आरक्षण: नई वैचारिकी की जरूरत
- शिवदयाल
अगर अनुसूचित जाति/जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण व्यवस्था का लाभ इन्हीं वर्गों के दस-पंद्रह प्रतिशत सम्पन्न लोग ही उठा रहे हैं, और दूसरी ओर प्रभुत्वशाली जातियाँ अपने लिए आरक्षण की माँग करती सड़कों पर आ गई हैं; अगर दलित लड़की यूपीएससी टाॅपर बन रही है, और दसवीं-बारहवीं में लड़कियाँ ही अव्वल आ रही हैं; अगर स्वयं दलित एवं पिछड़े वर्ग के नेता एवं बुद्धिजीवी भी अब मानने लगे हों कि साधन-सम्पन्न लोगों को आरक्षण सुविधा या लाभ का साधनहीन लोगों के पक्ष में परित्याग कर देना चाहिए, तो निश्चित रूप से यह आरक्षण-नीति की समीक्षा का समय है। वैसे भी एक सरकारी नीति की समीक्षा एक रूटीन सरकारी कार्य है, कोई ‘अनहोनी’ नहीं।
जिसे सत्ता में भागीदारी के रूप में प्रचारित किया जाता है, वह दरअसल नौकरशाही व्यवस्था में भागीदारी का मामला है, यानी सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी। भारत में सरकारी नौकरियों का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। अंग्रेजों ने भारत में केन्द्रीय सत्ता का निर्माण किया सन् 1858 में, वह भी ब्रिटिश राजसत्ता के अधीन। उसके पहले ईस्ट इंडिया कम्पनी की कलकत्ता, मद्रास, लखनऊ, बाॅम्बे आदि प्रेसिडेंसियों के माध्यम से हुकूमत चलती रही थी जो उसने 1757 में पलासी के युद्ध में मात्र बाइस सैनिक खोकर शुरू की थी। इतने बड़े भू-भाग पर शासन चलाने के लिए कम्पनी को भी आखिर एक नौकरशाही प्रणाली का निर्माण करना था। उस दौर में ही भारत में ही पहली बार ‘प्राइवेट सेक्टर ब्यूरोक्रेसी’ अस्तित्व में आई। कम्पनी की नौकरी के अलावा देशी रजवाड़ों-रियासतों में कुछ नौकरियाँ थी जिनमें सैन्य कार्य ही प्रमुख था, इसके लिए बहुत पढ़े-लिखे लोगों की जरूरत नहीं थी। इन रियासतों में सरकारी कामकाज करने वाले आमतौर पर लिखने-पढ़ने की परंपरागत योग्यता रखनेवाले लोग थे, जो जातीय दृष्टि से देखें तो गिनती के जाति-समुदायों से आते थे। उन्नीसवीं सदी में पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान से परिचय, सुधार आंदोलनों तथा आधुनिक उद्योग-धंधों के पनपने के साथ ही संचार साधनों के विकास के कारण भारत में बाबुओं, यानी किरानियों एवं श्रमिकों के एक नये नौकरीपेशा वर्ग का निर्माण हुआ। इस नये वर्ग में स्वाभाविक तौर पर वर्चस्व उनका बना जो परम्परागत रूप से शिक्षित थे और राजकाज की परम्परागत भाषा के अतिरिक्त अंग्रेजी भी पढ़-लिख सकते थे। इनमें से ज्यादातर लोग शहरी पृष्ठभूमि से थे क्योंकि ग्रामीण भारत में उस काल की कसौटी पर भी शैक्षिक अधिरचना प्रायः अनुपस्थित थी। पढ़ना-लिखना प्रायः परम्परागत एवं अनौपचारिक था और बहुत थोड़े लोगों तक सीमित था। उसमें अक्षर-ज्ञान, धर्म-तत्व ज्ञान तथा स्थानीय कौशलों का समावेश था। सवर्ण जातियों में भी बहुत कम लोग पढ़ते-लिखते थे, और ज्यादातर तो नौकरी को हिकारत से देखते थे। वास्तव में आज के तथाकथित सवर्णों की चार-पांच पीढ़ी पीछे चलें तो निरक्षरों का साम्राज्य मिलेगा।
तो उस समय से लेकर स्वतंत्रता-प्राप्ति तक शैक्षिक स्थिति का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1947 में देश में बारह प्रतिशत साक्षर थे। आम भारतीय गरीब और साधनहीन था। फिर विचारणीय प्रश्न यह है कि कौन पढ़ रहा था, और किसलिए? क्या उच्च जातियों में ही शिक्षा का स्तर उच्च था? क्या उच्च जाति के लोग ही आधुनिक शिक्षा और नौकरी के प्रति उन्मुुख और आकर्षित थे? क्या उनकी स्त्रियाँ शिक्षित थीं? क्या ब्राह्मण ही शत-प्रतिशत शिक्षित थे? हाँ, आधुनिक शिक्षा के दायरे में प्रवेश करने वालों में मुख्यतः ब्राह्मण, कायस्थ और मुसलमान थे। शिक्षा के लाभ और नौकरी की सुरक्षा के प्रति धीरे-धीरे अन्य लोगों, जाति-समूहों का भी आकर्षण बना और वे भी इनका अनुकरण करने लगे। यही कारण है कि स्वतंत्राता-प्राप्ति के बहुत बाद तक बिहार और उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में उच्च जातियों के अंदर भी ब्राह्मणों एवं कायस्थों का वर्चस्व रहा जो बाद में राजपूतों, भूमिहारों व वैश्यों से टूटा। कालांतर में शिक्षा और रोजगार में अन्य जातियों की उपस्थिति और प्रतिनिधित्व में इजाफा हुआ, खासकर सरकारी नौकरियों में पहले अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों की, और बाद में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग, कोटि में आनेवाली जातियों की। भले ही आरक्षण के बिना पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व कम होता लेकिन ये होतीं जरूर क्योंकि वे भी धीरे-धीरे शिक्षा और नौकरी की परिधि में अपनी जगह बनाती जा रही थीं, जैसे कि स्वयं कुछ उच्च जातियाँ।
1858 में गवर्नमेंट आॅफ इंडिया ऐक्ट के मार्फत भारत को ब्रिटिश राजसत्ता के अधीन लाने के पश्चात ही ‘सरकारी नौकरी’ की अवधारणा अस्तित्व में आई। इसके पहले तो लोग ‘कम्पनी’ की नौकरी करते थे। पहले शासन के निचले स्तर पर ही देसी, यानी भारतीय लोगों का प्रवेश था। बाद में आरजुओं-भिन्नतों के बाद मध्य स्तर के प्रशासन में भी भारतीय नियुक्त होने लगे। सन् 1861 में इंडियन सिविल सर्विस(आइ.सी.एस.) जो कि पहले इम्पीरियल सिविल सर्विस (लार्ड कार्नवालिस जन्मदाता) के नाम से जानी जाती थी, की परीक्षा में भारतीयों को शामिल होने की अनुमति मिली। सत्येन्द्र नाथ टैगोर पहले भारतीय आइ.सी.एस. बने। वे महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर के पुत्र तथा गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के बड़े भाई थे। इस स्तर पर शासन में भागीदारी का एक दिलचस्प आंकड़ा यह है कि 1861 से लेकर सन् 1900 तक बारह भारतीय आइ.सी.एस. हुए। इनमें नौ केवल बंगाली थे (छह ब्राह्मण एवं तीन कायस्थ), एक असमी, एक दक्षिण भारतीय और एक मध्यभारत के राज परिवार के व्यक्ति दीवान टेकचंद थे। 1900 से 1947 के बीच पाकिस्तान को चुननेवालों को छोड़कर सत्ताइस और भारतीय आइ.सी.एस. बने। इस दौर में भी बंगालियों का वर्चस्व कायम रहा, गोकि दूसरे नंबर पर दक्षिण भारतीय रहे। इनके बाद ही उत्तर भारतीयों का नंबर था। 1949 में सरदार पटेल ने आइ.सी.एस. अफसरों की ‘निष्पक्षता’ एवं ‘ कर्तव्य परायणता’ को देखते हुए इस सेवा संवर्ग को स्वतंत्र भारत में भी जारी रखने का फैसला लिया। आगे चलकर अखिल भारतीय सेवाओं (केन्द्र सरकार) एवं राज्य स्तरीय सेवाओं की प्रणाली के तहत नौकरशाही तंत्र का विकास हुआ।
- शिवदयाल
अगर अनुसूचित जाति/जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण व्यवस्था का लाभ इन्हीं वर्गों के दस-पंद्रह प्रतिशत सम्पन्न लोग ही उठा रहे हैं, और दूसरी ओर प्रभुत्वशाली जातियाँ अपने लिए आरक्षण की माँग करती सड़कों पर आ गई हैं; अगर दलित लड़की यूपीएससी टाॅपर बन रही है, और दसवीं-बारहवीं में लड़कियाँ ही अव्वल आ रही हैं; अगर स्वयं दलित एवं पिछड़े वर्ग के नेता एवं बुद्धिजीवी भी अब मानने लगे हों कि साधन-सम्पन्न लोगों को आरक्षण सुविधा या लाभ का साधनहीन लोगों के पक्ष में परित्याग कर देना चाहिए, तो निश्चित रूप से यह आरक्षण-नीति की समीक्षा का समय है। वैसे भी एक सरकारी नीति की समीक्षा एक रूटीन सरकारी कार्य है, कोई ‘अनहोनी’ नहीं।
जिसे सत्ता में भागीदारी के रूप में प्रचारित किया जाता है, वह दरअसल नौकरशाही व्यवस्था में भागीदारी का मामला है, यानी सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी। भारत में सरकारी नौकरियों का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। अंग्रेजों ने भारत में केन्द्रीय सत्ता का निर्माण किया सन् 1858 में, वह भी ब्रिटिश राजसत्ता के अधीन। उसके पहले ईस्ट इंडिया कम्पनी की कलकत्ता, मद्रास, लखनऊ, बाॅम्बे आदि प्रेसिडेंसियों के माध्यम से हुकूमत चलती रही थी जो उसने 1757 में पलासी के युद्ध में मात्र बाइस सैनिक खोकर शुरू की थी। इतने बड़े भू-भाग पर शासन चलाने के लिए कम्पनी को भी आखिर एक नौकरशाही प्रणाली का निर्माण करना था। उस दौर में ही भारत में ही पहली बार ‘प्राइवेट सेक्टर ब्यूरोक्रेसी’ अस्तित्व में आई। कम्पनी की नौकरी के अलावा देशी रजवाड़ों-रियासतों में कुछ नौकरियाँ थी जिनमें सैन्य कार्य ही प्रमुख था, इसके लिए बहुत पढ़े-लिखे लोगों की जरूरत नहीं थी। इन रियासतों में सरकारी कामकाज करने वाले आमतौर पर लिखने-पढ़ने की परंपरागत योग्यता रखनेवाले लोग थे, जो जातीय दृष्टि से देखें तो गिनती के जाति-समुदायों से आते थे। उन्नीसवीं सदी में पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान से परिचय, सुधार आंदोलनों तथा आधुनिक उद्योग-धंधों के पनपने के साथ ही संचार साधनों के विकास के कारण भारत में बाबुओं, यानी किरानियों एवं श्रमिकों के एक नये नौकरीपेशा वर्ग का निर्माण हुआ। इस नये वर्ग में स्वाभाविक तौर पर वर्चस्व उनका बना जो परम्परागत रूप से शिक्षित थे और राजकाज की परम्परागत भाषा के अतिरिक्त अंग्रेजी भी पढ़-लिख सकते थे। इनमें से ज्यादातर लोग शहरी पृष्ठभूमि से थे क्योंकि ग्रामीण भारत में उस काल की कसौटी पर भी शैक्षिक अधिरचना प्रायः अनुपस्थित थी। पढ़ना-लिखना प्रायः परम्परागत एवं अनौपचारिक था और बहुत थोड़े लोगों तक सीमित था। उसमें अक्षर-ज्ञान, धर्म-तत्व ज्ञान तथा स्थानीय कौशलों का समावेश था। सवर्ण जातियों में भी बहुत कम लोग पढ़ते-लिखते थे, और ज्यादातर तो नौकरी को हिकारत से देखते थे। वास्तव में आज के तथाकथित सवर्णों की चार-पांच पीढ़ी पीछे चलें तो निरक्षरों का साम्राज्य मिलेगा।
तो उस समय से लेकर स्वतंत्रता-प्राप्ति तक शैक्षिक स्थिति का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1947 में देश में बारह प्रतिशत साक्षर थे। आम भारतीय गरीब और साधनहीन था। फिर विचारणीय प्रश्न यह है कि कौन पढ़ रहा था, और किसलिए? क्या उच्च जातियों में ही शिक्षा का स्तर उच्च था? क्या उच्च जाति के लोग ही आधुनिक शिक्षा और नौकरी के प्रति उन्मुुख और आकर्षित थे? क्या उनकी स्त्रियाँ शिक्षित थीं? क्या ब्राह्मण ही शत-प्रतिशत शिक्षित थे? हाँ, आधुनिक शिक्षा के दायरे में प्रवेश करने वालों में मुख्यतः ब्राह्मण, कायस्थ और मुसलमान थे। शिक्षा के लाभ और नौकरी की सुरक्षा के प्रति धीरे-धीरे अन्य लोगों, जाति-समूहों का भी आकर्षण बना और वे भी इनका अनुकरण करने लगे। यही कारण है कि स्वतंत्राता-प्राप्ति के बहुत बाद तक बिहार और उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में उच्च जातियों के अंदर भी ब्राह्मणों एवं कायस्थों का वर्चस्व रहा जो बाद में राजपूतों, भूमिहारों व वैश्यों से टूटा। कालांतर में शिक्षा और रोजगार में अन्य जातियों की उपस्थिति और प्रतिनिधित्व में इजाफा हुआ, खासकर सरकारी नौकरियों में पहले अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों की, और बाद में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग, कोटि में आनेवाली जातियों की। भले ही आरक्षण के बिना पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व कम होता लेकिन ये होतीं जरूर क्योंकि वे भी धीरे-धीरे शिक्षा और नौकरी की परिधि में अपनी जगह बनाती जा रही थीं, जैसे कि स्वयं कुछ उच्च जातियाँ।
1858 में गवर्नमेंट आॅफ इंडिया ऐक्ट के मार्फत भारत को ब्रिटिश राजसत्ता के अधीन लाने के पश्चात ही ‘सरकारी नौकरी’ की अवधारणा अस्तित्व में आई। इसके पहले तो लोग ‘कम्पनी’ की नौकरी करते थे। पहले शासन के निचले स्तर पर ही देसी, यानी भारतीय लोगों का प्रवेश था। बाद में आरजुओं-भिन्नतों के बाद मध्य स्तर के प्रशासन में भी भारतीय नियुक्त होने लगे। सन् 1861 में इंडियन सिविल सर्विस(आइ.सी.एस.) जो कि पहले इम्पीरियल सिविल सर्विस (लार्ड कार्नवालिस जन्मदाता) के नाम से जानी जाती थी, की परीक्षा में भारतीयों को शामिल होने की अनुमति मिली। सत्येन्द्र नाथ टैगोर पहले भारतीय आइ.सी.एस. बने। वे महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर के पुत्र तथा गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के बड़े भाई थे। इस स्तर पर शासन में भागीदारी का एक दिलचस्प आंकड़ा यह है कि 1861 से लेकर सन् 1900 तक बारह भारतीय आइ.सी.एस. हुए। इनमें नौ केवल बंगाली थे (छह ब्राह्मण एवं तीन कायस्थ), एक असमी, एक दक्षिण भारतीय और एक मध्यभारत के राज परिवार के व्यक्ति दीवान टेकचंद थे। 1900 से 1947 के बीच पाकिस्तान को चुननेवालों को छोड़कर सत्ताइस और भारतीय आइ.सी.एस. बने। इस दौर में भी बंगालियों का वर्चस्व कायम रहा, गोकि दूसरे नंबर पर दक्षिण भारतीय रहे। इनके बाद ही उत्तर भारतीयों का नंबर था। 1949 में सरदार पटेल ने आइ.सी.एस. अफसरों की ‘निष्पक्षता’ एवं ‘ कर्तव्य परायणता’ को देखते हुए इस सेवा संवर्ग को स्वतंत्र भारत में भी जारी रखने का फैसला लिया। आगे चलकर अखिल भारतीय सेवाओं (केन्द्र सरकार) एवं राज्य स्तरीय सेवाओं की प्रणाली के तहत नौकरशाही तंत्र का विकास हुआ।
इस प्रकार गौर से देखें तो सरकारी नौकरी में आरक्षण के नाम पर सैकड़ों और हजारों सालों का हवाला देकर ‘अगड़ों और पिछड़ों’ के बीच वैमनस्य फैलाने का औचित्य नहीं बनता था। यह विशुद्ध राजनीतिक खेल था और इसका मकसद था सत्ता प्राप्त करना। इसके पहले भी वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण के आधार पर और स्वयं उनके संघर्षों के मद्देनजर दलितों एवं आदिवासियों के लिए साढ़े बाइस प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था, और संघर्ष की ऐसी कोई स्थिति पैदा नहीं हुई थी। आरक्षण ऐसी कोई अजूबी व्यवस्था नहीं थी, 1902 में ही कोल्हापुर के राजा ने अपने राज्य में दलितों एवं पिछड़ों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की थी। अंग्रेज भी शासन में विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधित्व के प्रति सचेत रहे थे। पहले तो उन्होंने राजकाज में पहले से मौजूद जातियों के लिए न्यूनतम जगहें आरक्षित कीं, लेकिन अन्य जातियों के लिए भी आरक्षण का प्रावधान (1883) किया। आगे चलकर मामला दलितों एवं मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचक मंडल पर पहुंचा।
आज की तारीख में आंख खोलनेवाली बात यह है कि यूपीएससी परीक्षाओं में आरक्षित कोटे के अभ्यर्थी इतने नंबर ला रहे हैं कि सामान्य कोटि में उन्हें शामिल किया जा सके, जबकि आरक्षण के स्वयंभू पैरोेकार इस पर कोई बात नहीं करते। ‘दलित’ को दलित और ‘पिछड़े’ को पिछड़ा मानने में ही उनका अपना भला है। वे हमेशा ‘हकतलफी’ का ही रोना रोएंगे, इन बच्चों की मेधा की अनदेखी करेंगे। यह तो एक बात हुई, अब दूसरी बात यह कि बड़ी नौकरियाँ पानेवाले इन अभ्यर्थियों में दलितों में अगड़ी जातियों, आदिवासियों में अगड़ी जनजातियों और पिछड़ों में दबंग प्रभुत्वशाली जातियों से ही प्रायः क्यों हैं? क्या चार-पांच अनसूचित जातियों, जनजातियां एवं पिछड़ी जातियां ही पूरे कोटे का प्रतिनिधित्व करें? लेकिन यह हो रहा है, क्योंकि जो जातियां आर्थिक व शैक्षिक दृष्टि से आगे चलकर आ रही हैं, जगहें उन्हें ही मिल रही हैं फिर बाकी सैंकड़ों जातियों का क्या होगा, कब वे अपने ही संवर्ग की जातियों के साथ प्रतियोगिता करने के योग्य बन पाएंगी? इसका मतलब यह हुआ कि आरक्षण का लाभ अब तक आरक्षित कोटे की सम्पन्न एवं प्रभु जातियां ही उठाती रही हैं। और आगे चलें तो इन लाभार्थी जातियों के भी प्रायः सम्पन्न, वर्गीय रूप से उत्क्रमित परिवार ही लाभ उठाते आए हैं। कुल मिलाकर अधिक से अधिक कुछ दर्जन जातियां (और उनमें भी समृद्ध, सम्पन्न परिवार) ही आरक्षण व्यवस्था का लाभ उठा रही हैं। वह भी एक ही परिवार, एक ही पीढ़ी में अनेक बार।
यह आकस्मिक नहीं कि ये ही जातियाँ राजनीति में भी सर्वाधिक वर्चस्वशाली हैं। कुछ प्रेक्षकों व विश्लेषकों का तो यह तक मानना है कि भारतीय लोकतंत्र इन्हीं जातियों के कोई एक नहीं तो दूसरे गंठजोड़ से चलायमान है। पूरी चुनावी राजनीति इन्हीं के इर्द-गिर्द चक्कर काटती है। दलितों-पिछड़ों-आदिवासियों यहाँ तक कि अल्पसंख्यक की आवाज भी यही बनी हुई हैं। अगर वर्ग भेद कोई सच्चाई है ही नहीं तो आरक्षण व्यवस्था के सम्पन्न लाभार्थी अपनी सम्पति का पुनर्वितरण अपने स्वजातियों में क्यों नही कर देते? फिर छह हजार जातियों की हिस्सेदारी को दर्जन भर या कुछ दर्जन जातियाँ क्यों हड़प जाएँ?
आज स्थिति यह है कि ‘आरक्षण नीति के मूल्यांकन अथवा समीक्षा की बात उठते ही ‘मनुवाद’, ‘ब्राह्मणवाद’, ‘सामंतवाद’ के नाम पर भयादोहन शुरू हो जाता है। क्या यह एक सच्चाई नहीं है कि हाल के ही इतिहास में पिछले डेढ़-दो सौ सालों में, जिन व्यक्तियों ने भारत के नवनिर्माण में सबसे प्रभावशाली भूमिका निभाई उनमें से अनेक गैर-ब्राह्मण थे, और ब्राह्मणों ने भी उन्हें स्वीकार किया? ऐसा कौन-सा आंदोलन हुआ समाज को आगे ले चलने वाला जिसमें ब्राह्मण नहीं हों, या ‘सवर्ण’ नहीं हों! लेकिन तब ऐसी फांक समाज में नहीं थी जो बाद में बना दी गई। अलगाव व बँटवारे के नकली भँवर में शोषण, जुल्म और दासता के खिलाफ चली लड़ाई की साझी विरासत को डुबोने की कोशिश चल रही है।
आरक्षण के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आज के जमाने में जो आर्थिक और राजनीतिक रूप से समर्थ है, सम्पन्न हैं, उन्हें सामाजिक-शैक्षणिक रूप से वंचित किस प्रकार माना जा सकता है, वे ‘पिछड़ा’ की कोटि में क्या वास्तव में रखे जाने योग्य हैं? उसी प्रकार जो सामाजिक-शैक्षणिक रूप से सम्पन्न हैं, वे आर्थिक रूप से ‘विपन्न’ भी हो सकते हैं। पिछले दो-तीन दशकों में जमीन की कीमतें कई गुना बढ़ी हैं, और जमीन की बिक्री से भूधारक जातियों की माली हालत बहुत बदली है। दूसरी ओर जिनके पास कोई अचल सम्पत्ति नहीं, भले ही वे उच्च जाति के हों, उनके लिए उनका श्रम और कौशल ही सहारा है। गरीबी व पिछड़ापन व्यापक रूप में भारतवर्ष की आम समस्या है - अनिवार्य रूप से खास जाति या जातियों की ही समस्या नहीं। अगर जाति व्यवस्था ही भारत में गरीबी का कारण है तो दुनिया के अन्य देशों-समाजों में गरीब क्यों हैं, जहाँ जाति नहीं है? वैसे भी सामाजिक-आर्थिक विषमता को जाति के नजरिए से देख तो सकते हैं, उसका हल नहीं निकाल सकते। हमारे यहां तो बढती आबादी इसी कारण नेताओं के लिए एक निषिद्ध विषय हैे। कुछ लोग, बल्कि सरकारें आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान( जो कि लागू हो भी गया) करके इसे मुद्दे का अंतिम समाधान मान लेती हैं, लेकिन यह मात्र ‘तुष्टिकरण’ है और एक प्रकार से यह मान लेना है कि आरक्षण व्यवस्था से केवल उच्च जातियाँ ही प्रभावित या असंतुष्ट हैं, जबकि यह अर्द्धसत्य है। जैसा कि ऊपर कहा गया वर्तमान आरक्षण सुविधा से वंचना स्वयं आरक्षित कोटि के अंतर्गत आनेवाली कम जनसंख्या एवं प्रभाव वाली अनेक जातियों की भी हो रही है। फिर आर्थिक आधार पर आरक्षण का कोई औचित्य बनता नहीं, आर्थिक पिछड़ापन संस्थागत पिछड़ापन नहीं है।
हमारे यहाँ बीपीएल पर कोई झगड़ा क्यों नहीं होता? इस कोटि में शामिल होने के लिए आंदोलन क्यों नहीं होता? कुछ समर्थ लोग जरूर बीपीएल का लाभ उठा लेते हैं लेकिन कोई आंकड़ा है कि कितने प्रतिशत सवर्ण बीपीएल कोटि में आते हैं? हम बीपीएल लाभार्थियों को ‘बीपीएल परिवारों’ से क्यों अभिहित करते हैं? उन्हें तो ‘बीपीएल जाति’ नहीं कहते? क्या हम ‘बीपीएल’ को आरक्षण व्यवस्था तक विस्तारित कर एक नई जमीन कोड़ सकते हैं? आखिर हम परिवार को जाति के बदले आरक्षण का आधार क्यों नहीं बना सकते? इसमें हमारा क्या जाएगा? सिवाए इसके कि कुछ लोगों की राजनीति चली जाएगी। हमारा समाज एक रहेगा, जाति-समुदाय एक-दूसरे के आमने-सामने नहीं होंगे, वोट बैंक की राजनीति पर विराम लगेगा, सभी जाति-समुदाय स्वतः इसके लाभार्थी बन जाएँगे। मूलभूत सिद्धांत यह होगा कि सामाजिक रूप से जो पिछड़े हैं वही आर्थिक रूप से भी पिछड़े हैं; अगर कोई अपवाद है तो वह भी इस व्यवस्था में शामिल होगा, क्योंकि निर्धनता और अभाव की आत्यंतिक अवस्था आपको ‘विशेष अवसर’ का अधिकारी बनाती है।
आरक्षण परिवार आधारित हो और एक परिवार एक पीढ़ी में एक ही बार इसका लाभ उठा सके, ताकि यह सुविधा कुछ परिवारों तक केन्द्रित न रहकर अनेकानेक परिवारों तक विस्तारित होती जाए। इस जटिल समस्या के सर्वस्वीकार्य हल के लिए कुछ नई वैचारिकी का संधान आवश्यक है। परिवार-आधारित आरक्षण का विचार इस दिशा में एक नई, सार्थक बहस को आगे बढ़ा सकता है। आखिरकार हमें नये विचारों के साथ ही होना पड़ता है। (सबलोग, जुलाई 2016 में प्रकाशित।)
पुनश्च :
सितंबर 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन विधेयक में महिला आरक्षण के अंतर्गत जो कोटि विभाजन की मांग की जा रही है उसमें परिवार को एकमात्र आधार बनाकर एक नया प्रयोग, एक नई शुरुआत की जा सकती है।
No comments:
Post a Comment