Saturday, 23 February 2013

                             आहत आस्थाओं का देश

                                                                                                                                      - शिवदयाल
आस्था और अभिव्यक्ति को लेकर पिछले कुछ वर्षों में अनेक लज्जाजनक प्रसंग सामने आए हैं, बल्कि आए दिन कुछ न कुछ घटता ही रहता है। एक घाव अभी भरता नहीं कि और खरोचें लग जाती हैं। किसी के कुछ कहने पर कोई न कोई आहत हो रहा है, लेकिन जो कोई आहत हो रहा है वह खुद ही को कोई खास जाति या समुदाय बता रहा है। वह कह रहा है- चूँकि इस बात से मुझे चोट पहुँची इसलिए यह माना जाए कि मैं जिस समुदाय से आता हूँ उसकी भावनाएं भी आहत हुईं। कौन हैं ये लोग? या तो धर्म या संस्कृति के ठेकेदार या पिफर राजनीति के ठेकेदार। अब इस समाज में कुछ विलक्षण बुद्धिजीवी  भी शामिल हो गए हैं लेकिन पिफर भी इस विशेषता के साथ कि इन्हें व्यापक समाज का  बनने से किसी ‘इस’ या ‘उस’ समाज का बुद्धिजीवी कहलाना बेहतर लगता है। ये बुद्धिजीवी भी उपरिलिखित ‘ठेकेदारों’ का ही पिष्टपोषण करते हैं, भले ही वे इस ख्याल में गापिफल रहें कि उनकी कोई अलग स्वायत्तता है। ये लोग किसी समुदाय विशेष की तरपफ से पूरे अधिकार और विश्वास के साथ अपने विचार रखते हैं- आधिकारिक प्रवक्ता के तौर पर जैसे। मजे की बात यह कि उनके कथन भी प्रायः उकसाने या चोट पहुंचाने वाले ही होते हैं।
भारत में अभिव्यक्ति का प्रश्न अब नियंत्रित अभिव्यक्ति बनाम स्वाधीन अभिव्यक्ति को हो गया है। सरकार और अदालतें लोकतंत्रा और संविधान की दुहाई देते हुए ही प्रगट या अप्रगट रूप से नियंत्रित अभिव्यक्ति के पक्ष में ही नजर आती हैं। हम बोलें जरूर, लेकिन ऐसे बोलें जिससे किसी और की ‘भावनाएं आहत न हों’! स्कूलों-कॉलेजों-पंचायतों में अब इस बात के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए कि एक नागरिक के तौर पर हमें  क्या बोलना है, कितना बोलना है और कैसे बोलना है। प्रशिक्षकों के रूप में धार्मिक समूहों और राजनीतिक दलों के नुमाइंदों को नियुक्त किया जा सकता है। आखिर तो ‘भावना’ और ‘आस्था’ के थोक डीलर तो ये ही लोग हैं। ये लोग ही तय करते हैं, किसे आने देना है, किसे निकाल बाहर करना है! अगर सचमुच ऐसी व्यवस्था हो जाए तो कम से कम सरकार का काम आसान हो जाएगा और जनता भी यह बात गांठ बांध लेगी कि वह ‘जनार्दन’ नहीं है, बस प्रजा है इस लोकतंत्रा में, और इसीलिए ढंग से, हिसाब से रहना है। इतना होने पर तो ‘स्वतंत्राचेता’ बुद्धिजीवीयों को अपनी औकात समझ में आ ही जानी है, और इन करतबों का प्रयोजन भी तो आखिरकार यही है।
कभी-कभी मन में विचार आता है कि इस बहुधार्मिक, बहुभाषिक, बहु सांस्कृतिक समाज में भाषाशास्त्रिायों को नई ‘लोकतांत्रिक भाषा’ रचने के लिए तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। ऐसी भाषा जिसमें व्यंजना न हो, मुहावरे न हो, व्यंग्य व उलटबांसियां न हों, जिसमें बात को समझाने के लिए उदाहरणों का प्रयोग न हो और हां, जहां मजाक के लिए भी कोई गुंजाइश न हो। हमारे यहां तो चुटकुले और लतीपफे भी बहुत कहे-सुने जाते हैं जिनमें कोई न कोई समुदाय आ ही जाता है। दाद देनी पड़ेगी हमारे ‘सरदार जी’ भाइयों की जिन्होंने अब तक अपने उफपर गढ़े जाने वाले लतीपफों के लिए मुकदमा नहीं किया। या क्या पता उनकी सहनशीलता भी जवाब दे जाए! हमारे परम सहिष्णु ग्रामीण समाज में विभिन्न जातियों के बारे में एक से बढ़कर एक लोकोक्तियां और मुहावरे प्रचलित हैं। इनमें निम्न जातियों को ही नहीं, उच्च जातियों को भी लक्ष्य बनाया गया है, बल्कि अधिक बनाया गया है- उनके दोहरे मानदंडों, स्वार्थी व आत्मकेन्द्रित स्वभाव, उनके तिकड़मों और काइयांपन को निशाना बनाया गया है। यह सब भी प्रतिबंधित हो जाना चाहिए अब, क्योंकि इससे आखिर किसी न किसी की भावनाएं आहत होती ही हैं।
तो बिल्कुल सादा, सरल, समत्वपूर्ण, लोकतांत्रिक भाषा रचना और बरतना भी हमारा राष्ट्रीय कर्त्तव्य होना ही चाहिए। एक इतना-सा काम हो जाने पर तो लेखकों-लिक्खाड़ों का काम तमाम हो ही जाना है। इससे नियंत्रित अभिव्यक्ति का महान उद्देश्य पूरा हो जाता है। यह रास्ता निरापद है और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुकूल भी ठहरता है। आखिर अपने देश में वैसा कारनामा तो किया नहीं जा सकता, जेसे कि पूर्वी पाकिस्तान के ढाका में सन् 1971 के संभवतः अप्रैल महीने के आखिर में जनरल टिक्का खां की पफौज ने पाकिस्तानी राष्ट्र के ‘व्यापक हित में’ अभियान चलाकर ढाका को लगभग ‘बुद्धिजीवीविहीन’ बना डाला था। रह रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। वैसे होने को क्या नहीं हो सकता। अपने देश में ऐसा सपना देखने वाले न हों- यह कैसे कहा जा सकता है। मौका मिलने की बात है। देश की जनता मौका कमोबेश सबको देती ही है- आज न कल।
जिस देश और समाज ने कुछ अपवादों को छोड़ कभी भी वाणी पर बंधन स्वीकार नहीं किया उसे अब उपदेश देने की कोशिश की जा रही है- क्या बोलो, कैसे बोलो, या पिफर बोलो ही क्यों? संवाद और सायुज्यता जिस समाज व संस्कृति का आधार रहा तो वहां अभिव्यक्ति का पाठ पढ़ाया जा रहा है। आप अभिव्यक्ति को रोकिए, और संवाद खत्म! इतना विशाल देश और समाज क्या संवादहीनता में टिका रह सकता है? क्या हमारे हित और सोच सचमुच इतना परस्पर विरोधी है कि हमें खुलकर अपनी बातें रखने से गुरेज करना चाहिए? यदि हां, तो एक राष्ट्र के रूप में बचे रहने की हमारी कुछ संभावना है?
एक भ्रम पफैलाया जा रहा है, जैसे अभिव्यक्ति की स्वाधीनता का अर्थ दूसरों को चोट पहुंचना ही हो। यह बात तो कोई भी व्यक्ति समझ सकता है, बल्कि बचपन से ही हम पढ़ते-सुनते आए हैं कि हमारी स्वतंत्राता दूसरों पर बंधन भी हो सकती है, वह वहीं तक प्रयोज्य हो सकती है जहां तक दूसरे भी उसका उतना ही अनुभव करें जितना कि हम। उसी तरह गाली-गलौज और धमकी को स्वाधीन अभिव्यक्ति का उदाहरण नहीं माना जा सकता। हमारे बोलने की आजादी का मतलब है हमारे बारे में बोलने की दूसरों को आजादी देना। और क्या अर्थ हो सकता है इसका? यहां हम अथवा कोई अन्य व्यक्ति, समूह या समुदाय इससे बरी नहीं हो सकता- किसी भी आधार पर नहीं। ऐसा नहीं हो सकता कि हम राजनीति में सामाजिक विभाजन को स्वीकार करें और अभिव्यक्ति के मामले में इससे पलट जाएं और ‘दण्डमुक्ति’ के बहाने तलाशें। भारत में लोकतांत्रिक राजनीति का प्रसार हुआ है। इसके क्या नतीजे हुए हैं, अच्छे या बुरे, या जैसे भी, इसका विश्लेषण करने से रोका नहीं जा सकता, न ही उसकी कसौटी बदली जा सकती है। इसकी जरूरत तो कतई नहीं है। अगर आप दलित, पिछड़ा, अल्पसंख्यक या महिला बनकर चुनाव लड़ते हैं और अपनी इस विशिष्ट पहचान से सत्ता प्राप्ति में आपको सहूलियत होती है तो इसी आधार पर अपने कार्यप्रदर्शन या आचरण के मूल्यांकन से परहेज क्यों हो? यहां अभिव्यक्ति का मामला क्योंकर उठना चाहिए? आपको तो जवाब देने के लिए प्रस्तुत होना चाहिए ओर अपनी बात रखनी चाहिए।
याद आता है, संभवतः 1996 में पटना में आयोजित एक सभा में प्रख्यात समाजवादी नेता व चिंतक किशन पटनायक ने राजनीतिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहा था कि यह भारत का दुर्भाग्य है कि राजनीति में जो शूद्र नेतृत्व खड़ा हुआ, वह भी भ्रष्ट हो गया, इससे बदलाव की संभावनाएं धूमिल हो गईं। आज की स्थिति होती तो शायद किशनजी को भी अपने ‘कथन’ का पफल भुगतना पड़ता। देश भर में उनके खिलापफ मुकदमे दायर होते और उन्हें ‘खलनायक’ घोषित कर दिया जाता। उनके कथन की गहराई में उतरा जाए तो पता चलेगा कि किस पीड़ा से उन्होंने यह बात कही। तब तक राजनीतिक अर्थशास्त्रा में भ्रष्टाचार को ‘समकारी कारक’ मानने के आधुनिक सिद्धांत  का प्रवर्तन नहीं हुआ था, उनका कथन तो इस सिद्धांत  के ठीक विपरीत पड़ता है। इसी प्रकार सत्तर से नब्बे के दशक तक आंदोलनकारी समूहों में यह सर्वमान्य बात थी कि महिलाओं के समाज और राजनीति की मुख्यधारा में आने से समाज और व्यवस्था मानवीय बनेगी। क्या इस विश्वास पर देश का महिला नेतृत्व खरा उतर सका? चार-पांच राज्यों में महिला नेतृत्व उभरा तो, लेकिन उसने अपने को किसी भी स्तर पर पूर्ववर्तियों से अलग दिखने का प्रयास भी नहीं किया, बल्कि कभी तो अपने को अधिक सख्त और असंवदेनशील ही सिद्ध  किया। क्या यह असंगत विश्लेषण है और महिला विरोधी है, और ऐसा कहना अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता का दुरुपयोग है?
राजनीतिक जोड़-घटाव व चुनावी लाभ-हानि के पफेर में देश में एक प्रतिबंध की संस्कृति विकसित की गयी है। अदालत भी ‘प्रतिबंध’ की मांग पर अतिशय संवेदनशीलता, बल्कि सदाशयता दिखाती है। यह कौन-सा लोकतंत्रा है जिसमें सरकार कोई पिफल्म देखकर बताए कि वह जनता के देखने योग्य है या नहीं? कोई किताब पढ़कर हमें बताया जाए कि न, यह तुम्हारे पढ़ने योग्य नहीं! क्या सरकार के पास कोई पैमाना है जिससे यह जाना जा सके कि कोई पिफल्म देखने या किताब पढ़ने की इच्छा रखने वाले कितने लोग हैं देश में, और उनकी इच्छा का भी आदर होना चाहिए? कुछ सौ या हजार लोगों के विरोध पर इतने बड़े देश में अभिव्यक्ति का प्रश्न हल किया जाएगा? यह तो नकारात्मकता की हद है! कितनी लज्जाजनक बात है यह कि ‘कामाध्यात्म’ के देश में हम नग्नता को अश्लीलता में रेड्यूस होते देख रहे हैं, और स्वयं अश्लीलता की ओर से आंखें पफेर रखी हैं। हमारे बच्चे पोर्न साइट्स देखते बड़े हो रहे हैं, स्त्राी-पुरुष होने का अर्थ नर-मादा होने में सिमटता जा रहा है, और कुछ सिरपिफरे कलाकारों की बनाई नग्न आकृतियां पर रंग पोत रहे हैं। वैलेंटाइन डे मनाते युवाओं को कान पकड़वाकर उठ-बैठ करवा रहे हैं। हम इन ‘आहत’ लोगों की यह सब स्वतंत्राताएं सह रहे हैं। ये स्वतंत्राताएं सिस्टम को, सरकार को, सत्ताधारी वर्ग को सूट करती हैं। इन्हीं स्वतंत्राताओं की आड़ में एक ओर युवा पीढ़ी को ‘लाइसेंस्ड दारू’ में डुबोया जा रहा है तो दूसरी ओर अखबार मालिकों को सरकारी टेंडरों व विज्ञापनों से मालामाल कर असहमति और विरोध को ढकने की कोशिशें की जा रही हैं। लोकतंत्रा का आभास हो तो ठीक, वह वास्तविक न बनने पाए। अभिव्यक्ति को नियंत्रित करने के ये उदाहरण हैं।
हमारा यह इतना विशाल देश संवादहीनता में अब तक नहीं जीता रहा। हमारी संस्कृति तो संवाद की संस्कृति रही है। अलग-अलग मत और विचार रखते, अलग आचरण और व्यवहार का पालन करते लोग साथ-साथ रहते आए हैं। हमारे यहां तो आस्तिकों ने ईशनिंदा को भी आदर से देखा। चार्वाक जैसे भोगवादी दर्शन के जनक को भी )षि माना। दिगंबरों को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनके प्रति श्र(ा बरती। आत्मा के सामने देह को नगण्य माना। रति को भी सृजन की अपरिमित संभावनाओं के रूप में देखा बल्कि उसे देवोपलब्धि का माध्यम बनाया। हम अपने सामुदायिक आचरण में कितना गिर चुके हैं, यह देखने का साहस अपने अंदर जुटाने का समय आ गया है। परस्पर व्यवहार और विचार-विनिमय के लिए एक जागृत समाज अपने को कानून और सरकार के उफपर नहीं छोड़ सकता।
सार्थक संवाद स्वाधीन अभिव्यक्ति से ही संभव है। बहुलतावादी अथवा बहुसांस्कृतिक समाज अभिव्यक्ति पर नियंत्राण से नहीं बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक सुनम्यता से ही बच पाएगा। यह सुनम्यता तब बढ़ेगी जब प्रत्येक सामाजिक समूह या समुदाय अपने से बाहर देखने की भी कोशिश करेगा, उसमें आलोचना करने का साहस और आलोचना सहने का धैर्य और शक्ति होगी। जो सचमुच लोकतंत्रा और आजादी चाहते हैं उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि अभिव्यक्ति आस्थाओं की बंधक न हो। अभिव्यक्ति पर नियंत्रातण तो आखिरकार समाज को लगातार कट्टरता अथवा कठोरता, अर्थात भंगुरता की ओर ही ले जाएगा।
                                                                                                                                       - शिवदयाल

जनसता, 22 पफरवरी, 2013 में प्रकाशित

Tuesday, 19 February 2013

वसंत                      
                    
                                                                                 - शिवदयाल

                          इस फूलों के मौसम मे
                           पेड़ के पत्ते
                            कितने जवान हो गए हैं
          कि धूप भी
             कैसी सुर्ख हो आई है !

                         ऐसा वसंत  
                            मेरे तुम्हारे बीच
                                कभी नहीं आया
         लेकिन देखो न,
           मौसम रह-रह कर
            मुझसे गिला करता है
                    
                        कि अब भी तुम्हारे साथ बीते
                          पतझड़ के वे दिन ही
                            मेरी आँखों में समाए हुए हैं !

                                                                                                                 २.
                                                                                                 वह देखो
                                                                                                       माँगता अभयारण्य

                              
        गमले में उगी
            सरसों में दुबका वसंत!

Saturday, 26 January 2013

शहीद
                           -शिवदयाल

लो शत्रु का शीश
या फिर बनो हविष्य
कि आज आहुति देनी भारी
बलिदानी,
अब की तुम्हारी बारी !

मिटो उनके कल के लिए आज
कि जिनके सजल लोचनों
और मधु-मुस्कानों पर
मरते-मिटते रहे आज तक
मरो कि बचें वे करोड़ों प्राण -
कोटि-कोटि नर-नारियाँ-नौनिहाल
जिन्हें न कभी देखा न सुना
न देख पाओगे न सुन पाओगे
जीते बचे तब भी,
जिनसे बस मिट्टी का है रिश्ता  !
और उनके लिए भी मिटो
जो तुम्हारे उत्सर्ग पर
बोलियाँ लगाने वाले हैं
लाख-दस लाख की
नौकरी-चाकरी, जमीन-जायदाद की ।

मिटो जवान कि
हर किसी के भाग्य में नहीं होता
मातृ-ऋण से उऋण हो जाना ।

तुम खेत रहो
कि खेतों में बची रहें बालियाँ
काम पर रोजाना  जाते रहें
 कामकाजी स्त्री-पुरुष , मजदूर
भिनसारे की  ताजी हवा से
नवजीवन पाते रहें बुजुर्ग
और शाम को
निश्चिन्त  प्रतीक्षा करती रहें स्त्रियाँ
काम  से लौटते पतियों
और खेल के मैदान में
किलकारियाँ मारते बच्चों की ।

तुम गिरों वीर
कि उठते रहें अमराइयों में
सावन के झूले
बेखटके लगते रहें हाट-बाजार-मेले
गौरैयों   की चोंच में
भरा रहे दाना
निरापद बना रहे पथिकों का
पीपल की पाँव में सुस्ताना !

तुम ही कटो  सेनानी
कि रहें मस्तक ऊँचे
तुम्हारे हमवतनों के
बनते  रहें महल उनके
सुख-सपनों के
मातृ-भूमि की रक्षा में
न पड़े तरूण-लहू कम
लड़ो कि जबतक है
दम में दम..

लड़ों कि एक शहीद के गिरते ही
रक्त में सनकर
एक राष्ट्र होता है खड़ा
और भी तन कर !
                                         (कारगिल युद्ध के समय रचित।)
                                        -शिवदयाल


Friday, 18 January 2013


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                -शिवदयाल 
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                         ((दस्तावेज में प्रकाशित 

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Tuesday, 8 January 2013

तिलिस्म
                             -शिवदयाल

री ...
तूने यह क्या जीया
कि जितना जीया
अपने ही खिलाफ जीया

री ...
तूने यह क्या सिरजा
कि जो भी सिरजा
अपने ही खिलाफ सिरजा

री ...
तूने यह कितना बरजा
कि जो भी बरजा
अपने ही खिलाफ बरजा

री ...
तोड़, अब
अपने ही खिलाफ
इस तिलिस्म को तोड़
अपने से भी अपने को जोड़ !

Monday, 7 January 2013

शिवदयाल की कहानियाँ: विमर्श गोष्ठी
 (संदर्भ: भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित कहानी संग्रह ‘मुन्ना बैंडवाले उस्ताद’)

विगत 28 नवम्बर, 2009 को पटना के राज्य अभिलेखागार के सेमिनार हॉल में ‘शिवदयाल की कहानियाँ’ (संदर्भ - भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित कहानी संग्रह मुन्ना बैंडवाले उस्ताद) पर एक विमर्श गोष्ठी का आयोजन हुआ।
चर्चा की शुरूआत करते हुए अंग्रेजी एवं हिन्दी के प्रख्यात विद्वान व समीक्षक डा. शैलेश्वर सती प्रसाद ने कहा कि शिवदयाल की कहानियाँ वैचारिक, राजनीतिक एवं कलात्मक स्तर पर हिन्दी कहानी को नवीन आयाम देती हैं और यह संग्रह इस दशक की संभवतः सर्वश्रेष्ठ कथाकृति है। उन्होंने कहा कि शीर्षक कथा ‘मुन्ना बैंडवाले उस्ताद’ अद्भुत कहानी है और यह प्रेमचंद की ईदगाह से कमजोर नहीं। डा. प्रसाद ने विचार व्यक्त किया कि शिवदयाल की कहानियों में मध्यवर्ग की त्रासदी अत्यंत मार्मिकता के साथ चित्रित हुई है, लेकिन इनकी कहानियों में कमजोर वर्ग के पात्रा, उनकी जीवन-स्थितियाँ, जनसंगठन और संघर्ष भी प्रमुखता पाते हैं।

समकालीन हिन्दी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर आलोक धन्वा   ने कहा कि शिवदयाल आंदोलनों की पृष्ठभूमि से आए रचनाकार हैं। इनकी कहानियों में विचार और संवेदना की यात्रा साथ-साथ चलती है, ऐसा बहुत कम होता है। इनकी कहानी ‘नॉस्टैल्जिया’ महादेशों की यात्रा करती है। इनकी संवेदना देश की सीमाओं को लाँघकर - इराक, अपफगानिस्तान, बाँग्लादेश और यूरोप-अमेरिका तक विस्तार पाती हैं और वास्तव में उन स्थानों की हलचलों और घटनाओं को हमारे अपने जीवन का हिस्सा बना देती हैं। उन्होंने कहा कि शिवदयाल की कहानियाँ व्यापक सामाजिक आलोचना का आधर तैयार करती हैं, इस काम में वे पर्याप्त संयम और आत्मानुशासन से काम लेते हैं। इससे उनकी रचनाओं का शास्त्राीय आधर तैयार होता है। वे हमारे समय के जेनुइन लेखक है।
प्रख्यात कथाकार उषाकिरण खान ने भी संग्रह को इस दशक की श्रेष्ठ कथाकृति बताते हुए कहा कि हर कहानी मँझी हुई है। शिवदयाल ने मध्यवर्ग की त्रासदियों और विडम्बनाओं को अत्यंत परिपक्वता और कलात्मकता के साथ उजागर किया है। उन्होंने आलोक, मुन्ना बैंडवाले उस्ताद, चंदन खुशबू की दुकान तथा नॉस्टैल्जिया कहानियों का जिक्र करते हुए कहा कि नॉस्टैल्जिया हमारे समय की भयानक कहानी कहती है।

वरिष्ठ उपन्यासकार एवं भा.प्र.से. के अध्किारी व्यास मिश्र ने विशेष रूप से ‘आलोक’ और ‘खबर’ कहानी की चर्चा की। उन्होंने कथाकार के सूक्ष्म प्रेक्षा और बारीक विश्लेषण की क्षमता को रेखांकित करते हुए कहा कि जहाँ आलोक का विषय और अपील सर्वव्यापी है, वहीं ‘खबर’ में खबरों का आतंक बड़े प्रभावी ढंग से चित्रित हुआ है। उन्होंने कहा कि ऐक्टिविस्ट रहने के बावजूद शिवदयाल ने विषयों के चुनाव में कोई सीमा नहीं मानी है और प्रायः हर तबके के पात्र  इनकी कहानियों में स्थान पाते हैं। उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से यह पुस्तक दशक की सर्वश्रेष्ठ कथाकृतियों में शामिल होने जा रही है।
सहयात्राी पत्रिका से जुड़े अरुण कुमार सिंह, प्रधन महालेखाकार ने संग्रह की चंदन खुशबू की दुकान, एक सफर का साथ, तथा नॉस्टैल्जिया का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि शिवदयाल हमारे समय की सच्चाइयों से हमें आमने-सामने करते हैं, वह भी पूरी संवेदनात्मक एवं कलात्मक आवेग के साथ।

हिन्दी-उर्दू के शायर संजय कुमार कुंदन ने शिवदयाल को मानवीय मूल्यों का चितेरा बताते हुए कहा कि इनकी रचनाओं को पढ़ना शरीपफ आदमी की संगत की तरह है। भाषा पर इनकी पकड़ अद्भुत है और इसमें वे बहुत संयम बरतते हैं।
वरिष्ठ कवि डा. निखिलेश्वर प्रसाद वर्मा ने शिवदयाल को एक खुद्दार और ईमानदार रचनाकार बताया। उन्होंने कहा कि कहानियों में वे स्वयं कुछ नहीं कहते, परिस्थितियाँ और पात्रा ही सच को उद्घाटित करते हैं।

राज्य अभिलेखागार के निदेशक विजय कुमार ने साहित्यिक रचनाओं को इतिहास का स्रोत स्वीकार किए जाने पर जोर दिया और कहा कि साहित्यिक रचनाएँ अपने समय का विश्वसनीय संदर्भ-स्रोत व दस्तावेज हैं।

विमर्श गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार शेखर ने की। उन्होंने ‘मुन्ना बैंडवाले उस्ताद’ को एक ‘मेजर’ कहानी के रूप में स्वीकार किया, इसके लिए उन्होंने शिवदयाल को विशेष रूप से बधई दी। साथ ही उन्होंने कहा कि एक्टिविज्म की पृष्ठभूमि की कहानी ‘आलोक’ में आलोक और सुधा के चरित्रा का अभी और विकास किया जाना चाहिए था।
अपने वक्तव्य में शिवदयाल ने विमर्श गोष्ठी में उपस्थित सभी लोगों के प्रति आभार प्रकट किया। उन्होंने कहा कि संग्रह में वास्तव में उथल-पुथल से भरे तीन दशक समाए हुए हैं।
इस विमर्श गोष्ठी का आयोजन ‘वातायन’ ने किया था और गोष्ठी का संचालन इसके निदेशक वरिष्ठ कवि  राजेश शुक्ला ने किया।
 गोष्ठी की शुरूआत में शिवदयाल ने अपनी कहानी ‘आलोक’ का पाठ भी किया। इस अवसर पर योगानंद हीरा, प्रो. किरण बाला प्रसाद, आभा सिन्हा, मुसापिफर बैठा, सुनील सिन्हा, राकेश प्रियदर्शी, रामयतन यादव, अनीस अंकुर, नवीन, सृष्टि दयाल, कमलेश कुमार, अखिलेश कुमार, बादशाह चौबे, राजीव रंजन प्रसाद, उदय ठाकुर, रवीन्द्र नाथ बैठा तथा अरुण नारायण आदि कई वरिष्ठ एवं युवा रचनाकार, संस्कृतिकर्मी तथा एक्टिविस्ट समूह के लोग उपस्थित थे।
- अरुण नारायण
प्रकाशन विभाग, बिहार विधन परिषद्, पटना।( पाखी में प्रकाशित)

Friday, 7 December 2012

 अंत, अंत हे गर्दनीबाग !

विकास की भेंट  चढ़ते अनेक इलाकों में से एक का आर्तनाद.... 

 1912 में अलग बिहार राज्य बनने के बाद सचिवालय  बना  और वर्ग-2 अधीनस्थ ,वर्ग-3 तथा वर्ग-4 कर्मचारियों के लिए एक  सुन्दर और व्यवस्थित आवासीय कॉलोनी बनाई  गयी हावरा-दिल्ली रेल लाइन के दक्खिन गर्दनीबाग में। लाइन के उत्तर में साहब  लोग बसाये गए जो आज भी आबाद हैं हार्डिंग रोड और उसके  आस-पास। यह इलाका खूब हरा-भरा  और शहर से लगा हुआ है। धीरे -धीरे रखरखाव के अभाव में ,साथ ही  अतिक्रमण के कारण गर्दनीबाग़ का बड़ा  हिस्सा आज बुरी अवस्था  में है।
गर्दनीबाग़ के नवनिर्माण की योजना बनी है जिस से पुराने मोहल्ले का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। इसका
'हेरिटेज कॉलोनी ' के रूप में जीर्णोद्धार हो सकता है जो एक खूबसूरत बात होती .लेकिन विकास के पैरोकारों को यह बात 'सूट' नहीं करती।
साल भर की उम्र से लेकर बाइस साल तक मैं गर्दनीबाग के एक क्वार्टर में रहा। आज भी मुझे वहीँ के सपने आते हैं।
तो यह कविता देखिये : "अंत , अंत हे गर्दनीबाग !"   विकास की भेंट  चढ़ते अनेक इलाकों में से एक का आर्तनाद.... 

 अंत, अंत हे गर्दनीबाग!
                                                                                                                -शिवदयाल

इस वसंत
      अंतिम बार फुलाया है सेमल
      सुग्गों-कठफोड़वों की
      अंतिम चहचहाहट है यह
      सेमल के फूलों की लाल-लाल
       लहलहाहट में
       कैसे लहालोट हो रहे हैं पंछी -
       अंतिम बार, अंतिम बार!

पुटुस की झाड़ियों की
      खटतूरस गंध
      अब हमेशा -हमेशा के लिए
      शेष होने वाली है
      न मालूम
      रंगबदलू गिरगिटान
      अब कहाँ ठौर पाएँगे
      किस देश जाएँगी
      उधेड़बुन में दौड़ लगातीं,
      एक-दूसरे को छकातीं
      ढीठ गिलहरियाँ

अबकी गर्मी तक
     सिरफल वृक्षों को
     अपनी उदारता दिखाने का
     मौका शायद ही मिले
     लू के थपेड़ों से जूझती टिटिहरी
     थक कर किस डाल बैठेगी
     कौन जानता है

ऊँची घास के नम घेरों में
     चें-चें करतीं, जाने क्या सहेजतीं
     खोजतीं-बीनतीं
     पनमुर्गियों का विहार
     अंतिम बार!

कसैले नीम के नन्हें फूलों पर
     मँडराती मधुमक्खियों और
     अमलतास के स्वर्ण-पुष्पों का
     पराग लूटते मदमस्त भौरों का गुँजन
     बस अंतिम बार!

  गोधूलि में
     बूढ़े पीपल पर
     कौओं की यह अंतिम पंचायत!
     चैत-बैसाख की धूप-हवा में पकीं
     कँटीली फुनगियों से लटकती
     गुलाबी, लच्छेदार जलेबियों की
     खग-वृन्द की यह अंतिम दावत!

आम के पत्तों-पल्लवों से
     ढँके-छिपे प्रणयातुर पंडुक
     निकलने वाले हैं
     अंतहीन प्रवास पर
     जाने किस दिशा  में

अगली बार
    अचरज और शोक से देखेंगे
    आसमान में चक्कर काटते
    नई-नई व्यूह रचनाओं का संधान करते
    सुंदर-सजीले बगुले -
    यह वही जगह तो नहीं
    जहाँ पाँख खुजाते, सुखाते
    सुस्ताते और ध्यान लगाते
    बिताया था चातुर्मास

बाल-बच्चों को संग ले
    इस ढूह से उस ढूह घूमते
    रुक-रुक कर मुँह उठाते
    अपनी ही दुनिया को पुनः-पुनः
    देखते-आँकते
    नेवलों की यह अंतिम तफरीह

कहीं कुछ ऊबड़-खाबड़ नहीं
    सब समतल हो जाने वाला है
    अबकी बारिश  में जगह-जगह
    नहीं जमा होंगे पानी के चहबच्चे
    जिनमें अपनी छवि देखने को
    बार-बार उद्धत हो
    झुण्डों में घूमती
    अपनी लंबी पूँछ के भार से दबी जाती
    पुँछल्ली ड्रैगनफ्लाई

अगली बरसात में
    धरती की कोख में ही दुबके रहेंगे
    शरीफ-शीलवान ढाबुस-दादुर
    उनका यह अंतिम मेघ -मल्हार

अपने में खोई कोलतार की
     सूनी सड़कों का एकाकीपन
     चौड़े में जमे गो कि झडे़, उधड़े
     बाबुओं के क्वार्टरों का
     डूबती नब्जों के बीच आत्मालाप
     जिनकी स्मृतियों में अभी जीवित हैं
     अंग्रेज बहादुर और लोहा सिंह
    -यह छोटी होती दुनिया में
     ऊँचे पेड़ों की गरिमा
    -यह सिकुड़ते स्पेस में
     खुले में रहने की जीवटता -
     सब अंत को संक्रमित

राजकुमार की
    चाय की दुकान पर
    चाय की यह रसीली अंतिम घूँट
    आँखों में पानी ला देती
    कड़ाही में तली जाती कचरी की
    यह अंतिम झाँस

जिन्होंने अपनी बुभुक्षा
    और लिप्सा में इस वसुंधरा को
    माता से भोग्या बना दिया
    सब कुछ रौंदता
    अपने घर्घर नाद में
    आर्त पुकारों को सोखता जाता
    ‘नई’, दौलतमंद दुनिया की
    जमीन तैयार करता उनका विकास-रथ
    अब गर्दनीबाग के सीवान तक आ पहुँचा है

अपनी मिट्टी
      हवा, धूप और आकाश
      अपने खग-विहग, जीव-जंतु
      अपनी हरीतिमा और विश्रान्ति
      अपनी खुषबू और फैल
      सुंदरता, कोमलता और नैसर्गिक मोहकता
      अपनी संपन्नता और पूरेपन के साथ
      उत्सर्ग को तैयार है
      गर्दनीबाग -
      जीवन की बहुतेरी छवियों,
      कोमल आहटों और गुंजारों से स्पंदित
      एक मोहल्ला जो बदकिस्मती से
     ‘बेशकीमती जमीन’ पर आबाद है

जिनके देह लगी हो इसकी माटी
     जिनके नासापुटों में बसी हो हरी घास की महक
     जिनका रहा हो यह क्रीड़ांगन
     यहाँ से गुजरते
     ठंडी छुअन से भरा हो
     जिनका जला हुआ मन

जो भुतहा बहेड़ा के नीचे से
     कभी डर कर गुजरे हों
     झड़बेरी और करौंदे की काँटेदार टहनियों से
     जिनकी आस्तीनें छिली हों

जिनके सपनों में आया हो
     बहुरुपिया - कच्चे खाँव
     जो भागे हों फेरी वाले की
     उस आवाज के पीेछे -
     एक पैसे में दो बटन, सिन्दू ऽ ऽ र ऽ ऽ ..   
     जो कभी भय तो कभी जुगुप्सा से
     साधुओं-सँपेरों-फकीरों का चुपके-चुपके
     पीछा करते रहे हों

  जो टमटम की सवारी का मजा लूटते
      घोड़े की पीठ पर पड़ते चाबुक से
      कभी खुद भी दहले हों
      गहन रात्रि में
      टीसन से खाली लौटते
      ताड़ी के नशे में
      सातवें सुर में अलाप लगाते
      टमटम वाले की तान और उस पर
      ताल बैठाते घोड़े की लयबद्ध टापों से
      जिनकी नींद उचटी हो

चितकोहरा पड़ाव पर
      खाली-खाली-सी दोपहरियों में
     अपने खोखे में
     बीड़ियाँ बनाते, बाँधते, सेंकते
     किसी वीतरागी से नसीब मियाँ को
     शाम की कव्वाली में सुर उठाते देख
     जो विस्मित रह गए हों

जिन्होंने यहीं देखी थी कोई छब
     और हमेशा  के लिए खुद को
     रख-छोड़ आए थे यहीं
     सुनते रहे थे जो रात की निविड़ता में
     छायागीत और बिनाका गीतमाला
     जो रोए थे चुपके-चुपके
     जिनकी रह गई बहुत कुछ अनकही

जिन्होंने यहीं की सड़कों पर
        मुट्ठी तानना सीखा था
        जिन्होंने यहीं,
        ठीक यहीं से देखनी शुरू की थी दुनिया
        जिनके केश सन के खेत हुए
        यहीं की धूप में
        जो यहीं से खो जाना चाहते हैं
        बहुत नीले आसमान की निस्सीमता में
        जिनके लिए शुरू होती है
        अनंत की यात्रा यहीं से
  
 उन्हें, उन सबको
        गर्दनीबाग का
       अंतिम प्रणाम्!


(जनसत्ता वार्षिक अंक 2012 में प्रकाशित।)


       

Sunday, 25 November 2012

खरीदारी
                  -शिवदयाल 


डिपार्टमेंटल स्टोर में
आइटम पसंद आ जाने पर
उन्होंने सेल्समैन को
आदेश  दिया - पैक कर दो !

काउंटर पर
पर्स हाथ में ले
उन्होंने मैनेजर से पूछा -
हाउ मच ?

पेमेंट रिसीव कर
मैनेजर ने जब ‘थैक्स’ कहा
तो मचलते हुए सामान उठाए
वे बाहर निकल आए।

लौटते हुए
उन्होंने खरीदी तरकारी
और मोल-भाव कर
डेढ़ रुपए की बचत कर ली
साथ में गंदे नोटों के लिए
सब्जी वाले को धिक्कारा ।

ऐन गली के नुक्कड़ पर
लड़के से फी दर्जन अंडों पर
अठन्नी कम कराकर
इतराते हुए घर आ गए।

उस दिन
ऐसे की उन्होंने खरीदारी
छोटे मुनाफों में की हिस्सेदारी
और खुश  हुए !

Monday, 12 November 2012

मेरा दीया पथ आलोकित करे तुम्हारा 
और हरे कुछ तमस अंतर का .....          
                                                            !! शुभ दीपावली !!


  नव-चैतन्य के महावट - रवींद्रनाथ                                 - शिवदयाल  ब चपन में ही जिन विभूतियों की छवि ने मन के अंदर अपना स्थाई निवा...