Wednesday, 19 January 2022

                               स्वराज के लिए हमें एक और लड़ाई लड़नी होगी

                                                                                                                   - शिवदयाल

आजादी के चौहत्तर साल पूरे हुए। अगले साल 2021 में हम हीरक जयंती मनाएँगे - आजादी के पचहत्तर साल! यह प्रत्येक भारतीय के लिए विशेष, विरल गौरव-उपलब्धि है। ऐतिहासिक दृष्टि से विचार करें तो पिछले हजार वर्षों में भारत के इतिहास का यह सबसे उज्ज्वल कालखण्ड है। पहली बार उपमहाद्वीप के इतने बड़े भू-भाग में एक ध्वज के नीचे भारत की जनता ने अपनी सम्प्रभु सत्ता स्थापित की और उसे सफलतापूर्वक स्थिर रखा है। सदियों तक पराधीनता और औपनिवेशिक शोषण-दमन में पिसने के बाद स्वतंत्रता हासिल करके दुनिया के प्रमुख देशों में अपना स्थान बना लेना भारत की जनता में अंतर्निहित शक्ति और क्षमता का परिचायक है। हमारी जो भी उपलब्धियाँ हैं, उन्हें हमने लोकतंत्र के माध्यम से संभव किया है, इससे दुनिया में आज भारत का विशेष समादर और प्रतिष्ठा है। हम स्वतंत्रता के लिए लड़ते-जूझते नये मूल्य भी सृजित करते रहे, गढ़ते रहे; प्रतिकार और प्रतिरोध के नये औजार और युक्तियों का आविष्कार भी किया। इनका महत्व और उपादेयता केवल हम तक सीमित न रही, विश्व समुदाय के लिए भी इनकी प्रासंगिकता बनी। राष्ट्रीय आंदोलन का दौर गहन विचारमंथन का दौर भी रहा, एक आत्मविस्मृत राष्ट्र मानो निश्चेतना से जाग रहा था। हमारा राष्ट्रीय आंदोलन इसीलिए केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने का साधन मात्र नहीं बना रहा। उसके अंदर सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक परिवर्तन के अतिरिक्त मानव-मुक्ति के उपायों की तलाश और सिद्धि का संकल्प भी शामिल था। राजनीति और समाज ही नहीं, अर्थ, धर्म, अध्यात्म, कला, साहित्य, विज्ञान - जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एक से बढ़कर एक विभूतियाँ एक नये राष्ट्र के निर्माण में अपना योग देने के लिए अवतरित हो रही थीं।

भारत आजादी के कुछ ही दशकों बाद यदि दुनिया में अपनी अलग सक्षम पहचान बनाने में सफल हुआ तो उसके पीछे यही कारण थे। भारत अपने लोकतंत्र के रास्ते से भी नहीं डिगा तो, जयप्रकाश नारायण के शब्दों में, इसका कारण भारत के लोगों की सांस्कृतिक व आध्यात्मिक प्रौढ़ता थी। जबकि इसके साथ स्वतंत्र हुए अनेक देश, पड़ोसी सहित, सर्वसत्तावाद के दलदल में उतर चुके थे। भारत पूर्वोत्तर में साम्यवादी चुनौती का सामना करने में भी (आजतक) सफल रहा, भले ही यहाँ साम्यवाद स्थापित करने के लिए स्वयं लोकतंत्र और इसकी व्यवस्थाओं को ही जरिये के रूप में इस्तेमाल किया जाता हो। आम भारतीय मानस लाख कमियों के बावजूद, अनेक विपथगामी प्रवृत्तियों के रहते भी यदि लोकतंत्र के प्रति विमुख नहीं हुआ तो मानना पड़ेगा कि लोकतंत्र हमारी सांस्कृतिक निर्मिति से अविच्छिन्न रूप से जुड़ा है, उसका अभिन्न अंग है। लोकतंत्र में रहना हमारी आंतरिक वृत्ति है, यह थोपा हुआ या लादा हुआ विचार या व्यवहार-प्रतिमान नहीं है। यही कारण है कि, भले ही वह पश्चिमी ढर्रे और ढब का हो, लोकतंत्र को चलाने में हम सफल रहे हैं और उचित ही आज दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहे जाते हैं। लेकिन क्या आजादी से इतना ही कुछ हासिल करना था हमें? हमने लोकतंत्र चलाया, बड़ी अर्थव्यवस्था बने, प्रमुख औद्योगिक देशों में गिने गए, लेकिन क्या सचमुच भारत अपने रास्ते चला? आजादी के पचहत्तरवें साल में यह सवाल उद्वेलित करता है....!

पराधीनता में पिसते कोटि-कोटि भारतीय नर-नारी जिस मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे थे, उसका लक्ष्य था - स्वराज। स्वराज एक जादुई शब्द था, इसका प्रभाव इतना था कि स्वतंत्रता सेनानियों को ‘सुराजी’ कहा जाता था, अर्थात वह जो स्वराज के लिए जूझ रहा है, बलि जा रहा है। लोकतंत्र का अर्थ एक साधारण व्यक्ति भले न समझता हो, वह उतना चलन में था भी नही ंतब, लेकिन स्वराज का मतलब जरूर समझता था। स्वराज शब्द का एक विशेष अर्थ था, केवल ‘अपना शासन’ भर तक इसका आशय नहीं था। यह शब्द हमारे सांस्कृतिक बोध में विनयस्त था, यह एक राजनीतिक पद (टर्म) मात्र नहीं था। यह हमारी जातीय स्मृति में टँका हुआ एक पवित्र शब्द था जो वेदों से चलता हुआ सहसा तीन सौ वर्ष पहले छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित ‘हिन्दवी स्वराज’ पदबंध में सर्वथा नये अर्थ और संदर्भ में प्रतिष्ठित हुआ। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ब्रिटिश राज के खिलाफ इसका पहला ओजपूर्ण प्रयोग महर्षि दयानंद सरस्वती ने किया। वास्तव में वेदों की ओर लौट चलने के आवाहन के साथ ही उन्होंने स्वराज को ही अपना जीवन अर्पित कर दिया। लोकमान्य गंगाधर तिलक के पहले गोपालकृष्ण गोखले और दादाभाई नौरोजी स्वशासन के संदर्भ में इसका प्रयोग कर चुके थे। लेकिन संभवतः एक मुकदमें के दौरान तिलक ने यह उद्घोष किया - ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूँगा।’’ इस कथन का विद्युन्मय प्रभाव जनमास पर हुआ। मानो यह ‘वन्दे मातरम’ की पूरक अभिव्यक्ति थी, मातृभूमि वंदना से आगे इसमें अपना, ‘अपने मन का शासन’ स्थापित करने का आग्रह और संकल्प था। तिलक का यह उद्घोष कितने ही स्वातंत्र्यवीरों का जीवनोद्देश्य बन गया। इसमें भारतीय राष्ट्रवाद की सबसे प्रखर अभिव्यक्ति थी। पूर्ण स्वराज की माँग करनेवाले पहले नेता तिलक ही थे। 1909 में ’‘हिन्द स्वराज’ कीे अपनी सभ्यता-विमर्श मूलक पुस्तक में गाँधीजी की दृष्टि में एक ओर ‘स्वराज का मतलब है सर्वाधिक दीन-हीन देशवासियों की स्वतंत्रता। ऐसी भारत सरकार जो देश की वयस्क जनसंख्या के बहुमत से कायम की गई हो। वयस्कों में वे स्त्री-पुरुष जिनका यहाँ जन्म हुआ है, उनके साथ वे लोग भी शामिल होंगे जो बाहर से आकर यहाँ बसे हैं। मेरा स्वराज मुट्ठी भर लोगों की सत्ता-प्राप्ति से नहीं आएगा, बल्कि सत्ता का दुरुपयोग किए जाने की सूरत में उसका प्रतिरोध करने की जनता की सामर्थ्य से विकसित होगा’’, तो दूसरी ओर ‘स्वराज सरकार के नियंत्रण से मुक्त होने का सतत प्रयास है, सरकार चाहे विदेशी हो या देशी। स्वराज एक पवित्र शब्द है। वह वैदिक शब्द है। उसका अर्थ है - स्वशासन, आत्मनिग्रह। वहाँ संयमों से मुक्ति नहीं बल्कि उनका पालन है।’’ गाँधीजी ने ‘स्वराज’ को एक और ही आयाम दे दिया, उसे अहिंसा और आत्मनिग्रह जैसी नैतिक स्थापनाओं से जोड़कर, इस प्रकार यह एक राजनीतिक पद से बढ़कर एक नैतिक-आध्यात्मिक संदर्भ से जुड़ गया। वास्तव में ’हिन्द स्वराज’ की अपनी कल्पना को गाँधीजी ग्राम-स्वराज में ही मूर्तिमान करने की चेष्टा करते रहे। ग्राम-स्वराज में ही उनके हिन्द स्वराज की चरम अभिव्यक्ति होती थी। एक अर्थ में गाँधीजी तिलक के राष्ट्रवाद को गाँवों की पुनर्रचना - समत्व और सहयोग-सहकार पर आधारित एक बेहतर, आत्मनिर्भर संस्करण, से जोड़ रहे थे। और उस समय तो भारत हर प्रकार से गाँवों का ही देश था!

इस बीच दो घटनाएँ उल्लेखनीय हैं - स्वराज से जुड़ी। 1923 में विधान परिषदों में शामिल होने-न होने के सवाल पर काँग्रेस में मतभेद हो गया। देशबंधु चितरंजन दास की अध्यक्षता में मोतीलाल नेहरू ने स्वराज पार्टी का गठन किया और स्वयं उसके सचिव बने। हालाँकि 1923 में चितरंजन दास के निधन के पश्चात यह संगठन मृतप्राय हो गया। दूसरी महत्वपूर्ण घटना जो स्वतंत्रता आंदोलन में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई, वह थी 1929 में काँग्रेस का लाहौर अधिवेशन। लार्ड इरविन द्वारा भारत को अधिराज्य-स्थिति (डोमीनियन स्टेटस) प्रदान करने की सहमति देने के बाद अपने वादे से मुकरने के खिलाफ काँग्रेस ने लाहौर अधिवेशन में 19 दिसम्बर, 1923 को पूर्ण स्वराज (च्नतद ैूंतरए ज्वजंस प्दकमचमदकमदबम) का प्रस्ताव जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में पारित किया। इसी के बाद पूर्ण स्वराज ही काँग्रेस का लक्ष्य बन गया।

महायुद्ध की समाप्ति के पश्चात न केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारी बदलाव हुआ, बल्कि भारत में भी राजनीति का एजेंडा, उसकी प्राथमिकता बदल गई। कैसी विडम्बना कि जैसे-तैसे स्वतंत्रता की घड़ी निकट आती गई, गाँधीजी अप्रासंगिक होते चले गए। इतिहास की धारा को मोड़ लेने की उनकी सामर्थ्य नहीं रह गई। उनके विश्वस्त, उनके अनुयायी, उनके ‘उत्तराधिकारी’ उनकी बात सुनने को तैयार नहीं थे। धर्म के आधार पर भारत-विभाजन की पटकथा लिखी जा चुकी थी। 1946 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में संविधान सभा का गठन हुआ । गाँधीजी के कहने पर डॉ. भीमराव अम्बेडकर को संविधान प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनया गया। ऐसे समय गाँधीजी के एक अनुयायी श्रीमननारायण अग्रवाल ने ‘स्वतंत्र भारत के लिए गाँधीवादी संविधान’ (ळंदकीपंद ब्वदेजपजनजपवद वित थ्तमम प्दकपंए 1946) नाम दस्तावेज तैयार किया जिसकी प्रस्तावना स्वयं गाँधीजी ने लिखी थी। उन्होंने स्वीकार किया था कि उस दस्तावेज में कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे वे असहमत हों। स्वराज के संदर्भ में इस दस्तावेज की थोड़ी चर्चा जरूरी है। श्रीमननारायण ने परिचयात्मक टिप्पणी में लिखा कि भारत के लिए तैयार किया जाने वाला संविधान आदर्श रूप में भारत की अपनी देशी संवैधानिक प्ररम्पराओं पर आधारित होना चाहिए। ये परम्पराएँ प्राचीन समय से अस्तित्व में रही थीं। उन्होंने आगे लिखा कि अतीत में भारत के संवैधानिक विकास के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि अतीत में राजतंत्र, निरंकुश तंत्र, प्रजातंत्र, गणतंत्रवाद, यहाँ तक कि अराजकता अथवा शासनहीनता के साथ भी हमारे पूर्वजों ने प्रयोग किए हैं। ऐसी समृद्ध विरासत के रहते भारत के लिए पश्चिमी देशों के संविधानों का एक मिश्रण तैयार करना न केवल अनुचित, बल्कि अपमानजनक है। वास्तव में गाँधीजी के सपनों के भारत की झलक, स्वराज की संक्षिप्त लेकिन ठोस रूपरेखा इसी दस्तावेज (संविधान) में थी - विकेन्द्रित राजनीतिक एवं प्रशासनिक ढाँचा जिसकी मूल इकाइयाँ ग्राम पंचायतें थीं। इन्हीं इकाइयों से मिलकर ऊपरी स्तर की सरकार बनती थी। ग्राम पंचायतों को न्यायिक कार्य सहित विस्तृत अधिकार दिए गए थे। मौलिक अधिकारों के साथ ही मौलिक कर्त्तव्यों को जोड़ा गया था। कुल बाइस अध्यायों में ‘मूलभूत सिद्धांत’, ‘मौलिक अधिकार एवं कर्तव्य’, ‘प्रांतीय सरकार’, ‘केन्द्र सरकार’ तथा ‘न्यायपालिका’ जैसे विषय शामिल थे। इस दस्तावेज में संविधान-निर्माण की भारतीय दृष्टि को प्रस्तुत किया गया था। इसमें वैकल्पिक भारतीय संवैधानिक परिकल्पनाओं को स्थान मिला था। लेकिन संविधान सभा में नेहरू-अम्बेडकर ने इस दस्तावेज को पूरी तरह अस्वीकृत कर दिया।

‘स्वराज’ शब्द को ही संविधान निर्माताओं ने भारत के संविधान से बाहर कर दिया, देशनिकाला दे दिया। संविधान-निर्माण में उन लोगों की चली जिन्हें ग्राम, स्वराज, अहिंसा जैसे शब्दों से एलर्जी थी। ये शब्द ही संविधान में ढूँढ़ने से नहीं मिलेंगे। जिनके हाथ में स्वतंत्र भारत की बागडोर सौंपी गई थी (स्वयं गाँधीजी के हाथों) उनका भारत-बोध उथला था, वे पश्चिम परस्ती में भारत का कल्याण देख रहे थे। भारत की प्राचीन विरासत, देशी चिंतन एवं विचार प्रणालियों को शंका-संदेह के साथ, हेय दृष्टि से देखते थे। इसलिए जिस जादुई शब्द ने लाखों-करोड़ों लोगोें, गाँवों-किसानों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा, वह स्वराज भारत के कर्णधारों के लिए किसी काम का नहीं रह गया। गाँधीजी ने स्वराज की एक सर्वसमावेशी व्याख्या प्रस्तुत की थी और इसको लेकर एक वर्ग में व्यक्त की जा रही शंका के निवारण का प्रयत्न किया था - ’‘जो लोग खुद आजाद होना चाहते हैं, वे दूसरों को गुलाम बनाने की सोच भी नहीं सकते। आजादी राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक - तीनों प्रकार की होनी चाहिए।’’ लेकिन भारत के नये देशी, लोकतांत्रिक शासक अंग्रेजों से भी बढ़कर अंग्रेज थे।

15 अगस्त, 1947 को औपनिवेशिक शासन से निचुड़ा हुआ, और तब भी बँटवारे से लहूलुहान एक गरीब देश था भारत। एक कमजोर नवजात की तरह इसकी देखभाल करनी थी। अंग्रेजों ने जो कुछ नष्ट किया था, जिसके चलते भारत दरिद्र बना था, सबसे पहले उसे पुनर्सृजित करने की जरूरत थी। इस दृष्टि से सर्वोपरि प्राथमिकताएँ थीं - अर्थतंत्र (ग्रामीण अर्थव्यवस्था) और शिक्षा तंत्र को नये सिरे से खड़ा करना। ध्यान से देखिए तो यही स्वराज का एजेंडा होता। ग्राम-स्वराज की व्यवस्था को लागू करके भारतीय गाँवों को फिर से खड़ा किया जा सका था, उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सकता था। इससे खाद्य संकट का निवारण हो सकता था, साथ ही ग्रामोद्योगों से बेरोजगारी पर भी काबू पाया जा सकता था। दूसरी ओर शिक्षा प्रणाली में औपनिवेशिक प्रभाव को कम से कमतर करने की पहल तत्काल ली जानी चाहिए थी। स्वभाषा द्वारा अर्जित स्वाधीन बुद्धि और चेतना जगाने वाली शिक्षा, जो अपनी मिट्टी, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और विरासत से जोड़े, उनसे प्रेम और सम्मान करना सिखाए, उनके प्रति श्रद्धा जगाए। लेकिन स्वतंत्र भारत का नेतृत्व अलग राह चला - पश्चिमी ‘आधुनिकता’ और ‘अंग्रेजियत’ से मोहाविष्ट! इस तरह स्वतंत्रता और स्वराज के रास्ते अलग हुए। स्वराज के जो भी औजार हो सकते थे, स्वतंत्रता मिलते ही हाथ से छूट गए, जानबूझ कर उन्हें छोड़ दिया गया। गाँव तो छूटे ही, उनके साथ महाधोखा हुआ, हम किसी एक भारतीय भाषा को राष्ट्रभाषा नहीं बना सके। क्षेत्रीय भाषाओं की बात ही क्या! ज्ञान, संवाद और शासन-प्रशासन के लिए हमें हमारे ही नेतृत्व ने स्वतंत्र भारत में अंग्रेजी भाषा पर निर्भर बना दिया। अँग्रेजी आज भी हम पर लदी हुई है। उपनिवेशवाद तो उपनिवेशों की संस्कृति नष्ट करके ही खड़ा होता है, फिर भारत तो उपनिवेशवाद के अलावा सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का भी शिकार रहा है, अंग्रेजी राज के भी पहले से। ऐसे में स्वभाषा के अभाव ने हमें बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से आज तक हीन बनाकर रखा है। हमारे पास मानो स्वयं को देखने-परखने की दृष्टि ही नहीं है। पिछले पचहत्तर वर्षों में हम जिन राजनीतिक विचारों, अवधारणाओं और शब्दावलियों से बँधे रहे है, उन्होंने भी प्रकारान्तर से हमें अपने इतिहास और सांस्कृतिक विरासत पर पुनर्दृष्टि डालने से रोक रखा है। ऐसी कोई भी कोशिश हो तो तुरंत ‘पुनरुत्थानवाद’ का शोर मचने लगता है और उसे अपराध की श्रेणी में डाल दिया जाता है। स्वतंत्रता-पूर्व से ही राजनीतिक वर्ग के एक बड़े हिस्से में यह प्रवृत्ति रहती चली आई है। उस समय भी हमारे कुछ विचारकों और बुद्धिजीवियों ने हमें सांस्कृतिक दरिद्रता के प्रति सचेत किया था और वास्तविक स्वराज के लिए ‘वैचारिक स्वराज’ की जरूरत पर बल दिया था।

स्वतंत्रता पश्चात सरकारों ने भले स्वराज के आदर्श से अपने को अलग कर लिया हो, स्वराज के कार्यक्रम को अपने स्तर से कुछ प्रयोगधर्मी नेता आगे बढ़ाने की कोशिश करते रहे। संत विनोबा का सर्वोदय स्वराज की उपलब्धि को ही लक्षित था, उन्होंने स्वराज-शास्त्र की कल्पना तक की। जयप्रकाश नारायण ने लोक-स्वराज की कल्पना की और मानो इसी की स्थापना के लिए संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया। राममनोहर लोहिया का स्वभाषा को  लेकर दुर्धर्ष आग्रह अंततः स्वराज के ही तो पक्ष में जाता था। ये सही अर्थों में स्वतंत्र भारत के राष्ट्रनायक थे, स्टेट्समैन थे।

आज की स्थिति में स्वराज का अर्थ है ऐसी व्यवस्था जिसका प्रत्येक नागरिक के साथ आत्मिक जुड़ाव हो, हर व्यक्ति और वर्ग-समूह उसे अपना माने। जिसमें रहते हुए किसी भी प्रकार - मन से, बुद्धि से या ज्ञान-कौशल से पराश्रित होने का बोध न हो, जिसमें शासक और शासित का भेद मिट जाए, जो सबके लिए सब प्रकार से अनुकूल हो। स्पष्ट है कि हमनें स्वतंत्रता तो हासिल की है, स्वराज्य से कोसों दूर हैं। सांत्वना की बात है कि हमारे पास लोकतंत्र है जिसे हम स्वराज-सिद्धि में लगा सकते हैं। अनेक दशकों बाद ‘राष्ट्रवाद’ एक बार फिर हमारे राष्ट्रीय जीवन में एक लोकप्रिय शब्द बन गया है। स्वराज की पूर्वशर्त है स्वराज-चेतना, जो आत्मसम्मान और अपने पैरों पर खड़ा हो सकने के साहस और संकल्प के भाव से उपजती है। उपनिवेश रहे देशों में विऔपनिवेशीकीकरण की प्रकिया को भी इसी से बल मिलता है। देखना है कि राष्ट्रवाद इसमें हमारी कितनी मदद कर सकता है, स्वराज-चेतना से जुड़कर ही वह अपनी सार्थकता सिद्ध करेगा - जन, राष्ट्र, स्वावलम्बन, स्वराज- ये आपस में जुड़े हुए, गुँथे हुए प्रत्यय हैं। वैसे इसमें कोई संदेह नहीं कि युवा पीढ़ी इस ओर आकृष्ट हुई है, वह उपनिवेशवाद के संघातक प्रभावों को अनुभव कर रही है और स्वराज का महत्व भी समझने लगी है। तभी तो आज ‘गणित एवं विज्ञान में स्वराज’ की बातें होने लगी हैं, बाकी विषयानुशासनों की बात ही क्या। स्वभाषा के महत्व को सरकार आज स्वीकार कर रही है। प्राथमिक स्तर तक मातृभाषा में शिक्षण इसी दिशा में बढ़ाया गया कदम है। कितना अच्छा हो कि जब हम 2047 में स्वतंत्रता का शती-वर्ष मनाएं तो हमारे अंदर यह ग्लानि न हो कि हमारी कोई सर्वस्वीकृत, सबके मन में श्रद्धा जगानेवाली एक राष्ट्रभाषा नहीं है। स्वराज सिद्धि के लिए वास्तव में हमें एक और लड़ाई लड़नी होगी, और इसकी शुरुआत ’स्व‘ से, स्वंय से करनी होगी - अपनी संकीर्णताओं, अपनी हीन भावना, अपनी परमुखापेक्षी वृत्ति से पहले लड़ना होगा। हमारे राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने स्वराज के विषय में कितनी सुंदर बात कही है-

                                                               ‘जो पर-पदार्थ के इच्छुक हैं

वे चोर नहीं तो भिक्षुक हैं

हमको तो ‘स्व’ पद-विहीन कहीं

है स्वयं राज्य भी इष्ट नहीं!’

                                                                          - शिवदयाल (नवनीत , अगस्त 2020 अंक में प्रकाशित।).  

 



Monday, 23 August 2021

 जाति गणना बगैर

                               - शिवदयाल

कई बार ऐसा लगता है जैसे भारत उनतीस राज्यों का संघ नहीं बल्कि वास्तव में छह हजार जातियों का संघ है। जाति को भारतीय समाज का एकमात्र और अंतिम सत्य मानने वालों की अगर चले (और चलती ही है) तो एक दिन शायद ऐसा होकर रहे। भारत को आधिकारिक रूप से छह हजार चार सौ या फिर उतनी जातियों का जितनी कि 2010 की जनगणना में गिनती आए, संघ घोषित कर दिया जाए। तब क्या होगा? तब वे सारे मसले हल हो जाएंगे जो जाति से जुडे़ हैं।

जातीय संघ वाले भारत में प्रत्येक जाति को वे सब अधिकार के दिए जाएं जो अभी उ-प्र-, बिहार, असम, गुजरात, तमिलनाडु आदि राज्यों को है। इससे प्रत्येक जाति को विकास करने का बराबर अवसर मिलेगा और यह शिकायत नहीं रह जाएगी कि कोई दूसरा उनकी राह का रोड़ा बन रहा है। जाति को सर्वेसर्वा मानने वालों के लिए यह एक महान मूल्य होना चाहिए। ऐसे समाज और ऐसे राष्ट्र की स्थापना ही उनका अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। ऐसे समाज में क्रान्ति या बदलाव की जरूरत अगर होगी तो सिर्फ इसलिए कि किस प्रकार भारतीय समाज को स्वतन्त्रता आंदोलन-पूर्व बल्कि औद्योगिकीकरण-पूर्व की स्थिति में कितनी जल्दी पहुंचा दिया जाय जहाँ कि जातीय टोले हों, जातीय पंचायतें हों, जातीय बाजार-हाट हों, और जातीय उत्पादन केन्द्र हों। अन्तरजातीयता की जहाँ कोई स्थिति या अवसर ही न हो। यह भावी भारत के निर्माण के लिए एक विचार बिंदु या परिकल्पना है।

जातीय जनगणना के द्वारा इस लक्ष्य की सिद्धि की दिशा में बढ़ा जा सकता है। जातीय शोषण एवं भेदभाव रोकने का यह एक महत्वपूर्ण हथियार साबित हो सकता है। कम से कम जातीय जनगणना के पक्षधर ऐसा ही मानकर चल रहे हैं।

सन् 1901 में जातीय जनगणना में अंग्रेज सरकार ने दो हजार सात सौ अड़तीस जातियों का पता लगाया था। आज सौ साल बाद समाजविज्ञानियों एवं जनसंख्याशास्त्रियों के आकलन के अनुसार लगभग तीन हजार से लेकर छह हजार चार सौ जातियां हैं। यह संख्या पाँच हजार के पार है, इससे तो शायद ही कोई इनकार करे। जाति हजारों सालों से भारत सामाजिक स्तरीकरण का प्रमुख आधार रही है। यह सामाजिक विभेद का भी प्रमुख जरिया रही है। जातियों की आर्थिक भूमिका बहुत मजबूत रही है। जातीय विभाजन को पेशागत विभाजन के रूप में भी पहचाना जा सकता है। इसे चतुर्वर्ण के रूप में धर्म का पिष्टपोषण भी मिलता रहा है और पुनर्जन्म की व्यवस्था से सम्बद्ध कर दिया गया है। जाति व्यवस्था में जन्म से ही व्यक्ति की सामाजिक स्थिति निर्धारित हो जाती है जो जीवन भर नहीं बदलती। यह बदलाव अगले जन्म में ही संभव है।

प्रत्येक जाति की सामाजिक-आर्थिक भूमिका नियत रही है, अपरिवर्तनीय। लेकिन यह भी सच है कि इतिहास में शूद्र राजा भी हुए हैं, लड़ाके और योद्धा भी हुए हैं और परम ज्ञानी भी। यह भी हुआ कि कभी की कोई योद्धा जाति कालांतर में अंत्यजों की श्रेणी में शामिल कर ली गई। जातियाँ बनती भी रही हैं। पिछले पाँच हजार सालों में भारत-भूमि पर न जाने कितनी बाहरी जातियाँ आकर बस गईं और बाद में अपनी हैसियत के अनुसार यहाँ के जातीय श्रेणीक्रम में समायोजित हो गईं। श्रेणीबद्धता भारतीय समाज में किस कदर हावी रही है, यह इस तथ्य से स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक जाति अनेक उपजातियों में विभक्त है और प्रायः दो उपजातियों के बीच विवाह-सम्बन्ध निषिद्ध रहे हैं। अजीब बात है कि इतनी कठोर और अपरिवर्तनीय सामाजिक व्यवस्था के रहते भारतीय समाज सदियों से बराबर परिवर्तनशील कैसे बना रहा? भारत बाहरी प्रभावों को लगातार ग्रहण करता रहा है। आक्रांता आते गए और राज-व्यवस्था, रीति-रिवाज, पहनावा-पोशाक और तत्व-विचार आदि क्षेत्रें में अपना प्रभाव छोड़ते गए। भारत इस प्रकार लगातार बनता रहा, नया होता रहा, अब भी यह प्रक्रिया जारी है। हाँ, जाति ने शायद यह काम किया कि इसने समाज के मूलभूत ढाँचे को बिखरने नहीं दिया। इससे भारतीय समाज का मौलिक स्वरूप और चरित्र बचा रह गया। भारी उथल-पुथल के बावजूद जाति-व्यवस्था टूट नहीं सकी, बल्कि इसने ‘शॉक एब्जॉर्बर’ की तरह काम किया। भारी झटकों का भी असर इसने हल्का कर दिया। यजमानी जैसी व्यवस्थाओं से जातियों की परस्पराश्रितता बनी और सामाजिक दूरी रहते हुए भी एक भिन्न सामाजिकता का विकास हुआ जो बहुत कम्पोजिट किस्म की रही। इसके बाहर किसी जाति या व्यक्ति का अस्तित्व संभव नहीं था।

ब्रिटिश राज में भूमि सम्बन्धों में भारी बदलाव हुए और इसी दौर में निम्न जातियों, दस्तकार और कारीगर जातियों की स्थिति अत्यंत खराब हुई। भू-शोषण के सबसे खराब उदाहरण भी इसी दौर में सामने आए। यह जन विद्रोहों का दौर भी रहा - किसान विद्रोह, आदिवासी विद्रोह, सन्यासी विद्रोह, और सबसे ऊपर सन् 1857 का स्वतंत्रता संग्राम! ध्यान रहे कि ये विद्रोह रजवाड़ों की आपसी शत्रुता अथवा प्रतिद्वन्द्विता का परिणाम नहीं थे, बल्कि त्रस्त जनता ने कभी संगठित तो कभी असंगठित ढंग से व्यवस्था के खिलाफ बगावत की थी। इन्हें एक जाति या कुछ जातियों ने अंजाम नहीं दिया था, यह साधारण भारतीय जन का ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ सहज और खुला प्रतिकार था। वास्तव में उत्पीड़क व्यवस्था के प्रतिकार और विद्रोह की एक सनातन परम्परा भारतीय समाज में रही है, आश्चर्य कि तब भी भारत सदियों तक गुलाम रहा। उच्च जातियों के उत्पीड़न के खिलाफ भी निम्न जातियाँ तनकर खड़ी हुई और यह उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम, हर कहीं हुआ। लेकिन कहना होगा कि ब्रिटिश राज में ही वास्तव में भारत की जाति व्यवस्था के सोपानक्रम अथवा पदानुक्रम, विभिन्न जातियों की पदस्थिति और उनके अंतःसम्बन्ध का कहीं व्यवस्थित अध्ययन अथवा आकलन हुआ। उन्नीसवीं सदी में सदियों से उत्पीडि़त निम्न जातियों, विशेषकर अस्पृश्यों ने जाति व्यवस्था, विशेषकर ब्राह्मणवाद के विरुद्ध संगठित रूप से जोरदार ढंग से आवाज उठाई। उनकी आवाज पहली बार सत्ता के स्तर पर भी और समाज के स्तर पर भी सुनी गई। मंदिर प्रवेश, स्कूली शिक्षा से लेकर राजनीतिक आरक्षण तक उनकी माँगों को ‘संरक्षणात्मक भेदभाव’ के सिद्धांत के आधार पर स्वीकृति मिली। 

इसी बीच निम्न जातियों के पक्ष में नितांत अविश्वसनीय पहल दक्खिन और पश्चिम की देशी रियासतों ने की। पहले मैसूर फिर कोल्हापुर के राजा छत्रपति साहूजी महाराज ने निम्न जातियों के लिए नौकरियों में सीटें आरक्षित कीं। 1920 में नागपुर में अखिल भारतीय बहिष्कृत परिषद की अध्यक्षता स्वयं कोल्हापुर के राजा ने की। इस प्रकार की पहलकदमियों ने निश्चय ही उत्पीडि़त जातियों के संघर्ष को शक्ति प्रदान की।

यह कहना मुश्किल है कि पहले ईस्ट इंडिया कम्पनी और बाद में ब्रिटिश सरकार ने किसी मानवतावादी दृष्टिकोण के तहत निम्न जातियों की स्थिति पर एक सकारात्मक स्टैण्ड बनाया। वास्तव में दो कारणों से अंग्रेजों की रुचि इस ओर बनी - पहला, स्थाई और वैध शासन के लिए शासन-प्रशासन के विभिन्न स्तरों पर एक सामाजिक संतुलन स्थापित करना_ और दूसरा, भारतीय समाज में विभाजन को और गहरा करने के अवसर का पूरा लाभ उठाना। अंग्रेज इस दूसरे कारण को 1932 में ‘कम्यूनल अवार्ड’ तक ले गए जिसमें अलग निर्वाचक मंडल की व्यवस्था की गई जिसका गांधीजी तथा काँग्रेस ने जोरदार विरोध किया। यह जानना भी कम रोचक नहीं कि स्वयं दलित नेतृत्व इस मामले पर बँटा हुआ था। एम-सी- राजा के नेतृत्व में ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज कॉन्फ्रेंस ने 1932 में ही अलग निर्वाचक मण्डल का विरोध कर ऐसे संयुक्त निर्वाचक मण्डल का समर्थन किया जिसमें आबादी के आधार पर सीटों का आरक्षण हो। राजा के इस दलित संगठन का हिन्दू महासभा के साथ इस आशय का एक समझौता भी हुआ जिसपर एम-सी- राजा और डॉ- बी-एस- मुंजे (हिन्दू महासभा) ने दस्तखत किए। अंग्रेज सरकार द्वारा कम्यूनल अवार्ड के माध्यम से अनुसूचित जातियों (दलितों का नया नामकरण) के लिए अलग निर्वाचक मण्डल की मांग मान लेने के बाद गाँधीजी का प्रसिद्ध पूना उपवास शुरू हुआ। अंततः गाँधीजी के आमरण अनशन के आगे डा- अम्बेडकर को ‘पूना पैक्ट’ के लिए राजी होना पड़ा। इस समझौते में संयुक्त निर्वाचक मंडल में अनुसूचित जातियों के लिए 151 सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया। इस प्रकार अंततः दलित पहचान और समस्या का उपनिवेशवादी नहीं बल्कि एक ‘राष्ट्रवादी हल’ ढूँढ़ा गया और भारतीय समाज और राज व्यवस्था को विभाजित होने से बचाया गया। बाद में 1940 के दशक में दलित राजनीति एक तरह से काँग्रेस की वृहद् राष्ट्रवादी धारा में समाहित हो गई। दलित नेतृत्व में मुद्दों पर मतैक्य का अभाव, गाँधीजी और काँग्रेस की राजनीति का बढ़ता दायरा और उसको अपार जन समर्थन, और दूसरी ओर कम्यूनिस्ट आंदोलनों ने भी अलग ‘दलित राजनीति’ का प्रभाव कम किया।

1946 के चुनाव में डा- अम्बेडकर का अनुसूचित जाति महासंघ 151 आरक्षित सीटों में से दो पर ही जीत हासिल कर सका। इसीलिए 1946 के कैबिनेट मिशन ने काँग्रेस को ही दलितों का प्रतिनिधि मान लिया। लेकिन सत्ता हस्तांतरण के कुछ ही पहले काँग्रेस ने दलित प्रश्न पर अपनी प्रतिबद्धता इस प्रकार प्रदर्शित की कि उसने संविधान सभा में न केवल डा- अम्बेडकर को शामिल किया बल्कि उन्हें संविधान प्रारूप समिति का अध्यक्ष भी बना दिया। यह अपने आप में एक असाधारण घटना थी जिसने भावी भारत के निर्माण का एक विशिष्ट खाका तैयार किया।

इस प्रकार उन्नीसवीं सदी के मध्य से लेकर स्वतंत्रता-प्राप्ति तक निम्नजातीय समूहों, या कहें दलित और गैर-ब्राह्मण जातियों के अधिकार और अस्मिता के लिए संघर्ष और जातिगत अन्याय के प्रतिरोध की एक लंबी और अटूट  शृंखला दिखाई देती है। इसमें अलग-अलग कोणों से जाति के प्रभावों का मूल्यांकन किया गया और इस व्यवस्था से मुक्ति के उपाय तलाशे गए। संघर्ष और प्रतिरोध की यह अखिल भारतीय परिघटना थी जिसने अपने समय के महान दलित अथवा गैर-ब्राह्मण नेतृत्व को खड़ा किया, जैसे महात्मा ज्योतिबा फूले, ई-वी- रामास्वामी नायकर ‘पेरियार’, एम-सी- राजा, केशवराम जेढ़े और डा- भीमराव अम्बेडकर। इसके पीछे अछूत जातियों के बीच उभरे भक्ति आंदोलनों की शक्ति भी थी जिन्होंने भक्ति और सामाजिक समता का संदेश दिया, जैसे - श्रीनारायण धर्म परिपालन योगम, मातुआ पंथ, सतनाम पंथ और बलहारी पंथ आदि। इस दौर में न सिर्फ अस्पृश्यों अथवा दलितों ने अपना संगठित प्रतिरोध दर्ज किया बल्कि गैर-ब्राह्मण और गैर-दलित जातियों के संगठन भी बने जिनका उद्देश्य राजनीति, शिक्षा और रोजगार में अपने लिए अधिक से अधिक संभावनाएँ तलाश करना था।

हरबर्ट रिजले प्रख्यात नृशास्त्री थे जिन्होंने जाति की नृतात्विक आधार पर विवेचना की। सन् 1901 में उन्हें जनगणना कमिश्नर बनाया गया और उन्होंने पहली बार जातयों की गिनती, उनका वर्गीकरण, और सोपानक्रम में उनकी स्थिति-निर्धारण कर सभी जरूरी सूचनाएँ दर्ज करने का प्रस्ताव किया। इस प्रस्ताव को संदेह की दृष्टि से देखा गया और पहले की तुलना में ढीले पड़ते जा रहे जातीय सोपानक्रम को रुढ़ और अपरिवर्तनीय बनाने का ‘सरकारी प्रयास’ कहा गया। इसकी तात्कालिक प्रतिक्रिया यह हुई कि विभिन्न जातियों एवं जातीय समूहों ने जातीय श्रेणीक्रम में अपने लिए उच्चतर श्रेणी की माँग की और दावे पेश किए। इस समय अनेक जातीय संगठन अस्तित्व में आए। उस समय इन संगठनों ने विभिन्न जातियों की एक राजनीतिक भूमिका निश्चित की और शिक्षा और रोजगार के अवसरों पर उच्च जातियों के एकाधिकार को तोड़ने के लिए भी सक्रिय हुए। इस प्रकार ऊपरी तौर पर आत्मकेन्द्रित और प्रतिगामी दिखते हुए भी ये जातीय संगठन उस समय अपनी-अपनी जातियों के लिए आधुनिकीकरण का संवाहक भी बने और अपनी गतिविधियों का एक औचित्य भी प्रस्तुत किया।

बाद में 1931 की जनगणना में अंतिम बार जातियों का संदर्भ आया। स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना 1951 में जातीय गणना को निषिद्ध किया गया। इसके स्पष्टतया दो कारण थे। पहला, भारत के संविधान में अस्पृश्यता को अपराध घोषित कर किसी भी आधार पर नागरिकों के बीच भेदभाव का निषेध किया गया, साथ ही अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों को ‘संरक्षणवादी भेदभाव’, अथवा विशेष अवसर के अंतर्गत सरकारी नौकरियों में दस वर्ष की अवधि के लिए सीटें आरक्षित की गईं। विधान मण्डलों में भी उनका प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए आरक्षित निर्वाचक मण्डलों की व्यवस्था की गई। इस प्रकार सामाजिक समता एवं न्याय के प्रश्नों का बकायदा संवैधानिक समाधान किया गया। दूसरा कारण यह रहा कि नवस्वतंत्र देश में राष्ट्रनिर्मार्ताओं एवं नीति-निर्धारकों ने ‘नागरिकता’ के प्रश्न को अधिक महत्वपूर्ण माना। वह समय देश के हर वर्ग, जाति, धर्म और क्षेत्र के नागरिकों को राष्ट्र-निर्माण के लिए एकबद्ध व एकनिष्ठ बनाने का था। देश अभी-अभी विभाजन की विभीषिका से उबरा था और धर्म इसका कारण बना था। सामाजिक विभेद को किसी भी कीमत पर एक और विभाजन का कारण नहीं बनने देना था। देश की अखण्डता को कई ओर से चुनौतियाँ मिल रही थीं। हर प्रांत, शहर, कस्बा, गाँव, मुहल्ले में सदियों से साथ-साथ रहते चले आए हिन्दू-मुसलमान जब अलग-अलग देशों के नागरिक बन सकते थे, तब जाति को विभाजन का ‘उतना पुख्ता’ आधार न मानना उस समय एक खुशफहमी पालने के जैसा ही था। आज भले ही गाँधीजी के पूना-उपवास को प्रपंच बताने की कोशिश हो, इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि वे वास्तव में अपने स्तर से एक राजनीतिक विभाजन को रोकने की कोशिश कर रहे थे। वे अगर असफल होते तो कहना मुश्किल है कि आज भारत का मानचित्र कैसा होता। इसलिए आज 1951 की जनगणना में जाति को शामिल न करने के पीछे कोई षड़यंत्र न देखकर उस समय की जमीनी सच्चाइयों को ध्यान में रखने की भी जरूरत है।

जाति का प्रश्न स्वतंत्र भारत में भी ज्वलंत बना रहा गो कि कुछ भिन्न तरीके से, भिन्न संदर्भों में। सन् 1951 में ही हिन्दू कोड बिल पर विरोध के कारण काँग्रेसी मंत्रिमंडल से डा- अम्बेडकर अलग हो गए। कुछ ही समय बाद हिन्दू समाज से उनका ऐसा मोहभंग हुआ कि उन्होंने अपने कोई तीन लाख अनुयायियों के साथ बौद्धधर्म की दीक्षा ले ली। 1956 में उनकी मृत्यु के कुछ ही समय बाद उनके अनुयायियों ने रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया की स्थापना की और इसी के माध्यम से अपने संघर्ष को आगे बढ़ाया, लेकिन यह पार्टी मुख्यतया महाराष्ट्र तक ही सिमट कर रह गई और आगे जबरदस्त टूट-फूट का शिकार हुई। दलित आंदोलन में एक ठहराव दिखाई दिया लेकिन जाति का प्रश्न अब दलित पहचान की सीमा से आगे निकलकर ‘गैर-सवर्ण’ तक जा पहुँचा। विशेषकर समाजवादी आंदोलनों ने जाति को भारत में वर्ग के समतुल्य करार दिया, अथवा यह कहा जाए कि उसका इस बात पर जोर रहा कि भारत में जात को परे कर ‘वर्ग’ की बात नहीं की जा सकती। इस सिद्धांत के सबसे प्रखर प्रवक्ता बने डा- राम मनोहर लोहिया। सबसे बड़ी बात कि उन्होंने सिर्फ ‘सौ में साठ’ की बात नहीं की बल्कि जाति-व्यवस्था को तोड़ने में महिलाओं की केन्द्रीय भूमिका स्वीकारी। इस क्रम में उन्होंने ‘स्त्री’ को भी उत्पीडि़त वर्ग माना और दलित स्त्री की ‘सर्वाधिक उत्पीडि़त’ के रूप में पहचान की। जाति-चिंतन को इस प्रकार एक नया आयाम देकर डा- लोहिया ने इसे बहुत व्यापक बना दिया। उनके पीछे पिछड़ी जातियों के युवाओं का भी एक बड़ा समूह आया। अपने इसी ‘जाति जोड़ स्त्री’ की बुनियाद पर संसदीय राजनीति की व्यूह-रचना की। 1967 में पहली बार सोशलिस्ट पार्टी के नेतृत्व में उत्तर भारत के अनेक राज्यों में गैर-काँग्रेसी सरकारें अस्तित्व में आईं। एक महत्वपूर्ण बात यह कि डा- लोहिया ने पिछड़ी जातियों की राजनीति को गैर-काँग्रेसवाद का पयार्य बना दिया। इसी बिना पर उन्होंने काँग्रेस को यथास्थितिवादी पार्टी करार दिया जबकि जातीय पदानुक्रम में सबसे नीचे जो दलित जातियाँ थीं वे काँग्रेस की ‘परम्परागत मतदाता’ थीं। 

संभवतः पचास-साठ के दशक से ही पिछड़ी और दलित जातियों के बीच एक फाँक पड़ गई थी जो नब्बे के दशक तक साफ दिखती भी रही। यह संभवतः दलित जातियों को प्राप्त राजनीतिक संरक्षण (आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र) और विशेष अवसर के तहत लगातार विस्तारित की जा रही आरक्षण-सुविधा को लेकर उपजा असंतोष था। पिछड़ी जातियों को अगड़ी जातियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही थी और राजनीतिक संरक्षण का अभाव भी था। वे राजनीतिक रूप से जिनके साथ थीं, वे पार्टियाँ सत्ता से दूर प्रतिपक्ष की राजनीति कर रही थीं। पिछड़ी जातियों को पहला बड़ा मौका 1977 के चुनाव में हाथ आया जबकि जनता पार्टी की सरकार ने पहली गैर-काँग्रेसी सरकार के रूप में दिल्ली की गद्दी संभाली। पिछड़ी जातियों के अनेक प्रतिनिधि संसद पहुँचे और मंत्री भी बने। यह अनायास नहीं कि आज देश का जो पिछड़ी जातियों का नेतृत्व है, वह कमोबेश इसी चुनाव से निकलकर आया। इसी दौर में पिछड़ों की दलितों के विरुद्ध कई अवसरों पर उग्र प्रतिक्रियाएँ दर्ज हुईं। जबकि समाजवादी आंदोलनों में अपनी जुझारू भूमिका निभाने वाले अनेक नेता दलित जातियों से थे। बिहार में भोला पासवान शास्त्री और कर्पूरी ठाकुर जैसे नेता समाजवादी आंदोलन के पुरोधा व्यक्तित्व थे। दोनाें नेता बिहार के गैर-काँग्रेसी मुख्यमंत्री हुए। बिहार में 1977 में जनता पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर बनाए गए। अपने कार्यकाल में उन्होंने ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ के लिए आरक्षण लागू किया जिसकी तब अत्यंत उग्र प्रतिक्रिया हुई। लेकिन आज आरक्षण के कर्पूरी फार्मूले को सबसे अधिक व्यावहारिक और इसीलिए स्वीकार्य माना जाता है। कर्पूरी ठाकुर के इस कदम से कम से कम बिहार में पिछड़ों और दलितों के बीच राजनीतिक दूरी कम करने में मदद मिली जिसका भरपुर लाभ नब्बे के दशक में उठाया गया। लेकिन तभी बेलछी कांड हुआ। इस जघन्य घटना में पिछड़ी जाति के दबंगों ने दलितों की सामूहिक हत्या की। इसी के पश्चात श्रीमती गाँधी ने ‘हाथी पर चढ़ कर’ इस गाँव का दौरा किया था और बाद में 1980 के चुनाव में भारी बहुमत से उन्होंने सत्ता में वापसी की।

काँग्रेस के लिए 1980 का चुनाव दिल्ली में वापसी के लिहाज से तो ठीक रहा लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में उसका जनाधार लगातार बिखरता चला गया। उधर पृष्ठभूमि में चली गई दलित राजनीति उत्तर भारत में एक नये स्वरूप में कहीं अधिक आक्रामक रूप से उभर रही थी। यह अल्पजन सवर्णों के विरुद्ध बहुजन दलितों-पिछड़ों (पिछडे़ इसमें बाद में जुड़े) की राजनीति थी जिसने धीरे-धीरे पाँव पसारे और पंजाब से चलकर लखनऊ फतह कर लिया। इसने तीन बार उत्तर प्रदेश को (बेशक एक ही) मुख्यमंत्री दिए - वह भी लोहिया की शब्दावली में सर्वाधिक उत्पीडि़त, अर्थात दलित महिला। यह इस अर्थ में भारत के जातीय इतिहास की एक महान घटना है जो लोकतंत्र में संभव हुई।

खैर! उत्तर भारत, बल्कि हिन्दीभाषी राज्यों जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा में काँग्रेस की खाली की गई जमीन पहले पिछड़ी जातियों के हाथ लगी। मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्य भले ही भाजपा के साथ चले गए हों, लेकिन नेतृत्व पर पिछड़े ही हावी रहे। बाद में मंडल आयोग की 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिशों को लागू करने को लेकर जो आंदोलन (मंडल आंदोलन) चला उसने न सिर्फ हिन्दीभाषी राज्यों, बल्कि गैर हिन्दीभाषी राज्यों में भी राजनीति ही नहीं एक हद तक समाज को भी नए सिरे से ध्रुवीकृत कर दिया। शुरू में तो ‘कमण्डल’, यानी राम जन्मभूमि आंदोलन, जिसकी अगुआई भाजपा कर रही थी, मंडलवाद के बिल्कुल खिलाफ खड़ा नजर आया और यह कहा गया कि हिन्दू समाज का जातीय विभाजन आसन्न देख जनमत का रुख धर्म अथवा धार्मिक विभाजन की ओर करने की कोशिश की गई। वास्तविकता लेकिन यही है कि मंडल का प्रभाव अन्तरदलीय आधार पर काम कर रहा था और इसने लगभग हर पार्टी के अंदर इसके विरोध (मंडल के विरोध) की सीमा ही नहीं तय कर दी, बल्कि दलों को अगड़े-पिछडे़ आधार पर एक तरह से बाँट भी दिया। यहाँ तक कि मुस्लिम समाज में भी ‘पसमांदा’ की आवाज बुलंद हुई और इस्लाम की लाख दुहाई देने के बावजूद मुस्लिम राजनीति अगड़ी-पिछड़ी आधार पर विभक्त होने से न बच सकी।

नब्बे के दशक में बिहार में जहाँ मण्डलीकरण के प्रभाव में पिछड़ों-दलितों का एका स्थापित हुआ जिसमें मुस्लिम अल्पसंख्यक भी शामिल हुए, वहीं उत्तर प्रदेश की राजनीति भी अधिक जटिल हो गई। वहाँ दलितों की ताकत ‘बहुजन समाज’ में अभिव्यक्त हो रही थी जबकि पिछड़ी जातियाँ ‘मण्डल’ और ‘कमण्डल’ में विभक्त थीं। आज भी, यदि जातियों की दृष्टि से विचार किया जाए तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में तीन ब्लॉक बन गए हैं। सीधे-सीधे यह निष्कर्ष के तौर पर तो नहीं कहा जा सकता लेकिन दलित-पिछड़ों की राजनीतिक का असर कम्यूनिस्ट आंदोलनों पर भी पड़ा। बिहार में वर्ग-युद्ध और जाति-युद्ध (या वर्ण युद्ध) में अंतर करना कठिन हो गया। नरसंहारों का सिलसिला बना जिसमें निरीह लोगों को निशाना बनाया गया। और इसके राजनीतिक फलाफल भी बटोरे गए। इसी दौर में कुछ सवर्ण जातियों को सीधे लक्ष्य बनाकर हत्याकांडों को अंजाम दिया गया। यह ‘अभूतपूर्व’ हुआ तो वर्ग-संघर्ष के नाम पर लेकिन यह दलित जातियों की सवर्ण जातियों के विरुद्ध चरम प्रतिक्रिया थी जिसे योजनाबद्ध ढंग से अंजाम दिया गया था। कहाँ जा सकता है कि नरसंहारों की राजनीति से मण्डलवादी राजनीति का प्रकारांतर से हित ही सधता था और इससे जातीय ध्रुवीकरण को साफ और तीखा बनाने में मदद मिलती थी। सांप्रदायिकता को रोकने के नाम पर भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी सत्ताधारी दल के समर्थन में आ गई और इस बहाने जाति की वास्तविकता को भी स्वीकार किया।

मण्डलीकरण के पश्चात विशेषकर शिक्षण संस्थाओं में युवा शक्ति का बिखराव साफ-साफ नजर आया, ज्यादातर शिक्षण संस्थाओं में नियमित चुनाव तक नहीं हो रहे। दूसरी ओर ट्रेड यूनियन आंदोलन की धार इतनी कुंद हुई कि नवउदारवादी व्यवस्था में श्रमसंघ की अहमियत ही खत्म हो गई और इसका ढंग से प्रतिकार तक न हो सका। नतीजा? बाजारवादी, जनविरोधी व्यवस्था का दंश पूरा समाज झेल रहा है, बल्कि जो कमजोर हैं, वे ज्यादा झेल रहे हैं। छोटी इकाइयों में बँटकर बड़ी लड़ाइयाँ नहीं लड़ी जा सकतीं।

2010 में भारत में दलित और पिछड़ी जातियों की स्थिति वैसी ही नहीं जैसी स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय थी। देश की राजनीति की वास्तविक नियंता आज यही हैं। लोकतंत्र संख्याबल से चलता है जो इन्हीं के पास है। संसद से लेकर विधानमण्डलों में इनकी मजबूत उपस्थिति है। पिछड़ी जातियाँ न सिर्फ राजनीतिक वर्चस्व बल्कि भूमि-अधिकार के मामले में भी आज आगे हैं। सवर्णों की जोतें पिछड़ी, विशेषकर मध्य जातियों को हस्तांतरित हुई हैं। आज गाँवों की शक्ति-संरचना बदल चुकी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और ‘विकास’ की परिघटना ने जातीय बंधनों को बहुत हद तक शिथिल कर दिया है और जातीय पहचानें धूमिल हुई हैं। दूसरी ओर एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में भारत की उपलब्धियाँ भी कम नहीं है। और यह सब अब तक जातीय गणना के बिना हुआ! वह भी तब जबकि देश के पिछड़े-दलित नेतृत्व ने सार्वजनिक जीवन में ’सवर्णवादी मूल्यों’ से जरा भी अलग दिखने की जरूरत नहीं समझी।

आज भारतीय नागरिकता के ऊपर जाति की सदस्यता को हावी होने देने का क्या कारण हो सकता है? होना तो यह चाहिए कि हम अब आगे जातीय पहचानों के विलोपीकरण की ओर बढ़ें, लेकिन स्थिति यह है कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर उन आग्रहों का भारी दबाव है जो लोकतंत्र-पूर्व के हमारे सामाजिक-राजनीतिक व्यवहार के नियामक रहे हैं। जातीय पहचानों को किसी न किसी बहाने कायम रखने का आग्रह इसी से जुड़ा है और इसके लिए सभी दोषी हैं। वास्तविकता यह है कि जातियों की गणना किए बिना भी हम इस व्यवस्था में असमानता, अन्याय और शोषण की पड़ताल करते रहे हैं और इसका समाधान भी ढूँढ़ते रहे हैं। पिछले छह दशकों में पूरे देश में समय-समय पर हुए आंदोलन और संघर्ष इसका प्रमाण है जिनका आधार अंतरजातीयता रहा है। भारत की जनता ने चुपचाप कभी कुछ भी नहीं स्वीकार किया। अब यह समय बताएगा कि भविष्य में निर्माण और प्रतिकार की शक्ति हमें भारतीय जन से जुटानी है या जाति-जन से। हमारे अंदर बुराइयाँ हर समय रहती हैं लेकिन हम उन्हें ढँकते हैं और अच्छाइयों को बाहर लाते हैं। जाति-धर्म आधारित भेदभाव हमारे सामाजिक जीवन की बुराइयाँ हैं, इन्हें खोल देने से ये बुराइयाँ अच्छाइयों में नहीं बदल जाएँगी। भारत की श्रेणीबद्ध समाज व्यवस्था को चुनौती देने के लिए श्रेणियों की नये सिरे से पहचान और उनके प्रति स्वीकार से कितनी सहायता मिल सकती है?

जातीय पहचानों को अटूट रखकर अन्य पहचानों µ भाषाई, धार्मिक, क्षेत्रीय, नृतात्विक - आदि को किस प्रकार संयमित रखा जा सकता है। इन्हें तो उल्टे इससे उकसावा मिलेगा। दूसरी ओर, यदि ध्यान से देखें तो भारत में जातीय संघर्ष केवल सवर्ण बनाम अवर्ण के आधार पर ही नहीं हुए। पिछड़ी जातियों, दलित जातियों एवं जनजातियों के बीच भी आपसी प्रतिद्वन्द्विता रही है, और है। जातीय गणना में, संभव है कमजोरों को अपनी बिरादरी की नई शक्ति (संख्या बल) का अहसास हो, लेकिन वहीं पहले से शक्तिमत्त जातियों के उन्मत्त होने का भी खतरा है। जातिवाद के ज्वार को स्वयं पिछड़ों और दलितों का नेतृत्व नहीं रोक सकेगा। यह केवल सवर्णों की चिन्ता नहीं होनी चाहिए। वास्तव में जाति का जनसंख्यात्मक पक्ष ऐसा संकट पैदा कर सकता है जिसके परिणामों का आकलन हम अभी से नहीं कर सकते। एक और महत्वपूर्ण बात यह कि अलग-अलग क्षेत्रें में अलग-अलग जाति-समूह प्रभावी है। उनकी प्रभुता के खिलाफ भी कोई एक जाति नहीं बल्कि जाति-समूह सक्रिय हैं। भूमंडलीकरण में कमजोर होते जा रहे भारतीय गाँवों में एक नए प्रकार के संघर्ष की जमीन तैयार होगी, एक ऐसा संघर्ष जो अंगुलियों को तो संभव है मजबूत बनाए, लेकिन जिससे मुट्ठी नहीं बन सकेगी।

इसलिए यह बात समझनी होगी कि जाति नहीं बल्कि अंतरजातीयता से भारतीय समाज का वर्गीय आधार विकसित होगा। जातीय गणना इस रास्ते की बाधा है न कि सुविधा। यह आकस्मिक नहीं है कि भारतीय समाज की जितनी भी क्रांतिकारी या परिवर्तनकामी धाराएँ रही हैं उन्होंने जातीय पहचानों को हमेशा गौण स्थान दिया। यह जाति से मुँह चुराना नहीं था बल्कि उसके प्रभाव को कम से कमतर करते जाना था जिससे कि बदलाव की चेतना क्षैतिज विभाजनों में बँटकर निष्प्रभावी न हो जाए। यह बात भूदान से लेकर तेलंगाना, नक्सलबाड़ी से लेकर संपूर्ण क्रांति, ‘चिपको’ से लेकर सरदार सरोवर तक - किसी भी आंदोलन से समझी जा सकती है। स्वतंत्रता आंदोलन के बाद इन आंदोलनों ने हमारी एक राष्ट्रीयता को पुष्ट ही किया है। और इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ अनुस्यूत किया है। अब यह हमारे नेतृत्व को तय करना है कि हमें किस ओर वे ले जाना चाहते हैं। फिलहाल तो वे उस ओर देखना भी गवारा नहीं कर रहे जहाँ युवा प्रेम कर रहे है और मारे जा रहे हैं। फिर भी प्रेम कर रहे है। ( 2011 में जनसत्ता सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।)

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Wednesday, 12 May 2021


 शिवदयाल की कविताएं

बगुले और तबेले

              - शिवदयाल

ताल में नहीं

तबेले में उतर रहे थे

बगुले

उनकी पीली चोचों में

मछलियाँ नहीं

कीलनियाँ भरी थीं

जो उन्होंने मवेशियों की

देह से खुरच कर निकाली थीं

उनके नथुनों में

गीली मिट्टी नहीं, सड़ते पानी और

गोबर की गंध भरी थी


बगुलों की आदतें बदल गई थीं

बदल गई थीं भंगिमाएँ

गई पीढ़ी के बुजुर्ग देखते

तो देखते रह जाते

दाँतों में अंगुली दबाए

कि बगुलों की चाल निश्शंक थी

एक टाँग पर देर तक

दम साधे खड़े रहने का

उनका कौशल जाता रहा था

ध्यान लगाने का न उनके पास धीरज था

न दरकार, और भगतई का तो

कोई प्रयोजन ही नहीं रह गया था

- नई पीढ़ी के बगुले

अपने बड़ों से जिसके बारे में सुनते

बड़े हो रहे थे ...

 

बगुलों की आदतें बदल गई थीं

जीने का तरीका बदल गया था

वे तैरना भूल गए थे

कहीं-कहीं उथले चहबच्चों में

बस उनके पीले, बल्कि धूसर पंजे भर डूबते थे

जिनमें उनके बच्चे कौतूहल से

‘छपाक’की आवाज निकाल कर खुश हो लेते थे


अब तो उन्हें

पानी में गर्दन डुबाने की

कल्पना करके भी भय लगता था

बगुलों के बच्चे भारी विस्मय से

ताल-तलैयों की कथा बाप-दादाओं,

से उनके बाप-दादाओं के बारे में सुनते थे

कि कैसे कोस भर की ऊँचाई से वे

ताल के तल में सोनबचवा मछली देख

बिजली की गति से गोते भी लगा लेते थे

और चोंच में छटपट करती मछली को दबाए ही

बाहर आते थे भींगे पाँख झटकारते ....


बुजुर्ग बताते कि आसमान से

ताल कितने नीले नजर आते

मानो धरती पर आसमान ही उतर आता था साक्षात्!


बच्चे सोचते ताज्जुब से -

पानी का रंग नीला? कितनी लंबी हाँकते हैं बूढ़े भी!

और फिर अदद मछली के लिए इतना खतरा मोल लेना ...!

मछलियाँ क्या इन रसीली कीलनियों से

अधिक स्वादिष्ट होती होंगी

चिपटी रहती हैं जो मवेशियों की चमड़ी से,

जिनसे जान छुड़ाने को कान आगे कर वे

मानो अम्यर्थना करते हैं हमारी

हुँह! बूढ़ों की ऐसी की तैसी

खामख्वाह हमें छोटा बनाने, हममें

हीन भावना भरने की कोशिश करते रहते हैं


बगुलों के पाँखों की सफेदी

ढल गई थी

उनमें सन के फूलों की जो गीली चमक होती थी

वह जाती रही थी

सूरज की किरणें बगुलों के परों से टकरा कर

पहले की तरह चकाचौध नहीं पैदा करती थीं

उनमें जज्ब हो जाती थीं


 उनके डैनों की लम्बाई जैसे घट रही थी

या क्या पता उन्हें पूरा खोलने की नौबत ही नहीं थी

यह उनकी लम्बी उड़ानों का जमाना नहीं था

दूरियाँ मानो सिमट आई थीं,

या कि आकाश में उनके लिए

जगह तंग हो गई थी

बगुले अब निस्सीम, निरभ्र आकाश को ताकते भर थे

फेंफड़ों में वे अपनी उतनी ही हवा खींचते थे

जितने में पास खड़े मरियल-से मझौले नीम से उतर कर

तबेले में आ सकें, और फिर वापस तबेले से नीम पर ....

 

तबेले की छप्परों से सरकंडे खींच

वे नीम पर घोंसले बनाने की कोशिश करते जबकि

कुछ कुनबों ने पास की इमारतों में

भूले-बिसरे छूटी जगहों पर आबाद होना भी शुरू किया था

कूड़ेदानों के आस-पास उनका कलरव चलता रहता

चील-कौवे, कठफोड़वे, मैनाएँ और पंडुक

यह काम पहले ही शुरू कर चुके थे

उनके बच्चे तो पेड़ों को अपना निवास मानते ही नहीं थे

पेड़ों पर रहना, घोंसले बनाना उन्हें असुरक्षित और खतरनाक लगता था

 


 बगुलों और भवनों-अट्टालिकाओं के बीच

अभी तबेले मौजूद थे

जहाँ केवल आहार नहीं, आश्रय भी था -

धूप-हवा और यदा-कदा की बारिश से बचने का ठिकाना

बूढ़े यह समझते थे और यही समझाने की कोशिश करते

कि अभी उनके शरणागत मत होवो

जब तक बन सके इन मत्र्य, नश्वर तबेलों में रहो

पुरखों का कुछ तो मान रहे ....



गजब की बात थी यह

कि बुजुर्ग बगुले अमरत्व और अनश्वरता से

भय खाते थे, बल्कि घृणा करते थे

उन्होंने प्रत्यक्ष देखा था कि कैसे इनसे

सृजन और पल्लवन की संभावना मिटती जाती है

वे अपने चारों तरफ उगी, फैली-पसरी

ठोस और कठोर अमर्त्य संरचनाओं को

जुगुप्सा से देखते थे

और अपने पुरखों के आद्रता-सम्पन्न जीवन

और उनकी दिशा-अन्वेषी उत्तुंग उड़ानों की याद कर

इनके ऊपर या अगल-बगल से उड़ते

यथासंभव, यथाशक्ति इन पर बीट मार कर

अनिर्वचनीय सुख की उपलब्धि करते थे, बल्कि

अपनी संतानों को भी इसके लिए प्रेरित करते थे

 

बुजुर्ग बगुले जो नहीं जानते थे

वह यह कि तबेले आस-पास उगते

फैलते-पसरते-ऊँचे उठते भवनों-निलयों का ही

विस्तारित हिस्सा थे - उन्हीं की छाया में पलते

उन्हीं पर आश्रित

जिनकी देह से लगी कीलनियाँ गटकते वे जिन्दा थे

उन मवेशियों के दूध पर वहाँ बच्चे पल-बढ़ रहे थे

आसमान जितना भी बचा था उसे अपनी जद में लेने को...


वास्तव में

ताल से तबेले के इस संक्रमण में

बगुलों का समर्पण हो चुका था, पहले ही

- मनुष्य-सभ्यता के समक्ष -

पूरा, सम्पूर्ण समर्पण! 


क्या पता बगुले इसे जान रहे हों

मान नहीं रहे हो...

वास्तव में सृष्टि आरम्भ होने के बाद

मनुष्येत्तर जीव की

यह सबसे बड़ी छलांग थी - एक युग से दूसरे युग में,

जो बगुलों ने लगाई थी - अपनी उत्तरजीविता के लिए

- ताल से उठ कर तबेले में गिरना!

                     -   शिवदयाल

(सरस्वती, जनवरी-मार्च 21 तथा ' पहली बार' ब्लॉग में प्रकाशित।)

Sunday, 24 January 2021

ओसारा


 'ओसारा '

             - शिवदयाल


वह घर 

कभी घर नहीं लगा

जिसमें एकदम से

हो जाते हैं अंदर

और अन्दर से

एकदम बाहर


अंदर और बाहर का

संधिस्थल है ओसारा

अंदर और बाहर आकर मिलते हैं

ओसारे में

बाहर से आए तो

जरा देर पसीना सुख लिया

और बाहर निकलते-निकलते

थोड़ा रुक कर

मौसम का मिजाज पढ़ लिया


वैसे भी उचटे मन को

ओसारे का आसरा रहता है

ओसारा

न कोरा स्याह है

न कोरा सफेद

धूसर रंगवाला

यह वह इलाका है जहां

अन्य रंगों के लिए

सम्भावनाएं जन्मती हैं


यह जीवन जैसे 

बिन ओसारे का घर..

Tuesday, 19 January 2021

लिफाफा

 लिफाफा'

            - शिवदयाल

दूसरों के

संदेश-पांती ढोता रहा

और ऊंचा अपने को आंकता रहा


मैं धारक 

उससे बड़ा नहीं हो सकता था

जिसे मैंने धारण किया था


मैं निमित्त उससे 

महती नहीं हो सकता था

जो मेरा हेतु था


अपनी तो महिमा

उतने अक्षरों से बनी थी

जितने में पानेवाले का

नाम-गाम लिखा था..

उन अक्षरों के प्रति

श्रद्धा बरतनी थी! 


जो फाड़ा गया

तो पड़ा हूं कूड़ेदान में

अपने हेतु से विछिन्न

अभिप्राय से हीन...


जिसे ढोता आया

जतन से, वह पत्र

सहेजा गया होगा कहीं

- इतनी-सी आशा

इतनी आश्वस्ति!

                      - शिवदयाल

Friday, 24 April 2020

मेरी कहानी ' नन्हें रंगदार' literature point पर पढ़ सकते हैं :
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=845352185958496&id=100014511669846
https://literaturepoint.com/

Tuesday, 25 February 2020

My article published on 24th February,2020 : Status Quoist Secularism And Hindu Citizenship.
https://www.internationalnewsandviews.com/status-quoist-secularism-and-hindu-citizenship/

Friday, 28 June 2019

केला होता अट्टाहास

मेरे उपन्यास' एक और दुनिया होती ' का मराठी संस्करण ' केला होता अट्टहास ' । इसे साधना प्रकाशन , पुणे ने छापा है। 1948 में महान स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी चिंतक, लेखक, शिक्षक साने गुरुजी ने साधना साप्ताहिक का प्रकाशन आरंभ किया था जो अबतक जारी है। साधना मराठी भाषा का अत्यंत प्रतिष्ठित पत्र है जो साधना ट्रस्ट द्वारा संचालित है( श्री विनोद श्रीसाठ  इसके संपादक हैं)।  साधना प्रकाशन भी उसी का अंग है। एक भारत की परिकल्पना को साकार करने के लिए गुरुजी ने आंतरभारती की स्थापना की थी जिसमें विभिन्न प्रांतों के लोग एक दूसरे की भाषा सीखें और संस्कृतियों से परिचित हों । यह प्रयास आज भी जारी है। यह पुस्तक इसका अद्यतन प्रमाण है जिसे इमरजेंसी के काले दिनों की याद में 25 जून 2019 को प्रकाशित किया गया है। प्रख्यात मराठी कवयित्री उषा मेहता इसकी प्रेरणा रही हैं। साहित्य - सिने समीक्षक व अनुवादक रेखा देशपांडे ने इस कृति का मराठी में अनुवाद किया है। 

Friday, 24 May 2019


Literature PointSheo Dayal के साथ है.
वरिष्ठ कथाकार शिवदयाल की कहानियां समाज की हर उस विडंबना को बड़े ही प्रभावी ढंग से रेखांकित करती है, जिससे आम आदमी की ज़िन्दगी और प्रकारान्तर से समाज और देश प्रभावित होता है। उनके कई कहानी संग्रह और उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। उन्हीं से सुनिए उनकी कहानी 'निवृत्ति'
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वरिष्ठ कथाकार शिवदयाल की कहानियां समाज की हर उस विडंबना को बड़े ही प्रभावी ढंग से रेखांकित करती है, जिससे आम आदमी क....


https://youtu.be/yXZFZ3ImNl8?fbclid=IwAR2aBNswtkM5HC-24FOu0JoChp_2pDfOqHa5k-qnAm_kPu3ngeyzADmy8nM

Sunday, 14 October 2018

My article : JP, Democracy and Revolution
https://www.thecitizen.in/index.php/en/NewsDetail/index/4/15235/JP-Democracy-and-Revolution

  नव-चैतन्य के महावट - रवींद्रनाथ                                 - शिवदयाल  ब चपन में ही जिन विभूतियों की छवि ने मन के अंदर अपना स्थाई निवा...