Saturday, 2 January 2016

संधिकाल की धुँध
- शिवदयाल

पिछले डेढ़ बरस में कोई जलियांवाला नहीं, सन् 42 जैसा दमन, आपातकाल का उत्पीड़न - ये सभी प्रत्यक्ष सरकारी दमन के ज्वलंत उदाहरण हैं। दूसरी ओर देश में कहीं 1984 दोहराया गया, कश्मीरी पंडितों जैसा पलायन हुआ, ही 2002 के गुजरात जैसी कोई घटना घटी - ये सामुदायिक हिंसा के घिनौने उदाहरण हैं जिनमें संभव है सरकार परोक्ष रूप से शामिल रही भी हो। घटनाएँ अनेक हैं आतपों के इस देश में, अब तो तिथि स्थान तक ठीक-ठीक याद नहीं रह पाता, क्रम मंे भी उलटफेर हो जाता है। ठीक-ठीक याद नहीं रहता कि मलियाना पहले हुआ था या नेल्ली। उसमें भी पिछली शताब्दी के ढलते वर्षों में बिहार में एक पर एक अंजाम दिए नरसंहारों को तो हम लगभग भूल ही गए हैं जो नयी सदी के आरंभ तक चले। भला हो जो कोर्ट द्वारा अनेक कांडों के अभियुक्तों को बरी करने की खबर से विस्मृति की कुछ धूल उड़ी - आह, ऐसा भी हुआ था! इसे वर्ग संघर्ष कहा गया - ऐसी लड़ाई जिसमें दोनों तरफ के सिपाही आमने-सामने नहीं लड़ते थे, घात लगाकर प्रतिद्वन्द्वी पक्ष (जाति) से जुड़े निरीह लोगों, स्त्रियों बच्चों की हत्याएँ करते थे। खैर, तो ऐसी हिंसाओं में विभिन्न समुदायों के सैकड़ों लोग हत हुए।
                फिर भी बेचैनी और घुटन और अब प्रतिरोध तक की नौबत! तीन लेखक मार दिए गए - नरेंद्र दाभोलकर, गोविन्द पनसारे और एम.एम. कुलबर्गी। वर्तमान केन्द्र सरकार के रहते कुलबर्गी की हत्या हुई, शेष दो लेखक पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान ही मारे गए - महाराष्ट्र में, जबकि केन्द्र में और राज्य में कांग्रेस की ही सरकारें थी। कुलबर्गी की हत्या भी कांग्रेस शासन में हुई है, हाँ केन्द्र में जरूर भाजपा की सरकार है। तीन लेखक मारे गए, ऊपर से दादरी कांड में एक निरपराध की एक घिनौने अफवाह, इल्जाम के आधार पर हुई हत्या से सनसनी उबाल में बदल गई। क्या एक लेखक की हत्या एक समुदाय की हत्या के बराबर है, सहिष्णुता के पैमाने का आखिरी छोर? एक सहिष्णु समाज में वे सब उपरिलिखित कांड हो सकते हैं जिनमें सैकड़ों-हजारों की जाने गईं? लेकिन लेखक की जान जाते ही सहिष्णुता समाप्त, बहुलता और विविधता एकाश्मक एकरूपता में तब्दील? क्या लेखक-हत्याब्रह्महत्याकी तरह है जिसकामहादोषराजा पर भी लगना निश्चित था और उसे भी इस महापाप के लिए उतरदायी माना जाता था?
                चलिए, लेखक-हत्या भले ही प्राचीन भारतीय समाज केब्रह्म-हत्याकी तरह भी हो, इतना तो मानना पड़ेगा कि एक लेखक की हत्या एक व्यक्ति की हत्या से कुछ बढ़कर है। वह एक विचार-दृष्टि की भी हत्या है, वह उस स्रोत को जबरन बंद करने जैसा है जहां से मनुष्य समाज के लिए शुभत्व की संभावना जनमती है। एक लेखक अथवा साहित्यकार की हत्या सृजन, शोधन परिष्कार की संभावना की भी हत्या है। हमारे यहाँ चार्वाक, कबीर या रैदास की हत्या नहीं हुई, आर्यभट्ट और भास्कराचार्य को भी नहीं मारा गया।  ये सब और इनके जैसे अनेक सर्जक, विचारक, शोधकत्र्ता नये विचारों का संधन कर रहे थे, गणितीय वैज्ञानिक सूत्रों की खोज कर रहे थे, साथ ही साथ स्थापित मान्यताओं, रूढि़यों पर चोट भी कर रहे थे, लेकिन किसी सत्ता ने इनका वध करने की नहीं सोची (ब्रह्म-हत्या के महापाप का भय?) हमारे यहाँ तो सत्ता द्वारा किसी विचारक या शिक्षक को विष का प्याला नहीं दिया गया। नवीन धर्म प्रवर्तक को भी सूली पर नहीं चढ़ाया गया, उल्टे उसकी अभ्यर्थना की गई - बुद्ध देव, तीर्थंकर भगवान महावीर, नानकदेव। उन्हें देव भगवान कहा गया। यहाँ तक कि दूसरे देशों में प्रवर्तित धर्मों के लिए धर्मस्थल उपलब्ध कराए गए।
                भारत में लेखक हत्या इसीलिए इतनी मर्मबेधक और स्तब्धकारी घटना है और इसे लेकर विशेषकर लेखक समाज में ऐसा उद्वेलन मचा है। सत्ता पक्ष इस गहराई में चीजों को देखने में असपफल है। वैसे भी लोकतांत्रिक भारत में पत्रकारों की हत्या आम घटना बन चुकी है। ऐसा ही एक औरमृगया वर्गपैदा हुआ है सूचना अधिकार अधिनियम के लागू होने के बाद सूचनाधिकार कार्यकत्र्ताओं का जो सत्ताधारी एवं उनके दलालों का अत्यंत आसान और निरीह शिकार है। अब तक सैकड़ोंआरटीआईकार्यकत्र्ताओं की हत्या हो चुकी है। ऐसे मंे अगर दो-चार लेखक भी मार दिए गए हो तो ऐसा कौन-सा आसमान टूट पड़ा! हत्या तो देश में मृत्यु की एक प्रमुख वजह है आज! बुढ़ापा, रोग और दुर्घटना की तरह।
                तीनों हत लेखकों में एक और समानता है - तीनों देशी, क्षेत्रीय भाषाओं के लेखक हैं, गैर हिन्दी गैर-अंग्रेजी भाषाओं में लिखने वाले। इससे एक निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह कट्टर एवं कमजर्फ लोगों के लिए अधिक भेद्य वर्ग है। इनकी हत्या के प्रतिरोध में पहली मजबूत आवाज हिन्दी से आई जो अस्वाभाविक नहीं, बाद में इस आवाज में दूसरी आवाजें मिलती चली गईं। यह तस्वीर का एक पहलू है।
                असहिष्णु वातावरण, घुटन, बेचैनी ... ! यह राजसत्ता बनाम आम जनता का मामला नहीं है, बल्कि जनता के एक वर्ग बनाम शेष जनता का है। यह वर्ग सत्तापोषित माना जाता है। यह स्थिति प्रत्यक्ष राज्य दमन से अधिक खतरनाक है। ऐसा कहते और सोचते हुए यह बात ध्यान में रखने और याद करने की जरूरत है - मुसोलिनी काबलिलातथाब्लैक ब्रिगेड’, हिटलर काजंगस्ट्रम’, ‘स्टार्म रेजीमंेटआदि, स्टालिन कायूथ ब्रिगेड’, पूर्वी पाकिस्तान के रजाकार आदि और हाल ही में रूस मंे  पुतिन समर्थित/समर्थकनाशी’ (युवा आन्दोलन) इसमें हम संजय गाँधी के समय के यूथ काँग्रेस को भी जोड़ सकते हैं, साथ ही पश्चिम बंगाल के (सत्तासीन) वाम कैडर तथा आज के टीएमसी कैडर को भी, अगर थोड़ी और उदारता बरती जाए। भारतीय उदाहरण बाहरी उदाहरणों की तुलना में कमजोर भले दिखते हों, हैं तो सही। वैसे इन्हें अगर छोड़ भी दें तो गिनाए गए समूहों के अलावा कम्बोडिया के पोलपोट के साथ ही अनेक अफ्रीकी तानाशाहों ही भी यूथ ब्रिगेड रही हैं जिन्होंने आम जनता पर बेइंतहा जुल्म ढाए। बांग्लादेश आज तक इनसे त्रस्त है - इनके अवशेषों से। वे वहाँ लेखकों-प्रकाशकों का ही शिकार कर रहे हैं, जबकि सरकार उनकी नहीं है।
                ये जोफ्री रैडिकल्सघूमते दिख रहे हैं किन्हीं-किन्हीं संज्ञा-विशेषणों के साथ जो कभी दादरी करवा रहे हैं तो कभी कुछ और, वे हमारे पढ़े-लिखे, सुविज्ञ लेखकों कलाकारों और बुद्धिजीवियों को सर्वसत्तावादियों के उन्हीं पालितपुत्रों की याद दिला रहे हैं जिन्होंने उनकी राह आसान बनाने के लिए लोगों का जीना हराम कर दिया। डर की एक वजह यह है! ये पहले भी थे, लेकिन आज सरकार है इनकी। इनकी ताकत बढ़ी हुई है, हौसला बढ़ा हुआ है। चाहे जिसे गद्दार घोषित कर दें, या पारदेश का एजेंट!
                ल्ेकिन क्या सम्प्रदायवाद के नाम पर देश में कहीं बलवा हो रहा है? लोग अपने इलाके छोड़कर भाग रहे हैं? कहीं रेल-सड़क जाम है? कोई रथ यात्रा या सांस्कृतिक मार्च हो रहा है? सामाजिक तनावों के चलते अर्थव्यवस्था के बैठने की नौबत है? स्कूल-काॅलेज-कार्यालय बंद हैं? नही ंतो फिर इस सीमा तक, इतने तीखे विरोध का औचित्य? कि लेखक अपनी ही स्वायत्त संस्था को सरकारी घोषित कर उसी के कब्जे मंे दे दें। पाठकों एवं साहित्य-समाज की गुणग्राहकता के बल पर अर्जित मान-सम्मान उन्हें बदनुमा दाग की तरह दिखाई दें?
                क्या यह अंतरंजित प्रतिक्रिया इसी कारण नहीं है कि वास्तव मेंहिन्दूदक्षिणपंथियों के शासन को सहन करना कठिन हो रहा है? एक वाजिब डर एक गैरवाजिब वैचारिक असहिष्णुता में परिणत नहीं हो रहा है? जनता द्वारा चुनी गई एक वैध सरकार को डेढ़ साल के अंदर ही अवैध बनाने याडिस्क्रेडिटकरने के रूप में बौद्धिकों के इस विरोध को आखिर क्यों देखा जाए जो एक तरीके केलेखकीय ऐक्टिविज्मकी शक्ल अख्तियार कर रहा है? यहाँ एक और सवाल प्रासंगिक लगता है कि क्या वास्तव में लेखक का ऐक्टिविस्ट बनना भी उसका लेखकीय दायित्व है, क्या इसके लिए उसका लेखन ही पर्याप्त नहीं? लेखन तो वास्तव में सत्ता और व्यवस्था के विरोध से ही शुरु होता है, वरना लिखने वालों को देश निकाला क्यों दिया जाता और मौत के फरमान क्यों सुनाए जाते! क्यों उनकी किताबें जलाई जातीं! यह कीमत तो अब तक वे अपने शब्दों के लिए चुकाते रहे हैं, जुलूसों में भाग लेने के लिए नहीं!
                लेखक या बुद्धिजीवी एक विशेष प्रकार की राजनीति का समर्थक या विरोधी हो सकता है, लेकिन उसका यह स्टैंड स्वयं उसके अपने प्रेक्षण एवं न्यायबुद्धि द्वारा निर्धारित होना चाहिए, राजनीतिक पूर्वाग्रहांे अथवा पक्षपातों द्वारा नहीं। उसके लिए यह भी चुनौती है कि वह अपने सोच के परिसर में, चिंतन के दायरे में परविचार, अन्य दृष्टि को भी जगह देता है, या देने को तैयार है या नहीं। क्या एक लेखक एक राजनीतिक कार्यकत्र्ता की तरह प्रतिबद्ध और समर्पित हो सकता है जो सिर्फ और सिर्फ अपने दल के हित को सर्वोपरि रखना चाहता है? अगर हाँ, तो उसकी विश्वसनीयता व्यापक समाज के लिए संदिग्ध बनी रहेगी।
 कहने को  लेखक का कोई देश नहीं होता, लेकिन वास्तव में हर लेखक का एक अपना देश तो होता है, नहीं होता तब यह सबकुछ भला क्यों होता। और कोई लेखक अपना देश छोड़कर नहीं जाना चाहता, इसीलिए उसकी चिंताओं में सबसे पहले उसके अपने लोग और उनके सुख-दुःख शामिल होते हैं। प्रथमतया इनकी ही मुक्ति के लिए उसे स्वाधीन अंतःकरण की दरकार होती है। अंतःकरण की स्वााध्ीनता भी लेखक को उपहार में नहीं मिलती, हासिल करना पड़ता है इसे। किसी खास विचार या विचारधारा के साथ सात जनमों का रिश्ता निभाकर और अन्य विचार से आँखें फेरकर तो इसे कतई हासिल नहीं किया जा सकता।
                यह संािध्काल है! लेखक को शाश्वत विद्रोही अथवा चिर विपक्षी के रूप में देखना उसकी भूमिका को कम आँकना होगा। दुनिया का हर बड़ा रचनाकार अंततः संवाद और साहचर्य, सम्मिलन और समाहिती के प्रति समर्पित होता है। भेद से अभेद की ओर उसका लेखन प्रवृत्त होता है। वर्तमान स्थिति से भी विकट समय था लगभग पूरे मध्यकाल का। एक पर एक बाहरी आक्रमण, अस्थिरता, धार्मिक जातीय वैमनस्य, रूढि़बद्धता, और क्या-क्या, लेकिन हमारे भक्त कवियों ने प्रेम भक्ति के पद रचकर सामाजिक सामंजस्य में अपना महान योग दिया, बल्कि देश की नई सांस्कृतिक धारा ही निर्मित कर दी जो आज भी हमें आप्यायित कर रही है।

                विरोध के स्वर उठने के साथ संवाद की पहल भी होनी चाहिए। लेखक कोई निरंकुश सत्ता नहीं है कि वह पहल करे, हाथ बढ़ाए। यह रेजीम पसंद भले हो लेकिन आखिर इसके पीछे जनेच्छा है, बहुमत है। अपने देश की सरकार है, ईस्ट इंडिया कम्पनी की सरकार नहीं। विरोध को इसी सीमा में रखना चाहिए। संधिकाल में लेखक को अपनी भूमिका को विरोध से आगे सद्भावना एवं सामंजस्य तक ले लाना चाहिए। दूसरी ओर सहिष्णुता और सामंजस्य हमारा स्वभाव नहीं होता तो क्या भाजपा आज इस मुकाम तक पहुँच पाती? अगर सरकार सचमुच भारतीय मूल्यों एवं परंपराओं में आस्था रखती है तो संवाद और सहकार के लिए उसे आगे आना पड़ेगा। विचारधारा और पूर्वाग्रह का हवाला देकर इस पूरे प्रकरण को वाजिब तरजीह नहीं देना किसी के हक में नहीं होगा। भय, संशय और आशंका की धुँध सरकार की जरा-सी संवेदनशीलता सदाशयता से छँट सकती है। बदले की कार्रवाई में लेखकों को पुस्तकें लौटाना और पुस्तकंे जलाना वास्तव में उन्हीं आशंकाओं को पुष्ट करने जैसा है जिससे बुद्धिजीवी उद्वेलित हैं। लेखक सत्ता के, आपके विरोध में रहेंगे, आप उनसे मोर्चा नहीं ले सकते। इतनी शक्तिशाली अमेरिकी सरकार अपने सबसे बड़े आलोचक नोम चोम्स्की से मोर्चा नहीं लेती है, उन्हें सहन करती है। अमरीकियों को अपनी शक्ति का पता है लेकिन यह भी मालूम है कि चोम्स्की की कीमत क्या है। इतिहास ऐसे दृष्टांतों से भरा पड़ा है जिनमें राजसत्ताओं को बौद्धिक सत्ता की उपेक्षा और अपमान की कीमत चुकानी पड़ी। राजसत्ताएँ आती-जाती रहती हैं, होमर और कालिदास, शेक्सपीयर और तुलसी, तोल्सतोय और रवीन्द्रनाथ बने रहते हैं, बने रहेंगे।  -00-

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