Wednesday, 9 September 2015



                                                                                                                                     
                                बिहार : गतांक से आगे या पीछे
                                                                                                                           -शिवदयाल
                                                विडंबना और विरोधाभास बिहार की राजनीति का अभिन्न अंग है । बिहार काफी विकास कर चुका है, विकास के सभी मानकों पर, मुख्यमंत्री के अनुसार उसका प्रदर्शन ‘श्रेष्ठ’ रहा है, पिछले दस वर्षों में बिहार ‘स्वस्थ’ राज्यों की पंगत में शामिल हो गया है । लेकिन कोई भी तथाकथित विकसित राज्य अपने लिए विशेष दर्जे की मांग नहीं कर रहा है, जबकि बिहार इसकी जाने कब से रट लगाए है । भाई, जब सब कुछ ठीक–ठाक है तो किस बात पर, किस आधार पर विशेष दर्जा की माँग? अगर विशेष दर्जा चाहिए तो इसका मतलब  स्पष्ट है कि बिहार अभी भी एक पिछड़ा राज्य है (जो कि वह है ) । लेकिन पिछड़ा मान लेने से दो कार्यकालों  पर ही सवाल उठने लगेंगे, आगे चुनाव है, दिक्कत होगी । तो भले ही हम पिछड़े नहीं है, विशेष दर्जा तो हमें चाहिए ही चाहिए! चित भी मेरी पट भी मेरी!
                                           अब सत्रह साल के साथी रहे भाजपा पर भी तो यह दोष  तो  लगेगा कि आखिर आठ बरस के शासन में उसने किया क्या कि बिहार की हालत अब भी खस्ता है ? इसपर उसक यह विचित्र तर्क कि उसके सरकार में रहने तक तो ‘रामराज्य’ आ ही गया था, हटने के बाद राज्य दुर्दशाग्रस्त हो गया है ।
                राजद के शासनकाल में कभी पटना हाईकोर्ट ने किसी मामले पर टिप्पणी करते हुए राज्य में जंगल राज होने की बात कही थी । इतना प्रभावशाली विशेषण तो बिहार की राजनीति में राजद का घोर से घोर विरोधी  भी उसके लिए नहीं खोज पाया था, तो ‘जंगलराज’ के खात्मे के लिए जेडीयू’ और भाजपा ने एक–दूसरे का दामन थामा और आखिरकार 2005 में ‘सुशासन’ ले आए । बेहिचक भाजपा ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री स्वीकार कर लिया । जेडीयू के विधायकों की संख्या अधिक न होती तब भी शायद स्वीकार कर ही लेते। इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में उन्हें रेल मंत्रालय दिया जा चुका था ।
                पहला कार्यकाल अच्छा गुजरा । अभिशासन ;यानी  गवर्नेंस की दृष्टि से कई पहलकदमियाँ सामने आईं । कानून–व्यवस्था की स्थिति में सुधार हुआ, रात में भी सड़कें गुजलार रहने लगीं । पर्व–त्यौहारों में भीड़ उमड़ी। सभी सरकारी महकमे हरकत में आए । निर्माण (कंस्ट्रक्शन) गतिविधियों में इजाफा हुआ । वित्तीय क्षेत्र में योजना आकार कई गुणा बढ़ गया । कर ढाँचा विस्तारित हुआ । पुल–पुलियों का निर्माण हुआ । शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई कदम उठाए गए । प्राथमिक शिक्षा को समुन्नत बनाने;  साक्षरता, खासकर महिला साक्षरता में बढ़ोत्तरी के उपाय किए गए । शैक्षिक अधिरचना के विकास की दिशा में भी प्रगति देखने को मिली । महिला विकास को भी प्राथमिकता मिली – पंचायत में पचास प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान के अलावा भी बच्चियोें को साइकिलें और पोशाक का  प्रावधान  दिया गया । दूसरी ओर राज्य में स्वास्थ्य की दिशा में सुधार द्रष्टव्य हुआ । अनेक अस्पतालों को समुन्नत किया गया । प्राथमिक चिकित्सालय व्यवस्था को बेहतर बनाया गया, डॉक्टरों की उपलब्धता   सुनिश्चित की गई और दवाइओं  का भी इंतजाम किया गया । सबसे बड़ी बात कि केन्द्रीय योजनाओं के रहते राज्य की अपनी योजनाएँ एक कार्यक्रम शुरू किए गए बिहार ओर इसके नेतृत्व की देश भर में चर्चा हुई।
                                तो पहले कार्यकाल ने सचमुच फर्क पैदा किया था,सो बिहार की जनता ने दूसरा कार्यकाल और मजबूती के साथ दिया । जेडीयू-भाजपा की जोड़ी जम गई । एक समय कुछ विश्लेषकों ने बिहार को सबसे तेज वृद्धि वाला राज्य भी घोषित कर दिया । नीतीश  कुमार ‘पी एम मैटेरियल’ बताए जाने लगे । कुछ लोग किसी गैर भाजपाई के  प्रधानमंत्री बनने की संभावना देख रहे थे, उनके हिसाब से गठबंधनो  का दौर अभी जारी रहने वाला था, और यहाँ नीतीश भाजपा सहित अन्य दलों की स्वाभाविक पसंद बन सकते थे । नीतीश की दृष्टि से देखें तो उनके जैसे एक क्षेत्रीय, वह भी एक राज्य में सीमित दल के नेता के लिए इससे बड़ा मौका  हो नहीं सकता था । भाजपा के साथ उन्हें रेलमंत्री और फिर बिहार का मुख्यमंत्री बनने का अवसर सुलभ हो चुका था ।
                                भाजपा की रणनीति लेकिन कुछ और थी । आडवाणी के बाद की पीढ़ी के नेताओं ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को तुरूप के पत्ते के रूप में इस्तेमाल किया । पहली बार संसदीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री चुनने का हक संसदीय दल से छीनकर, पद का दावेदार पहले से घोषित कर दिया गया । बिहार के मुख्यमंत्री को यह नागवार गुजरा उन्होंने इसी आधार  पर भाजपा के साथ सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया । कारण बताया  गया, मोदी की उग्र आक्रामक छवि को  । बिहार की जनता ने 2015 और 2010 में एनडीए को सत्ता सौंपी थी, नीतीश जी ने उसमेें से भाजपा को बाहर निकाल फेंका और इस तरह ‘मैंडेट ’ एक तरह से हथिया लिया । यह उन्होंने नये सहयोगी जुटाकर, बिना चुनाव में गए जदयू  की सरकार बना ली, और खुद को नीतिवान नेता और   धर्मनिरपेक्षता का चैंपियन भी घोषित किया!
                                             बात बनी नहीं । सारा दाँव उल्टा पड़ा । राजीव  गांधी के बाद पहली बार नरेन्द्र मोदी ने भाजपा को अकेले बहुत दिलाकर दिल्ली में सरकार बना ली । अब नीतीश कुमार ने खुद को ‘नैतिक’ रूप से ऊँचा सिद्ध करने के लिए एक और दाँव खेला, अपने एक सहयोगी जीतनराम माँझी को मुख्यमंत्री पद सौंप दिया और दावा किया कि पहली बार एक महादलित को उन्होंने मुख्यमंत्री बनाया है । माँझी ‘खड़ाऊँ राज’ वाले भरत साबित  नहीं हुए।  उनके मुताबिक उन्होंने अपने हिसाब से काम करना शुरु किया जो उनके दल के नेताओं को रास न आया । उन्हें मुख्यमंत्री पद से एक तरह से जबरन हटा दिया गया जबकि  चुनाव में मात्र सात–आठ महीने बचे थे । इससे राज्य में एक और नेता, दलित नेता पैदा हो गया । इसका श्रेय नीतीश कुमार को देना चाहिए । यही वह बिन्दु है जहाँ एक महा गठबंधन  की जमीन तैयार हुई जिसमें ‘दो शत्रु’ एक साझे ‘शत्रु’ के मुकाबले के लिए ‘मित्र’ हो गए । विडंबना और विरोधाभास ! जिनके तथाकथित ‘जंगलराज’ से मुक्ति  दिलाने के लिए बारह साल तक  लगातार जूझते रहे उनका साथ लेकर अपने सत्रह साल तक साथ रहे सहयोगी के खिलाफ मोर्चा । ‘पीएम मैटेरियल’ नीतीश कुमार के साथ मुश्किल यह है कि वे अपने दम पर, अकेले कभी राजनीति नहीं  कर सके । पहले उन्होंने लालू प्रसाद का साथ लिया , 1993 में उनसे अलग होकर जार्ज फर्नांडीज के साथ समता पाटी बना ली । यही समता  पार्टी एनडीए का हिस्सा हो गई, यानी भाजपा की साझेदार बन गई । अब सत्रह साल के बाद भाजपा से अलग होने के बाद पुनः लालू जी के साथ रहने की मजबूरी ! अगर अपने काम से – दस साल के काम से सचमुच उन्होंने बिहारियों का दिल जीता है, उन्हें नई पहचान दी हे तो  उन्हें अकेले चुनाव में आने का दम दिखाना चाहिए था, वह भी ऐन भाजपा से अलग होने के बाद ।
                              पैकेज और पैकेजिंग की बात बहुत होती है । आज की राजनीति का यह बाजादवादी तौर–तरीका है, जिसे या तो मान लेना चाहिए था फिर  उससे अलग रहना चाहिए । इसका विरोध करते परोक्ष रूप से आप भी वही काम करें तो  यह नहीं चल सकता । बिहार का अतीत, बिहार की अस्मिता या पहचान, बिहारीपन, बिहारी राष्ट्रीयता, बिहार की हकतलफी, बिहार का विकास, बिहार को विशेष  राज्य का दर्जा, बाल-नाखून  का नमूना -  यह भी एक प्रकार की पैकेजिंग ही है । बिहार को अपने अंदर देखने की जरूरत भी है । लेकिन बिहार में अपने से बाहर देश–दुनिया को देखने की विरासत रही है । अगर बिहार सचमुच रास्ता दिखाने वाला राज्य है तो इसका कारण यही है, और आत्मकेन्द्रित राजनीति से इसकी यह ऐतिहासिक भूमिका भी जाती रहेगी ।
                                बिहार पिछले सालों में बदला नहीं है, ऐसा नहीं है । संपर्कता बढ़ी है, ठेकेदारोें–बिल्डरों की बदौलत शहरों–कस्बों में रौनक बढ़ी है । नई इमारतें  बनीं हैं । विकास, भले ही वह उद्योगों के रास्ते न आया हो, अपनी चमक  तो  दिखा रहा है ।बिजली वायदे वायदे के मुताबिक 2015 तक तो नहीं आई , अब फिर 2016  गाँव-गाँव बिजली पहुँचाने का वादा ! जमीन की कीमतें आसमान छू रही हैं । अपना आशियाना साधारण आदमी के औकात के बाहर की चीज है। पटना धनकुबेरों का शहर बन गया है । ‘सुशासन’  और ‘विकास’ का एक परिणाम यह जरूर आया है कि मध्यवर्ग अथवा खाने–कमानेवाले लोगों की, श्रमजीवियों की सम्पत्ति धारण करने की क्षमता जाती रही । वे अब पटना ही नहीं, बिहार के किसी भी शहर में सम्पत्ति खरीदने की औकात नहीं रखते । औकात उनकी है और बढ़ रही है जिनके पास पहले से जमीन है । इस अर्थ में बिहार में जो मध्यवर्ग, कामकाजी वर्ग खड़ा हो रहा था वह हाशिये पर चला गया है । उसकी कहीं कोई आवाज नहीं है । यह वर्ग अब सरकारी लाठी खानेवाला वर्ग बन गया है । इस वर्ग की संपत्तिहीनता का गहरा प्रभाव बिहारी समाज और अर्थव्यवस्था पर होना है ।
 बिहार में पूंजी आई है लेकिन  उस तक पहुँच प्रायः उनकी बनी है जिनके पास पहले से पूंजी थी, या फिर उनकी जिन्होंने अवैध  ढंग से इसे हासिल किया । बिहार में राजनीति ही नहीं, पूरी  व्यवस्था में गहरे अंतविरोध  झलकते हैं । नई शिक्षा संस्थाएं खुलीं और जो पहले से चल रही थीं, वो गर्त में चली जा रही हैं । प्राथमिक शिक्षा को प्रसार व व्यापकता तो  किसी हद तक मिली लेकिन गुणवत्ता सिरे से गायब! माध्यमिक शिक्षा का तो कोई नामलेवा नहीं बचा । हाल ही में दसवीं की परीक्षा का आँखों देखा हाल दुनिया के सामने आया । उच्च शिक्षा की स्थिति दयनीय है । इतनी समर्थ सरकार आज तक विश्वविद्यालय शिक्षकोें की नियुक्ति नहीं कर सकी । तकनीक शिक्षा में भी शिक्षकों का घोर अभाव है । अधिरचना का तो है ही । तो परिणाम यह कि बच्चे आज भी बाहर जाने के लिए मजबूर हैं, जैसे कि बेरोजगार और मजदूर मजबूर हैं । बिहार की व्यवस्था के मारे लोग अलग–अलग महानगरों में अलग–अलग बिहार बना रहे हैं और अब तो उनकी यह स्थिति हो गई है कि वे बाहर बैठे रहकर  भी चुनावी परिणामों में अंतर पैदा कर सकते हैं, लिहाजा उन्हें भी लुभाया जा रहा है । जलावतनी को यहाँ के सत्ताधारी वर्ग और समाज ने स्वीकार कर लिया है । मध्य , उच्चमध्य वर्ग में तो यह प्रतिष्ठा का पैमाना भी बन गया है, कोई अपने बच्चो को बिहार में नहीं देखना चाहता । यह गर्व की बात है कि उनका बच्चा बिहार के बाहर है । यह ‘बिहारी स्वाभिमान’ का एक और पक्ष है ।
                                                            सुशासन काल का एक और प्रभाव विचलित करने वाला है, बिहारी संस्कृति में   दारु  संस्कृति ने खूब  अच्छी पैठ बनाई है । कहा गया पीने वाले मजे में पिएँ, इस सरकार को टैक्स देते रहें । राज्य में कराधार  बढ़ाने का प्रमुख माध्यम शराब को बनाया गया । गाँव–गाँव में दुकानें खुल गईं । स्कूलों–कॉलेजों–अस्पतालों के आस–पास भी । सुशासन में एक नया आयाम जुड़ा नशाखोरी का । आश्चर्य कि महिला सशक्तीकरण के लिए आगे बढ़कर काम करने वाली सरकार शराबखोरी को किस प्रकार बढ़ावा दे सकी । और हाँ, इस नीति को बनाने–चलाने में भाजपा बराबर की भागीदार रही हैै । आज महिलाओं से सौदेबाजी हो रही है कि अगर पुनः सत्ता मिल गई तो शराब राज्य में प्रतिबंधित  कर दी जाएगी, वरना तो उसे जारी ही रहना चाहिए!
                                                बिहार में प्राचीन गौरव, विरासत और धरोहर की बात बहुत होती है । अभी हाल में पटना के पुराने संग्रहालय के रहते हाईकोर्ट के निकट एक विशाल बिहार म्यूजियम का निर्माण चार–पांच सौ करोड़ रुपये की लागत से किया गया जिसे उच्च न्यायालय ने गौरवाजिब और गैरजरूरी बताया । म्यूजियम के निर्माण के लिए ब्रिटिश काल के /रोहरों–पुराने विशाल बंगलों को नष्ट कर दिया गया । इसके पहले पटना जंक्शन के पास फ्रेज़र रोड स्थित पटना सेंट्रल जेल को तोड़कर बुद्ध स्मृति पार्क का निर्माण कराया गया । स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियोें को संरक्षित रखने वाली इस महत्वपूर्ण धरोहर को समूल नष्ट कर दिया गया, उसका कोई अंश संरक्षित नहीं रखा गया । जेल के अंशों का समावेश करते हुए कायदे से यहाँ वाणिज्य केन्द्र स्थापित किया जाना चाहिए चाहिए था। बुद्ध स्मृति पार्क किसी किसी शांत , रमणीक स्थान पर बनाना श्रेयस्कर होता।  लेकिन सरकार की जिद है कि नया निर्माण पुराने धरोहरों को नष्ट करके ही होगा । पटना में विरासत और  धरोहर के नाम पर जो कुछ बचा हुआ है वह उपनिवेश काल का नया पटना रराजधानी क्षेत्र ही है । इसे संरक्षित करके शहर को बाहर फैलाना बढ़ाना था । आने वाली पीढ़ियां इस सुंदर इलाके को उसके मूल स्वरूप में देख पातीं! लेकिन अब नजर ‘हेरिटेज’ कालोनी ‘का हक पाने के लिए हर तरह से उपयुक्त ब्रिटिशकाल में बाबुओं लिए बने  हरे-भरे खूबसूरत मोहल्ले गर्दनीबाग को ‘विकसित’ करने, यानी नष्ट करने का है ।उपनिवेशकालीन संरचनाएं बेशकीमती जमीनों पर आबाद हैं , इनपर विकास के कर्णधारों-पैरोकारों की नजर है। पटना का वर्तमान स्वरुप बदल जाना है , उन  इलाकों को  छोड़  जहाँ  सत्ताधारी वर्ग बसता है। बौद्धिकों  का शहर चुप है, जैसे कि वह गांधी  मैदान की जकड़बंदी पर चुप रहा । मगध  महिला कॉलेज की लड़कियों ने आवाज उठाई तो किसी तरह उनका रास्ता बच गया । वहाँ विशाल ‘द्वार’ बन रहा है । बिहार में बिल्डर और ठेकेदार, विकास के अग्रदूत हैं, नेता–अफसर इनका पथ बुहार रहे हैं, मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं !
                बिहार के विकास की बोली लग रही है। केंद्र और राज्य  सरकारें जैसे होड़ कर रही हैं । बिहार में चाहे यह सरकार रहे या जाये, आने वाले वर्षों में पैसा बहुत आएगा, लेकिन उनका सदुपयोग राज्य और राज्य की जनता के हक में हो पाएगा इसकी संभावना कम है । इसके लिए जिस कार्य संस्कृति और उत्तरदायी तंत्र की दरकार होती है वह अब भी नदारद है । नैतिकता तो छोड़िए, कानून और  सरकार का मामूली खौफ तब प्रशासन में नहीं दिखाई देता । दिखावे के लिए आए दिन छोटे–बड़े मुर्गे पकड़े जाते रहते हैं, अंदरखाने का खेल चलता ही रहता है ।
                जिन मुद्दों को चुनावों के लिए उछाला जा रहा है, जनता, खासकर युवाओं की शायद ही उसमें कोई रूचि है । रोजगार , आजीविका उनकी प्राथमिक जरूरत है।  जिधर उन्हें इसकी गारंटी  सम्भावना दिखेगी , उस ओर वे जाएंगे। दलों को लगता है कि आखिरकर जाति का ‘अमोघ’ अस्त्र की काम आने वाला है । कोशिश जारी है । एक और बात तय है कि बिहार प्रचलित, या चालू विकास के रास्ते को ही अपनाने वाला है, इसे चुनौती देने और एक वैकल्पिक रास्ते के संधान की इच्छाशक्ति प्रतिरोध  की धरती  कहे जाने वाले इस सूबे में शायद ही बची है । वैसे राजनीतिक दृष्टि से बिहार के चुनाव अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं । एनडीए इसे अपनी झोली में डालने के लिए एड़ी–चोटी का जोर लगाएगा,इसे हासिल किये बिना उसका अश्वमेध पूरा नहीं होगा।  जबकि यह अंतिम किला किसी भी तरह बच जाए, इसके लिए राजद–जेडीयू–काँग्रेस कुछ भी उठा न रखेंगे । राजद-जदयू 'मंडल' को  पुनर्जीवित कर  भाजपा  को  'कमण्डलवाद ' में परिसीमित कर  बड़ी कॉन्स्टीटूऐंसी बनाना चाहते हैं। यह 2005 में शुरू हुए 'समरसता ' और 'समवेशिता ' से आगे (या कि पीछे !) का मुकाम है !  इन दोनों गठबंधनों की लड़ाई में कुछ हासिल करने के लिए वामदलों का मोर्चा भी पूरी ताकत झोंकने के लिए तैयार है । देखना यह है कि क्या वास्तव में यह चुनाव कमंडल–मंडल के बीच है, या कि चुनाव के बाद यह राजनीति इतिहास की बात हो जाने वाली है!
                ('सबलोग', दिल्ली के सितम्बर 2015 अंक में प्रकाशित। )




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