते उत्तराखंड में ऐसी भयंकर तबाही हो गई।

हमारे शास्त्र-पुराणों और मिथकों में हिमालय और गंगा  की बहुत महिमा है। कहा गया है कि  गंगा जब स्वर्ग से अवतरित हुई तो उसके वेग को सँभालने के लिए शिवजी को अपनी जटाओं में उसे समेटना पड़ा और तब एक जटा से होकर उन्होंने गंगा को धरती पर आने दिया। इस मिथक में वास्तव में गंगा के उद्गम की जटिलता को व्यक्त किया गया है। सदियों से हिमालय में  लोग वहां के परिवेश के अनुसार अपनी जीवन-शैली  को ढालते आये हैं। पिछले कुछ दशकों में , विशेषकर उत्तराखंड राज्य के निर्माण के बाद लोभ-लालच में वहां के नेताओं और कर्णधारों ने अपनी तपोभूमि को आनंदलोक में बदलने का अभियान चलाया। भुरभुरी मिटटी के अभी भी बनते हुए पहाड़ की भंगुरता की अनदेखी कर ऐसे व्यवहार किया गया मानो  हिमालय कोई बड़ा पठार हो। विकास के इंजन को चलाने के लिए अब हिमालय के संसाधनों पर भी गिद्ध-दृष्टि लग गयी। राज्य को बिजली उत्पादक प्रदेश बनाने की महत्वाकांक्षा में  सदानीरा नदियों को जगह-जगह से बाँधने के लिए होड़ मच गयी।   परिणाम सामने है , बल्कि यह तो एक चेतावनी भर है। अगर हम अब भी नहीं चेते तो आनेवाले समय में किस प्रकार की विपदा का सामना करना पड़ेगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है।

मिथक इतिहास तो नहीं होता लेकिन इसमें मनुष्य जाति का सभ्यतागत अनुभव जरूर दर्ज रहता है।गंगा वाले प्रसंग से इतनी बात तो स्पष्ट हो ही जाती है कि गंगा जटिल और नाजुक संरचना वाली नदी है।और अब विज्ञानं भी इसे सिद्ध कर रहा है। महाभारत में द्वारिका नगरी के समुद्र में समाने का प्रसंग आया है, आज 'बेट  द्वारिका' की खोज ने इसे सही ठहराया है।

विकास का यह तर्ज समूची धरती के लिए ही विनाशकारी सिद्ध हो रहा है और हिमालय भी इसकी चपेट में है, हिमालय नहीं बचा तो भारत कैसे बच  पायेगा !


Sunday, 19 May 2013

                        याद 
                                                 -शिवदयाल 
  
                                       *
                              फिर सुलझाने बैठे 
                              बेतरह उलझा
                              हिसाब-किताब 
                               कि  क्या दिया 
                               क्या पाया !
   
                                         *
                               थक कर 
                               सुस्ताने के बहाने 
                               घूमा किये 
                               और देखा किये 
                               वे सडकें , वे गलियां 
                               वे मकां , वे लोग 
                               जो सालों में 
                               नहीं बदले 
                               नहीं बद्ले… !
      
                                           *
                               रात देखा 
                               कटता हुआ चाँद 
                               झूमती हुई हवा 
                               आखों में तैर आये 
                               कैसे-कैसे दिन 
                               कैसी-कैसी रातें 
                               लमहे बहते रहे बूँद-बूँद .....! 



Sunday, 12 May 2013

स्मृति में माँ
..                         -शिवदयाल

मारूँ जामुन की टहनी पर झटास
चाटूँ करौंदे की फाँक पर  नमक

बीन आऊँ भिनसारे
रात के अंधड़ में गिरे टिकोले
गूदा खाकर सिरफल के खोइए में
पानी पीऊँ भरपेट

लेकिन किस तरह छुपाऊँ
छिले हुए घुटने
और दाग लगी बुश्शर्ट की जेब

आज तो माँ मारेगी जरूर !

तितली की पूँछ में बाँधूँ धागा
चुराऊँ ग्वाले की बोरसी से लिट्टी
बकरी के थन में मारूँ मुँह
करूँ टमटमवाले के चरते घोड़े की सवारी

और डरूँ कि
मेरे घर पहुँचने के पहले
आज उलाहना पहुँचेगी जरूर
आज तो माँ मारेगी जरूर !

झींसी की फुलेल में
निकलूँ दबे कदम चुपचाप
भर दिन खेऊँ कागज की नावें
बोरे की बरसाती में
बंसी लिए फिरूँ ताल-तलैयों में
शिकार बंद करूँ मर्त्तबान में

आज छिपने का नहीं कसूर
आज तो माँ मारेगी जरूर !

Saturday, 13 April 2013

कुछ छोटी कविताएँ 

जीवन 

एक बूँद प्यास 
एक तिनका आस 

बीत गयी साँस !

नेह
  
मैं 
वह सुन्दर दीप्ति 
हो सकता हूँ 
जिसे नेह से 
बार-बार छूकर 
तुम 
अपना हाथ जला लोगे. .


देर में  

देर में 
रुकी हवा बह चली 
देर में महमह हुई रात 
देर में   भीगी दूब  पर 
बिछे हरसिंगार 
देर में 
मकरंद से लिपटा  भौंरा 

देर में 
जरा देर में 
तुमसे मैं कह सका -

मुझे तुमसे प्यार है ! 
               

-शिवदयाल 
 



  




Monday, 25 March 2013

                रंग और नूर 
                                                                   -शिवदयाल 


सूरज की किरणें वर्षा की बूँदों पर पड़ती हैं और सात रंगों में विभक्त होकर क्षितिज पर उत्तर से दक्खिन दिशा में धनुष के रूप में तन जाती हैं। इन्द्रधनुष है तो इसका मतलब है कि कहीं जल है, तृप्ति है,  कि पिपासा और तृष्णा का अंत होने वाला है। प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुईं, अम्बर से अमृत-बूँदें बरसने ही को हैं। फिर तो वर्षा-जल से आप्यायित धरती पर सृजन का कारोबार शुरू ही हो जाएगा । हमारे यहाँ श्रमण और साधु  जो कभी नहीं रुकते-ठहरते - रमता जोगी बहता पानी - बरसात के चार महीने एक जगह ठहरकर ‘चातुर्मास’ बिताते हैं। सिर्फ अपनी सुविधा  के लिए नहीं बल्कि इसलिए भी कि उनकी गतिविधियाँ  इस ‘सृजन-उत्सव’ में कहीं से भी बाधक न बनें। प्रकृति और प्रतिवेश के प्रति इस एकात्मता-बोध् से चलकर आज हम यह कहाँ आ पहुँचे हैं कि ‘पर्यावरण दिवस’ और ‘पृथ्वी दिवस’ के नाम पर खुद को ही बचाने की गुहार लगा रहे हैं।

इन्द्रधनुष देख मन उमगता है। मानो अंतर के सारे रंग छलककर क्षितिज पर टँग जाते हैं - सतरंगे धनुष की शक्ल में। इन्द्रधनुष जैसे दिलासा देता है कि बदरंगी में भी रंग है। यों तो जमाना रंगों का है, वह भी चटख रंगों का। सादा और उदास रंगों का जमाना गया। अंतर का रंग फीका पड़ता गया और बाहर चटख रंग फैलते गए। बाहर रंग ही रंग दिखाई देते हैं और वास्तव में हम सभी किसी न किसी प्रकार रंगों के व्यापार में ही रमे हैं। कोई लाल रंग का व्यापार कर रहा है तो कोई हरे रंग का। कोई नीले रंग का तो कोई केसरिया रंग का। जब व्यापार है तो प्रतिस्पर्धा  भी है। और तब आग्रह-दुराग्रह भी हैं, और इसमें हर रंग फीका पड़ रहा है, अपनी पहचान खो रहा है।
चाहे-अनचाहे हम किसी न किसी रंग के प्रति आसक्त हैं, शायद प्रतिबद्ध  भी। हम उस खास रंग से पहचान पाते हैं, बल्कि स्वयं हमारा भी कोई न कोई रंग है, भले ही वह हमें पसंद न हो। जैसे हम खुद काले हों और गोरा रंग हमें पसंद हो, कालों को गोरा बनाने वाली क्रीमों से बाजार पट गए हैं। इसके विपरीत अगर हमें हरा ;या लाल ही सही, रंग पसंद हो तो हर कहीं उसे ही देखना चाहते है, हर चीज को उसी रंग में डुबो देना चाहते हैं। कभी-कभी हमारा आग्रह इस हद तक पहुँच जाता है कि हमें कहीं कोई और रंग दीख ही नहीं पड़ता। वैसे आँखों की एक बीमारी में कोई-कोई रंग कोई और ही रंग प्रतीत होता है, जैसे देख रहे हों लाल और दीख रहा हो केसरिया। इसे रंग-अंधता या वर्ण-अंधता कहते हैं। राजनीति में यों तो यह बीमारी आम है, लेकिन यह राजनीति का चमत्कार ही है कि कभी-कभी यही सच होता है, यानी तौर-तरीके इतने एक-से होते हैं कि रंग का भेद करना मुश्किल हो जाता है। शायद इसलिए कि सत्ता का अपना ही एक रंग होता है, उस पर कोई और रंग नहीं चढ़ता - क्या लाल, क्या हरा और क्या केसरिया।
हमारी रंग-संवेदना हमारी दुनिया को बनाती और बिगाड़ती है। देखें तो दुनिया रंग-संवेदना का ही कारोबार है। कवि-कलाकार से लेकर राजनेता, और धर्म  के पहरूए तक इसी कारोबार में रमे हैं। अलग-अलग रंग और अलग-अलग दुकानें। सभी रंगों में अपनी पहचान ढूँढ रहे हैं, सभी रंगों से पहचाने जा रहे है। सभी रंगों की कमाई कर रहे हैं। हमारे यहाँ ‘रंग जमाने’ की कोशिशें होती हैं, ‘रंगदार’ होते हैं जो मुहल्लों-टोलों में रंगदारी टैक्स वसूलते हैं।
यह उत्तर से दक्खिन तक क्षितिज पर तनी सतरंगी धन्वाकार रेखा ‘नार्थ-साउथ’ का कोई भेद नहीं मानती, बल्कि उन्हें परस्पर जोड़ती है। सबके मन के आकाश में तनता है इंद्रधनुष, चाहे वह कितना ही सूना हो, कितना ही फीका हो, या एकाकी!  लेकिन इंद्रध्नुष है तो उसमें सात रंग हैं। वह छह, पाँच या कम, बल्कि आठ रंगों का भी नहीं हो सकता। कोई गूढ़ बात है, रहस्य जीवन का। इंद्रधनुष के सात रंग, जैसे सात सुर, जैसे सात समुद्र, जैसे सात जन्म ...! सात घोड़े सूरज के! सप्ताह के दिन भी सात ही।
हमारा लोक-मन भी कितना रंगीला है। वह रंगों का उत्सव-पर्व मनाता है। कृष्ण की रास-लीला भी तो रंग-लीला ही है। वह गोपियों के संग रास ही नहीं रचाते, होली भी खेलते हैं। गुरु-दर्शन से आह्लादित हजरत अमीर खुसरो कह उठते हैं - आज रंग है! राजस्थान की मरूभूमि पर भी चुनरियों के छींटदार रंग छिटके पड़े हैं। वास्तव में हमारे लोक जीवन में ही रंगों को देखने की एक ‘दृष्टि’ है। इसमें किसी एक रंग के प्रति आग्रह नहीं दिखता, बल्कि मन अपने ‘इष्ट’ के रंग में ही रंग जाना चाहता है और यह जीवन की चरम उपलब्धि है। वह ‘इष्ट’ चाहे फिर देवता हो या मनुष्य। वहाँ हर रंग अलग-अलग कारणों से अलग-अलग संदर्भों में समादृत है। क्योंकि यह दुनिया एक रंग की नहीं बनी, नहीं बनाई जा सकती। यह दुनिया रंग-बिरंगी है और बनी रहेगी। हर रंग दूसरे रंग के होने से ही पहचान पाता है, अर्थ पाता है। रंगों की कैसी विस्तीर्ण और अद्भुत छटा बन सकती है, इसका प्रमाण स्वयं हमारा भारतीय समाज है।

इंद्रधनुष अपने आप में एक मूल्य है। यह चातक की पिपासा को स्वाति की बूँद का आश्वासन है। इंद्रधनुष में सृजन के रंग समाहित हैं। इसके सात रंग परस्पर मिलकर असंख्य रंग-वर्णों की सृष्टि करते है, जबकि सात रंग वास्तव में निखरी हुई उजली धूप  के सात टुकड़े हैं। इंद्रधनुष धूप के टुकड़ों से ही तो बनता है। सातों रंग मिलकर धूप बन जाते हैं जिसकी ऊष्मा  और आँच से जगत का कार्य-व्यापार चल रहा है, जिसके आलोक से हमारी दुनिया प्रभासित हो रही है।
इंद्रधनुष सृष्टि की बाहों का घेरा है - व्यष्टि से लेकर समष्टि तक को अपने में समेट लेने को आतुर!   (जनसता में प्रकाशित।फोटो इन्टरनेट से।)                                                                                                                                                     

Saturday, 16 March 2013

       बांग्लादेश की नई राह
                                                                                                                                   -शिवदयाल
शाहबाग की क्रांति कई मायनों में खास है।  ढाका के इस व्यस्त चौक पर जो लोग उमड़-उमड़ कर आ रहे हैं उनका वास्ता वर्तमान से कम, इतिहास से ज्यादा है। वे अरब वसंत के क्रांतिकारियों की तरह जनविरोधी सरकार को उखाड़ फंेकने नहीं आ रहे, बल्कि चालीस  साल पहले मुक्ति संग्राम के दौर में पाकिस्तानी सेना की छत्रछाया में अपने ही देश के नर-नारियों को मारने और सताने वाले चरमपंथी युद्ध-अपराधियों को दंडित करवाने के लिए उन्होंने कमर कस ली है जो आज तक आजाद घूम रहे हैं। इन पर देशद्रोह और मानवता के विरुद्ध अपराध का मुकदमा चल रहा है। बांग्लादेश की युवा पीढ़ी इस मामले पर अधिक संवेदनशील और मुखर दिखाई दे रही है। शाहबाग की लड़ाई बंगाली राष्ट्रवाद और इस्लामी कट्टरपंथ की बीच है। वहाँ की सरकार अभी स्वयं बंगाली राष्ट्रवाद का प्रतीक बनी हुई है और मुक्ति संग्राम के ’निर्दयी विश्वासघातियों’ को कठोर दंड दिलवाने के लिए कटिबद्ध दिखाई दे रही है।
    बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में  जितने नागरिकों को संहार हुआ वह द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का सबसे बड़ा, सबसे भीषण नरसंहार था। गैर सरकारी सूत्र मरने वालों की संख्या तीस लाख से ऊपर बताते हैं, कुछ अन्य सूत्र तीन लाख से ऊपर। स्वयं पाकिस्तान सरकार छब्बीस हजार नागरिकों के संहार की बात स्वीकार करती है। भारत आने वाले पूर्वी पाकिस्तान के शरणार्थियों की संख्या से भी इस बात की पुष्टि होती है कि पाकिस्तानी सेना और उसके द्वारा खड़ी की गई मिलिशिया ने लाखों लोगों को मारा था। यों तो पोलैण्ड और चेकोस्लोवाकिया में सोवियत टैंक उतारे गए थे तब भी नागरिक आबादी निशाना बनी थी। वैसे ही कोरिया और वियतनाम युद्ध में भी बड़ी संख्या में नागरिक हत हुए थे, लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सबसे बड़ा और वीभत्स नरसंहार पूर्वी पाकिस्तान में हुआ माना जा सकता है। इसके बाद अस्सी के दशक में कम्बोडिया के खमेररूज शासन में पोलपोट ने लाखों हमवतनों को मारा। वास्तव में पाकिस्तानी सेना ने भी अपने हमवतनों (भले ही पूर्वी पकिस्तानी, बंगाली) का संहार किया, उनका जिनका पाकिस्तानी राष्ट्र के निर्माण में भारी योगदान था, बल्कि पश्चिमी पाकिस्तान से भी अधिक।
    इस क्षेत्र में ’धार्मिक राष्ट्रीयता’ के बीज तो अंग्रेजों ने 1905 में ही बो दिए थे जब जनसंख्या के धार्मिक चरित्र एवं संकेन्द्रण के आधार पर बंगाल का विभाजन किया था - मुस्लिमबहुल पूर्वी बंगाल और हिन्दूबहुल पश्चिमी बंगाल। हालाँकि राष्ट्रवादी आंदोलन के दबाव में अंग्रेजों को साम्प्रदायिक विभाजन का यह फैसला बदलना पड़ा और बंगाल पुनः 1912 में एक हो गया। लेकिन यह कैसे माना जाए कि बंग-भंग और पाकिस्तान की मांग, और बाद में भारत के विभाजन और पाकिस्तान के जन्म के बीच कोई संबंध नहीं है। बंग-भंग ने यह तो साबित कर ही दिया था किसी इलाके का भूगोल आबादी की धार्मिक आस्थाओं के आधार बदलना संभव है। भारत-विभाजन कहीं न कहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से बंग-भंग की ही एक व्यापकतर, वृहत्तर पुनरावृत्ति था। इसमें पश्चिमी भारत को भी धार्मिक आधार पर शेष भारत से अलग कर दिया गया। वास्तव में बंग-भंग भारत के साम्प्रदायिक आधार पर विभाजन का एक प्रयोग ही था, उसकी पूर्व पीठिका थी। अंग्रेजों को तत्काल हासिल यह था कि काँग्रेस के नेतृत्व में राष्ट्रवादी आंदोलन कमजोर पड़े, मुसलमानों को इससे (काँगेस से) दूर रखकर। बंग-भंग के अगले ही साल 1906 में और वह भी ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। पुनः 1909 में मॉर्ले-मिंटो सुधार के तहत मुसलमानों के लिए साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था का  प्रस्ताव आया। 1907 में ही पूर्वी बंगाल के कोमिल्ला में दंगे हुए, बाद में जिसकी कड़ी भी बनी जमालपुर तथा अन्य स्थानों में। इसी दौरान ऐसे पर्चे भी छापे और बांटे गए जिसमें मुसलमानों से हिन्दुओं से पूरी तरह दूर रहने की अपील की गई। इसकी उग्र प्रतिक्रिया स्वदेशी आंदोलन के कार्यकर्ताओं  में हुई।
    भले ही 1912 में बंगाल का एकीकरण हो गया लेकिन भारत के साम्प्रदायिक विभाजन की नींव पड़ चुकी थी और वह भी बंगाल में। बाद के दशकों में हालाँकि मुस्लिम राजनीति में उत्तर  भारतीय अधिक प्रभावी रहे, और अलीगढ़, लाहौर और फिर कराची जैसे शहर मुस्लिम राजनीति के केन्द्र रहे, लेकिन इस पूरी राजनीति का अभ्युदय ढाका से ही हुआ था। बाद में जिन्ना ने पाकिस्तान के लिए जो ’सीधी कार्रवाई’ की धमकी या चेतावनी दी तो उसके पीछे असली ताकत ढाका और पूर्वी बंगाल की ही थी। सीधी कार्रवाई का सबसे ज्यादा असर भी बंगाल में ही दिखाई दिया।
    पूर्वी बंगाल, भारत विभाजन के पश्चात् पूर्वी पाकिस्तान बना, जो पाकिस्तानी राष्ट्रीयता की उद्भव-भूमि था। क्या विडम्बना है कि पाकिस्तानी राष्ट्रीयता की रक्षा और पाकिस्तानी राष्ट्र को एकजुट रखने के नाम पर पाकिस्तान निर्माण के पच्चीस साल के अंदर ही पूर्वी पाकिस्तान के लाखों लोगों को मारा गया। वजह? पाकिस्तानी राष्ट्रीयता के ऊपर बंगाली राष्टीªयता का हावी होना! विभाजन की राजनीति भी कैसे खेल खेलती है! पक्ष और पाले कैसे बदलते रहते हैं! लेकिन यह बंगाली राष्ट्रीयता अंध ’इस्लामी राष्ट्रीयता’ से अलग कैसे पाँव पसार सकी जिसने भारत विभाजन के माध्यम से हजार साल की साझी विरासत को छिन्न-भिन्न कर दिया था? दरअसल सत्ता  प्राप्ति की मुहिम मे  साझेदारी या उसकी अगुआई का अनिवार्य परिणाम यह नही कि सत्ता  -भोग में भागीदारी, वह भी बराबर की, हो ही। पूर्वी पाकिस्तान गरीब था और समाज के प्रभावशाली तबके में शिक्षक, वकील डाक्टर और किरानी जैसे कुछ पेशेवर लोग थे। पश्चिमी पाकिस्तान संपन्न था। यहाँ रईस थे, इजारेदार थे, कारखानेदार थे, जमींदार थे, और फौजी थे। पाकिस्तानी सेना में लगभग सभी अधिकारी पश्चिमी पाकिस्तानी थे, उसमें भी पंजाबी अधिक थे। पूर्वी पाकिस्तान के अधिकारी नाम-मात्र को थे। बहुत सालों बाद एक मेजन जेनरल हुआ था। नये देश के इस सम्पन्न, प्रभुत्वशाली तबके ने एक ओर तो अधिक से अधिक राजनीतिक और आर्थिक शक्ति अपने हाथों केन्द्रित कर ली, तो दूसरी ओर ये सŸाा के षड़यंत्रों में भी शामिल हो गए, वह भी इस तरह कि राजनीति में लगातार सेना हावी होती चली गई। पाकिस्तानी राष्ट्रीयता की उद्भव-भूमि पूर्वी पाकिस्तान अपने पश्चिमी समकक्ष के पीछे लंग भरता रहा - बढ़ती आबादी, बेकारी, भुखमरी, बाढ़, अकाल व बीमारी से त्रस्त।
    मुस्लिम लीग को अवामी लीग ने विस्थापित कर दिया जो शुरू में तो अपने को अधिक पाकिस्तानी जताती रही, लेकिन राजनीति, अर्थव्यवस्था और प्रशासन में लगातार उपेक्षा से बंगाली राष्ट्रीयता धीरे-धीरे पाकिस्तानी राष्ट्रीयता पर हावी होती चली गई। स्वाभाविक है कि इस नई राजनीति में हिन्दुओं के लिए भी जगह थी जो भले ही संख्या में बहुत कम रह गए थे, तब भी उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर थी। इस नई राजनीति को अल्पसंख्यकों की दरकार थी और इसके लिए उसे साम्प्रदायिक विद्वेष और विभेद की नीति को छोड़ भारत की ’धर्मनिरपेक्ष’ राजनीति का अनुसरण करना था। 1953 में ही ऑल पाकिस्तान अवामी मुस्लिम लीग में से पार्टी ने ’मुस्लिम’ का परित्याग कर दिया। अब तक बांग्ला को पाकिस्तान की एक राजभाषा का दर्जा मिल चुका था गो कि बहुत जद्दोजहद के बाद। 1948 में ही नोटों-सिक्कों, और स्टैम्प टिकटों आदि से बांग्ला लिपि गायब कर दी गई और उसके स्थान पर उर्दू आ गई। भारी आक्रोश पैदा होने के बाद स्वयं जिन्ना को ढाका जाना पड़ा जहाँ उन्होंने निर्णायक रूप से उर्दू की तरफदारी की और उसके पक्ष में फैसला सुना दिया। इसके बाद ही 1952 का बांग्ला भाषा आंदोलन खड़ा हुआ। तब तक 1949 में ऑल पाकिस्तान अवामी मुस्लिम लीग की स्थापना ढाका में हो चुकी थी , मुस्लिम लीग के खिलाफ बंगाली राष्ट्रीयता को मजबूत करना जिसका ध्येय था। बाद में 1956 में पाकिस्तान की नेशनल एसेम्बली में अवामी लीग और रिपब्लिकन पार्टी की गठबंधन सरकार को बहुमत मिलने के बाद लीग के नेता हुसैन शहीद सुहरावर्दी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने जब पूर्वी पाकिस्तान को पश्चिम के समकक्ष लाने की कोशिशें शुरू की तो राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा ने उनसे इस्तीफा ले लिया। इन्हीं मिर्जा ने 1958 में मार्शल ला लागू कर जिस जनरल अयूब खान को मार्शल ला प्रशासक बनाया उसी ने राष्ट्रपति मिर्जा को अपदस्थ कर दिया। बाद में सुहरावर्दी ने अयूब खान के खिलाफ एक गठबंधन बनाया लेकिन 1963 में बेरूत के एक होटल में वे मृत पाए गए।
शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में अवामी लीग की राजनीति पूर्वी पाकिस्तान को पाकिस्तान की मुख्यधारा की राजनीति से लगातार अलग कर रही थी लेकिन इसके लिए जिम्मेवार स्वयं पाकिस्तानी राजनीतिज्ञ और सेना थी। शेख मुजीब के छह सूत्री मांगपत्र पाकिस्तानी सरकार के समक्ष रखते ही समझादारों को अससास हो गया था कि विलगाव में पड़ा पूर्वी भाग अब अलग रास्ता अख्तियार करने के लिए तैयार था। लेकिन विडम्वना यह कि भुट्टो जैसा नेता भी परिस्थिति की गंभीरता का अंदाजा नहीं लगा पा रहा था। 1970 के आम चुनावों में मुजीब की अवामी लीग को पूर्वी पाकिस्तान की 169 में से 167 सीटें मिलीं जबकि पश्चिमी पाकिस्तान की 138 में से एक भी नहीं। सरकार बनाने का मुजीब का दावा खारिज कर दिया गया और इस प्रकार ’बांग्लादेश’ के निर्माण का आधार पूरी तरह तैयार हो गया और इसी के साथ भयानक दमन और उत्पीड़न का वह दौर शुरू हुआ जिसके बारे में ऊपर बताया गया। ’ऑपरेशन सर्चलाइट’ पूर्वी पाकिस्तान को एकदम से रौंद डालने के लिए शुरू किया गया। एक विचित्र बात यह थी कि तब के पूर्वी पाकिस्तान में इस्लामी कट्टरपंथी ’द्विराष्ट्र सिद्धांत’ के आधार पर अब भी ’एक पाकिस्तान’ के पक्षधर थे और पाकिस्तानी सेना का खुलकर साथ दे रहे थे। इनके कई गुट थे, जैसे रजाकार, अलशम्स, अलबद्र इत्यादि। बांग्ला राष्ट्रवादियों एवं उनके समर्थकों को मारने और यातनाएं देने में इन्होंनेे बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। इनपर हजारों बेगुराहों के खून का इल्जाम था, सैकड़ों स्त्रियों के साथ इन्होंने बलात्कार किया था। इन्होंने लोगों के अंग-भंग किए थे।
    1975 में तख्ता पलट और शेख मुजीब की हत्या के बाद बांग्लादेशी समाज के ये तत्व एकदम निर्भय हो गए। लगातार सैन्य शासन के दुष्चक्र में फँसा देश तब भी इनके जुल्म और अपराध नहीं भूल सका। अवामी लीग जो नेपथ्य में चली गई थी, 1990 में मार्शल लॉ हटने के बाद पुनः उभर कर आई और इसने लोगों  को मुक्ति संग्राम की याद दिलाई। अवामी लीग की नेता शेख हसीना वाजेद शेख मुजीब की बेटी हैं। हसीना दूसरी बार प्रधानमंत्री बनी हैं। कट्टरपंथी पहले सैन्य शासन और अब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के साथ हैं। पूर्व राष्ट्रपति जियाउर्रहमान की बेवा खालिदा जिया जिनकी नेता हैं। ये वही जनरल जियाउर्रहमान थे जिन्होंने सैनिक तख्ता पलट कर मुजीब की हत्या के पश्चात गद्दी हथियाई थी।
    2008 के आम चुनाव के पहले देश में सेना समर्थित एक ’केयरटेकर’ सरकार थी जिसपर तटस्थ रहकर चुनाव कराने की जिम्मेदारी भी थी लेकिन जिसने भ्रष्टाचार का बहाना लेकर दो साल चुनाव टाला था। इस सरकार ने मतदाता सूची को बहुत हद तक दुरुस्त कर दिया था और इससे कहीं न कहीं अवामी लीग की ही राह आसान हुई और उसे भारी बहुमत मिला। देश में राजनीतिक स्थिरता, लोकतंत्र की मजबूती तथा कट्टरपंथियों को हाशिए पर डालना इस सरकार की प्राथमिकता रही। हसीना सरकार में महिलाएँ भी हैं, अल्पसंख्यक भी और कुल मिलाकर इस सरकार की उपलब्धियाँ पूर्ववर्ती सरकारों से बेहतर ही रही हैं। सŸाा में आने के पहले भी शेख हसीना ने मुक्ति संग्राम के युद्ध अपराधियों को दण्ड दिलवाने का वादा किया था। सŸाा में आते ही हसीना ने युद्ध अपराधियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई तेज कर दी। दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने केयरटेकर सरकार की व्यवस्था को अपने एक निर्णय में लोकतंात्रिक आदर्शों एवं सिद्धांतों के विरुद्ध ठहराया। इसे देखते हुए हसीना सरकार एक संविधान संशोधन प्रस्ताव लेकर आई, ताकि संसद में प्रचंड बहुमत के रहते इसे पारित  करवा लिया जाए। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने इसके विरुद्ध अभियान छेड़ दिया और  सड़क पर आ गई। कट्टरपंथी और युद्ध अपराधी भी इसमें शामिल हो गए। खालिदा जिया ने तो वाशिंगटन पोस्ट में अमेरिकी सरकार से देश में लोकतंत्र बचाने के लिए हस्तक्षेप तक की अपील कर दी जिसकी व्यापक प्रतिक्रिया हुई और उनपर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की माँग हुई।
इसी बीच 4 फरवरी को ूंत बतपउम जतपइनदंस ने जमाते इस्लामी के सहायक महासचिव अब्दुल कादेर मुल्ला को उम्र कैद की सजा सुनाई। मुल्ला पर तीन सौ हत्याओं का आरोप है। बांग्लादेश के राष्ट्रवादियों तथा आज की युवा पीढ़ी को यह फैसला मान्य नहीं हुआ।युद्ध अपराधियों को मृत्युदंड से कमतर कुछ भी नहीं की माँग करते वे ढाका के शाहवाग चौक पर आ गए और वही डेरा डाल दिया। अब लड़ाई इस्लामी चरमपंथियों और बांग्ला राष्ट्रवादियों के बीच है। इस्लामी तत्वों में हिंसा और खूनखराबा में कोई कसर नहीं छोड़ी है। शाहवाग आंदोलन के एक सक्रिय कार्यकर्ता  व ब्लॉगर की हत्या के बाद आंदोलन और उफान पर आ गया है और अब समूचा बांग्लादेश इसकी गिरफ्त में है। वास्तव में शाहवाग आंदोलनकारी शेख हसीना सरकार को मजबूती प्रदान कर रहे हैं। उसके फैसलों को वैधेता प्रदान कर रहे हैं। हर उम्र, लिंग और वर्ग के लोग, इसमें शामिल हैं लेकिन युवाओं की संख्या सबसे अधिक है, वह भी लड़कियों की। यह लोग एक खुला, लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और स्त्री संवेदी समाज चाहते हैं और इसके लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं। यह आंदोलन की शक्ति का ही परिणाम है कि शेख हसीना सरकार ने बी.एन.पी. और चरमपंथियों के आगे झुकने से मना कर दिया है। उसने केयरटेकर सरकार की व्यवस्था से भी इनकार कर दिया है, चुनावों की निष्पक्षता के लिए उसने मजबूत चुनाव आयोग को पर्याप्त माना है।
    भारत के राष्ट्रपति के हाल की यात्रा शेख हसीना सहित सभी बांग्ला राष्ट्रवादियों के लिए बड़ा सम्बल रही है। इससे वास्तव में बंगाली राष्ट्रवाद को और मजबूती मिली है। कुछ तत्व  भारत में बांग्लादेश के चरमपंथियों का समर्थन कर रहे हैं और उनकी माँगों को जायज ठहरा रहे हैं। ये लोग प्रकारान्तर से आज भी द्विराष्ट्र के सिद्धांत को जायज ठहराने की कोशिश कर रहे हैं जबकि बांग्लादेश के उदय ने इसका खोखलापन चालीस साल पहले ही उजागर कर दिया। हाल के वर्षों में एक भरोसेमंद पड़ोसी मित्र देश के रूप में बांग्लादेश ने भारत की सुरक्षा चिंताओं के प्रति संवेदनशीलता दिखाई है, और तत्परतापूर्वक उन सभी आतंकी एवं चरमपंथी समूहों के खिलाफ कार्रवाई की है जो अपनी गतिविधियाँ उसकी जमीन से संचालित कर रहे थे। दोनों सरकारों का साक्षा लक्ष्य है - क्षेत्र में शांति, स्थिरता और विकास। अब भारत को आगे बढ़कर इस सौहार्द को स्थाई बनाने की कोशिश करनी चाहिए। बांग्लादेश के साथ दोस्ती राष्ट्रहित का मामला है। एक मुख्यमंत्री की जिद और दृष्टिहीनता के कारण भारत तिस्ता नदी जल बँटवारे पर अपनी प्रतिबद्धता पूरी नहीं कर पाया है। इसके बाद भूमि-सीमा विवाद हल करने का वादा राष्ट्रपति मुखर्जी कर आए हैं। पता नहीं इसका क्या अंजाम होगा। भारत की सकारात्मक पहल हर तरह से दोनों देशों के हित में होगी। यह अवसर गँवा देना दोनों देशों के लिए नुकसानदेह साबित होगा।  (जनसत्ता16 मार्च 2013)
                                                                                                                                     - शिवदयाल

Friday, 8 March 2013

मीनू मैम की हँसी
                                -शिवदयाल
बहुत जतन से
बचाई गई कोई चीज
ज्यों दिखा दी जाए
किसी को चौंकाने
या अपना ही आह्लाद दिखाने को
- ऐसे ही फैलती है
थोड़े-से मोटे होठों पर
मीनू मैम की हँसी !

एरियर, इन्क्रीमेन्ट
खाली बस
किसी सहकर्मी की लिफ्ट
बॉस द्वारा प्रशंसा
बच्चों की कभी-कभार की लाग-लपेट और लाड़ व
उनकी उपलब्धियाँ
बुजुर्ग पति की दुर्लभ चेष्टाएँ
व्यस्त दिनचर्या में से निकाली गई कोई  ट्रीट ...

मीनू मैम की हँसी
जैसे उत्सव-क्षणों का निर्वाह है !


मीनू मैम की बिन्दी

भवों के सन्धि-स्थल के ठीक ऊपर
अब सिर्फ हल्का-सा एक दाग है

लम्बे वर्तुल केशों के बीचोंबीच
काढ़ी गई माँग में
खूब चौड़ा सिन्दूर भरती थी कभी मीनू
अँजी हुई पनीली आँखों के ऊपर
तनी हुई भवों के क्षितिज के बीचोंबीच
उठता था जैसे
सुबह का सूरज - टेस लाल

यह मीनू से मैम बनते-बनते में
माथे पर घुलते-फैलते-पसरते
कुमकुम की जगह ले ली
प्लास्टिक की चिपचिपी बिन्दी ने
और इस बिन्दी ने छोड़ा -
यह गोल, कहीं गोरा धब्बा

अब भी कभी-कभी
जो दमक जाती है
मीनू मैम के माथे पर मखमली बिन्दी
वह फुर्सत का  एक रोमानी ‘चेंज’ हैं !

                                                  -शिवदयाल

Thursday, 7 March 2013

मीनू मैम का पर्स  
                                                 - शिवदयाल

घर  से निकलते-निकलते
उसे टाँग लेती हैं वे यंत्रवत्
न जाने कितनी बार
टटोलना पड़ता है उसे
दिन भर में

आइडेन्टिटी कार्ड और
डाक्टर का प्रेस्क्रिपशन
कुछ जरूरी गोलियाँ
नोट और रेजगारियाँ
चुकाए जाने वाले बिल
खरीदे गए सामानों की कुछ रसीदें
टेलीफोन डायरी, नेलकटर...
और पसीने और प्रसाधन की
मिली-जुली गंध वाला
एक लेडिज रूमाल !

पर्स है तो जैसे
मुकाबले का हौसला है ।

घर लौटने पर सबसे पहले
जिस चीज को वह खुद से
अलग करती हैं - उसे सोफे पर दे फेंक
वह है मीनू मैम का पर्स !

जब कि मीनू मैम की पर्स में बंद हैं
मीनू मैम का वजूद !
 

  नव-चैतन्य के महावट - रवींद्रनाथ                                 - शिवदयाल  ब चपन में ही जिन विभूतियों की छवि ने मन के अंदर अपना स्थाई निवा...