Wednesday, 26 June 2013

                             हिमालय भारत का भाल है 
                                                                                                                             -शिवदयाल

इस बार ' विकास सहयात्री ' पत्रिका (अप्रैल-जून ) की आवरण कथा हमने पर्यावरण संकट पर केन्द्रित की , और संयोग ऐसा कि पत्रिका के स्टाल पर पहुँचते न पहुँचते उत्तराखंड में ऐसी भयंकर तबाही हो गई।

हमारे शास्त्र-पुराणों और मिथकों में हिमालय और गंगा  की बहुत महिमा है। कहा गया है कि  गंगा जब स्वर्ग से अवतरित हुई तो उसके वेग को सँभालने के लिए शिवजी को अपनी जटाओं में उसे समेटना पड़ा और तब एक जटा से होकर उन्होंने गंगा को धरती पर आने दिया। इस मिथक में वास्तव में गंगा के उद्गम की जटिलता को व्यक्त किया गया है। सदियों से हिमालय में  लोग वहां के परिवेश के अनुसार अपनी जीवन-शैली  को ढालते आये हैं। पिछले कुछ दशकों में , विशेषकर उत्तराखंड राज्य के निर्माण के बाद लोभ-लालच में वहां के नेताओं और कर्णधारों ने अपनी तपोभूमि को आनंदलोक में बदलने का अभियान चलाया। भुरभुरी मिटटी के अभी भी बनते हुए पहाड़ की भंगुरता की अनदेखी कर ऐसे व्यवहार किया गया मानो  हिमालय कोई बड़ा पठार हो। विकास के इंजन को चलाने के लिए अब हिमालय के संसाधनों पर भी गिद्ध-दृष्टि लग गयी। राज्य को बिजली उत्पादक प्रदेश बनाने की महत्वाकांक्षा में  सदानीरा नदियों को जगह-जगह से बाँधने के लिए होड़ मच गयी।   परिणाम सामने है , बल्कि यह तो एक चेतावनी भर है। अगर हम अब भी नहीं चेते तो आनेवाले समय में किस प्रकार की विपदा का सामना करना पड़ेगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है।

मिथक इतिहास तो नहीं होता लेकिन इसमें मनुष्य जाति का सभ्यतागत अनुभव जरूर दर्ज रहता है।गंगा वाले प्रसंग से इतनी बात तो स्पष्ट हो ही जाती है कि गंगा जटिल और नाजुक संरचना वाली नदी है।और अब विज्ञानं भी इसे सिद्ध कर रहा है। महाभारत में द्वारिका नगरी के समुद्र में समाने का प्रसंग आया है, आज 'बेट  द्वारिका' की खोज ने इसे सही ठहराया है।

विकास का यह तर्ज समूची धरती के लिए ही विनाशकारी सिद्ध हो रहा है और हिमालय भी इसकी चपेट में है, हिमालय नहीं बचा तो भारत कैसे बच  पायेगा !


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