Wednesday, 2 November 2016

आरक्षण: नई वैचारिकी की जरूरत
- शिवदयाल
अगर अनुसूचित जाति/जनजाति एवं अन्य पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण व्यवस्था का लाभ इन्हीं वर्गों के दस-पंद्रह प्रतिशत सम्पन्न लोग ही उठा रहे हैं, और दूसरी ओर प्रभुत्वशाली जातियाँ अपने लिए आरक्षण की माँग करती सड़कों पर आ गई हैं; अगर दलित लड़की यूपीएससी टाॅपर बन रही है, और दसवीं-बारहवीं में लड़कियाँ ही अव्वल आ रही हैं; अगर स्वयं दलित एवं पिछड़े वर्ग के नेता एवं बुद्धिजीवी भी अब मानने लगे हों कि साधन-सम्पन्न लोगों को आरक्षण सुविधा या लाभ का साधनहीन लोगों के पक्ष में परित्याग कर देना चाहिए, तो निश्चित रूप से यह आरक्षण-नीति की समीक्षा का समय है। वैसे भी एक सरकारी नीति की समीक्षा एक रूटीन सरकारी कार्य है, कोई ‘अनहोनी’ नहीं।
जिसे सत्ता में भागीदारी के रूप में प्रचारित किया जाता है, वह दरअसल नौकरशाही व्यवस्था में भागीदारी का मामला है, यानी सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी। भारत में सरकारी नौकरियों का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। अंग्रेजों ने भारत में केन्द्रीय सत्ता का निर्माण किया सन् 1858 में, वह भी ब्रिटिश राजसत्ता के अधीन। उसके पहले ईस्ट इंडिया कम्पनी की कलकत्ता, मद्रास, लखनऊ, बाॅम्बे आदि प्रेसिडेंसियों के माध्यम से हुकूमत चलती रही थी जो उसने 1757 में पलासी के युद्ध में मात्र बाइस सैनिक खोकर शुरू की थी। इतने बड़े भू-भाग पर शासन चलाने के लिए कम्पनी को भी आखिर एक नौकरशाही प्रणाली का निर्माण करना था। उस दौर में ही भारत में ही पहली बार ‘प्राइवेट सेक्टर ब्यूरोक्रेसी’ अस्तित्व में आई। कम्पनी की नौकरी के अलावा देशी रजवाड़ों-रियासतों में कुछ नौकरियाँ थी जिनमें सैन्य कार्य ही प्रमुख था, इसके लिए बहुत पढ़े-लिखे लोगों की जरूरत नहीं थी। इन रियासतों में सरकारी कामकाज करने वाले आमतौर पर लिखने-पढ़ने की परंपरागत योग्यता रखनेवाले लोग थे, जो जातीय दृष्टि से देखें तो गिनती के जाति-समुदायों से आते थे। उन्नीसवीं सदी में पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान से परिचय, सुधार आंदोलनों तथा आधुनिक उद्योग-धंधों के पनपने के साथ ही संचार साधनों के विकास के कारण भारत में बाबुओं, यानी किरानियों एवं श्रमिकों के एक नये नौकरीपेशा वर्ग का निर्माण हुआ। इस नये वर्ग में स्वाभाविक तौर पर वर्चस्व उनका बना जो परम्परागत रूप से शिक्षित थे और राजकाज की परम्परागत भाषा के अतिरिक्त अंग्रेजी भी पढ़-लिख सकते थे। इनमें से ज्यादातर लोग शहरी पृष्ठभूमि से थे क्योंकि ग्रामीण भारत में उस काल की कसौटी पर भी शैक्षिक अधिरचना प्रायः अनुपस्थित थी। पढ़ना-लिखना प्रायः परम्परागत एवं अनौपचारिक था और बहुत थोड़े लोगों तक सीमित था। उसमें अक्षर-ज्ञान, धर्म-तत्व ज्ञान तथा स्थानीय कौशलों का समावेश था। सवर्ण जातियों में भी बहुत कम लोग पढ़ते-लिखते थे, और ज्यादातर तो नौकरी को हिकारत से देखते थे। वास्तव में आज के तथाकथित सवर्णों की चार-पांच पीढ़ी पीछे चलें तो निरक्षरों का साम्राज्य मिलेगा।
तो उस समय से लेकर स्वतंत्रता-प्राप्ति तक शैक्षिक स्थिति का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1947 में देश में बारह प्रतिशत साक्षर थे। आम भारतीय गरीब और साधनहीन था। फिर विचारणीय प्रश्न यह है कि कौन पढ़ रहा था, और किसलिए? क्या उच्च जातियों में ही शिक्षा का स्तर उच्च था? क्या उच्च जाति के लोग ही आधुनिक शिक्षा और नौकरी के प्रति उन्मुुख और आकर्षित थे? क्या उनकी स्त्रियाँ शिक्षित थीं? क्या ब्राह्मण ही शत-प्रतिशत शिक्षित थे? हाँ, आधुनिक शिक्षा के दायरे में प्रवेश करने वालों में मुख्यतः ब्राह्मण, कायस्थ और मुसलमान थे। शिक्षा के लाभ और नौकरी की सुरक्षा के प्रति धीरे-धीरे अन्य लोगों, जाति-समूहों का भी आकर्षण बना और वे भी इनका अनुकरण करने लगे। यही कारण है कि स्वतंत्राता-प्राप्ति के बहुत बाद तक बिहार और उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में उच्च जातियों के अंदर भी ब्राह्मणों एवं कायस्थों का वर्चस्व रहा जो बाद में राजपूतों, भूमिहारों व वैश्यों से टूटा। कालांतर में शिक्षा और रोजगार में अन्य जातियों की उपस्थिति और प्रतिनिधित्व में इजाफा हुआ, खासकर सरकारी नौकरियों में पहले अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों की, और बाद में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग, कोटि में आनेवाली जातियों की। भले ही आरक्षण के बिना पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व कम होता लेकिन ये होतीं जरूर क्योंकि वे भी धीरे-धीरे शिक्षा और नौकरी की परिधि में अपनी जगह बनाती जा रही थीं, जैसे कि स्वयं कुछ उच्च जातियाँ।
1858 में गवर्नमेंट आॅफ इंडिया ऐक्ट के मार्फत भारत को ब्रिटिश राजसत्ता के अधीन लाने के पश्चात ही ‘सरकारी नौकरी’ की अवधारणा अस्तित्व में आई। इसके पहले तो लोग ‘कम्पनी’ की नौकरी करते थे। पहले शासन के निचले स्तर पर ही देसी, यानी भारतीय लोगों का प्रवेश था। बाद में आरजुओं-भिन्नतों के बाद मध्य स्तर के प्रशासन में भी भारतीय नियुक्त होने लगे। सन् 1861 में इंडियन सिविल सर्विस(आइ.सी.एस.) जो कि पहले इम्पीरियल सिविल सर्विस (लार्ड कार्नवालिस जन्मदाता) के नाम से जानी जाती थी, की परीक्षा में भारतीयों को शामिल होने की अनुमति मिली। सत्येन्द्र नाथ टैगोर पहले भारतीय आइ.सी.एस. बने। वे महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर के पुत्र तथा गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के बड़े भाई थे। इस स्तर पर शासन में भागीदारी का एक दिलचस्प आंकड़ा यह है कि 1861 से लेकर सन् 1900 तक बारह भारतीय आइ.सी.एस. हुए। इनमें नौ केवल बंगाली थे (छह ब्राह्मण एवं तीन कायस्थ), एक असमी, एक दक्षिण भारतीय और एक मध्यभारत के राज परिवार के व्यक्ति दीवान टेकचंद थे। 1900 से 1947 के बीच पाकिस्तान को चुननेवालों को छोड़कर सत्ताइस और भारतीय आइ.सी.एस. बने। इस दौर में भी बंगालियों का वर्चस्व कायम रहा, गोकि दूसरे नंबर पर दक्षिण भारतीय रहे। इनके बाद ही उत्तर भारतीयों का नंबर था। 1949 में सरदार पटेल ने आइ.सी.एस. अफसरों की ‘निष्पक्षता’ एवं ‘ कर्तव्य परायणता’ को देखते हुए इस सेवा संवर्ग को स्वतंत्र भारत में भी जारी रखने का फैसला लिया। आगे चलकर अखिल भारतीय सेवाओं (केन्द्र सरकार) एवं राज्य स्तरीय सेवाओं की प्रणाली के तहत नौकरशाही तंत्र का विकास हुआ।

इस प्रकार गौर से देखें तो सरकारी नौकरी में आरक्षण के नाम पर सैकड़ों और हजारों सालों का हवाला देकर ‘अगड़ों और पिछड़ों’ के बीच वैमनस्य फैलाने का औचित्य नहीं बनता था। यह विशुद्ध राजनीतिक खेल था और इसका मकसद था सत्ता प्राप्त करना। इसके पहले भी वस्तुनिष्ठ प्रेक्षण के आधार पर और स्वयं उनके संघर्षों के मद्देनजर दलितों एवं आदिवासियों के लिए साढ़े बाइस प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था, और संघर्ष की ऐसी कोई स्थिति पैदा नहीं हुई थी। आरक्षण ऐसी कोई अजूबी व्यवस्था नहीं थी, 1902 में ही कोल्हापुर के राजा ने अपने राज्य में दलितों एवं पिछड़ों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की थी। अंग्रेज भी शासन में विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधित्व के प्रति सचेत रहे थे। पहले तो उन्होंने राजकाज में पहले से मौजूद जातियों के लिए न्यूनतम जगहें आरक्षित कीं, लेकिन अन्य जातियों के लिए भी आरक्षण का प्रावधान (1883) किया। आगे चलकर मामला दलितों एवं मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचक मंडल पर पहुंचा।
आज की तारीख में आंख खोलनेवाली बात यह है कि यूपीएससी परीक्षाओं में आरक्षित कोटे के अभ्यर्थी इतने नंबर ला रहे हैं कि सामान्य कोटि में उन्हें शामिल किया जा सके, जबकि आरक्षण के स्वयंभू पैरोेकार इस पर कोई बात नहीं करते। ‘दलित’ को दलित और ‘पिछड़े’ को पिछड़ा मानने में ही उनका अपना भला है। वे हमेशा ‘हकतलफी’ का ही रोना रोएंगे, इन बच्चों की मेधा की अनदेखी करेंगे। यह तो एक बात हुई, अब दूसरी बात यह कि बड़ी नौकरियाँ पानेवाले इन अभ्यर्थियों में दलितों में अगड़ी जातियों, आदिवासियों में अगड़ी जनजातियों और पिछड़ों में दबंग प्रभुत्वशाली जातियों से ही प्रायः क्यों हैं? क्या चार-पांच अनसूचित जातियों, जनजातियां एवं पिछड़ी जातियां ही पूरे कोटे का प्रतिनिधित्व करें? लेकिन यह हो रहा है, क्योंकि जो जातियां आर्थिक व शैक्षिक दृष्टि से आगे चलकर आ रही हैं, जगहें उन्हें ही मिल रही हैं फिर बाकी सैंकड़ों जातियों का क्या होगा, कब वे अपने ही संवर्ग की जातियों के साथ प्रतियोगिता करने के योग्य बन पाएंगी? इसका मतलब यह हुआ कि आरक्षण का लाभ अब तक आरक्षित कोटे की सम्पन्न एवं प्रभु जातियां ही उठाती रही हैं। और आगे चलें तो इन लाभार्थी जातियों के भी प्रायः सम्पन्न, वर्गीय रूप से उत्क्रमित परिवार ही लाभ उठाते आए हैं। कुल मिलाकर अधिक से अधिक कुछ दर्जन जातियां (और उनमें भी समृद्ध, सम्पन्न परिवार) ही आरक्षण व्यवस्था का लाभ उठा रही हैं। वह भी एक ही परिवार, एक ही पीढ़ी में अनेक बार।
यह आकस्मिक नहीं कि ये ही जातियाँ राजनीति में भी सर्वाधिक वर्चस्वशाली हैं। कुछ प्रेक्षकों व विश्लेषकों का तो यह तक मानना है कि भारतीय लोकतंत्र इन्हीं जातियों के कोई एक नहीं तो दूसरे गंठजोड़ से चलायमान है। पूरी चुनावी राजनीति इन्हीं के इर्द-गिर्द चक्कर काटती है। दलितों-पिछड़ों-आदिवासियों यहाँ तक कि अल्पसंख्यक की आवाज भी यही बनी हुई हैं। अगर वर्ग भेद कोई सच्चाई है ही नहीं तो आरक्षण व्यवस्था के सम्पन्न लाभार्थी अपनी सम्पति का पुनर्वितरण अपने स्वजातियों में क्यों नही कर देते? फिर छह हजार जातियों की हिस्सेदारी को दर्जन भर या कुछ दर्जन जातियाँ क्यों हड़प जाएँ?
आज स्थिति यह है कि ‘आरक्षण नीति के मूल्यांकन अथवा समीक्षा की बात उठते ही ‘मनुवाद’, ‘ब्राह्मणवाद’, ‘सामंतवाद’ के नाम पर भयादोहन शुरू हो जाता है। क्या यह एक सच्चाई नहीं है कि हाल के ही इतिहास में पिछले डेढ़-दो सौ सालों में, जिन व्यक्तियों ने भारत के नवनिर्माण में सबसे प्रभावशाली भूमिका निभाई उनमें से अनेक गैर-ब्राह्मण थे, और ब्राह्मणों ने भी उन्हें स्वीकार किया? ऐसा कौन-सा आंदोलन हुआ समाज को आगे ले चलने वाला जिसमें ब्राह्मण नहीं हों, या ‘सवर्ण’ नहीं हों! लेकिन तब ऐसी फांक समाज में नहीं थी जो बाद में बना दी गई। अलगाव व बँटवारे के नकली भँवर में शोषण, जुल्म और दासता के खिलाफ चली लड़ाई की साझी विरासत को डुबोने की कोशिश चल रही है।
आरक्षण के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आज के जमाने में जो आर्थिक और राजनीतिक रूप से समर्थ है, सम्पन्न हैं, उन्हें सामाजिक-शैक्षणिक रूप से वंचित किस प्रकार माना जा सकता है, वे ‘पिछड़ा’ की कोटि में क्या वास्तव में रखे जाने योग्य हैं? उसी प्रकार जो सामाजिक-शैक्षणिक रूप से सम्पन्न हैं, वे आर्थिक रूप से ‘विपन्न’ भी हो सकते हैं। पिछले दो-तीन दशकों में जमीन की कीमतें कई गुना बढ़ी हैं, और जमीन की बिक्री से भूधारक जातियों की माली हालत बहुत बदली है। दूसरी ओर जिनके पास कोई अचल सम्पत्ति नहीं, भले ही वे उच्च जाति के हों, उनके लिए उनका श्रम और कौशल ही सहारा है। गरीबी व पिछड़ापन व्यापक रूप में भारतवर्ष की आम समस्या है - अनिवार्य रूप से खास जाति या जातियों की ही समस्या नहीं। अगर जाति व्यवस्था ही भारत में गरीबी का कारण है तो दुनिया के अन्य देशों-समाजों में गरीब क्यों हैं, जहाँ जाति नहीं है? वैसे भी सामाजिक-आर्थिक विषमता को जाति के नजरिए से देख तो सकते हैं, उसका हल नहीं निकाल सकते। हमारे यहां तो बढती आबादी इसी कारण नेताओं के लिए एक निषिद्ध विषय हैे। कुछ लोग, बल्कि सरकारें आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान( जो कि लागू हो भी गया) करके इसे मुद्दे का अंतिम समाधान मान लेती हैं, लेकिन यह मात्र ‘तुष्टिकरण’ है और एक प्रकार से यह मान लेना है कि आरक्षण व्यवस्था से केवल उच्च जातियाँ ही प्रभावित या असंतुष्ट हैं, जबकि यह अर्द्धसत्य है। जैसा कि ऊपर कहा गया वर्तमान आरक्षण सुविधा से वंचना स्वयं आरक्षित कोटि के अंतर्गत आनेवाली  कम जनसंख्या एवं प्रभाव वाली अनेक जातियों की भी हो रही है। फिर आर्थिक आधार पर आरक्षण का कोई औचित्य बनता नहीं, आर्थिक पिछड़ापन संस्थागत पिछड़ापन नहीं है।
        हमारे यहाँ बीपीएल पर कोई झगड़ा क्यों नहीं होता? इस कोटि में शामिल होने के लिए आंदोलन क्यों नहीं होता? कुछ समर्थ लोग जरूर बीपीएल का लाभ उठा लेते हैं लेकिन कोई आंकड़ा है कि कितने प्रतिशत सवर्ण बीपीएल कोटि में आते हैं? हम बीपीएल लाभार्थियों को ‘बीपीएल परिवारों’ से क्यों अभिहित करते हैं? उन्हें तो ‘बीपीएल जाति’ नहीं कहते? क्या हम ‘बीपीएल’ को आरक्षण व्यवस्था तक विस्तारित कर एक नई जमीन कोड़ सकते हैं? आखिर हम परिवार को जाति के बदले आरक्षण का आधार क्यों नहीं बना सकते? इसमें हमारा क्या जाएगा? सिवाए इसके कि कुछ लोगों की राजनीति चली जाएगी। हमारा समाज एक रहेगा, जाति-समुदाय एक-दूसरे के आमने-सामने नहीं होंगे, वोट बैंक की राजनीति पर विराम लगेगा, सभी जाति-समुदाय स्वतः इसके लाभार्थी बन जाएँगे। मूलभूत सिद्धांत यह होगा कि सामाजिक रूप से जो पिछड़े हैं वही आर्थिक रूप से भी पिछड़े हैं; अगर कोई अपवाद है तो वह भी इस व्यवस्था में शामिल होगा, क्योंकि निर्धनता और अभाव की आत्यंतिक अवस्था आपको ‘विशेष अवसर’ का अधिकारी बनाती है।
        आरक्षण परिवार आधारित हो और एक परिवार एक पीढ़ी में एक ही बार इसका लाभ उठा सके, ताकि यह सुविधा कुछ परिवारों तक केन्द्रित न रहकर अनेकानेक परिवारों तक विस्तारित होती जाए। इस जटिल समस्या के सर्वस्वीकार्य हल के लिए कुछ नई वैचारिकी का संधान आवश्यक है। परिवार-आधारित आरक्षण का विचार इस दिशा में एक नई, सार्थक बहस को आगे बढ़ा सकता है। आखिरकार हमें नये विचारों के साथ ही होना पड़ता है। (सबलोग, जुलाई 2016 में प्रकाशित।)
पुनश्च : 
सितंबर 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन विधेयक में महिला आरक्षण के अंतर्गत जो कोटि विभाजन की मांग की जा रही है उसमें परिवार को एकमात्र आधार बनाकर एक नया प्रयोग, एक नई शुरुआत की जा सकती है। 

Tuesday, 15 March 2016

पगडंडियाँ
  -शिवदयाल


पंक्ति में
एक के पीछे एक चलते
बनती है पगडंडी
साथ-साथ
समांतर चलने के लिए
बनानी पड़ती है सड़क
जहाँ होती है होड़
आगे निकलने की
पहले पहुँचने की
पगडंडी बनती है
अनुगमन से
पीछे चलने वाला
अकुंठ, समर्पित भाव से
पीछे-पीछे चलता जाता है
आगे चलने वाला
आगे चलने का श्रेय नहीं लेता
निष्काम, निरभिमान
वह चलता चला जाता है
आश्वस्त कि यों एक के पीछे एक
चलकर भी
पहुँचना तो साथ-साथ ही है!
सड़क पर चलते
सब साथ-साथ हैं
पहुँचते सभी अकेले-अकेले हैं ...
पुरखों ने बनाई थीं
पगडंडियाँ
हमने पगडंडियों को
सड़कों में तब्दील किया
साथ-साथ चलते
हम अकेले-अकेले पहुँच रहे हैं
जाने किन अनजान
अनचिन्हे हलाकों में
और खोज रहे हैं पगडंडियाँ
जिधर से होकर
पुरखे गुजरे थे,
जो वास्तव में कहीं से शुरू होकर
कहीं तक भी पहुँच सकती हैं...
..........

Thursday, 11 February 2016

कुएँ की दुनिया
मेढ़क को
यह हक है कि
वह अपने कुएँ को
अपनी दुनिया समझे
उसमें सुखी-संतुष्ट रहे
लेकिन मेढ़क को
इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती
कि वह बाकी दुनिया को भी
अपने कुएँ में
समेटने की जुरअत करे...
----शिवदयाल
उदारता

मैं इतना उदार नहीं होना चाहता
कि हवा बहे
और एक सूखे पत्ते की तरह
आसमान में उड़ जाऊँ
इसके बदले
मैं क्यों न धरती में जमे
एक नन्हें पौधे की तरह
पवन झकोरों पर उमगता रहूँ...!
-- शिवदयाल

Saturday, 2 January 2016

संधिकाल की धुँध
- शिवदयाल

पिछले डेढ़ बरस में कोई जलियांवाला नहीं, सन् 42 जैसा दमन, आपातकाल का उत्पीड़न - ये सभी प्रत्यक्ष सरकारी दमन के ज्वलंत उदाहरण हैं। दूसरी ओर देश में कहीं 1984 दोहराया गया, कश्मीरी पंडितों जैसा पलायन हुआ, ही 2002 के गुजरात जैसी कोई घटना घटी - ये सामुदायिक हिंसा के घिनौने उदाहरण हैं जिनमें संभव है सरकार परोक्ष रूप से शामिल रही भी हो। घटनाएँ अनेक हैं आतपों के इस देश में, अब तो तिथि स्थान तक ठीक-ठीक याद नहीं रह पाता, क्रम मंे भी उलटफेर हो जाता है। ठीक-ठीक याद नहीं रहता कि मलियाना पहले हुआ था या नेल्ली। उसमें भी पिछली शताब्दी के ढलते वर्षों में बिहार में एक पर एक अंजाम दिए नरसंहारों को तो हम लगभग भूल ही गए हैं जो नयी सदी के आरंभ तक चले। भला हो जो कोर्ट द्वारा अनेक कांडों के अभियुक्तों को बरी करने की खबर से विस्मृति की कुछ धूल उड़ी - आह, ऐसा भी हुआ था! इसे वर्ग संघर्ष कहा गया - ऐसी लड़ाई जिसमें दोनों तरफ के सिपाही आमने-सामने नहीं लड़ते थे, घात लगाकर प्रतिद्वन्द्वी पक्ष (जाति) से जुड़े निरीह लोगों, स्त्रियों बच्चों की हत्याएँ करते थे। खैर, तो ऐसी हिंसाओं में विभिन्न समुदायों के सैकड़ों लोग हत हुए।
                फिर भी बेचैनी और घुटन और अब प्रतिरोध तक की नौबत! तीन लेखक मार दिए गए - नरेंद्र दाभोलकर, गोविन्द पनसारे और एम.एम. कुलबर्गी। वर्तमान केन्द्र सरकार के रहते कुलबर्गी की हत्या हुई, शेष दो लेखक पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान ही मारे गए - महाराष्ट्र में, जबकि केन्द्र में और राज्य में कांग्रेस की ही सरकारें थी। कुलबर्गी की हत्या भी कांग्रेस शासन में हुई है, हाँ केन्द्र में जरूर भाजपा की सरकार है। तीन लेखक मारे गए, ऊपर से दादरी कांड में एक निरपराध की एक घिनौने अफवाह, इल्जाम के आधार पर हुई हत्या से सनसनी उबाल में बदल गई। क्या एक लेखक की हत्या एक समुदाय की हत्या के बराबर है, सहिष्णुता के पैमाने का आखिरी छोर? एक सहिष्णु समाज में वे सब उपरिलिखित कांड हो सकते हैं जिनमें सैकड़ों-हजारों की जाने गईं? लेकिन लेखक की जान जाते ही सहिष्णुता समाप्त, बहुलता और विविधता एकाश्मक एकरूपता में तब्दील? क्या लेखक-हत्याब्रह्महत्याकी तरह है जिसकामहादोषराजा पर भी लगना निश्चित था और उसे भी इस महापाप के लिए उतरदायी माना जाता था?
                चलिए, लेखक-हत्या भले ही प्राचीन भारतीय समाज केब्रह्म-हत्याकी तरह भी हो, इतना तो मानना पड़ेगा कि एक लेखक की हत्या एक व्यक्ति की हत्या से कुछ बढ़कर है। वह एक विचार-दृष्टि की भी हत्या है, वह उस स्रोत को जबरन बंद करने जैसा है जहां से मनुष्य समाज के लिए शुभत्व की संभावना जनमती है। एक लेखक अथवा साहित्यकार की हत्या सृजन, शोधन परिष्कार की संभावना की भी हत्या है। हमारे यहाँ चार्वाक, कबीर या रैदास की हत्या नहीं हुई, आर्यभट्ट और भास्कराचार्य को भी नहीं मारा गया।  ये सब और इनके जैसे अनेक सर्जक, विचारक, शोधकत्र्ता नये विचारों का संधन कर रहे थे, गणितीय वैज्ञानिक सूत्रों की खोज कर रहे थे, साथ ही साथ स्थापित मान्यताओं, रूढि़यों पर चोट भी कर रहे थे, लेकिन किसी सत्ता ने इनका वध करने की नहीं सोची (ब्रह्म-हत्या के महापाप का भय?) हमारे यहाँ तो सत्ता द्वारा किसी विचारक या शिक्षक को विष का प्याला नहीं दिया गया। नवीन धर्म प्रवर्तक को भी सूली पर नहीं चढ़ाया गया, उल्टे उसकी अभ्यर्थना की गई - बुद्ध देव, तीर्थंकर भगवान महावीर, नानकदेव। उन्हें देव भगवान कहा गया। यहाँ तक कि दूसरे देशों में प्रवर्तित धर्मों के लिए धर्मस्थल उपलब्ध कराए गए।
                भारत में लेखक हत्या इसीलिए इतनी मर्मबेधक और स्तब्धकारी घटना है और इसे लेकर विशेषकर लेखक समाज में ऐसा उद्वेलन मचा है। सत्ता पक्ष इस गहराई में चीजों को देखने में असपफल है। वैसे भी लोकतांत्रिक भारत में पत्रकारों की हत्या आम घटना बन चुकी है। ऐसा ही एक औरमृगया वर्गपैदा हुआ है सूचना अधिकार अधिनियम के लागू होने के बाद सूचनाधिकार कार्यकत्र्ताओं का जो सत्ताधारी एवं उनके दलालों का अत्यंत आसान और निरीह शिकार है। अब तक सैकड़ोंआरटीआईकार्यकत्र्ताओं की हत्या हो चुकी है। ऐसे मंे अगर दो-चार लेखक भी मार दिए गए हो तो ऐसा कौन-सा आसमान टूट पड़ा! हत्या तो देश में मृत्यु की एक प्रमुख वजह है आज! बुढ़ापा, रोग और दुर्घटना की तरह।
                तीनों हत लेखकों में एक और समानता है - तीनों देशी, क्षेत्रीय भाषाओं के लेखक हैं, गैर हिन्दी गैर-अंग्रेजी भाषाओं में लिखने वाले। इससे एक निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह कट्टर एवं कमजर्फ लोगों के लिए अधिक भेद्य वर्ग है। इनकी हत्या के प्रतिरोध में पहली मजबूत आवाज हिन्दी से आई जो अस्वाभाविक नहीं, बाद में इस आवाज में दूसरी आवाजें मिलती चली गईं। यह तस्वीर का एक पहलू है।
                असहिष्णु वातावरण, घुटन, बेचैनी ... ! यह राजसत्ता बनाम आम जनता का मामला नहीं है, बल्कि जनता के एक वर्ग बनाम शेष जनता का है। यह वर्ग सत्तापोषित माना जाता है। यह स्थिति प्रत्यक्ष राज्य दमन से अधिक खतरनाक है। ऐसा कहते और सोचते हुए यह बात ध्यान में रखने और याद करने की जरूरत है - मुसोलिनी काबलिलातथाब्लैक ब्रिगेड’, हिटलर काजंगस्ट्रम’, ‘स्टार्म रेजीमंेटआदि, स्टालिन कायूथ ब्रिगेड’, पूर्वी पाकिस्तान के रजाकार आदि और हाल ही में रूस मंे  पुतिन समर्थित/समर्थकनाशी’ (युवा आन्दोलन) इसमें हम संजय गाँधी के समय के यूथ काँग्रेस को भी जोड़ सकते हैं, साथ ही पश्चिम बंगाल के (सत्तासीन) वाम कैडर तथा आज के टीएमसी कैडर को भी, अगर थोड़ी और उदारता बरती जाए। भारतीय उदाहरण बाहरी उदाहरणों की तुलना में कमजोर भले दिखते हों, हैं तो सही। वैसे इन्हें अगर छोड़ भी दें तो गिनाए गए समूहों के अलावा कम्बोडिया के पोलपोट के साथ ही अनेक अफ्रीकी तानाशाहों ही भी यूथ ब्रिगेड रही हैं जिन्होंने आम जनता पर बेइंतहा जुल्म ढाए। बांग्लादेश आज तक इनसे त्रस्त है - इनके अवशेषों से। वे वहाँ लेखकों-प्रकाशकों का ही शिकार कर रहे हैं, जबकि सरकार उनकी नहीं है।
                ये जोफ्री रैडिकल्सघूमते दिख रहे हैं किन्हीं-किन्हीं संज्ञा-विशेषणों के साथ जो कभी दादरी करवा रहे हैं तो कभी कुछ और, वे हमारे पढ़े-लिखे, सुविज्ञ लेखकों कलाकारों और बुद्धिजीवियों को सर्वसत्तावादियों के उन्हीं पालितपुत्रों की याद दिला रहे हैं जिन्होंने उनकी राह आसान बनाने के लिए लोगों का जीना हराम कर दिया। डर की एक वजह यह है! ये पहले भी थे, लेकिन आज सरकार है इनकी। इनकी ताकत बढ़ी हुई है, हौसला बढ़ा हुआ है। चाहे जिसे गद्दार घोषित कर दें, या पारदेश का एजेंट!
                ल्ेकिन क्या सम्प्रदायवाद के नाम पर देश में कहीं बलवा हो रहा है? लोग अपने इलाके छोड़कर भाग रहे हैं? कहीं रेल-सड़क जाम है? कोई रथ यात्रा या सांस्कृतिक मार्च हो रहा है? सामाजिक तनावों के चलते अर्थव्यवस्था के बैठने की नौबत है? स्कूल-काॅलेज-कार्यालय बंद हैं? नही ंतो फिर इस सीमा तक, इतने तीखे विरोध का औचित्य? कि लेखक अपनी ही स्वायत्त संस्था को सरकारी घोषित कर उसी के कब्जे मंे दे दें। पाठकों एवं साहित्य-समाज की गुणग्राहकता के बल पर अर्जित मान-सम्मान उन्हें बदनुमा दाग की तरह दिखाई दें?
                क्या यह अंतरंजित प्रतिक्रिया इसी कारण नहीं है कि वास्तव मेंहिन्दूदक्षिणपंथियों के शासन को सहन करना कठिन हो रहा है? एक वाजिब डर एक गैरवाजिब वैचारिक असहिष्णुता में परिणत नहीं हो रहा है? जनता द्वारा चुनी गई एक वैध सरकार को डेढ़ साल के अंदर ही अवैध बनाने याडिस्क्रेडिटकरने के रूप में बौद्धिकों के इस विरोध को आखिर क्यों देखा जाए जो एक तरीके केलेखकीय ऐक्टिविज्मकी शक्ल अख्तियार कर रहा है? यहाँ एक और सवाल प्रासंगिक लगता है कि क्या वास्तव में लेखक का ऐक्टिविस्ट बनना भी उसका लेखकीय दायित्व है, क्या इसके लिए उसका लेखन ही पर्याप्त नहीं? लेखन तो वास्तव में सत्ता और व्यवस्था के विरोध से ही शुरु होता है, वरना लिखने वालों को देश निकाला क्यों दिया जाता और मौत के फरमान क्यों सुनाए जाते! क्यों उनकी किताबें जलाई जातीं! यह कीमत तो अब तक वे अपने शब्दों के लिए चुकाते रहे हैं, जुलूसों में भाग लेने के लिए नहीं!
                लेखक या बुद्धिजीवी एक विशेष प्रकार की राजनीति का समर्थक या विरोधी हो सकता है, लेकिन उसका यह स्टैंड स्वयं उसके अपने प्रेक्षण एवं न्यायबुद्धि द्वारा निर्धारित होना चाहिए, राजनीतिक पूर्वाग्रहांे अथवा पक्षपातों द्वारा नहीं। उसके लिए यह भी चुनौती है कि वह अपने सोच के परिसर में, चिंतन के दायरे में परविचार, अन्य दृष्टि को भी जगह देता है, या देने को तैयार है या नहीं। क्या एक लेखक एक राजनीतिक कार्यकत्र्ता की तरह प्रतिबद्ध और समर्पित हो सकता है जो सिर्फ और सिर्फ अपने दल के हित को सर्वोपरि रखना चाहता है? अगर हाँ, तो उसकी विश्वसनीयता व्यापक समाज के लिए संदिग्ध बनी रहेगी।
 कहने को  लेखक का कोई देश नहीं होता, लेकिन वास्तव में हर लेखक का एक अपना देश तो होता है, नहीं होता तब यह सबकुछ भला क्यों होता। और कोई लेखक अपना देश छोड़कर नहीं जाना चाहता, इसीलिए उसकी चिंताओं में सबसे पहले उसके अपने लोग और उनके सुख-दुःख शामिल होते हैं। प्रथमतया इनकी ही मुक्ति के लिए उसे स्वाधीन अंतःकरण की दरकार होती है। अंतःकरण की स्वााध्ीनता भी लेखक को उपहार में नहीं मिलती, हासिल करना पड़ता है इसे। किसी खास विचार या विचारधारा के साथ सात जनमों का रिश्ता निभाकर और अन्य विचार से आँखें फेरकर तो इसे कतई हासिल नहीं किया जा सकता।
                यह संािध्काल है! लेखक को शाश्वत विद्रोही अथवा चिर विपक्षी के रूप में देखना उसकी भूमिका को कम आँकना होगा। दुनिया का हर बड़ा रचनाकार अंततः संवाद और साहचर्य, सम्मिलन और समाहिती के प्रति समर्पित होता है। भेद से अभेद की ओर उसका लेखन प्रवृत्त होता है। वर्तमान स्थिति से भी विकट समय था लगभग पूरे मध्यकाल का। एक पर एक बाहरी आक्रमण, अस्थिरता, धार्मिक जातीय वैमनस्य, रूढि़बद्धता, और क्या-क्या, लेकिन हमारे भक्त कवियों ने प्रेम भक्ति के पद रचकर सामाजिक सामंजस्य में अपना महान योग दिया, बल्कि देश की नई सांस्कृतिक धारा ही निर्मित कर दी जो आज भी हमें आप्यायित कर रही है।

                विरोध के स्वर उठने के साथ संवाद की पहल भी होनी चाहिए। लेखक कोई निरंकुश सत्ता नहीं है कि वह पहल करे, हाथ बढ़ाए। यह रेजीम पसंद भले हो लेकिन आखिर इसके पीछे जनेच्छा है, बहुमत है। अपने देश की सरकार है, ईस्ट इंडिया कम्पनी की सरकार नहीं। विरोध को इसी सीमा में रखना चाहिए। संधिकाल में लेखक को अपनी भूमिका को विरोध से आगे सद्भावना एवं सामंजस्य तक ले लाना चाहिए। दूसरी ओर सहिष्णुता और सामंजस्य हमारा स्वभाव नहीं होता तो क्या भाजपा आज इस मुकाम तक पहुँच पाती? अगर सरकार सचमुच भारतीय मूल्यों एवं परंपराओं में आस्था रखती है तो संवाद और सहकार के लिए उसे आगे आना पड़ेगा। विचारधारा और पूर्वाग्रह का हवाला देकर इस पूरे प्रकरण को वाजिब तरजीह नहीं देना किसी के हक में नहीं होगा। भय, संशय और आशंका की धुँध सरकार की जरा-सी संवेदनशीलता सदाशयता से छँट सकती है। बदले की कार्रवाई में लेखकों को पुस्तकें लौटाना और पुस्तकंे जलाना वास्तव में उन्हीं आशंकाओं को पुष्ट करने जैसा है जिससे बुद्धिजीवी उद्वेलित हैं। लेखक सत्ता के, आपके विरोध में रहेंगे, आप उनसे मोर्चा नहीं ले सकते। इतनी शक्तिशाली अमेरिकी सरकार अपने सबसे बड़े आलोचक नोम चोम्स्की से मोर्चा नहीं लेती है, उन्हें सहन करती है। अमरीकियों को अपनी शक्ति का पता है लेकिन यह भी मालूम है कि चोम्स्की की कीमत क्या है। इतिहास ऐसे दृष्टांतों से भरा पड़ा है जिनमें राजसत्ताओं को बौद्धिक सत्ता की उपेक्षा और अपमान की कीमत चुकानी पड़ी। राजसत्ताएँ आती-जाती रहती हैं, होमर और कालिदास, शेक्सपीयर और तुलसी, तोल्सतोय और रवीन्द्रनाथ बने रहते हैं, बने रहेंगे।  -00-

  नव-चैतन्य के महावट - रवींद्रनाथ                                 - शिवदयाल  ब चपन में ही जिन विभूतियों की छवि ने मन के अंदर अपना स्थाई निवा...