Thursday, 25 October 2012

                                     थोड़ी-सी करुणा ... !
                                                                                                                         - शिवदयाल

बरामदे के फर्श पर लाठी पटकते हुए वे आवाज देते - मलकिनी जी ....! लो , झूलन मिस्त्री आ गए। हर किसी को मालूम हो जाता कि वे आ गए हैं, बाहर निकलकर आवभगत करने की उतावली नहीं होती। एक किस्म का इत्मीनान होता कि झूलन मिस्त्री आए हैं तो अभी रहेंगे। उन्हें जाने की कोई हड़बड़ी नहीं होगी। अभी तो वे बाहर बरामदे पर बैठकर सुरती ठोकेंगे, फिर लाठी घुमाते, टेकते अहाते का पूरा चक्कर लगाएँगे और एक तरह से अपने लिए एंगेजमेन्ट की तलाश करेंगे। कहाँ क्या-कुछ किया जा सकता है। कहीं कोई क्यारी सूखती मिलेगी, कहीं खुराई तो कहीं बोआई की जरूरत होगी, कहीं झाड़ उग आए होंगे तो उन्हें काटने-छाँटने की दरकार होगी। कुछ न कुछ तो काम होगा या कि उसका बहाना।
वे इतवार या किसी छुट्टी के दिन ही नहीं आते थे, कभी भी चले आते थे। हमें नहीं, माँ को आवाज लगाते थे - मलकिनी जी..., और बस! 
गहरा साँवला रंग, औसत कद, अंदर को धँसी  छोटी-छोटी आँखें, बदन पर धोती-गंजी और गमछा जो अक्सर पगड़ी की तरह सिर पर बँधा   रहता। हाँ, उनकी गंजी आध्ी बाँह की कुर्त्तानुमा गंजी होती जिसमें दोनों ओर जेबें होतीं। ऐसी गंजी आज भी चलती है, खादी की। उनकी लाठी उनके साथ बाद में जुड़ी जबकि आँख में मोतियाबिन्द उतर आया।
माँ जब अपने कामकाज निपटा लेती तो जैसे उसे उनका ध्यान आता। वह उनका हाल-चाल पूछती और कोई काम हो तो वह भी बताती। कभी-कभी उन पर खीझती भी। झूलन मिस्त्री मनोयोग से अपना काम करते जबकि माँ बरामदे के फर्श पर बैठी सुस्ताती रहती। दोनों के बीच तब भी संवाद चलता रहता। वे मगही बोलते थे, माँ भोजपुरी लेकिन कहीं कोई रुकावट नहीं। दुनियादारी की बातें, बाल-बच्चों की राजी-खुशी से लेकर महँगाई और तंगी तक।
सन् 71-72 में पटना के गर्दनीबाग स्थित हमारा सरकारी क्वार्टर पूरी तरह तोड़कर बनाया गया था। कोई चार-पाँच महीने तक काम चलता रहा। हम क्वार्टर छोड़कर नहीं गए, किसी तरह उसी में गुजारा किया। शुरू में कोई पंद्रह-बीस मजदूर और राजमिस्त्री सुबह से शाम तक काम करते, बाद में ठेकेदार ने पाँच-सात से ही काम चलाया। कभी-कभी माँ उन्हें  चाय पिलाती। उनमें से एक थे माधो  मिस्त्री जिन्होंने हमारे सामने ही ईंटें ढोते-ढोते करनी पकड़ ली थी और राजमिस्त्री  बन गए थे। वे सबसे साफ-सुथरे दिखते थे, ठिगने कद के गठीले बदन वाले। रंग एकदम साफ। हर समय एक मुस्कराहट उनकी घनी मूछों के बीच से झाँकती रहती। छुट्टी के समय हम बच्चों का सबसे बड़ा शगल मजदूरों को काम करते देखना था। दोपहर के भोजन के वक्त उन्हें सत्तू खाते देख हम भी ललचते। कभी-कभी उन्हें अँचार-चटनी भी सुलभ कराते। इसके लिए हमारी सिफारिश को माँ ने कभी नामंजूर नहीं किया।
हमारा र्क्वाटर बनकर तैयार हो गया। सब मजूर-मिस्त्री अगले ठौर को चले गए। हमने दूसरी चीजों में मन लगाना शुरू किया। लेकिन माधो  और झूलन मिस्त्री का हमारे पास जैसे कुछ रह गया। प्रायः छुट्टी के दिन वे चले आते। बाबूजी को बागवानी का शौक था, उनके साथ क्यारियाँ बनाने में जुट जाते। माँ उन्हें चाय तो पिलाती ही, भोजन भी कराती, उसकी चादर तंग थी तब भी। कोई साल दो साल बाद माधो  मिस्त्री का आना कम हो गया, बाद में तो जैसे वे गायब ही हो गए। शायद काम के सिलसिले में उन्होंने शहर ही छोड़ दिया हो या अपने गाँव लौट गए हों। बच गए झूलन, जो  मिस्त्री  नहीं बन पाए, मजूर ही बने रहे। हमने सन् 82 में क्वार्टर छोड़ा और किराए के मकान में आ गए। तब तक उनका हमारे यहाँ आना बना रहा।
 वे ढल गए थे। हाथ में लाठी आ गई थी, आँखें जवाब दे रही थीं। मजूर की अगर आँखें साथ न दें ...! उनसे अब ज्यादा कुछ नहीं हो पाता था। ओसारे पर बैठे आँखें साफ करते रहते, तब भी माँ-बाबूजी से काम पूछते। उन्हें चाय मिलती और भोजन भी। तब तक उनका आना कम होता गया था। क्वार्टर छोड़ते वक्त हमें उनकी भी याद आई - झूलन  मिस्त्री कहाँ रह गए, एक बार भेंट हो जाती!
शहर बदल चुका है। तब से तीन ठिकाने बदले हैं। राजधनी के नये इलाके में हूँ। तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था के बीच अपने शहर को भी आधुनिक होते देख रहा हूँ। चारों ओर बहुमंजिली रिहाएशें हैं, चमकती-दमकती दुकानें हैं, मॉल हैं, शोरूम हैं, क्या है, क्या है ...। चौड़ी होती सड़कों के बगल में ठेलों पर तरकारी की दुकानें भी हैं। हाँ, सुबह निकलता हूँ, तो नुक्कड़ों-चौराहों पर मजूरों की कतारें देखता हूँ, कोई उनके श्रम का खरीदार मिल जाए तो उस पर लुझ पड़ते हैं। यह श्रम-हाट है, लेबर मार्केट। हर वय, हर रंग, हर शक्ल, हर क्षमता का मजदूर। धेती-पायजामे से लेकर जींस और बारमूडा तक में अपना श्रम बेचने को तत्पर, कहीं बेकल मजदूर! किसी को दीवारों की मरम्मत करानी है, किसी को नाली बनवानी है, किसी को माल ढुलवाना है, किसी को मिट्टी कटवानी है। जमकर मोल-भाव होता है। वाजिब दाम वाले के साथ सौदा पट जाता है। बाकी दूसरे ग्राहक की राह देखते हैं। दिन चढ़ने के साथ-साथ इनकी बेकली भी बढ़ती जाती है।
 इन्हीं में कोई लेह-लद्दाख में सड़कें बनाने चला जाता है तो कोई जामनगर और मुंबई-पुणे-बंगलोर में रोटी जुटाने के साथ-साथ मार खाने की अपनी बारी का इंतजार करता है। ये हर कहीं है लेकिन कहीं नहीं। इनका कोई नहीं। कोई दल, कोई झंडा भी नहीं। इन्हें देखता हूँ तो कभी-कभी झूलन मिस्त्री याद आ जाते हैं - मलकिनी जी  ...! उनसे जुड़ा हास-परिहास और उपहास भी याद आता है। लेकिन जाने क्यों एक उदासी-सी छाती है। उन्हें याद करना आज मानो एक मजूर मात्र को याद करने जैसा नहीं है।
आज माँ नहीं है। पता नहीं माधो   और झूलन मिस्त्री कहाँ हैं! जाने हैं भी कि नहीं। कहीं कोई और चीज भी खो रही है, साथ छोड़ रही है जैसे। वह किसी तरह बच पाती ...। वह जो थोड़ी-सी करुणा थी।

                  गरदनीबाग क्वार्टर की छत पर मैं ,सन  7 6-77 का फोटो .
(जनसत्ता में प्रकाशित - दुनिया मेरे आगे - स्तम्भ में।)

Wednesday, 17 October 2012

 नीचे दिए लिंक पर मेरी कुछ कहानियां पढ़ी जा सकती हैं :


http://www.worldcat.org/title/munna-baindavale-ustada-kahani-sangraha/oclc/302318513/viewport

Sunday, 14 October 2012

घोंघा
                          शिवदयाल 

घोंघे को मिला है कवच
जो बसेरा भी है उसका !

घोंघा अपना कवच
साथ लिए चलता है
अगर चलने की दरकार हो

जरा-सी आपदा की
आहट हो या
कोई अजनबी स्पर्श
घोंघा दुबक आता है
अपने खोल में
अगर किसी विवशता में
जरा देर के लिए
आ भी जाए बाहर ।

घोंघा जी नहीं सकता
निष्कवच
घोंघा अपने कवच में ही
मर जाना चाहता है ।

- आदमी अंदर से कहीं
घोंघा होता है !

(समकालीन कविता के प्रथमांक में।)

Wednesday, 10 October 2012

नाव
                                            शिवदयाल 

कागज की है
यह नाव
ओ लहरों ....
देखना,
अपनी तरंगों की गति में
कहीं इसे ले न डूबना
यह नाव कागज की है !

चलेगी थोड़ी दूर,
भीगेगी, फूलेगी
धीरे-धीरे इसमें रिसेगा पानी
फिर खुद ही ढूँढ लेगी सतह

तब तक लिए जाना
इसे नजरों से दूर
और करने देना किल्लोलें
शिशु -मन को !
ओ लहरों ...
          
(दस्तावेज में प्रकाशित )

Friday, 5 October 2012

यथास्थिति
                                 - शिवदयाल

धुएँ में लगातार देखने से
एक दृष्टि-मोह बनता है,
चीजों को स्पष्ट देखने की बजाए
लगातार धुएँ से लिपटे रहने में
एक अलग ही आनंद है

कल्पना के सुंदर घर में
पलंग पर लेटे-लेटे
खिड़की से आकाश  देखने में
वक्त अच्छा कटता है

यथार्थ भूले हुए
सपने की तरह
नींद में दस्तक देता है

कोई खलल क्यों
पहलकदमी किस लिए ?



                                    (पहले की एक रचना .)
 

Monday, 1 October 2012

            बिहारी राष्ट्रवाद का मिथक
                                                                                                                                     - शिवदयाल

1912 के पहले बिहार बंगाल का ही एक अंग था, जैसा कि उड़ीसा भी बंगाल का ही एक भाग था। 1757 के पलासी युद्ध में जीत के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी को बंगाल की दीवानी मिली तो इसमें उडीसा और बिहार भी शामिल थे।
बिहारी राष्ट्रीयता के प्रति आग्रह हाल के इतिहास में पहली बार बंगाल से बिहार को अलग करने के आंदोलन के दौरान ही दिखाई देता है जो बीसवीं सदी के पहले दशक में प्रारंभ हुआ। इसे पढ़े-लिखे लेकिन बंगाली प्रभुत्व के नीचे दबे बिहारियों ने शुरू किया था जो सता, प्रशासन और रोजगार में अपना हिस्सा चाहते थे। विस्मित करने वाली बात यह है कि जिन दिनों बिहारी राष्ट्रीयता का उदय हो रहा था, बंगाली राष्ट्रीयता जो भाषा और संस्कृति के आधार पर कहीं अधिक मजबूत और अटूट थी, स्वयं धर्म के आधार पर भंग हो रही थी। बंगाली राष्ट्रीयता का प्रकटीकरण कहीं न कहीं भारतीय राष्ट्रवाद में हो रहा था इसलिए अंग्रेजों ने मुसलमान बहुल पूर्वी बंगाल को हिन्दु बहुल पश्चिम बंगाल से अलग कर दिया। इस घटना का इतना भीषण विरोध् हुआ कि आखिरकार अंग्रेजों को यह फैसला वापस लेना पड़ा, लेकिन बिहारीयत का झण्डा उठाने वाले बिहारी भ्रदलोक को यह सुनहरा अवसर हाथ लग गया - जब बंगाल बँट सकता है तब बिहार बंगाल से अलग क्यों नहीं हो सकता? विडम्बना यह कि भारतीय राष्ट्रवाद को कमजोर करने के लिए बंग भंग किया गया, लेकिन अलग बिहार की मांग करने वालों ने भले ही बिहारी पहचान का हवाला दिया हो लेकिन यह दावा भी करते रहे कि बंगाल के मुकाबले बिहार अंग्रेजी राज के प्रति बहुत अधिक वफादार और इसीलिए शांत था। एक मुजफ्फरपुर बम काण्ड (खुदी राम बोस को फांसी हुई थी) को छोड़कर कहीं कोई हलचल नहीं हुई। अंग्रेजों को भी लगा कि बंगाल को दो बंगालों में बांटने की बजाए बिहार को अलग करने से अंग्रजी राज को कही अधिक स्थिरता मिल सकती है। आखिरकार 1912 में बिहार बंगाल से अलग होकर एक और सूबे के रूप में अस्तित्व में आया।
बिहारी राष्ट्रीयता की थोड़ी-बहुत चर्चा पिछली सदी के अंतिम दशक में चली जबकि बिहार से काटकर झारखण्ड राज्य के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो रहा था। इस समय झारखण्डी पहचान भारी पड़ी और बिहार के राजनीतिक दलों के लिए यही सुविधाजनक लगा कि बिहार से झारखण्ड को अलग कर दिया जाए। वास्तव में बिहारी राष्ट्रीयता सचमुच मजबूत होती तो एक आदिवासी मुख्यमंत्री को मौका देकर भी बिहार विभाजन को रोकने की कोशिश की जा सकती थी।
इस बीच कुछ अर्थशास्त्रियों और राजनीतिक चिंतकों ने यह सिद्धांत गढ़ने की कोशिश की कि क्षेत्रीयता या उप-राष्ट्रीयता विकास के लिए उत्प्रेरक का काम करती है। बिहार पिछड़ा इसलिए है कि बिहार में ‘बिहारीयत’ नहीं है, बिहारियों में ‘बिहारीपन’ नहीं है। इसलिए जातीय व भाषाई पहचानों के ऊपर यदि बिहारी पहचान को प्रतिष्ठापित किया जाए तो तरक्की का रास्ता खुल जाएगा। वर्तमान सरकार अपनी उपलब्धियों का बहुत कुछ श्रेय इस बात को भी देती है कि उसने जातिग्रस्त बिहारी समाज को एक समवेत बिहारी पहचान के साथ संयुक्त किया है। वैसे देश के विभिन्न भागों में बिहारियों के साथ जो दुर्व्यवहार हुआ उससे भी बिहारीयत की भावना जगी है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।यह बात अलग है कि जाति की राजनीति बदस्तूर जारी है और नये जातीय सभीकरणों पर भी लगातार काम होता रहा है।
सवाल यह है कि हिन्दी भाषी राज्यों की अलग-अलग क्या पहचानें हैं? उत्तरप्रदेशीय, मध्यप्रदेशीय, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी पहचानें क्या हैं? उनका आधार  क्या है? समूचे हिन्दी क्षेत्र की ही पहचान का आधार क्या है? बिहार ही नहीं, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी उपसंस्कृतियों वाले क्षेत्र हैं, यानी बिहारी या उत्तरप्रदेशीय राष्ट्रीयता के अंदर भी राष्ट्रीयताएँ - मिथिलांचल, पूर्वाचल, रूहेलखण्ड, बुंदेलखण्ड ... । वरना क्या एक ही झटके में उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में बाँटने का प्रस्ताव वहां की सरकार पारित करा सकती है? वास्तव में गहराई से विचार करें तो हिन्दी प्रदेशों के साथ सुविधा यह है कि वे अपनी पहचानों को राष्ट्रीय पहचान के साथ एकाकार कर सकती हैं, उनके पास उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी भाषा है, और लगभग एक साझा राजनीतिक संस्कृति और विरासत है। अगर ये अलग प्रदेश हैं तो प्रशासनिक सुविधा के लिए ही अधिक, न कि क्षेत्रीय या सांस्कृतिक विविधता के कारण।
इनमें भी बिहार की स्थिति विशेष है। बिहार में वैसे भी पहचान का आग्रह उतना मजबूत नहीं रहा, उल्टे बिहार ने अपनी पहचान को भारत की अस्मिता में विलयित करके रखा। इसके ऐतिहासिक कारण हैं। बिहार से भारत ही नहीं, दुनिया को देखने की परम्परा रही है। भारतीय उपमहाद्वीप का पहला साम्राज्य ढाई हजार साल पहले बिहार में ही बना। उसके बाद की कुछ सदियों की उथल-पुथल के बाद गुप्तों के विशाल साम्राज्य का केन्द्र भी बिहार ही रहा जो हूणों के अनवरत आक्रमण के कारण चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समय उज्जयिनी स्थानांतरित हो गया। मौर्यो (अशोक) और गुप्तों (समुद्रगुप्त) का साम्राज्य उपमहाद्वीप की सीमाओं के बाहर तक फैला था। इसी के साथ विराट विश्वदृष्टि के साथ जैन और बौद्ध धर्म बिहार में ही प्रवर्तित हुए - यह विकास भारत की परम्परागत वैदिक संस्कृति के समानांतर या कि विरोध में हुआ। बिहार बाद में सिख धर्म का भी महत्वपूर्ण केन्द्र बना। बौद्ध धर्म विश्व को बिहार की सबसे महान देन है, आज वह विश्व का चौथा धर्म है। गुप्तों की राजधानी उज्जयिनी स्थानांतरित होने के बाद इतिहास में ठहराव दिखाई देता है जैसा कि सत्ता-केन्द्र बदलने के पश्चात यह स्वाभाविक ही है। मध्यकाल तक आते-आते दिल्ली भारत का सत्ता केन्द्र बन गई और बिहार नेपथ्य में चला गया। लेकिन सोलहवीं सदी में एक अप्रत्याशित घटना घटी। बिहार का एक सिपाही हिन्दुस्तान का बादशाह बन गया। शेरशाह सूरी के उदय के साथ बिहार फिर से राजनीति की मुख्यधारा में आया, भले ही यह वापस सत्ता केन्द्र न पाया हो। एक कहावत चल पड़ी - बिहार का एक सिपाही हिन्दुस्तान का शहंशाह हो जाता है। शेरशाह की दृष्टि कितनी व्यापक और उदात्त थी, यह अल्पावधि में अंजाम दिए गए उसके महान कार्यों से प्रमाणित है। सासाराम में अपने खूबसूरत मकबरे के अलावा बिहार को शेरशाह ने अलग से और क्या दिया, जीटी रोड तो बस बिहार से होकर गुजरी। लेकिन परिवहन, संचार (डाक व्यवस्था), भूमि प्रबंधन (जमीन की पैमाइश और बंदोबस्ती), न्याय व्यवस्था और जन कल्याण के उसके अभिनव प्रयोग बाद के बादशाहों-हुक्मरानों के लिए अनुकरणीय और कभी तो श्लाघनीय बने रहे।
शेरशाह की असामयिक मृत्यु के पश्चात बिहार पुनः गुमनामी में खो गया। उसके बाद तो 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में ही बिहार चमका, बाबू कुँअर सिंह के शौर्य, पराक्रम और स्वातंत्र्य-चेतना के कारण। वे बिहार को नहीं भारत को अंग्रेजों से आजाद करने के लिए लड़े। वह भी अस्सी वर्ष की वय में। बिरसा मुण्डा का आंदोलन भी अंग्रेजों के जालिम राज से मुक्ति की अपनी तरह की एक कोशिश थी जिसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। क्या अजीब बात है कि जिस राजभक्ति की एवज में अंग्रेजों ने बिहार को अलग प्रांत बनाया 1912 में, उसके पाँच वर्ष बाद ही 1917 में चम्पारण की धरती पर गांधीजी के सत्याग्रह का भारत में प्रथम प्रयोग हुआ जो आशातीत रूप से सफल हुआ। इस एक घटना ने बिहार को भारत के स्वतंत्रतता आंदोलन के आधुनिक चरण का अगुआ बना दिया। राजभक्ति की दुहाई देकर अलग प्रांत के लिए लड़ने वाले अधिकांश नेता स्वतंत्रता आंदोलन के सिपाही बन गए। 1942 के निर्णायक दौर में जयप्रकाश नारायण के बहाने बिहार ने देश का नेतृत्व किया। 1947 में देश स्वतंत्र हुआ। क्या यह मात्र संयोग है कि एक बिहारी डा. राजेन्द्र प्रसाद ही स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्राध्यक्ष बने ? दो कार्यकाल पूरे करने के बावजूद राजेन्द्र बाबू सिवान-मैरवा रोड से जीरादेई गांव को जोड़ने के लिए एक अच्छी सड़क तक न बनवा सके। नवस्वतंत्र राष्ट्र की स्थिरता और अखण्डता, उसकी जातीय चेतना और आत्मगौरव की रक्षा करना उनकी प्राथमिकता थी । देश को बनाने-बढ़ाने में बिहार ने अपने दोनों हाथ खोल दिए और आंखें बंद कर लीं। नहीं तो  आज भारत विश्व के दस प्रमुख औद्योगिक देशों में न होता। आज के नेता हमारे पुरानी पीढ़ी के नेताओं की इन ‘गल्तियों’ का रोना रोते हैं लेकिन ध्यान से देखें तो उस समय के हमारे नेताओं ने वही किया जो उन्हें करना चाहिए था और जो  उनके इतिहास-बोध और राजनीतिक चेतना के अनुरूप था। बिहार ने पुनः 1974-77 में देश का सर्वसत्तावाद के खिलाफ नेतृत्व किया - 1942 की क्रांति के नायक जेपी एक बार फिर सामने थे। बिहार परिवर्तन के प्रयोगों की प्रयोगशाला बना रहा, कि देश बदले, दुनिया बदले। चाहे वह पचास के दशक का भूदान आंदोलन हो, संपूर्ण क्रांति का आंदोलन हो, नक्सली आंदोलन हो या अन्य कम्युनिस्ट आंदोलन - सब सिर्फ बिहार नहीं, देश में सार्थक परिवर्तन लाने को लक्षित रहे। देश ने बिहार को आशा भरी नजरों से देखा तो इसीलिए देखा।
लेकिन शायद आज भूमंडलीकरण, बाजारवाद और विकास की ललक ने राजनीति की प्राथमिकताएँ ही नहीं बदली हैं, बल्कि मूल्य, आदर्श और दृष्टि भी बदल डाली है। बिहार के बच्चे अब राष्ट्रगान के साथ ही ‘राज्यगान’ में राज्य की महिमा गाएँगे ताकि बिहारीयत मजबूत हो। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ द्वारा रचित हमारे राष्ट्रगान में राष्ट्र की जयगाथा ही नहीं संघवाद का आदर्श भी है। राज्यगानों की परम्परा संघवाद को नए सिरे से परिभाष्ति कर रही है, परिणाम क्या होगा, अभी से कहा नहीं जा सकता। वास्तव में बिहारी राष्ट्रवाद का विचार बिहार की राजनीतिक-सांस्कृतिक परम्परा, विरासत और इतिहास बोध से मेल नहीं खाता।('शुक्रवार' के 'बिहार अंक' 22 मार्च ,में प्रकाशित।)


  नव-चैतन्य के महावट - रवींद्रनाथ                                 - शिवदयाल  ब चपन में ही जिन विभूतियों की छवि ने मन के अंदर अपना स्थाई निवा...