Wednesday, 9 September 2015



                                                                                                                                     
                                बिहार : गतांक से आगे या पीछे
                                                                                                                           -शिवदयाल
                                                विडंबना और विरोधाभास बिहार की राजनीति का अभिन्न अंग है बिहार काफी विकास कर चुका है, विकास के सभी मानकों पर, मुख्यमंत्री के अनुसार उसका प्रदर्शनश्रेष्ठरहा है, पिछले दस वर्षों में बिहारस्वस्थराज्यों की पंगत में शामिल हो गया है लेकिन कोई भी तथाकथित विकसित राज्य अपने लिए विशेष दर्जे की मांग नहीं कर रहा है, जबकि बिहार इसकी जाने कब से रट लगाए है भाई, जब सब कुछ ठीकठाक है तो किस बात पर, किस आधार पर विशेष दर्जा की माँग? अगर विशेष दर्जा चाहिए तो इसका मतलब  स्पष्ट है कि बिहार अभी भी एक पिछड़ा राज्य है (जो कि वह है ) लेकिन पिछड़ा मान लेने से दो कार्यकालों  पर ही सवाल उठने लगेंगे, आगे चुनाव है, दिक्कत होगी तो भले ही हम पिछड़े नहीं है, विशेष दर्जा तो हमें चाहिए ही चाहिए! चित भी मेरी पट भी मेरी!
                                           अब सत्रह साल के साथी रहे भाजपा पर भी तो यह दोष  तो  लगेगा कि आखिर आठ बरस के शासन में उसने किया क्या कि बिहार की हालत अब भी खस्ता है ? इसपर उसक यह विचित्र तर्क कि उसके सरकार में रहने तक तोरामराज्य ही गया था, हटने के बाद राज्य दुर्दशाग्रस्त हो गया है
                राजद के शासनकाल में कभी पटना हाईकोर्ट ने किसी मामले पर टिप्पणी करते हुए राज्य में जंगल राज होने की बात कही थी इतना प्रभावशाली विशेषण तो बिहार की राजनीति में राजद का घोर से घोर विरोधी  भी उसके लिए नहीं खोज पाया था, तोजंगलराजके खात्मे के लिए जेडीयूऔर भाजपा ने एकदूसरे का दामन थामा और आखिरकार 2005 मेंसुशासनले आए बेहिचक भाजपा ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री स्वीकार कर लिया जेडीयू के विधायकों की संख्या अधिक होती तब भी शायद स्वीकार कर ही लेते। इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में उन्हें रेल मंत्रालय दिया जा चुका था
                पहला कार्यकाल अच्छा गुजरा अभिशासन ;यानी  गवर्नेंस की दृष्टि से कई पहलकदमियाँ सामने आईं कानूनव्यवस्था की स्थिति में सुधार हुआ, रात में भी सड़कें गुजलार रहने लगीं पर्वत्यौहारों में भीड़ उमड़ी। सभी सरकारी महकमे हरकत में आए निर्माण (कंस्ट्रक्शन) गतिविधियों में इजाफा हुआ वित्तीय क्षेत्र में योजना आकार कई गुणा बढ़ गया कर ढाँचा विस्तारित हुआ पुलपुलियों का निर्माण हुआ शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई कदम उठाए गए प्राथमिक शिक्षा को समुन्नत बनाने;  साक्षरता, खासकर महिला साक्षरता में बढ़ोत्तरी के उपाय किए गए शैक्षिक अधिरचना के विकास की दिशा में भी प्रगति देखने को मिली महिला विकास को भी प्राथमिकता मिलीपंचायत में पचास प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान के अलावा भी बच्चियोें को साइकिलें और पोशाक का  प्रावधान  दिया गया दूसरी ओर राज्य में स्वास्थ्य की दिशा में सुधार द्रष्टव्य हुआ अनेक अस्पतालों को समुन्नत किया गया प्राथमिक चिकित्सालय व्यवस्था को बेहतर बनाया गया, डॉक्टरों की उपलब्धता   सुनिश्चित की गई और दवाइओं  का भी इंतजाम किया गया सबसे बड़ी बात कि केन्द्रीय योजनाओं के रहते राज्य की अपनी योजनाएँ एक कार्यक्रम शुरू किए गए बिहार ओर इसके नेतृत्व की देश भर में चर्चा हुई।
                                तो पहले कार्यकाल ने सचमुच फर्क पैदा किया था,सो बिहार की जनता ने दूसरा कार्यकाल और मजबूती के साथ दिया जेडीयू-भाजपा की जोड़ी जम गई एक समय कुछ विश्लेषकों ने बिहार को सबसे तेज वृद्धि वाला राज्य भी घोषित कर दिया नीतीश  कुमारपी एम मैटेरियलबताए जाने लगे कुछ लोग किसी गैर भाजपाई के  प्रधानमंत्री बनने की संभावना देख रहे थे, उनके हिसाब से गठबंधनो  का दौर अभी जारी रहने वाला था, और यहाँ नीतीश भाजपा सहित अन्य दलों की स्वाभाविक पसंद बन सकते थे नीतीश की दृष्टि से देखें तो उनके जैसे एक क्षेत्रीय, वह भी एक राज्य में सीमित दल के नेता के लिए इससे बड़ा मौका  हो नहीं सकता था भाजपा के साथ उन्हें रेलमंत्री और फिर बिहार का मुख्यमंत्री बनने का अवसर सुलभ हो चुका था
                                भाजपा की रणनीति लेकिन कुछ और थी आडवाणी के बाद की पीढ़ी के नेताओं ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को तुरूप के पत्ते के रूप में इस्तेमाल किया पहली बार संसदीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री चुनने का हक संसदीय दल से छीनकर, पद का दावेदार पहले से घोषित कर दिया गया बिहार के मुख्यमंत्री को यह नागवार गुजरा उन्होंने इसी आधार  पर भाजपा के साथ सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया कारण बताया  गया, मोदी की उग्र आक्रामक छवि को  बिहार की जनता ने 2015 और 2010 में एनडीए को सत्ता सौंपी थी, नीतीश जी ने उसमेें से भाजपा को बाहर निकाल फेंका और इस तरहमैंडेटएक तरह से हथिया लिया यह उन्होंने नये सहयोगी जुटाकर, बिना चुनाव में गए जदयू  की सरकार बना ली, और खुद को नीतिवान नेता और   धर्मनिरपेक्षता का चैंपियन भी घोषित किया!
                                             बात बनी नहीं सारा दाँव उल्टा पड़ा राजीव  गांधी के बाद पहली बार नरेन्द्र मोदी ने भाजपा को अकेले बहुत दिलाकर दिल्ली में सरकार बना ली अब नीतीश कुमार ने खुद कोनैतिकरूप से ऊँचा सिद्ध करने के लिए एक और दाँव खेला, अपने एक सहयोगी जीतनराम माँझी को मुख्यमंत्री पद सौंप दिया और दावा किया कि पहली बार एक महादलित को उन्होंने मुख्यमंत्री बनाया है माँझीखड़ाऊँ राजवाले भरत साबित  नहीं हुए।  उनके मुताबिक उन्होंने अपने हिसाब से काम करना शुरु किया जो उनके दल के नेताओं को रास आया उन्हें मुख्यमंत्री पद से एक तरह से जबरन हटा दिया गया जबकि  चुनाव में मात्र सातआठ महीने बचे थे इससे राज्य में एक और नेता, दलित नेता पैदा हो गया इसका श्रेय नीतीश कुमार को देना चाहिए यही वह बिन्दु है जहाँ एक महा गठबंधन  की जमीन तैयार हुई जिसमेंदो शत्रुएक साझेशत्रुके मुकाबले के लिएमित्रहो गए विडंबना और विरोधाभास ! जिनके तथाकथितजंगलराजसे मुक्ति  दिलाने के लिए बारह साल तक  लगातार जूझते रहे उनका साथ लेकर अपने सत्रह साल तक साथ रहे सहयोगी के खिलाफ मोर्चा पीएम मैटेरियलनीतीश कुमार के साथ मुश्किल यह है कि वे अपने दम पर, अकेले कभी राजनीति नहीं  कर सके पहले उन्होंने लालू प्रसाद का साथ लिया , 1993 में उनसे अलग होकर जार्ज फर्नांडीज के साथ समता पाटी बना ली यही समता  पार्टी एनडीए का हिस्सा हो गई, यानी भाजपा की साझेदार बन गई अब सत्रह साल के बाद भाजपा से अलग होने के बाद पुनः लालू जी के साथ रहने की मजबूरी ! अगर अपने काम सेदस साल के काम से सचमुच उन्होंने बिहारियों का दिल जीता है, उन्हें नई पहचान दी हे तो  उन्हें अकेले चुनाव में आने का दम दिखाना चाहिए था, वह भी ऐन भाजपा से अलग होने के बाद
                              पैकेज और पैकेजिंग की बात बहुत होती है आज की राजनीति का यह बाजादवादी तौरतरीका है, जिसे या तो मान लेना चाहिए था फिर  उससे अलग रहना चाहिए इसका विरोध करते परोक्ष रूप से आप भी वही काम करें तो  यह नहीं चल सकता बिहार का अतीत, बिहार की अस्मिता या पहचान, बिहारीपन, बिहारी राष्ट्रीयता, बिहार की हकतलफी, बिहार का विकास, बिहार को विशेष  राज्य का दर्जा, बाल-नाखून  का नमूना -  यह भी एक प्रकार की पैकेजिंग ही है बिहार को अपने अंदर देखने की जरूरत भी है लेकिन बिहार में अपने से बाहर देशदुनिया को देखने की विरासत रही है अगर बिहार सचमुच रास्ता दिखाने वाला राज्य है तो इसका कारण यही है, और आत्मकेन्द्रित राजनीति से इसकी यह ऐतिहासिक भूमिका भी जाती रहेगी
                                बिहार पिछले सालों में बदला नहीं है, ऐसा नहीं है संपर्कता बढ़ी है, ठेकेदारोेंबिल्डरों की बदौलत शहरोंकस्बों में रौनक बढ़ी है नई इमारतें  बनीं हैं विकास, भले ही वह उद्योगों के रास्ते आया हो, अपनी चमक  तो  दिखा रहा है ।बिजली वायदे वायदे के मुताबिक 2015 तक तो नहीं आई , अब फिर 2016  गाँव-गाँव बिजली पहुँचाने का वादा ! जमीन की कीमतें आसमान छू रही हैं अपना आशियाना साधारण आदमी के औकात के बाहर की चीज है। पटना धनकुबेरों का शहर बन गया है सुशासन  औरविकासका एक परिणाम यह जरूर आया है कि मध्यवर्ग अथवा खानेकमानेवाले लोगों की, श्रमजीवियों की सम्पत्ति धारण करने की क्षमता जाती रही वे अब पटना ही नहीं, बिहार के किसी भी शहर में सम्पत्ति खरीदने की औकात नहीं रखते औकात उनकी है और बढ़ रही है जिनके पास पहले से जमीन है इस अर्थ में बिहार में जो मध्यवर्ग, कामकाजी वर्ग खड़ा हो रहा था वह हाशिये पर चला गया है उसकी कहीं कोई आवाज नहीं है यह वर्ग अब सरकारी लाठी खानेवाला वर्ग बन गया है इस वर्ग की संपत्तिहीनता का गहरा प्रभाव बिहारी समाज और अर्थव्यवस्था पर होना है
 बिहार में पूंजी आई है लेकिन  उस तक पहुँच प्रायः उनकी बनी है जिनके पास पहले से पूंजी थी, या फिर उनकी जिन्होंने अवैध  ढंग से इसे हासिल किया बिहार में राजनीति ही नहीं, पूरी  व्यवस्था में गहरे अंतविरोध  झलकते हैं नई शिक्षा संस्थाएं खुलीं और जो पहले से चल रही थीं, वो गर्त में चली जा रही हैं प्राथमिक शिक्षा को प्रसार व्यापकता तो  किसी हद तक मिली लेकिन गुणवत्ता सिरे से गायब! माध्यमिक शिक्षा का तो कोई नामलेवा नहीं बचा हाल ही में दसवीं की परीक्षा का आँखों देखा हाल दुनिया के सामने आया उच्च शिक्षा की स्थिति दयनीय है इतनी समर्थ सरकार आज तक विश्वविद्यालय शिक्षकोें की नियुक्ति नहीं कर सकी तकनीक शिक्षा में भी शिक्षकों का घोर अभाव है अधिरचना का तो है ही तो परिणाम यह कि बच्चे आज भी बाहर जाने के लिए मजबूर हैं, जैसे कि बेरोजगार और मजदूर मजबूर हैं बिहार की व्यवस्था के मारे लोग अलगअलग महानगरों में अलगअलग बिहार बना रहे हैं और अब तो उनकी यह स्थिति हो गई है कि वे बाहर बैठे रहकर  भी चुनावी परिणामों में अंतर पैदा कर सकते हैं, लिहाजा उन्हें भी लुभाया जा रहा है जलावतनी को यहाँ के सत्ताधारी वर्ग और समाज ने स्वीकार कर लिया है मध्य , उच्चमध्य वर्ग में तो यह प्रतिष्ठा का पैमाना भी बन गया है, कोई अपने बच्चो को बिहार में नहीं देखना चाहता यह गर्व की बात है कि उनका बच्चा बिहार के बाहर है यहबिहारी स्वाभिमानका एक और पक्ष है
                                                            सुशासन काल का एक और प्रभाव विचलित करने वाला है, बिहारी संस्कृति में   दारु  संस्कृति ने खूब  अच्छी पैठ बनाई है कहा गया पीने वाले मजे में पिएँ, इस सरकार को टैक्स देते रहें राज्य में कराधार  बढ़ाने का प्रमुख माध्यम शराब को बनाया गया गाँवगाँव में दुकानें खुल गईं स्कूलोंकॉलेजोंअस्पतालों के आसपास भी सुशासन में एक नया आयाम जुड़ा नशाखोरी का आश्चर्य कि महिला सशक्तीकरण के लिए आगे बढ़कर काम करने वाली सरकार शराबखोरी को किस प्रकार बढ़ावा दे सकी और हाँ, इस नीति को बनानेचलाने में भाजपा बराबर की भागीदार रही हैै आज महिलाओं से सौदेबाजी हो रही है कि अगर पुनः सत्ता मिल गई तो शराब राज्य में प्रतिबंधित  कर दी जाएगी, वरना तो उसे जारी ही रहना चाहिए!
                                                बिहार में प्राचीन गौरव, विरासत और धरोहर की बात बहुत होती है अभी हाल में पटना के पुराने संग्रहालय के रहते हाईकोर्ट के निकट एक विशाल बिहार म्यूजियम का निर्माण चारपांच सौ करोड़ रुपये की लागत से किया गया जिसे उच्च न्यायालय ने गौरवाजिब और गैरजरूरी बताया म्यूजियम के निर्माण के लिए ब्रिटिश काल के /रोहरोंपुराने विशाल बंगलों को नष्ट कर दिया गया इसके पहले पटना जंक्शन के पास फ्रेज़र रोड स्थित पटना सेंट्रल जेल को तोड़कर बुद्ध स्मृति पार्क का निर्माण कराया गया स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियोें को संरक्षित रखने वाली इस महत्वपूर्ण धरोहर को समूल नष्ट कर दिया गया, उसका कोई अंश संरक्षित नहीं रखा गया जेल के अंशों का समावेश करते हुए कायदे से यहाँ वाणिज्य केन्द्र स्थापित किया जाना चाहिए चाहिए था। बुद्ध स्मृति पार्क किसी किसी शांत , रमणीक स्थान पर बनाना श्रेयस्कर होता।  लेकिन सरकार की जिद है कि नया निर्माण पुराने धरोहरों को नष्ट करके ही होगा पटना में विरासत और  धरोहर के नाम पर जो कुछ बचा हुआ है वह उपनिवेश काल का नया पटना रराजधानी क्षेत्र ही है इसे संरक्षित करके शहर को बाहर फैलाना बढ़ाना था आने वाली पीढ़ियां इस सुंदर इलाके को उसके मूल स्वरूप में देख पातीं! लेकिन अब नजरहेरिटेजकालोनीका हक पाने के लिए हर तरह से उपयुक्त ब्रिटिशकाल में बाबुओं लिए बने  हरे-भरे खूबसूरत मोहल्ले गर्दनीबाग कोविकसितकरने, यानी नष्ट करने का है ।उपनिवेशकालीन संरचनाएं बेशकीमती जमीनों पर आबाद हैं , इनपर विकास के कर्णधारों-पैरोकारों की नजर है। पटना का वर्तमान स्वरुप बदल जाना है , उन  इलाकों को  छोड़  जहाँ  सत्ताधारी वर्ग बसता है। बौद्धिकों  का शहर चुप है, जैसे कि वह गांधी  मैदान की जकड़बंदी पर चुप रहा मगध  महिला कॉलेज की लड़कियों ने आवाज उठाई तो किसी तरह उनका रास्ता बच गया वहाँ विशालद्वारबन रहा है बिहार में बिल्डर और ठेकेदार, विकास के अग्रदूत हैं, नेताअफसर इनका पथ बुहार रहे हैं, मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं !
                बिहार के विकास की बोली लग रही है। केंद्र और राज्य  सरकारें जैसे होड़ कर रही हैं बिहार में चाहे यह सरकार रहे या जाये, आने वाले वर्षों में पैसा बहुत आएगा, लेकिन उनका सदुपयोग राज्य और राज्य की जनता के हक में हो पाएगा इसकी संभावना कम है इसके लिए जिस कार्य संस्कृति और उत्तरदायी तंत्र की दरकार होती है वह अब भी नदारद है नैतिकता तो छोड़िए, कानून और  सरकार का मामूली खौफ तब प्रशासन में नहीं दिखाई देता दिखावे के लिए आए दिन छोटेबड़े मुर्गे पकड़े जाते रहते हैं, अंदरखाने का खेल चलता ही रहता है
                जिन मुद्दों को चुनावों के लिए उछाला जा रहा है, जनता, खासकर युवाओं की शायद ही उसमें कोई रूचि है रोजगार , आजीविका उनकी प्राथमिक जरूरत है।  जिधर उन्हें इसकी गारंटी  सम्भावना दिखेगी , उस ओर वे जाएंगे। दलों को लगता है कि आखिरकर जाति काअमोघअस्त्र की काम आने वाला है कोशिश जारी है एक और बात तय है कि बिहार प्रचलित, या चालू विकास के रास्ते को ही अपनाने वाला है, इसे चुनौती देने और एक वैकल्पिक रास्ते के संधान की इच्छाशक्ति प्रतिरोध  की धरती  कहे जाने वाले इस सूबे में शायद ही बची है वैसे राजनीतिक दृष्टि से बिहार के चुनाव अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं एनडीए इसे अपनी झोली में डालने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगाएगा,इसे हासिल किये बिना उसका अश्वमेध पूरा नहीं होगा।  जबकि यह अंतिम किला किसी भी तरह बच जाए, इसके लिए राजदजेडीयूकाँग्रेस कुछ भी उठा रखेंगे राजद-जदयू 'मंडल' को  पुनर्जीवित कर  भाजपा  को  'कमण्डलवाद ' में परिसीमित कर  बड़ी कॉन्स्टीटूऐंसी बनाना चाहते हैं। यह 2005 में शुरू हुए 'समरसता ' और 'समवेशिता ' से आगे (या कि पीछे !) का मुकाम है !  इन दोनों गठबंधनों की लड़ाई में कुछ हासिल करने के लिए वामदलों का मोर्चा भी पूरी ताकत झोंकने के लिए तैयार है देखना यह है कि क्या वास्तव में यह चुनाव कमंडलमंडल के बीच है, या कि चुनाव के बाद यह राजनीति इतिहास की बात हो जाने वाली है!
                ('सबलोग', दिल्ली के सितम्बर 2015 अंक में प्रकाशित। )




Wednesday, 29 July 2015

   प्रतिभा व प्रतिबद्धता के संगम परेश सिन्हा बहुत याद आएंगे

परेशजी नहीं रहे ! कवि,कथाकार,नाटककार ,नाट्य-निर्देशक , ट्रेड यूनियन एक्टिविस्ट , और समाजवादी मूल्यों के प्रति अंत तक प्रतिबद्ध रहनेवाले परेश सिन्हा ! अपने देशकाल पर सजग और चौकस निगाह रखनेवाले और अपने सृजन से सार्थक हस्तक्षेप करनेवाले बुद्धिजीवी परेश सिन्हा। संवेदनशील , हंसमुख, मिलनसार और परदुःखकातर परेशजी अपने  समकालीनों में सबसे प्रौढ़ और परिपक्व थे। कभी किसी के पीछे नहीं गए , किसी से कुछ  मांगा नहीं, अपनी धुन में लगे रहे।
परेशजी की सृजनात्मकता अनेक विधाओं में प्रस्फुटित हुई , लेकिन उनकी सबसे पुख्ता पहचान नाटककार की रही है। उन्होंने अनेक चर्चित नाटक लिखे - 'गांधी नहीं मरेगा ', ' कटे हुए लोग ',चेहरा दर चेहरा ',आदि। साथ ही  अनेक महत्वपूर्ण नाटकों का सफल मंचन किया - 'घासीराम कोतवाल '(विजय तेंदुलकर),'रसगंधर्व '(मणि मधुकर), 'सृष्टि का आखिरी आदमी'(धर्मवीर भारती),'सगुन पंछी '( लक्ष्मीनारायण लाल ), 'दूसरी सीता'(स्नेहलता रेड्डी ), तथा 'इकतारे की आँख ' आदि। परेशजी ने भारतीजी की प्रसिद्ध कविता 'मुनादी' का नाट्य रूपांतरण किया और पटना के आयकर चौराहे पर (जहाँ  जेपी पर लाठियां चली थीं)  स्थापित जेपी की प्रतिमा के अनावरण के अवसर पर उसका मंचन किया था।
Sheo Dayal's photo.
परेशजी , प्रियदर्शी और  मैं
परेशजी की पीढ़ी स्वाधीनता के नवोन्मेष में जवान हुई थी जिसकी आँखों में नये , खुशहाल भारत का सपना था। अल्पवय में पिता को खो देने से परेशजी के लिए पढाई-लिखाई के बाद रोजी-रोजगार अनिवार्य तो था लेकिन वे राजनीतिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से शुरू से ही जुड़े रहे । लेखन के क्षेत्र में वे साठ के दशक से सक्रिय थे। इसी दौर में वे समाजवादी आंदोलन से भी जुड़े और बाद में आल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन के पदाधिकारी भी रहे। अनेक साहित्यिक विभूतियों से उनकी नजदीकी रही, खासकर खासकर कथाशिल्पी रेणु से। बाबा नागार्जुन और कमलेश्वर का भी सान्निध्य उन्हें प्राप्त था। सन चौहत्तर ककए आंदोलन में जयप्रकाशजी के  आवाहन पर रेणुजी  नेतृत्व में रचनाकारों की जो टोली सड़कों पर निकली उनमें परेशजी भी सक्रिय रूप से शामिल थे। उनकी यह नुक्कड़ कविता अबतक लोगों को याद है : ' खेल भाई खेल , खेल भाई खेल / कैसा गजब यह सत्ता का खेल / बेटे के हाथ लगा कार कारखाना /पोसपुत के हाथ आई भारत की रेल..' रोग-शोक झेलते  भी परेशजी सृजनरत रहे , गोकि उनकी किताबें जितनी आनी  चाहिए थीं, नहीं आयीं। 'जबड़ों की छाँह में ' ,  उत्तर दो यक्ष ' (कविता संग्रह ), तीन-तरह लोग (  कहानी संग्रह ), 'गांधी नहीं मरेगा '( नाटक संग्रह) उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं। उनकी अनेक रचनायें अप्रकाशित हैं : कोई एक सूरज(उपन्यास), टिकोरा(मगही कवितायेँ), तथा दो नाटक संग्रह। उनकी प्रतिबद्धता इन पंक्तियों में झलकती है :'झोंपड़ों पर फूस हम कुछ और देंगे /  सरकंडे, खमाची , बांस-बल्ले /  और बंधन बांधकर अपनी नसों के/ सृजन को  हम  एक नया आयाम देंगे ,/इसलिए कि सिरजना ही है / सहज अभ्यास अपना। '
निजी तौर पर मैं उनकी आलोचकीय दृष्टि  का कायल रहा हूँ।  सौभाग्य मानता  हूँ कि मेरी अनेक रचनायें उनकी नज़रों  गुजरीं। दिसंबर 12 में पूरा हुए और अबतक अप्रकाशित उपन्यास का उन्हें बहुत इंतजार था।  आखिर उनका कहा सच हुआ : 'लगता है कि मेरे जाने के बाद ही आपका उपन्यास आएगा !' चौहत्तर आंदोलन की परिवर्तनकामी  धारा पर केंद्रित यह उपन्यास, काश अबतक आ गया होता, मुझे यह अफ़सोस न रहता ! बने रहेें हिंदी के प्रकाशक , और उनके काबिल 'विशेषज्ञ '! उनकी सत्ता व साम्राज्य बना रहे!
परेश जी एक ओर आंदोलन में सक्रिय थे तो दूसरी ओर श्रमसंघ गतिविधियों में भी शामिल थे। 1975 की रेल हड़ताल में उन्हें जेल जाना पड़ा। वे पटना के फुलवारीशरीफ कैम्प जेल में रहें। छूटे तो आपातकाल का समय था। उन्हें फौरन भूमिगत होना पड़ा। इस दौरान वे जगह-जगह घूमते रहे और बम्बई में खासा वक्त बिताया। इसी दौर में उनकी कमलेश्वर से नजदीकी हुई और संभवतः उनका सहयोग भी प्राप्त हुआ। जबकि कमलेश्वर की लाईन एकदम अलग, बल्कि उल्टी थी। कवि गोपीवल्लभ सहाय उनके घनिष्ठ मित्र थे। परेश जी गोपीवल्लभजी के निधन के बाद उनकी पुण्यतिथि पर साहित्यिक आयोजन करते थे। कई वर्षों तक यह क्रम चला, बाद में स्वास्थ्य गिरने लगा तो यह क्रम भंग हुआ।
परेशजी उन्माद की राजनीति से व्यथित रहते थे और करुणा पर आधरित क्रांति की कल्पना करते थे। नब्बे के दशक में हुए सत्ता परिवर्तन से उन्हें बहुत उम्मीदें थी लेकिन शायद तभी उनमें यह स्वीकार जगा - ‘राजा तो राजा ही होगा, राजवंश का हो न हो/ प्रजा दलित शोषित ही होगी, राज कंस का हो ना हो...’


 मैं जब अशोक नगर, कंकड़बाग में रहता था तो उनसे अक्सर मिलना होता रहता था। मोहल्ला छूटा तो मुलाकातें भी कम हो गई। पिछले जाड़े में जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी के मित्र चक्रवर्ती अशोक प्रियदर्शी के साथ उनसे मिलने गया था तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था - ‘अरे, मेरे देवता आ गए!’ देर तक उनसे बातें होती रही। उनके साथ हमने फोटो भी खिंचाई। बाहर निकले तो घर के बाहर निकलकर वे तब तक हमें हाथ हिलाते रहे जबतक कि हम गली से बाहर नहीं निकल गए। हमारा मन भर आया।
एक-ढेड़ महीना पहले मुकेश प्रत्यूष जी से खबर मिली - परेशजी अस्पताल में हैं। मैं भगवती प्रसाद द्विवेदी के साथ उन्हें रेलवे स्पेशियलिटी अस्पताल में उन्हें देखने गया। वे कष्ट में थे, बेचैन थे। कुछ देर की बातचीत के बाद लेटे-लेटे हाथ जोड़ दिए - ‘चलने का वक्त लगता है, आ गया है, गलती-सलती सब मापफ कीजिएगा!’ उनके चेहरे पर अभी तेज था, हमने उन्हें भरोसा दिलाया कि वे जल्दी स्वस्थ होकर घर चले जाएंगे।
बाद में उन्हें दिल्ली ले जाया गया जहां पर गंगाराम अस्पताल में इलाज के दौरान 15 जुलाई, 2015 को उनका निधन हो गया। अपने पीछे वे भरा-पूरा परिवार छोड़ गये हैं। और छोड़ गये हैं अपनी अनेक अप्रकाशित रचनाएं।

समाजवादी आंदोलन के एक और पुरोधा चले गए। इतने विचारशील  उतने ही हंसमुख , निस्पृह और मिलनसार परेशजी  अनुपस्थिति बहुत खलेगी। यह रिक्ति कभी भर नहीं सकती। उनकी स्मृति को  प्रणाम्।
-शिवदयाल





Saturday, 27 June 2015

फेसबुक (26 जून 2015 ) से....


' फिर भी '
मुझे कुछ नहीं चाहिए
मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए
तुम चाहो तो
मुझसे जो कसम ले लो....

हाँ मैं सोचता हूँ फिर भी
और देखता हूँ -
पेड़ और हवा
पंछी और आकाश..
और इसमें
तुम्हारा क्या जाता है !
        - शिवदयाल

Navneet Sharma ,धर्मशाला 
आ. भाई साहब।
प्रणाम।
कैसे लिखते हैं आप और कहां से लिखते हैं।

यह कविता बहुत बार पढ़ी। बहुत अच्‍छी लगी।
प्रस्‍तुत है पहाड़ी अनुवाद।
सादर
नवनीत

'फिरी भी'

मिंजो किछ नी चाहिदा
मिंजों तिज्‍जो ते किछ नी चाहिदा
तू चाहे ता
मिंजो ते सगंद चकाई लैह्

हां मैं सोचदा फिरी भी
कने दिखदा
रुख कने होआ
पंछी कने गास
कने इस च
तेरा क्‍या जांदा !
     - शिवदयाल

Thursday, 14 May 2015

 हिमालय में होने का सुख
                                                                                                                               -शिवदयाल
( यह लेख 1994 में पटना से प्रकाशित 'खबरनामा ' के प्रवेशांक में प्रकाशित हुआ था। आज इस ललित निबंध की प्रासंगिकता बन आई है,  इसमें व्यक्त आशंकाएँ आज सही सिद्ध हो रही हैं।  अविकल रूप में मूल लेख प्रस्तुत है।  )
फेवा लेक ,अन्नपूर्णा रेंज , पोखरा , नेपाल

हिमालय का ख्याल आते ही कितने सारे अहसास, कितनी सारी अनुभूतियाँ मन में एक ही साथ आ बैठती हैं। मानो हिमालय हिमशिखरों की शृंखला का नाम मात्र न हो प्रत्युत हमारे अस्तित्व, हमारे जीवन-स्पंदन का ही विस्तार हो, या कि स्वयं हम ‘पौरुष’ के उस ‘‘पूँजीभूत ज्वाल’’ का ही एक लघु अंश हों। यह भारतीय मन है ! जिसने जीवन में कभी हिमालय नहीं देखा वह भी हिमालय को इस तरह जानता है जैसे उसे अलग से छूने, देखने, साक्षात् अनुभव करने की जरूरत न हो; क्योंकि हिमालय तो है ही अपने संपूर्ण विस्तार, सौन्दर्य व दिव्यता के साथ स्वयं उसके अंदर बसा हुआ ! इसीलिए हिमालय भारत के भू-राजनीतिक मानचित्र का हिस्सा नहीं है बल्कि हमारी जातीय स्मृति, चेतना और मिथकों की आधारभूमि भी है। भारतीय अस्मिता के साथ हिमालय इस तरह गुँथा हुआ है कि जैसे वह भारत का ही पर्याय हो।

हिमालय को किस-किस रूप में देखा जाए - किन-किन संदर्भों व छवियों में ! हिमालय, यानी हिमशिखरों की वह धवल भूमि, तपोस्थली जहाँ देवता विचरते हैं, जो देवलोक गंगा स्वर्ग से उतर कर महादेव शिव की जटाओं में निवास बनाती है, जो अनेकानेक प्राणदायिनी नदियों-सरिताओं का उद्गम-स्थल है। हिमालय जिसके पार्श्व  में है कैलाश मानसरोवर-शिव-पार्वती की लीला-भूमि! हिमालय, यानी बौद्धों का महातीर्थ, जहाँ बौद्ध धर्म, संस्कृति और जीवन-शैली सैकड़ों वर्षों से जीवित है, गोम्पाओं, लामाओं का रहस्यमय लोक ! हिमालय में गूँजती है सिक्ख गुरूओं की पवित्र बानी। हिमालय, सच में इस संसार में जैसे अलग एक संसार है। मिाचल से अरूणाचल तक लगभग ढ़ाई हजार किलोमीटर लंबी, 500 कि.मी. चौड़ी व औसतन 8-10 हजार फुट ऊँची सधन वन-प्रांतरों, स्रोतों-सरिताओं तथा हिमशैलों से बनी एक अभेद्य  दीवार है हिमालय जो उत्तर की बर्फीली हवाओं को भारत में घुसने नहीं देता, जो बादलों को रोक कर अपने ही द्वारा निर्मित गंगा-जमुना के उर्वर मैदानों को सींचती है। हिमालय न होता तो यह जंबुद्वीप क्या होता, कल्पना करना भी कठिन है।
इन्हीं अर्थों में हिमालय में होना एक बिल्कुल अलग अनुभव है। इसमें रहते हुए, इसमें से गुजरते हुए एक विलक्षण अनुभूति होती है जो रागात्मक भी होती है और अलौकिक भी। कभी-कभी तो ऐसा लगता है जैसे हम स्वयं अपने अंदर चढ़ाई तय कर रहे हों अथवा ढ़लानों से फिसल रहे हों। जिन्होंने जीवन में सिर्फ टीलों को देखा है उन्हें एक बार हिमालय जरूर देखना चाहिए। ऊँचाई क्या चीज होती है, विराटता किसे कहते हैं - यह अहसास सिर्फ और सिर्फ हिमालय दे सकता है। पहली बार समुद्र देखना स्तब्ध करता है - उसकी निस्सीमता, उसकी गहराई और गर्जन एक क्षण को विमूढ़ बना देता है, शायद डरा भी देता है। पहली बार गगनचुंबी हिममंडित चोटियों को देख कर रोम-रोम में रोमांच भर जाता है, हम या तो चिल्ला पड़ते हैं या फिर जैसे प्रतिक्रिया करना ही भूल जाते हैं।

हिमाचल
हिमालय को देखने की कितनी ही प्रेरणाएं हो सकती हैं किन्तु यह सच है कि नैसर्गिक सौन्दर्य हिमालय का बहुत सशक्त पक्ष है। आमतौर पर एक सैलानी को उसका अप्रतिम सौन्दर्य ही अपनी ओर खींचता है। इसके लिए वह हिमालय से अरूणाचल तक कोई भी स्थान चुन सकता है। वह नेपाल और भूटान की यात्रा भी कर सकता है। कैलाश-मानसरोवर की यात्रा करके भी हिमालय को बहुत निकट से देखा-जाना जा सकता है। इस यात्रा का सबसे बड़ा रोमांच यह है कि इसमें हिमालय को लाँघ कर कैलाश-मानसरोवर से उसे ठीक दक्षिण में देखा जा सकता है। उस क्षेत्र के आस-पास सिन्धु व ब्रह्मपुत्र का उद्गम स्थल भी है। साथ ही वह दुलर्भ ‘ब्रह्मकमलों’’ का क्षेत्र भी है। वैसे पूर्वी राज्यों के सैलानियों के मनपसंद स्थान हैं - काठमांडू, पोखरा, दार्जिलिंग, कलिमपोंग, मिरिक, गंगटोक, शिलांग व काजीरंगा इत्यादि। इन दिनों अरूणाचल भी पर्यटन के नक्शे पर अपनी सशक्त मौजदूगी दर्ज करने लगा है। दार्जिलिंग से कंचनजंगा की सुनहली घटा जहाँ मुग्ध कर देती है वहीं सिक्किम अपने खूबसूरत लानों और रंगबिरंगे फूलों वाली वादियों के लिए मशहूर है। काठमांडू घाटी में गजब का सौन्दर्य है। काठमांडू के आस-पास कई पर्यटन स्थल हैं जिनमें भक्तपुर और पाटन प्रमुख हैं। इन दोनों स्थानों तक पहुँचने का सड़क मार्ग समतल किन्तु बहुत मनोरम है। काठमांडू से पोखरा की लगभग 200 कि.मी. की सड़क यात्रा वास्तव में रोमांचकारी है। पूरे सफर में काली नदी की फेनिल, उज्जवल किन्तु उग्र धारा आपके साथ चलती है। सड़क के एक ओर सघन वनों वाले ऊँचे पहाड़ तो दूसरी तरफ काली की वेगवती धार ! ऊँचे-नीचे सर्पिलाकार रास्ते पर हर पल रोमांच ! पोखरा के दसेक कि.मी. पहले ही आभास होने लगता है कि आप किसी ऐसे स्थान पर पहुँचने वाले हैं जिसे आपने कभी सपने में देखा था, या कि शायद सपने में भी नहीं देखा था! और यह लीजिए, ठीक सामने क्षितिज पर बादलों के ऊपर सर उठाए कौन झाँक रहा है ! कभी सुनहली, कभी गुलाबी तो कभी हल्की नीली घटा बिखेरते? शायद आपकी कार का ड्राइवर उस ओर देखने का इशारा करे और आप सहसा हिमजड़ित माछापुछरे पर्वत के एकदम समीप! पोखरा में पोखरे ही पोखरे हैं यानी झीलें ही झीलें, जैसा कि नैनीताल में है। पोखरा का नीरव, स्निग्ध सौन्दर्य सिर्फ महसूस करने की चीज है। वहाँ के फेवा ताल की प्रशांत विस्तीर्णता में माछापुछरे की परछाई और उस पर रह-रह कर बादलों की जुंबिश बस विमुग्धकारी है। किन्तु सच तो यह है हिमालय के किसी भी इलाके में नैसर्गिक सौन्दर्य छलकता है। उसकी विराटता, उसकी दिव्यता जैसे उसके कण-कण में मौजूद है।
लेकिन बदलते समय से हिमालय भी अछूता और बेअसर नहीं। हिमालय गर्म हो रहा है। न सिर्फ भौगोलिक व पर्यावरणीय दृष्टि से, बल्कि इस दृष्टि से कि हिमालय का ‘मानस’ उग्र हो रहा है। इसके पीछे अनेक कारण हैं और वं संभवतः परस्पराश्रित हो। अब जब कभी हिमालय जाएँ तो कुछ बातें ध्यान में रख लें - गंगोत्री ग्लेशियर वहाँ चल रहे ढाबों व आमदरफ्त के कारण गर्म हो रहा है; चेरापूँजी में अब छाता साथ रखने की कतई जरूरत नहीं; माउंट एवरेस्ट समेत अनेकों चोटियाँ पवर्तारोहण के पागलपन को झेलते-झेलते पस्त हो रही हैं; वहाँ कूड़े की समस्या पैदा हो गई है; पोखरा जैसे रमणीक पर्यटन स्थल का दिनोंदिन एक शहर के रूप में फैलते-पसरते जाना माछापुछरे पर्वत के साथ-साथ आस-पास के झीलों व वनस्पतियों के लिए संकट पैदा कर रहा है; दार्जिलिंग, कलिमपोंग, मिरिक की वादियों की नमी सूख रही है; साथ ही वहाँ रह-रह कर गोरखालैण्ड का सर्प फन बढ़ाता है; ब्रह्मपुत्र घाटी का सलोनापन उल्फा, बोडो जैसे उग्रवादी संगठनों ने छीन लिया है; गढ़वाल और कुमाऊँ अब भू-क्षरण का शिकार हो रहे हैं, वहाँ उत्तराखण्ड की हवा बह रही है, हिमाचल की सुरम्य घाटियाँ चूना-पत्थर की खदानों में तब्दील हो रही हैं और कश्मीर का हाल तो सबको मालूम है ! कभी-कभी घबराहट होती है - सदियों से अविचल तपस्यारत यह ध्यानमग्न वीतरागी क्या करवट बदलने वाला है? जिनके भी मन में हिमालय बसता है उन्हें इस यक्ष-प्रश्न से जूझना होगा और अपने स्तर से पहलकदमी की जमीन भी तैयार करनी होगी। पहाड़ों को समझने के लिए पहाड़ जैसा धीरज और हौसला रखना होगा।
यह सब होने के बावजूद हिमालय अब भी हिमालय है - प्रकृति की एक अनोखी, अनुपम कृति! लगभग ढाई हजार लंबी इस शुभ्र-श्वेत पट्टी पर प्रकृति ने कौन-कौन से रंग बिखेरे हैं यह सिर्फ देखकर और साक्षात् अनुभव करके ही जाना जा सकता है। लेकिन जब कभी हम हिमालय जायें तो एक क्षण के लिए भी भूले नहीं कि हम उसे सिर्फ अपनी श्रद्धा ही दे सकते हैं और इसमें हमारा अपना मंगल ही है। आखिर हिमालय भारत का ‘‘दिव्य भाल’’ है - उज्ज्वल और प्रशस्त !

  नव-चैतन्य के महावट - रवींद्रनाथ                                 - शिवदयाल  ब चपन में ही जिन विभूतियों की छवि ने मन के अंदर अपना स्थाई निवा...