पगडंडियाँ
-शिवदयाल
पंक्ति में
एक के पीछे
एक चलते
बनती है पगडंडी
साथ-साथ
समांतर चलने के
लिए
बनानी पड़ती है सड़क
जहाँ होती है
होड़
आगे निकलने की
पहले पहुँचने की
पगडंडी बनती है
अनुगमन से
पीछे चलने वाला
अकुंठ, समर्पित भाव से
पीछे-पीछे चलता
जाता है
आगे चलने वाला
आगे चलने का
श्रेय नहीं लेता
निष्काम, निरभिमान
वह चलता चला
जाता है
आश्वस्त कि यों
एक के पीछे
एक
चलकर भी
पहुँचना तो साथ-साथ ही
है!
सड़क पर चलते
सब साथ-साथ
हैं
पहुँचते सभी अकेले-अकेले हैं ...
पुरखों ने बनाई
थीं
पगडंडियाँ
हमने पगडंडियों को
सड़कों में तब्दील
किया
साथ-साथ चलते
हम अकेले-अकेले पहुँच
रहे हैं
न जाने किन
अनजान
अनचिन्हे हलाकों में
और खोज रहे
हैं पगडंडियाँ
जिधर से होकर
पुरखे गुजरे थे,
जो वास्तव में कहीं
से शुरू होकर
कहीं तक भी
पहुँच सकती हैं...
..........
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