Monday, 30 September 2013


प्रथम पुण्यतिथि पर प्रकाशित लेख
                                     किशन पटनायक
       विकल्प की तलाश  जारी रखनी होगी
                                                                                                                                                                                  -शिवदयाल

इकहरा बदन, औसत कद, साधारण पहनावा - आम तौर पर खादी का कुर्ता-पायजामा - आम होने का आभास देता एक बहुत खास व्यक्तित्व! पहली नजर में संभव है किसी समूह में आप उनका नोटिस नहीं ले पाएँ, बषर्तें आपकी उनसे नजरें न मिली हों, उन गहरी, स्थिर आँखों का साक्षात् न हुआ हो। बातचीत में भी वे उतने ही सरल और विनम्र प्रतीत होंगे - आप उस खास को आम समझने लग सकते हैं, लेकिन जब आप उनसे विदा लेकर अपने गंतव्य का रुख करेंगे तो अनुभव होगा कि आप कितने भरे-भरे लग रहे हैं। उनकी पानीदार आँखें, विचार-तरंगों में डूबती-उतराती उनकी खनकदार वाणी का ओज, हाव-भाव में एक ठहराव, व्यवहार में सौम्यता - सचमुच एक विरल व्यक्तित्व ! उनकी अनुपस्थिति का सूनापन कभी-कभी आक्रांत करता है - निजी स्तर पर भी, और सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर भी। किशान   पटनायक एक नेता, चिंतक-विचारक ही नहीं, एक योद्धा-व्यक्तित्व का नाम भी है जो आजीवन विषमता और अन्याय के विरुद्ध व्यूह-रचना में लगा रहा।
किशन  जी के व्यक्तित्व के कई पहलू हैं जो अलग-अलग स्तरों पर प्रभावित करते हैं। उन्होंने अंततः अपने को एक राजनीतिक व्यक्ति ही माना है क्योंकि राजनीति ही व्यवस्था बदलने का सबसे कारगर और सुलभ औजार है। लेकिन 1952 में सोशलिस्ट पार्टी का कार्यकर्त्ता बनकर राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले किषन पटनायक की रुचि और प्रवृत्ति मूल प्रष्नों से दो-चार होने की थी इसलिए अध्ययन और लेखन को उन्होंने हमेषा अपने काम का जरूरी अंग माना। आगे चलकर उनकी गिनती देष के चोटी के बुद्धिजीवियों, चिंतकों में होने लगी। बल्कि सन 74 के आंदोलन में शामिल होने के लिए वे पटना आए तो युवाओं का समूह उन्हें चिंतक ज्यादा और नेता कम समझता था, और कहना होगा कि उनके प्रति एक विशेष किस्म का ‘क्रेज’ या झुकाव था। सच तो यह है कि किशन जी के साथ प्रतिभाश ली युवाओं का एक समूह हर समय, हर दौर में उनके साथ लगा रहा। उनमें एक खास बात थी कि वे युवाओं को कुछ नया सोचने और करने के लिए जैसे कभी-कभी ‘प्रोवोक’ करते , उकसाते। प्रायः हर भाषण और वार्लालाप में वे श्रोता के सोच का दायरा बढ़ा देते थे। अपने अकाट्य तर्कों और विषिष्ट वक्तृता के बल पर ऐसा कर पाते थे।
उन्होंने राजनीति के माध्यम से जीवन और जगत-व्यवहार को जानने-समझने की कोशिश  की। समाजवाद उनके जीवन का लक्ष्य था - समता और नैतिकता पर आधृत मानव-समाज! यह लक्ष्य उनके जीवन की साध्य-वेला में और भी दुष्कर और अलभ्य होता गया। बीसवीं सदी में देखे गए स्वपन फलित होने के पहले ही चकनाचूर हो गए। विकासशील देशों ने भी पष्चिमी पूँजीवादी मूल्यों को अपनाना शुरू कर दिया। विद्रोहों से प्रेरित और अनुस्यूत देशीय चिंतन-प्रणाली अवरूद्ध होती गई और भूमंडलीकरण का विष्व-चिंतन उसका स्थान लेने लगा। समता, न्याय, समाजवाद - असंभव लक्ष्य बनते गए। मनुष्य की श्रेष्ठता की कसौटी उसका शील-गुण और सृजनशीलता नहीं वरन आधुनिक तकनीक के उपयोग और उपभोग की क्षमता बन गई। समाज में बाजार नहीं रहा, बाजार में समाज समाता गया। यानी - ठीक उल्टी दिशा  में मानव-समाज का प्रस्थान। स्वयं किशन जी आषंका व्यक्त करते हैं - ‘‘... विकास और जीवन-स्तर में बढ़ोतरी की दर बनाए रखने के लिए करोड़ों-करोड़ों लोगों का बलिदान करना होगा। बहुत सारी स्थानीय आबादियों का सफाया करना पड़ सकता है, जिस तरह उत्तरी अमेरिका में एक बार हुआ था (उससे छोटे पैमाने पर सोवियत रूप में भी एक बार हुआ था; जरमनी में भी एक बार हुआ था... यानी यूरोपीय लोग इस तरह की कार्रवाइयों से अपरिचित नहीं हैं)। महाहत्याओं और नरसंहार की बजाए आर्थिक योजनाएँ ही ऐसी बनाई जाएँगी कि सफाया अपने आप होने लगेगा। कोई प्रतिकार न होने पर लगातार भुखमरी, महामारी या प्यास से झुंड के झुंड लोग तड़प कर स्पष्ट लेकिन धीमी गति या मात्रा (परिमाण) में मरने लगेंगे, तब इक्कीसवीं सदी में इसको दैवी विनाष या विकास की कीमत कहकर चर्चा से ओझल कर दिया जाएगा।’’ यह तो विश्व -परिदृश्य  है, लेकिन देश  के अंदर भी जो आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य  बनता गया वह कम विचलित करने वाला नहीं था। नब्बे के दशक में एक ओर आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई तो दूसरी ओर साम्प्रदायिकता एक गंभीर चुनौती के रूप में आ खड़ी हुई। किषन पटनायक ने आरक्षण-आंदोलन को इसकी एक काट या जवाब के रूप में देखा लेकिन सत्ता-षीर्ष पर पहुँचे शुद्र नेतृत्व ने इन्हें बहुत निराष किया। मंडल आंदोलन ने उत्तर भारत की राजनीति तो बदल डाली लेकिन ऐसा नेतृत्व खड़ा न कर सका जो पिछड़ों-दलितों की चेतना को सिर्फ सत्ता-प्राप्ति का माध्यम भर न बनाकर एक बड़े सामाजिक-आर्थिक बदलाव का औजार बनाता। उल्टे भ्रष्टाचार और अपराध ने शुद्र राजनीति की रही-सही संभावनाओं को भी धूमिल बना डाला। इन आंतरिक परिस्थितियों ने वैष्विक स्तर पर जारी अमेरीका और पश्चिम परस्त नीतियों को ही प्रकारांतर से पुष्ट किया। गुजरात के तांडव ने तो जैसे यह साबित कर दिया कि लोकतंत्रीय व्यवस्था में भी एक खास मानव-समूह या समुदाय को सुनियोजित ढंग से पाषविक हिंसा का षिकार बनाया जा सकता है और बहुमत के शासन के नाम पर राज्य-व्यवस्था को भी इसमें परोक्ष रूप से शामिल किया जा सकता है।
अगर किशन पटनायक 70 के दशक के बाद से ही ‘वैकल्पिक राजनीति’ को खड़ा करने की कोषिष में लगे तो दूसरी ओर वैकल्पिक सभ्यता के निर्माण के लिए एक विष्व-दृष्टि का भी विकास करते रहे। पूँजी, आधुनिक तकनीक, बाजारवाद, पर्यावरण विनाष और खासकर भूमंडलीकरण की विपदा उनके चिंतन के केन्द्र में रही। उन्होंने लेकिन सभ्यता के इस संकट को लेकर कभी हताषा व्यक्त नहीं की बल्कि इसका सामना करने के लिए विचारों का संधान करते रहे। यही कारण है कि किषन जी उन गिने-चुने विचारकों में हैं जिन्होंने वैष्विकीकरण की चुनौतियों का सिर्फ रोना नहीं रोया बल्कि उसके विष्वसनीय, सार्थक और संभाव्य विकल्प का मार्ग तलाषते रहे। यहाँ उन्होंने गाँधीजी की अंगुली पकड़ी और आधुनिकता की वर्तमान कसौटियों को धता बताया।
किशनजी संगठन के महत्व को समझते थे इसीलिए संगठन बनाने के काम से वे कभी विरत नहीं हुए। उनका चिंतन और उनका कर्म-दोनों एक-दूसरे को परिपूरित करते थे, परिपुष्ट करते थे। सन् 74 आंदोलन के दौरान और उसके बाद भी परिवर्तनकामी जमात जेपी के बाद उनको अपना नेता मानने को तैयार थी, लेकिन वे स्वयं इसके लिए तैयार नहीं हुए। यों देखें तो जेपी और किशन पटनायक में कुछ बातें समान थीं, कुछ आधारभूत बातें, यथा - दोनों नें सत्ता के लिए सिद्धांतों से कभी कोई समझौता नहीं किया; दोनों आजीवन मानव जीवन की बेहतरी के लिए विकल्पों की तलाष में लगे रहे; दोनों समाजवादी धारा का प्रतिनिधित्व करते थे; दोनों का नैतिकता के प्रति विषेष आग्रह है। लेकिन वहीं दोनों दूर-दूर भी दिखाई देते हैं - जेपी विकल्पों की तलाश  में क्रांतिशोधक की भूमिका का निर्वाह करते हुए विचारधारा की परिधि को तोड़ते हैं, जबकि किशन पटनायक अंत तक समाजवादी बने रहते हैं; जेपी की राजनीति के केन्द्र में पार्टी या दल नहीं स्वयं ‘लोक’ है जबकि किशन जी संसदीय लोकतंत्र में पार्टी की महत्ता स्वीकार करते हैं; जेपी और किषन पटनायक के बीच कहीं लोहिया हैं जो ‘जाति-वर्ण’ को बदलाव का माध्यम बनाना चाहते हैं - किशन पटनायक इसी आइडिया को आगे तक ले जाकर ‘भारत शूद्रों का होगा’ का उदघोष करते हैं; दूसरी ओर जेपी के अंदर का मार्क्सवादी जातीय चेतना की सीमा और भंगुरता के प्रति सशंकित रहता है और वर्ग संगठन के माध्यम से जातीय चेतना कर शोधन करना चाहता है, जो जातीय चेतना का वर्गीय चेतना में रूपांतरण चाहता है ताकि वंचित जातियों के बीच क्षैतिज विभाजन में क्रांति या बदलाव का लक्ष्य-बिंदु ही न लुप्त हो जाए!
इसमें कोई शक नहीं कि अस्सी के दषक से किशन जी भारत में लोकतंत्र और समाजवाद के सबसे प्रखर व ओजस्वी प्रवक्ता व व्याख्याकार रहे। उन्होंने नयी परिस्थितियों में समाजवादी सिद्धांतों के नवीकरण और शोधन का भरसक प्रयास किया और समाजवाद को अब भी एक मूल्य के रूप में बचाने में कामयाब रहे। इतने कठिन समय में यह उनकी महान उपलब्धि मानी जाएगी। उन्होंने आज की जटिल परिस्थितियों को समझने में पूर्व  प्रचलित विचारधारा को असमर्थ बताने की हिम्मत दिखाई और नये शास्त्रों और विचारों के संधान का आग्रह रखा। दूसरी ओर जमीनी आंदोलनों से जुड़े कार्यकर्ताओं के बीच अपनी जीवंत व प्रेरणादायी उपस्थिति से नयी पहलकदमियों की जमीन तैयार की। उनकी अनुपस्थिति में उनका संगठन ‘समाजवादी जन परिषद’ ही नहीं, समाजवादी आंदोलन नेतृतव के संकट से जूझ रहा है। किशनजी के युवजन साथी इस चुनौती को अवष्य स्वीकारेंगे, क्योंकि आखिरकार दुनिया को विकल्पहीनता में नहीं छोड़ा जा सकता! (प्रभात खबर में प्रकाशित )

ई-मेल- sheodayal@rediffmail.com


                        

Friday, 27 September 2013

                                        होना और खोना 
                                                                                                                            - शिवदयाल
सदा सुहागन के पौध को मुर्झाते देख रहा हूं - जीवन में पहली बार। अब तक हर मौसम में सदा सुहागन को गुलाबी, बैंगनी और सफेद फूलों से लहलहाते ही देखा था। नाम भी इसका इसीलिए रखा गया हो - सदा सुहागन, कभी न मुरझाने वाला। हर समय वसंत का अहसास कराने वाला। शीत-घाम-पावस - सबको समान भाव से ग्रहण करने वाला। मौसम की अनुकूलता-प्रतिकुलता से निष्प्रभ सदा हरसाने वाला। फूल भी ऐसे जो ताबड़तोड़ खिलते हैं और खिलते ही फौरन मुरझा नहीं जाते। कम-से-कम दो दिन तो डंठलों से लगे ही रहते हैं, इसी बीच उनके सूखते-मुरझाते दूसरे फूल डालियों में खिल आते हैं। इसीलिए सदा सुहागन इतना पल्लवित-पुष्पित दिखता है - नवब्याहता  ज्यों साज-सिंगार से सजी-धजी ,  अपने पर रीझी ड्योढ़ी पर खड़ी हो। आखिर सदा सुहागन के पफूलों को किसका इंतजार रहता है।
एक बार लम्बे समय तक बाहर रहने के बाद अपने ठिकाने लौटा था - बहुत निराश! पिछवाड़े का दरवाजा खोला तो देखा फर्श पर मिट्टी की एक परत जम गई थी जिसपर खर-पतवार उग आए थे। एक जंगली लतर जालियों पर चढ़कर अंदर बारामदे में जैसे छाया दे रही थी। कुछ क्षणों तक खड़ा मैं सोचता रहा - हमारी अनुपस्थिति भी कितनी उपस्थितियों को संभव बनाती है! तभी कोने में रखे गमले पर दृष्टि गई तो सदा सुहागन की फुनगी पर एक फूल मुस्करा रहा था। मेरी देह में झुरझुरी दौड़ गई। आँखों में आँसु निकल आए। उस अनुभव को व्यक्त करना आसान नहीं। मुझ अकेले की जैसे बाट जोह रहा था सदा सुहागन का वह नन्हा-सा पौधा । मैं झुका, नीचे बैठकर पंखुड़ियों को छुआ, थोड़ी मोटी, गहरे हरे रंग की पत्तियों को भी। उस स्निग्ध् छुअन ने जैसे अंतर का सब क्लेष हर लिया। यह पौध मानो मुझसे कह रहा था - देखो, मैं हूँ! तुम्हारे जाने के बाद का यह लंबा निर्जला उपवास भी मुझे मार न सका। वर्षा के छींटे मिले कभी-कभार, नही तो गर्मियों के तपते दिनों और जाड़ों की ठंडी सूखी रातों से ही पाला पड़ता रहा। जड़ों को पानी न मिला तो हवा से नमी सोखकर मैं जीवित रहा। जीवित रहा कि अपना धर्म  निभाऊँ , अपनी शाखाओं पर फूल खिलाऊँ । चींटियों ने कोंपलों का रस चूसा, भँवरों और मधुमक्खियों ने पराग लूटे। और मेरा होना क्या है! मैं फैला नहीं, छतनार नहीं हुआ, तो क्या। जितने में रहा,  जितना रहा, उतने को इसी के लिए तो बचाकर, सहेजकर रखा!
आँसू पोंछते उठकर मैंने पहला काम किया कि उस गमले में, सदा सुहागन की जड़ों में पानी दिया, अपने को धन्य किया। फिर नये सिरे से अपने को बटोरकर आने वाले कठिनतर दिनों का सामना करने के लिए तैयारी शुरू की। तबसे कहीं भी रहूँ, सदा सुहागन मेरे साथ रहता चला आया है।
यों अब फूल भी ‘उत्पाद’ बन गए हैं। बारहमासा फूलों की कुछ प्रजातियाँ भी विकसित कर ली गई हैं। बचपन में मौसम की पहली बरसात के बाद गेंदे के नवांकुरित पौधें के लिए हम नर्सरियों और कोठियों को छान मारते थे। बड़े जतन से पौधे  को गीली मिट्टी में रोपकर उसके बड़े होने का इंतजार करते। पहली कली निकलते ही ऐसा उत्साह छाता मानो परिवार में किसी नये का आगमन हुआ हो। गेंदा  पहले बरसात का फूल था जो जाड़ा रहते खिलता रहता। आज वह प्रायः बारहमासा पफूल है। भक्तिभाव बढ़ने के साथ पूजा स्थलों पर उसकी विशेष माँग है। लेकिन आश्चर्य है, मुझे अपने शहर में कभी भी सदा सुहागन के फूलों की माला नहीं दिखी। मन को कहीं तसल्ली होती है कि सदा सुहागन के पफूल ‘उत्पाद’ बनने से बचे हुए हैं।
लेकिन सदा सुहागन को सूखते-मुझाते भी तो कभी नहीं देखा था। पहली बार देख रहा हूँ - पहले ऊपर की कोंपलें सूखीं और पिफर पत्ते और डंठल और तना ...। जड़ों से एक शाखा ऐसे निकली है जो मानो किसी और पौधे  का अंग हो। इस पर हरीतिमा अभी बची हुई है। लेकिन तने के बाद अगर जड़ भी सूखने लगे, तब? भादो की भरी बरसात में इस पौधे  का मुर्झाना संतप्त कर रहा है। सर्दी-गर्मी होती तो एक बहाना होता मन को समझाने-बहलाने का। रोज पानी देता हूँ और मन ही मन प्रार्थना करता हूँ कि यह पौधा  बच जाए। प्रार्थना लेकिन बिरथ जा रही है। और मन अभी उस स्तर तक नहीं सध जहाँ कि चीजों के होने और खोने का अंतर मिट जाए। अपनी तरह से यह नई दुनिया भी तो यही आग्रह कर रही है कि जो जा रहा है उसे जाने दो, उसके लिए शोक न करो, विदा-गीत न गाओ, उसे रोकने की कोशिश न करो। उस ओर से निश्चेष्ट हो जाओ और मुक्ति पा लो।
किसी अपशकुन की तरह सदा सुहागन के पौधे  को मुझाते देख रहा हूँ!

(दुनिया मेरे आगे , जनसत्ता ,२४ सितम्बर  २०१३ ) 

Saturday, 21 September 2013

शिवदयाल की कहानियां : विमर्श गोष्ठी 
28 नवम्बर 2009
दो खण्डों में विडियो क्लिपिंग पोस्ट की जा रही है (सम्पादित अंश ). आयोजन की अध्यक्षता अस्सी के दशक के चर्चित कथाकार शेखर ने की. मुख्य अतिथि  हिंदी-अंग्रेजी के  विद्वान , आलोचक  एवं कला  समीक्षक डॉ. शैलेश्वर सती  प्रसाद थे जबकि विशिष्ठ अतिथि थीं  कथाकार उषा किरण खान. संचालन   कवि एवं वातायन मेडिया के राजेश शुक्ल ने की .प्रतिभागियों में प्रमुख थे -  कवि अलोक धन्वा , उपन्यासकार  व्यासजी मिश्र , प्रधान महालेखाकार अरुण कुमार सिंह, इतिहासकार डॉ. विजय कुमार, शायर संजय कुमार कुंदन , कवि डॉ. निखिलेश्वर प्रसाद वर्मा, प्रो. किरणबाला प्रसाद,  नाटककार योगानंद  हीरा , कमलेश, एक्टिविस्ट नवीन,  कवि अरुण नारायण , कवि मुसाफिर बैठा, राकेश नंदन, आभा  सिन्हा , सृष्टि आदि . 




Saturday, 7 September 2013

समय : दो कविताएं
   
(1)
समय जम गया था
मैंने अपना पूरा ताप दिया
समय पिघल कर नदी बन गया
और मैं बन गया
किनारे पर हिमशिला

(2)
समय था
समय नहीं है
समय राख हो गया !
हम दोनों एक-दूसरे को बर्बाद करते रहे
समय मुझे कभी
मैं समय को कभी -
और समय राख होता रहा - -
समय-जो था
समय-जो रहेगा
अभी राख हो गया है !

पर चेतना की आँधी में
समय की राख उड़ती है
जहाँ-जहाँ गिरती है
(मुझको छूती है)
फफोले उग आते हैं
और समय जिन्दा हो जाता है
-मैं जल जाता हूँ !
                                     - शिवदयाल

  नव-चैतन्य के महावट - रवींद्रनाथ                                 - शिवदयाल  ब चपन में ही जिन विभूतियों की छवि ने मन के अंदर अपना स्थाई निवा...