'ओसारा '
- शिवदयाल
वह घर
कभी घर नहीं लगा
जिसमें एकदम से
हो जाते हैं अंदर
और अन्दर से
एकदम बाहर
अंदर और बाहर का
संधिस्थल है ओसारा
अंदर और बाहर आकर मिलते हैं
ओसारे में
बाहर से आए तो
जरा देर पसीना सुख लिया
और बाहर निकलते-निकलते
थोड़ा रुक कर
मौसम का मिजाज पढ़ लिया
वैसे भी उचटे मन को
ओसारे का आसरा रहता है
ओसारा
न कोरा स्याह है
न कोरा सफेद
धूसर रंगवाला
यह वह इलाका है जहां
अन्य रंगों के लिए
सम्भावनाएं जन्मती हैं
यह जीवन जैसे
बिन ओसारे का घर..

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