थोड़ी-सी करुणा ... !
- शिवदयाल
बरामदे के फर्श पर लाठी पटकते हुए वे आवाज देते - मलकिनी जी ....! लो , झूलन मिस्त्री आ गए। हर किसी को मालूम हो जाता कि वे आ गए हैं, बाहर निकलकर आवभगत करने की उतावली नहीं होती। एक किस्म का इत्मीनान होता कि झूलन मिस्त्री आए हैं तो अभी रहेंगे। उन्हें जाने की कोई हड़बड़ी नहीं होगी। अभी तो वे बाहर बरामदे पर बैठकर सुरती ठोकेंगे, फिर लाठी घुमाते, टेकते अहाते का पूरा चक्कर लगाएँगे और एक तरह से अपने लिए एंगेजमेन्ट की तलाश करेंगे। कहाँ क्या-कुछ किया जा सकता है। कहीं कोई क्यारी सूखती मिलेगी, कहीं खुराई तो कहीं बोआई की जरूरत होगी, कहीं झाड़ उग आए होंगे तो उन्हें काटने-छाँटने की दरकार होगी। कुछ न कुछ तो काम होगा या कि उसका बहाना।
वे इतवार या किसी छुट्टी के दिन ही नहीं आते थे, कभी भी चले आते थे। हमें नहीं, माँ को आवाज लगाते थे - मलकिनी जी..., और बस!
- शिवदयाल
बरामदे के फर्श पर लाठी पटकते हुए वे आवाज देते - मलकिनी जी ....! लो , झूलन मिस्त्री आ गए। हर किसी को मालूम हो जाता कि वे आ गए हैं, बाहर निकलकर आवभगत करने की उतावली नहीं होती। एक किस्म का इत्मीनान होता कि झूलन मिस्त्री आए हैं तो अभी रहेंगे। उन्हें जाने की कोई हड़बड़ी नहीं होगी। अभी तो वे बाहर बरामदे पर बैठकर सुरती ठोकेंगे, फिर लाठी घुमाते, टेकते अहाते का पूरा चक्कर लगाएँगे और एक तरह से अपने लिए एंगेजमेन्ट की तलाश करेंगे। कहाँ क्या-कुछ किया जा सकता है। कहीं कोई क्यारी सूखती मिलेगी, कहीं खुराई तो कहीं बोआई की जरूरत होगी, कहीं झाड़ उग आए होंगे तो उन्हें काटने-छाँटने की दरकार होगी। कुछ न कुछ तो काम होगा या कि उसका बहाना।
वे इतवार या किसी छुट्टी के दिन ही नहीं आते थे, कभी भी चले आते थे। हमें नहीं, माँ को आवाज लगाते थे - मलकिनी जी..., और बस!
गहरा साँवला रंग, औसत कद, अंदर को धँसी छोटी-छोटी आँखें, बदन पर धोती-गंजी और गमछा जो अक्सर पगड़ी की तरह सिर पर बँधा रहता। हाँ, उनकी गंजी आध्ी बाँह की कुर्त्तानुमा गंजी होती जिसमें दोनों ओर जेबें होतीं। ऐसी गंजी आज भी चलती है, खादी की। उनकी लाठी उनके साथ बाद में जुड़ी जबकि आँख में मोतियाबिन्द उतर आया।
माँ जब अपने कामकाज निपटा लेती तो जैसे उसे उनका ध्यान आता। वह उनका हाल-चाल पूछती और कोई काम हो तो वह भी बताती। कभी-कभी उन पर खीझती भी। झूलन मिस्त्री मनोयोग से अपना काम करते जबकि माँ बरामदे के फर्श पर बैठी सुस्ताती रहती। दोनों के बीच तब भी संवाद चलता रहता। वे मगही बोलते थे, माँ भोजपुरी लेकिन कहीं कोई रुकावट नहीं। दुनियादारी की बातें, बाल-बच्चों की राजी-खुशी से लेकर महँगाई और तंगी तक।
सन् 71-72 में पटना के गर्दनीबाग स्थित हमारा सरकारी क्वार्टर पूरी तरह तोड़कर बनाया गया था। कोई चार-पाँच महीने तक काम चलता रहा। हम क्वार्टर छोड़कर नहीं गए, किसी तरह उसी में गुजारा किया। शुरू में कोई पंद्रह-बीस मजदूर और राजमिस्त्री सुबह से शाम तक काम करते, बाद में ठेकेदार ने पाँच-सात से ही काम चलाया। कभी-कभी माँ उन्हें चाय पिलाती। उनमें से एक थे माधो मिस्त्री जिन्होंने हमारे सामने ही ईंटें ढोते-ढोते करनी पकड़ ली थी और राजमिस्त्री बन गए थे। वे सबसे साफ-सुथरे दिखते थे, ठिगने कद के गठीले बदन वाले। रंग एकदम साफ। हर समय एक मुस्कराहट उनकी घनी मूछों के बीच से झाँकती रहती। छुट्टी के समय हम बच्चों का सबसे बड़ा शगल मजदूरों को काम करते देखना था। दोपहर के भोजन के वक्त उन्हें सत्तू खाते देख हम भी ललचते। कभी-कभी उन्हें अँचार-चटनी भी सुलभ कराते। इसके लिए हमारी सिफारिश को माँ ने कभी नामंजूर नहीं किया।
हमारा र्क्वाटर बनकर तैयार हो गया। सब मजूर-मिस्त्री अगले ठौर को चले गए। हमने दूसरी चीजों में मन लगाना शुरू किया। लेकिन माधो और झूलन मिस्त्री का हमारे पास जैसे कुछ रह गया। प्रायः छुट्टी के दिन वे चले आते। बाबूजी को बागवानी का शौक था, उनके साथ क्यारियाँ बनाने में जुट जाते। माँ उन्हें चाय तो पिलाती ही, भोजन भी कराती, उसकी चादर तंग थी तब भी। कोई साल दो साल बाद माधो मिस्त्री का आना कम हो गया, बाद में तो जैसे वे गायब ही हो गए। शायद काम के सिलसिले में उन्होंने शहर ही छोड़ दिया हो या अपने गाँव लौट गए हों। बच गए झूलन, जो मिस्त्री नहीं बन पाए, मजूर ही बने रहे। हमने सन् 82 में क्वार्टर छोड़ा और किराए के मकान में आ गए। तब तक उनका हमारे यहाँ आना बना रहा।
माँ जब अपने कामकाज निपटा लेती तो जैसे उसे उनका ध्यान आता। वह उनका हाल-चाल पूछती और कोई काम हो तो वह भी बताती। कभी-कभी उन पर खीझती भी। झूलन मिस्त्री मनोयोग से अपना काम करते जबकि माँ बरामदे के फर्श पर बैठी सुस्ताती रहती। दोनों के बीच तब भी संवाद चलता रहता। वे मगही बोलते थे, माँ भोजपुरी लेकिन कहीं कोई रुकावट नहीं। दुनियादारी की बातें, बाल-बच्चों की राजी-खुशी से लेकर महँगाई और तंगी तक।
सन् 71-72 में पटना के गर्दनीबाग स्थित हमारा सरकारी क्वार्टर पूरी तरह तोड़कर बनाया गया था। कोई चार-पाँच महीने तक काम चलता रहा। हम क्वार्टर छोड़कर नहीं गए, किसी तरह उसी में गुजारा किया। शुरू में कोई पंद्रह-बीस मजदूर और राजमिस्त्री सुबह से शाम तक काम करते, बाद में ठेकेदार ने पाँच-सात से ही काम चलाया। कभी-कभी माँ उन्हें चाय पिलाती। उनमें से एक थे माधो मिस्त्री जिन्होंने हमारे सामने ही ईंटें ढोते-ढोते करनी पकड़ ली थी और राजमिस्त्री बन गए थे। वे सबसे साफ-सुथरे दिखते थे, ठिगने कद के गठीले बदन वाले। रंग एकदम साफ। हर समय एक मुस्कराहट उनकी घनी मूछों के बीच से झाँकती रहती। छुट्टी के समय हम बच्चों का सबसे बड़ा शगल मजदूरों को काम करते देखना था। दोपहर के भोजन के वक्त उन्हें सत्तू खाते देख हम भी ललचते। कभी-कभी उन्हें अँचार-चटनी भी सुलभ कराते। इसके लिए हमारी सिफारिश को माँ ने कभी नामंजूर नहीं किया।
हमारा र्क्वाटर बनकर तैयार हो गया। सब मजूर-मिस्त्री अगले ठौर को चले गए। हमने दूसरी चीजों में मन लगाना शुरू किया। लेकिन माधो और झूलन मिस्त्री का हमारे पास जैसे कुछ रह गया। प्रायः छुट्टी के दिन वे चले आते। बाबूजी को बागवानी का शौक था, उनके साथ क्यारियाँ बनाने में जुट जाते। माँ उन्हें चाय तो पिलाती ही, भोजन भी कराती, उसकी चादर तंग थी तब भी। कोई साल दो साल बाद माधो मिस्त्री का आना कम हो गया, बाद में तो जैसे वे गायब ही हो गए। शायद काम के सिलसिले में उन्होंने शहर ही छोड़ दिया हो या अपने गाँव लौट गए हों। बच गए झूलन, जो मिस्त्री नहीं बन पाए, मजूर ही बने रहे। हमने सन् 82 में क्वार्टर छोड़ा और किराए के मकान में आ गए। तब तक उनका हमारे यहाँ आना बना रहा।
वे ढल गए थे। हाथ में लाठी आ गई थी, आँखें जवाब दे रही थीं। मजूर की अगर आँखें साथ न दें ...! उनसे अब ज्यादा कुछ नहीं हो पाता था। ओसारे पर बैठे आँखें साफ करते रहते, तब भी माँ-बाबूजी से काम पूछते। उन्हें चाय मिलती और भोजन भी। तब तक उनका आना कम होता गया था। क्वार्टर छोड़ते वक्त हमें उनकी भी याद आई - झूलन मिस्त्री कहाँ रह गए, एक बार भेंट हो जाती!
शहर बदल चुका है। तब से तीन ठिकाने बदले हैं। राजधनी के नये इलाके में हूँ। तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था के बीच अपने शहर को भी आधुनिक होते देख रहा हूँ। चारों ओर बहुमंजिली रिहाएशें हैं, चमकती-दमकती दुकानें हैं, मॉल हैं, शोरूम हैं, क्या है, क्या है ...। चौड़ी होती सड़कों के बगल में ठेलों पर तरकारी की दुकानें भी हैं। हाँ, सुबह निकलता हूँ, तो नुक्कड़ों-चौराहों पर मजूरों की कतारें देखता हूँ, कोई उनके श्रम का खरीदार मिल जाए तो उस पर लुझ पड़ते हैं। यह श्रम-हाट है, लेबर मार्केट। हर वय, हर रंग, हर शक्ल, हर क्षमता का मजदूर। धेती-पायजामे से लेकर जींस और बारमूडा तक में अपना श्रम बेचने को तत्पर, कहीं बेकल मजदूर! किसी को दीवारों की मरम्मत करानी है, किसी को नाली बनवानी है, किसी को माल ढुलवाना है, किसी को मिट्टी कटवानी है। जमकर मोल-भाव होता है। वाजिब दाम वाले के साथ सौदा पट जाता है। बाकी दूसरे ग्राहक की राह देखते हैं। दिन चढ़ने के साथ-साथ इनकी बेकली भी बढ़ती जाती है।
शहर बदल चुका है। तब से तीन ठिकाने बदले हैं। राजधनी के नये इलाके में हूँ। तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था के बीच अपने शहर को भी आधुनिक होते देख रहा हूँ। चारों ओर बहुमंजिली रिहाएशें हैं, चमकती-दमकती दुकानें हैं, मॉल हैं, शोरूम हैं, क्या है, क्या है ...। चौड़ी होती सड़कों के बगल में ठेलों पर तरकारी की दुकानें भी हैं। हाँ, सुबह निकलता हूँ, तो नुक्कड़ों-चौराहों पर मजूरों की कतारें देखता हूँ, कोई उनके श्रम का खरीदार मिल जाए तो उस पर लुझ पड़ते हैं। यह श्रम-हाट है, लेबर मार्केट। हर वय, हर रंग, हर शक्ल, हर क्षमता का मजदूर। धेती-पायजामे से लेकर जींस और बारमूडा तक में अपना श्रम बेचने को तत्पर, कहीं बेकल मजदूर! किसी को दीवारों की मरम्मत करानी है, किसी को नाली बनवानी है, किसी को माल ढुलवाना है, किसी को मिट्टी कटवानी है। जमकर मोल-भाव होता है। वाजिब दाम वाले के साथ सौदा पट जाता है। बाकी दूसरे ग्राहक की राह देखते हैं। दिन चढ़ने के साथ-साथ इनकी बेकली भी बढ़ती जाती है।
इन्हीं में कोई लेह-लद्दाख में सड़कें बनाने चला जाता है तो कोई जामनगर और मुंबई-पुणे-बंगलोर में रोटी जुटाने के साथ-साथ मार खाने की अपनी बारी का इंतजार करता है। ये हर कहीं है लेकिन कहीं नहीं। इनका कोई नहीं। कोई दल, कोई झंडा भी नहीं। इन्हें देखता हूँ तो कभी-कभी झूलन मिस्त्री याद आ जाते हैं - मलकिनी जी ...! उनसे जुड़ा हास-परिहास और उपहास भी याद आता है। लेकिन जाने क्यों एक उदासी-सी छाती है। उन्हें याद करना आज मानो एक मजूर मात्र को याद करने जैसा नहीं है।
आज माँ नहीं है। पता नहीं माधो और झूलन मिस्त्री कहाँ हैं! जाने हैं भी कि नहीं। कहीं कोई और चीज भी खो रही है, साथ छोड़ रही है जैसे। वह किसी तरह बच पाती ...। वह जो थोड़ी-सी करुणा थी।
आज माँ नहीं है। पता नहीं माधो और झूलन मिस्त्री कहाँ हैं! जाने हैं भी कि नहीं। कहीं कोई और चीज भी खो रही है, साथ छोड़ रही है जैसे। वह किसी तरह बच पाती ...। वह जो थोड़ी-सी करुणा थी।
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| गरदनीबाग क्वार्टर की छत पर मैं ,सन 7 6-77 का फोटो . |
(जनसत्ता में प्रकाशित - दुनिया मेरे आगे - स्तम्भ में।)
