फेसबुक (26 जून 2015 ) से....
' फिर भी '
मुझे कुछ नहीं चाहिए
मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए
तुम चाहो तो
मुझसे जो कसम ले लो....
' फिर भी '
मुझे कुछ नहीं चाहिए
मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए
तुम चाहो तो
मुझसे जो कसम ले लो....
हाँ मैं सोचता हूँ फिर भी
और देखता हूँ -
पेड़ और हवा
पंछी और आकाश..
और इसमें
तुम्हारा क्या जाता है !
- शिवदयाल
Navneet Sharma ,धर्मशाला
आ. भाई साहब।
प्रणाम।
कैसे लिखते हैं आप और कहां से लिखते हैं।
यह कविता बहुत बार पढ़ी। बहुत अच्छी लगी।
प्रस्तुत है पहाड़ी अनुवाद।
सादर
नवनीत
'फिरी भी'
मिंजो किछ नी चाहिदा
मिंजों तिज्जो ते किछ नी चाहिदा
तू चाहे ता
मिंजो ते सगंद चकाई लैह्
हां मैं सोचदा फिरी भी
कने दिखदा
रुख कने होआ
पंछी कने गास
कने इस च
तेरा क्या जांदा !
- शिवदयाल
और देखता हूँ -
पेड़ और हवा
पंछी और आकाश..
और इसमें
तुम्हारा क्या जाता है !
- शिवदयाल
Navneet Sharma ,धर्मशाला
आ. भाई साहब।
प्रणाम।
कैसे लिखते हैं आप और कहां से लिखते हैं।
यह कविता बहुत बार पढ़ी। बहुत अच्छी लगी।
प्रस्तुत है पहाड़ी अनुवाद।
सादर
नवनीत
'फिरी भी'
मिंजो किछ नी चाहिदा
मिंजों तिज्जो ते किछ नी चाहिदा
तू चाहे ता
मिंजो ते सगंद चकाई लैह्
हां मैं सोचदा फिरी भी
कने दिखदा
रुख कने होआ
पंछी कने गास
कने इस च
तेरा क्या जांदा !
- शिवदयाल

No comments:
Post a Comment