Thursday, 14 May 2015

 हिमालय में होने का सुख
                                                                                                                               -शिवदयाल
( यह लेख 1994 में पटना से प्रकाशित 'खबरनामा ' के प्रवेशांक में प्रकाशित हुआ था। आज इस ललित निबंध की प्रासंगिकता बन आई है,  इसमें व्यक्त आशंकाएँ आज सही सिद्ध हो रही हैं।  अविकल रूप में मूल लेख प्रस्तुत है।  )
फेवा लेक ,अन्नपूर्णा रेंज , पोखरा , नेपाल

हिमालय का ख्याल आते ही कितने सारे अहसास, कितनी सारी अनुभूतियाँ मन में एक ही साथ आ बैठती हैं। मानो हिमालय हिमशिखरों की शृंखला का नाम मात्र न हो प्रत्युत हमारे अस्तित्व, हमारे जीवन-स्पंदन का ही विस्तार हो, या कि स्वयं हम ‘पौरुष’ के उस ‘‘पूँजीभूत ज्वाल’’ का ही एक लघु अंश हों। यह भारतीय मन है ! जिसने जीवन में कभी हिमालय नहीं देखा वह भी हिमालय को इस तरह जानता है जैसे उसे अलग से छूने, देखने, साक्षात् अनुभव करने की जरूरत न हो; क्योंकि हिमालय तो है ही अपने संपूर्ण विस्तार, सौन्दर्य व दिव्यता के साथ स्वयं उसके अंदर बसा हुआ ! इसीलिए हिमालय भारत के भू-राजनीतिक मानचित्र का हिस्सा नहीं है बल्कि हमारी जातीय स्मृति, चेतना और मिथकों की आधारभूमि भी है। भारतीय अस्मिता के साथ हिमालय इस तरह गुँथा हुआ है कि जैसे वह भारत का ही पर्याय हो।

हिमालय को किस-किस रूप में देखा जाए - किन-किन संदर्भों व छवियों में ! हिमालय, यानी हिमशिखरों की वह धवल भूमि, तपोस्थली जहाँ देवता विचरते हैं, जो देवलोक गंगा स्वर्ग से उतर कर महादेव शिव की जटाओं में निवास बनाती है, जो अनेकानेक प्राणदायिनी नदियों-सरिताओं का उद्गम-स्थल है। हिमालय जिसके पार्श्व  में है कैलाश मानसरोवर-शिव-पार्वती की लीला-भूमि! हिमालय, यानी बौद्धों का महातीर्थ, जहाँ बौद्ध धर्म, संस्कृति और जीवन-शैली सैकड़ों वर्षों से जीवित है, गोम्पाओं, लामाओं का रहस्यमय लोक ! हिमालय में गूँजती है सिक्ख गुरूओं की पवित्र बानी। हिमालय, सच में इस संसार में जैसे अलग एक संसार है। मिाचल से अरूणाचल तक लगभग ढ़ाई हजार किलोमीटर लंबी, 500 कि.मी. चौड़ी व औसतन 8-10 हजार फुट ऊँची सधन वन-प्रांतरों, स्रोतों-सरिताओं तथा हिमशैलों से बनी एक अभेद्य  दीवार है हिमालय जो उत्तर की बर्फीली हवाओं को भारत में घुसने नहीं देता, जो बादलों को रोक कर अपने ही द्वारा निर्मित गंगा-जमुना के उर्वर मैदानों को सींचती है। हिमालय न होता तो यह जंबुद्वीप क्या होता, कल्पना करना भी कठिन है।
इन्हीं अर्थों में हिमालय में होना एक बिल्कुल अलग अनुभव है। इसमें रहते हुए, इसमें से गुजरते हुए एक विलक्षण अनुभूति होती है जो रागात्मक भी होती है और अलौकिक भी। कभी-कभी तो ऐसा लगता है जैसे हम स्वयं अपने अंदर चढ़ाई तय कर रहे हों अथवा ढ़लानों से फिसल रहे हों। जिन्होंने जीवन में सिर्फ टीलों को देखा है उन्हें एक बार हिमालय जरूर देखना चाहिए। ऊँचाई क्या चीज होती है, विराटता किसे कहते हैं - यह अहसास सिर्फ और सिर्फ हिमालय दे सकता है। पहली बार समुद्र देखना स्तब्ध करता है - उसकी निस्सीमता, उसकी गहराई और गर्जन एक क्षण को विमूढ़ बना देता है, शायद डरा भी देता है। पहली बार गगनचुंबी हिममंडित चोटियों को देख कर रोम-रोम में रोमांच भर जाता है, हम या तो चिल्ला पड़ते हैं या फिर जैसे प्रतिक्रिया करना ही भूल जाते हैं।

हिमाचल
हिमालय को देखने की कितनी ही प्रेरणाएं हो सकती हैं किन्तु यह सच है कि नैसर्गिक सौन्दर्य हिमालय का बहुत सशक्त पक्ष है। आमतौर पर एक सैलानी को उसका अप्रतिम सौन्दर्य ही अपनी ओर खींचता है। इसके लिए वह हिमालय से अरूणाचल तक कोई भी स्थान चुन सकता है। वह नेपाल और भूटान की यात्रा भी कर सकता है। कैलाश-मानसरोवर की यात्रा करके भी हिमालय को बहुत निकट से देखा-जाना जा सकता है। इस यात्रा का सबसे बड़ा रोमांच यह है कि इसमें हिमालय को लाँघ कर कैलाश-मानसरोवर से उसे ठीक दक्षिण में देखा जा सकता है। उस क्षेत्र के आस-पास सिन्धु व ब्रह्मपुत्र का उद्गम स्थल भी है। साथ ही वह दुलर्भ ‘ब्रह्मकमलों’’ का क्षेत्र भी है। वैसे पूर्वी राज्यों के सैलानियों के मनपसंद स्थान हैं - काठमांडू, पोखरा, दार्जिलिंग, कलिमपोंग, मिरिक, गंगटोक, शिलांग व काजीरंगा इत्यादि। इन दिनों अरूणाचल भी पर्यटन के नक्शे पर अपनी सशक्त मौजदूगी दर्ज करने लगा है। दार्जिलिंग से कंचनजंगा की सुनहली घटा जहाँ मुग्ध कर देती है वहीं सिक्किम अपने खूबसूरत लानों और रंगबिरंगे फूलों वाली वादियों के लिए मशहूर है। काठमांडू घाटी में गजब का सौन्दर्य है। काठमांडू के आस-पास कई पर्यटन स्थल हैं जिनमें भक्तपुर और पाटन प्रमुख हैं। इन दोनों स्थानों तक पहुँचने का सड़क मार्ग समतल किन्तु बहुत मनोरम है। काठमांडू से पोखरा की लगभग 200 कि.मी. की सड़क यात्रा वास्तव में रोमांचकारी है। पूरे सफर में काली नदी की फेनिल, उज्जवल किन्तु उग्र धारा आपके साथ चलती है। सड़क के एक ओर सघन वनों वाले ऊँचे पहाड़ तो दूसरी तरफ काली की वेगवती धार ! ऊँचे-नीचे सर्पिलाकार रास्ते पर हर पल रोमांच ! पोखरा के दसेक कि.मी. पहले ही आभास होने लगता है कि आप किसी ऐसे स्थान पर पहुँचने वाले हैं जिसे आपने कभी सपने में देखा था, या कि शायद सपने में भी नहीं देखा था! और यह लीजिए, ठीक सामने क्षितिज पर बादलों के ऊपर सर उठाए कौन झाँक रहा है ! कभी सुनहली, कभी गुलाबी तो कभी हल्की नीली घटा बिखेरते? शायद आपकी कार का ड्राइवर उस ओर देखने का इशारा करे और आप सहसा हिमजड़ित माछापुछरे पर्वत के एकदम समीप! पोखरा में पोखरे ही पोखरे हैं यानी झीलें ही झीलें, जैसा कि नैनीताल में है। पोखरा का नीरव, स्निग्ध सौन्दर्य सिर्फ महसूस करने की चीज है। वहाँ के फेवा ताल की प्रशांत विस्तीर्णता में माछापुछरे की परछाई और उस पर रह-रह कर बादलों की जुंबिश बस विमुग्धकारी है। किन्तु सच तो यह है हिमालय के किसी भी इलाके में नैसर्गिक सौन्दर्य छलकता है। उसकी विराटता, उसकी दिव्यता जैसे उसके कण-कण में मौजूद है।
लेकिन बदलते समय से हिमालय भी अछूता और बेअसर नहीं। हिमालय गर्म हो रहा है। न सिर्फ भौगोलिक व पर्यावरणीय दृष्टि से, बल्कि इस दृष्टि से कि हिमालय का ‘मानस’ उग्र हो रहा है। इसके पीछे अनेक कारण हैं और वं संभवतः परस्पराश्रित हो। अब जब कभी हिमालय जाएँ तो कुछ बातें ध्यान में रख लें - गंगोत्री ग्लेशियर वहाँ चल रहे ढाबों व आमदरफ्त के कारण गर्म हो रहा है; चेरापूँजी में अब छाता साथ रखने की कतई जरूरत नहीं; माउंट एवरेस्ट समेत अनेकों चोटियाँ पवर्तारोहण के पागलपन को झेलते-झेलते पस्त हो रही हैं; वहाँ कूड़े की समस्या पैदा हो गई है; पोखरा जैसे रमणीक पर्यटन स्थल का दिनोंदिन एक शहर के रूप में फैलते-पसरते जाना माछापुछरे पर्वत के साथ-साथ आस-पास के झीलों व वनस्पतियों के लिए संकट पैदा कर रहा है; दार्जिलिंग, कलिमपोंग, मिरिक की वादियों की नमी सूख रही है; साथ ही वहाँ रह-रह कर गोरखालैण्ड का सर्प फन बढ़ाता है; ब्रह्मपुत्र घाटी का सलोनापन उल्फा, बोडो जैसे उग्रवादी संगठनों ने छीन लिया है; गढ़वाल और कुमाऊँ अब भू-क्षरण का शिकार हो रहे हैं, वहाँ उत्तराखण्ड की हवा बह रही है, हिमाचल की सुरम्य घाटियाँ चूना-पत्थर की खदानों में तब्दील हो रही हैं और कश्मीर का हाल तो सबको मालूम है ! कभी-कभी घबराहट होती है - सदियों से अविचल तपस्यारत यह ध्यानमग्न वीतरागी क्या करवट बदलने वाला है? जिनके भी मन में हिमालय बसता है उन्हें इस यक्ष-प्रश्न से जूझना होगा और अपने स्तर से पहलकदमी की जमीन भी तैयार करनी होगी। पहाड़ों को समझने के लिए पहाड़ जैसा धीरज और हौसला रखना होगा।
यह सब होने के बावजूद हिमालय अब भी हिमालय है - प्रकृति की एक अनोखी, अनुपम कृति! लगभग ढाई हजार लंबी इस शुभ्र-श्वेत पट्टी पर प्रकृति ने कौन-कौन से रंग बिखेरे हैं यह सिर्फ देखकर और साक्षात् अनुभव करके ही जाना जा सकता है। लेकिन जब कभी हम हिमालय जायें तो एक क्षण के लिए भी भूले नहीं कि हम उसे सिर्फ अपनी श्रद्धा ही दे सकते हैं और इसमें हमारा अपना मंगल ही है। आखिर हिमालय भारत का ‘‘दिव्य भाल’’ है - उज्ज्वल और प्रशस्त !

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