लिफाफा'
- शिवदयाल
दूसरों के
संदेश-पांती ढोता रहा
और ऊंचा अपने को आंकता रहा
मैं धारक
उससे बड़ा नहीं हो सकता था
जिसे मैंने धारण किया था
मैं निमित्त उससे
महती नहीं हो सकता था
जो मेरा हेतु था
अपनी तो महिमा
उतने अक्षरों से बनी थी
जितने में पानेवाले का
नाम-गाम लिखा था..
उन अक्षरों के प्रति
श्रद्धा बरतनी थी!
जो फाड़ा गया
तो पड़ा हूं कूड़ेदान में
अपने हेतु से विछिन्न
अभिप्राय से हीन...
जिसे ढोता आया
जतन से, वह पत्र
सहेजा गया होगा कहीं
- इतनी-सी आशा
इतनी आश्वस्ति!
- शिवदयाल
No comments:
Post a Comment