Monday, 23 August 2021

 जाति गणना बगैर

                               - शिवदयाल

कई बार ऐसा लगता है जैसे भारत उनतीस राज्यों का संघ नहीं बल्कि वास्तव में छह हजार जातियों का संघ है। जाति को भारतीय समाज का एकमात्र और अंतिम सत्य मानने वालों की अगर चले (और चलती ही है) तो एक दिन शायद ऐसा होकर रहे। भारत को आधिकारिक रूप से छह हजार चार सौ या फिर उतनी जातियों का जितनी कि 2010 की जनगणना में गिनती आए, संघ घोषित कर दिया जाए। तब क्या होगा? तब वे सारे मसले हल हो जाएंगे जो जाति से जुडे़ हैं।

जातीय संघ वाले भारत में प्रत्येक जाति को वे सब अधिकार के दिए जाएं जो अभी उ-प्र-, बिहार, असम, गुजरात, तमिलनाडु आदि राज्यों को है। इससे प्रत्येक जाति को विकास करने का बराबर अवसर मिलेगा और यह शिकायत नहीं रह जाएगी कि कोई दूसरा उनकी राह का रोड़ा बन रहा है। जाति को सर्वेसर्वा मानने वालों के लिए यह एक महान मूल्य होना चाहिए। ऐसे समाज और ऐसे राष्ट्र की स्थापना ही उनका अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। ऐसे समाज में क्रान्ति या बदलाव की जरूरत अगर होगी तो सिर्फ इसलिए कि किस प्रकार भारतीय समाज को स्वतन्त्रता आंदोलन-पूर्व बल्कि औद्योगिकीकरण-पूर्व की स्थिति में कितनी जल्दी पहुंचा दिया जाय जहाँ कि जातीय टोले हों, जातीय पंचायतें हों, जातीय बाजार-हाट हों, और जातीय उत्पादन केन्द्र हों। अन्तरजातीयता की जहाँ कोई स्थिति या अवसर ही न हो। यह भावी भारत के निर्माण के लिए एक विचार बिंदु या परिकल्पना है।

जातीय जनगणना के द्वारा इस लक्ष्य की सिद्धि की दिशा में बढ़ा जा सकता है। जातीय शोषण एवं भेदभाव रोकने का यह एक महत्वपूर्ण हथियार साबित हो सकता है। कम से कम जातीय जनगणना के पक्षधर ऐसा ही मानकर चल रहे हैं।

सन् 1901 में जातीय जनगणना में अंग्रेज सरकार ने दो हजार सात सौ अड़तीस जातियों का पता लगाया था। आज सौ साल बाद समाजविज्ञानियों एवं जनसंख्याशास्त्रियों के आकलन के अनुसार लगभग तीन हजार से लेकर छह हजार चार सौ जातियां हैं। यह संख्या पाँच हजार के पार है, इससे तो शायद ही कोई इनकार करे। जाति हजारों सालों से भारत सामाजिक स्तरीकरण का प्रमुख आधार रही है। यह सामाजिक विभेद का भी प्रमुख जरिया रही है। जातियों की आर्थिक भूमिका बहुत मजबूत रही है। जातीय विभाजन को पेशागत विभाजन के रूप में भी पहचाना जा सकता है। इसे चतुर्वर्ण के रूप में धर्म का पिष्टपोषण भी मिलता रहा है और पुनर्जन्म की व्यवस्था से सम्बद्ध कर दिया गया है। जाति व्यवस्था में जन्म से ही व्यक्ति की सामाजिक स्थिति निर्धारित हो जाती है जो जीवन भर नहीं बदलती। यह बदलाव अगले जन्म में ही संभव है।

प्रत्येक जाति की सामाजिक-आर्थिक भूमिका नियत रही है, अपरिवर्तनीय। लेकिन यह भी सच है कि इतिहास में शूद्र राजा भी हुए हैं, लड़ाके और योद्धा भी हुए हैं और परम ज्ञानी भी। यह भी हुआ कि कभी की कोई योद्धा जाति कालांतर में अंत्यजों की श्रेणी में शामिल कर ली गई। जातियाँ बनती भी रही हैं। पिछले पाँच हजार सालों में भारत-भूमि पर न जाने कितनी बाहरी जातियाँ आकर बस गईं और बाद में अपनी हैसियत के अनुसार यहाँ के जातीय श्रेणीक्रम में समायोजित हो गईं। श्रेणीबद्धता भारतीय समाज में किस कदर हावी रही है, यह इस तथ्य से स्पष्ट हो जाता है कि प्रत्येक जाति अनेक उपजातियों में विभक्त है और प्रायः दो उपजातियों के बीच विवाह-सम्बन्ध निषिद्ध रहे हैं। अजीब बात है कि इतनी कठोर और अपरिवर्तनीय सामाजिक व्यवस्था के रहते भारतीय समाज सदियों से बराबर परिवर्तनशील कैसे बना रहा? भारत बाहरी प्रभावों को लगातार ग्रहण करता रहा है। आक्रांता आते गए और राज-व्यवस्था, रीति-रिवाज, पहनावा-पोशाक और तत्व-विचार आदि क्षेत्रें में अपना प्रभाव छोड़ते गए। भारत इस प्रकार लगातार बनता रहा, नया होता रहा, अब भी यह प्रक्रिया जारी है। हाँ, जाति ने शायद यह काम किया कि इसने समाज के मूलभूत ढाँचे को बिखरने नहीं दिया। इससे भारतीय समाज का मौलिक स्वरूप और चरित्र बचा रह गया। भारी उथल-पुथल के बावजूद जाति-व्यवस्था टूट नहीं सकी, बल्कि इसने ‘शॉक एब्जॉर्बर’ की तरह काम किया। भारी झटकों का भी असर इसने हल्का कर दिया। यजमानी जैसी व्यवस्थाओं से जातियों की परस्पराश्रितता बनी और सामाजिक दूरी रहते हुए भी एक भिन्न सामाजिकता का विकास हुआ जो बहुत कम्पोजिट किस्म की रही। इसके बाहर किसी जाति या व्यक्ति का अस्तित्व संभव नहीं था।

ब्रिटिश राज में भूमि सम्बन्धों में भारी बदलाव हुए और इसी दौर में निम्न जातियों, दस्तकार और कारीगर जातियों की स्थिति अत्यंत खराब हुई। भू-शोषण के सबसे खराब उदाहरण भी इसी दौर में सामने आए। यह जन विद्रोहों का दौर भी रहा - किसान विद्रोह, आदिवासी विद्रोह, सन्यासी विद्रोह, और सबसे ऊपर सन् 1857 का स्वतंत्रता संग्राम! ध्यान रहे कि ये विद्रोह रजवाड़ों की आपसी शत्रुता अथवा प्रतिद्वन्द्विता का परिणाम नहीं थे, बल्कि त्रस्त जनता ने कभी संगठित तो कभी असंगठित ढंग से व्यवस्था के खिलाफ बगावत की थी। इन्हें एक जाति या कुछ जातियों ने अंजाम नहीं दिया था, यह साधारण भारतीय जन का ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ सहज और खुला प्रतिकार था। वास्तव में उत्पीड़क व्यवस्था के प्रतिकार और विद्रोह की एक सनातन परम्परा भारतीय समाज में रही है, आश्चर्य कि तब भी भारत सदियों तक गुलाम रहा। उच्च जातियों के उत्पीड़न के खिलाफ भी निम्न जातियाँ तनकर खड़ी हुई और यह उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम, हर कहीं हुआ। लेकिन कहना होगा कि ब्रिटिश राज में ही वास्तव में भारत की जाति व्यवस्था के सोपानक्रम अथवा पदानुक्रम, विभिन्न जातियों की पदस्थिति और उनके अंतःसम्बन्ध का कहीं व्यवस्थित अध्ययन अथवा आकलन हुआ। उन्नीसवीं सदी में सदियों से उत्पीडि़त निम्न जातियों, विशेषकर अस्पृश्यों ने जाति व्यवस्था, विशेषकर ब्राह्मणवाद के विरुद्ध संगठित रूप से जोरदार ढंग से आवाज उठाई। उनकी आवाज पहली बार सत्ता के स्तर पर भी और समाज के स्तर पर भी सुनी गई। मंदिर प्रवेश, स्कूली शिक्षा से लेकर राजनीतिक आरक्षण तक उनकी माँगों को ‘संरक्षणात्मक भेदभाव’ के सिद्धांत के आधार पर स्वीकृति मिली। 

इसी बीच निम्न जातियों के पक्ष में नितांत अविश्वसनीय पहल दक्खिन और पश्चिम की देशी रियासतों ने की। पहले मैसूर फिर कोल्हापुर के राजा छत्रपति साहूजी महाराज ने निम्न जातियों के लिए नौकरियों में सीटें आरक्षित कीं। 1920 में नागपुर में अखिल भारतीय बहिष्कृत परिषद की अध्यक्षता स्वयं कोल्हापुर के राजा ने की। इस प्रकार की पहलकदमियों ने निश्चय ही उत्पीडि़त जातियों के संघर्ष को शक्ति प्रदान की।

यह कहना मुश्किल है कि पहले ईस्ट इंडिया कम्पनी और बाद में ब्रिटिश सरकार ने किसी मानवतावादी दृष्टिकोण के तहत निम्न जातियों की स्थिति पर एक सकारात्मक स्टैण्ड बनाया। वास्तव में दो कारणों से अंग्रेजों की रुचि इस ओर बनी - पहला, स्थाई और वैध शासन के लिए शासन-प्रशासन के विभिन्न स्तरों पर एक सामाजिक संतुलन स्थापित करना_ और दूसरा, भारतीय समाज में विभाजन को और गहरा करने के अवसर का पूरा लाभ उठाना। अंग्रेज इस दूसरे कारण को 1932 में ‘कम्यूनल अवार्ड’ तक ले गए जिसमें अलग निर्वाचक मंडल की व्यवस्था की गई जिसका गांधीजी तथा काँग्रेस ने जोरदार विरोध किया। यह जानना भी कम रोचक नहीं कि स्वयं दलित नेतृत्व इस मामले पर बँटा हुआ था। एम-सी- राजा के नेतृत्व में ऑल इंडिया डिप्रेस्ड क्लासेज कॉन्फ्रेंस ने 1932 में ही अलग निर्वाचक मण्डल का विरोध कर ऐसे संयुक्त निर्वाचक मण्डल का समर्थन किया जिसमें आबादी के आधार पर सीटों का आरक्षण हो। राजा के इस दलित संगठन का हिन्दू महासभा के साथ इस आशय का एक समझौता भी हुआ जिसपर एम-सी- राजा और डॉ- बी-एस- मुंजे (हिन्दू महासभा) ने दस्तखत किए। अंग्रेज सरकार द्वारा कम्यूनल अवार्ड के माध्यम से अनुसूचित जातियों (दलितों का नया नामकरण) के लिए अलग निर्वाचक मण्डल की मांग मान लेने के बाद गाँधीजी का प्रसिद्ध पूना उपवास शुरू हुआ। अंततः गाँधीजी के आमरण अनशन के आगे डा- अम्बेडकर को ‘पूना पैक्ट’ के लिए राजी होना पड़ा। इस समझौते में संयुक्त निर्वाचक मंडल में अनुसूचित जातियों के लिए 151 सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया। इस प्रकार अंततः दलित पहचान और समस्या का उपनिवेशवादी नहीं बल्कि एक ‘राष्ट्रवादी हल’ ढूँढ़ा गया और भारतीय समाज और राज व्यवस्था को विभाजित होने से बचाया गया। बाद में 1940 के दशक में दलित राजनीति एक तरह से काँग्रेस की वृहद् राष्ट्रवादी धारा में समाहित हो गई। दलित नेतृत्व में मुद्दों पर मतैक्य का अभाव, गाँधीजी और काँग्रेस की राजनीति का बढ़ता दायरा और उसको अपार जन समर्थन, और दूसरी ओर कम्यूनिस्ट आंदोलनों ने भी अलग ‘दलित राजनीति’ का प्रभाव कम किया।

1946 के चुनाव में डा- अम्बेडकर का अनुसूचित जाति महासंघ 151 आरक्षित सीटों में से दो पर ही जीत हासिल कर सका। इसीलिए 1946 के कैबिनेट मिशन ने काँग्रेस को ही दलितों का प्रतिनिधि मान लिया। लेकिन सत्ता हस्तांतरण के कुछ ही पहले काँग्रेस ने दलित प्रश्न पर अपनी प्रतिबद्धता इस प्रकार प्रदर्शित की कि उसने संविधान सभा में न केवल डा- अम्बेडकर को शामिल किया बल्कि उन्हें संविधान प्रारूप समिति का अध्यक्ष भी बना दिया। यह अपने आप में एक असाधारण घटना थी जिसने भावी भारत के निर्माण का एक विशिष्ट खाका तैयार किया।

इस प्रकार उन्नीसवीं सदी के मध्य से लेकर स्वतंत्रता-प्राप्ति तक निम्नजातीय समूहों, या कहें दलित और गैर-ब्राह्मण जातियों के अधिकार और अस्मिता के लिए संघर्ष और जातिगत अन्याय के प्रतिरोध की एक लंबी और अटूट  शृंखला दिखाई देती है। इसमें अलग-अलग कोणों से जाति के प्रभावों का मूल्यांकन किया गया और इस व्यवस्था से मुक्ति के उपाय तलाशे गए। संघर्ष और प्रतिरोध की यह अखिल भारतीय परिघटना थी जिसने अपने समय के महान दलित अथवा गैर-ब्राह्मण नेतृत्व को खड़ा किया, जैसे महात्मा ज्योतिबा फूले, ई-वी- रामास्वामी नायकर ‘पेरियार’, एम-सी- राजा, केशवराम जेढ़े और डा- भीमराव अम्बेडकर। इसके पीछे अछूत जातियों के बीच उभरे भक्ति आंदोलनों की शक्ति भी थी जिन्होंने भक्ति और सामाजिक समता का संदेश दिया, जैसे - श्रीनारायण धर्म परिपालन योगम, मातुआ पंथ, सतनाम पंथ और बलहारी पंथ आदि। इस दौर में न सिर्फ अस्पृश्यों अथवा दलितों ने अपना संगठित प्रतिरोध दर्ज किया बल्कि गैर-ब्राह्मण और गैर-दलित जातियों के संगठन भी बने जिनका उद्देश्य राजनीति, शिक्षा और रोजगार में अपने लिए अधिक से अधिक संभावनाएँ तलाश करना था।

हरबर्ट रिजले प्रख्यात नृशास्त्री थे जिन्होंने जाति की नृतात्विक आधार पर विवेचना की। सन् 1901 में उन्हें जनगणना कमिश्नर बनाया गया और उन्होंने पहली बार जातयों की गिनती, उनका वर्गीकरण, और सोपानक्रम में उनकी स्थिति-निर्धारण कर सभी जरूरी सूचनाएँ दर्ज करने का प्रस्ताव किया। इस प्रस्ताव को संदेह की दृष्टि से देखा गया और पहले की तुलना में ढीले पड़ते जा रहे जातीय सोपानक्रम को रुढ़ और अपरिवर्तनीय बनाने का ‘सरकारी प्रयास’ कहा गया। इसकी तात्कालिक प्रतिक्रिया यह हुई कि विभिन्न जातियों एवं जातीय समूहों ने जातीय श्रेणीक्रम में अपने लिए उच्चतर श्रेणी की माँग की और दावे पेश किए। इस समय अनेक जातीय संगठन अस्तित्व में आए। उस समय इन संगठनों ने विभिन्न जातियों की एक राजनीतिक भूमिका निश्चित की और शिक्षा और रोजगार के अवसरों पर उच्च जातियों के एकाधिकार को तोड़ने के लिए भी सक्रिय हुए। इस प्रकार ऊपरी तौर पर आत्मकेन्द्रित और प्रतिगामी दिखते हुए भी ये जातीय संगठन उस समय अपनी-अपनी जातियों के लिए आधुनिकीकरण का संवाहक भी बने और अपनी गतिविधियों का एक औचित्य भी प्रस्तुत किया।

बाद में 1931 की जनगणना में अंतिम बार जातियों का संदर्भ आया। स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना 1951 में जातीय गणना को निषिद्ध किया गया। इसके स्पष्टतया दो कारण थे। पहला, भारत के संविधान में अस्पृश्यता को अपराध घोषित कर किसी भी आधार पर नागरिकों के बीच भेदभाव का निषेध किया गया, साथ ही अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों को ‘संरक्षणवादी भेदभाव’, अथवा विशेष अवसर के अंतर्गत सरकारी नौकरियों में दस वर्ष की अवधि के लिए सीटें आरक्षित की गईं। विधान मण्डलों में भी उनका प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए आरक्षित निर्वाचक मण्डलों की व्यवस्था की गई। इस प्रकार सामाजिक समता एवं न्याय के प्रश्नों का बकायदा संवैधानिक समाधान किया गया। दूसरा कारण यह रहा कि नवस्वतंत्र देश में राष्ट्रनिर्मार्ताओं एवं नीति-निर्धारकों ने ‘नागरिकता’ के प्रश्न को अधिक महत्वपूर्ण माना। वह समय देश के हर वर्ग, जाति, धर्म और क्षेत्र के नागरिकों को राष्ट्र-निर्माण के लिए एकबद्ध व एकनिष्ठ बनाने का था। देश अभी-अभी विभाजन की विभीषिका से उबरा था और धर्म इसका कारण बना था। सामाजिक विभेद को किसी भी कीमत पर एक और विभाजन का कारण नहीं बनने देना था। देश की अखण्डता को कई ओर से चुनौतियाँ मिल रही थीं। हर प्रांत, शहर, कस्बा, गाँव, मुहल्ले में सदियों से साथ-साथ रहते चले आए हिन्दू-मुसलमान जब अलग-अलग देशों के नागरिक बन सकते थे, तब जाति को विभाजन का ‘उतना पुख्ता’ आधार न मानना उस समय एक खुशफहमी पालने के जैसा ही था। आज भले ही गाँधीजी के पूना-उपवास को प्रपंच बताने की कोशिश हो, इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि वे वास्तव में अपने स्तर से एक राजनीतिक विभाजन को रोकने की कोशिश कर रहे थे। वे अगर असफल होते तो कहना मुश्किल है कि आज भारत का मानचित्र कैसा होता। इसलिए आज 1951 की जनगणना में जाति को शामिल न करने के पीछे कोई षड़यंत्र न देखकर उस समय की जमीनी सच्चाइयों को ध्यान में रखने की भी जरूरत है।

जाति का प्रश्न स्वतंत्र भारत में भी ज्वलंत बना रहा गो कि कुछ भिन्न तरीके से, भिन्न संदर्भों में। सन् 1951 में ही हिन्दू कोड बिल पर विरोध के कारण काँग्रेसी मंत्रिमंडल से डा- अम्बेडकर अलग हो गए। कुछ ही समय बाद हिन्दू समाज से उनका ऐसा मोहभंग हुआ कि उन्होंने अपने कोई तीन लाख अनुयायियों के साथ बौद्धधर्म की दीक्षा ले ली। 1956 में उनकी मृत्यु के कुछ ही समय बाद उनके अनुयायियों ने रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया की स्थापना की और इसी के माध्यम से अपने संघर्ष को आगे बढ़ाया, लेकिन यह पार्टी मुख्यतया महाराष्ट्र तक ही सिमट कर रह गई और आगे जबरदस्त टूट-फूट का शिकार हुई। दलित आंदोलन में एक ठहराव दिखाई दिया लेकिन जाति का प्रश्न अब दलित पहचान की सीमा से आगे निकलकर ‘गैर-सवर्ण’ तक जा पहुँचा। विशेषकर समाजवादी आंदोलनों ने जाति को भारत में वर्ग के समतुल्य करार दिया, अथवा यह कहा जाए कि उसका इस बात पर जोर रहा कि भारत में जात को परे कर ‘वर्ग’ की बात नहीं की जा सकती। इस सिद्धांत के सबसे प्रखर प्रवक्ता बने डा- राम मनोहर लोहिया। सबसे बड़ी बात कि उन्होंने सिर्फ ‘सौ में साठ’ की बात नहीं की बल्कि जाति-व्यवस्था को तोड़ने में महिलाओं की केन्द्रीय भूमिका स्वीकारी। इस क्रम में उन्होंने ‘स्त्री’ को भी उत्पीडि़त वर्ग माना और दलित स्त्री की ‘सर्वाधिक उत्पीडि़त’ के रूप में पहचान की। जाति-चिंतन को इस प्रकार एक नया आयाम देकर डा- लोहिया ने इसे बहुत व्यापक बना दिया। उनके पीछे पिछड़ी जातियों के युवाओं का भी एक बड़ा समूह आया। अपने इसी ‘जाति जोड़ स्त्री’ की बुनियाद पर संसदीय राजनीति की व्यूह-रचना की। 1967 में पहली बार सोशलिस्ट पार्टी के नेतृत्व में उत्तर भारत के अनेक राज्यों में गैर-काँग्रेसी सरकारें अस्तित्व में आईं। एक महत्वपूर्ण बात यह कि डा- लोहिया ने पिछड़ी जातियों की राजनीति को गैर-काँग्रेसवाद का पयार्य बना दिया। इसी बिना पर उन्होंने काँग्रेस को यथास्थितिवादी पार्टी करार दिया जबकि जातीय पदानुक्रम में सबसे नीचे जो दलित जातियाँ थीं वे काँग्रेस की ‘परम्परागत मतदाता’ थीं। 

संभवतः पचास-साठ के दशक से ही पिछड़ी और दलित जातियों के बीच एक फाँक पड़ गई थी जो नब्बे के दशक तक साफ दिखती भी रही। यह संभवतः दलित जातियों को प्राप्त राजनीतिक संरक्षण (आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र) और विशेष अवसर के तहत लगातार विस्तारित की जा रही आरक्षण-सुविधा को लेकर उपजा असंतोष था। पिछड़ी जातियों को अगड़ी जातियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही थी और राजनीतिक संरक्षण का अभाव भी था। वे राजनीतिक रूप से जिनके साथ थीं, वे पार्टियाँ सत्ता से दूर प्रतिपक्ष की राजनीति कर रही थीं। पिछड़ी जातियों को पहला बड़ा मौका 1977 के चुनाव में हाथ आया जबकि जनता पार्टी की सरकार ने पहली गैर-काँग्रेसी सरकार के रूप में दिल्ली की गद्दी संभाली। पिछड़ी जातियों के अनेक प्रतिनिधि संसद पहुँचे और मंत्री भी बने। यह अनायास नहीं कि आज देश का जो पिछड़ी जातियों का नेतृत्व है, वह कमोबेश इसी चुनाव से निकलकर आया। इसी दौर में पिछड़ों की दलितों के विरुद्ध कई अवसरों पर उग्र प्रतिक्रियाएँ दर्ज हुईं। जबकि समाजवादी आंदोलनों में अपनी जुझारू भूमिका निभाने वाले अनेक नेता दलित जातियों से थे। बिहार में भोला पासवान शास्त्री और कर्पूरी ठाकुर जैसे नेता समाजवादी आंदोलन के पुरोधा व्यक्तित्व थे। दोनाें नेता बिहार के गैर-काँग्रेसी मुख्यमंत्री हुए। बिहार में 1977 में जनता पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर बनाए गए। अपने कार्यकाल में उन्होंने ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ के लिए आरक्षण लागू किया जिसकी तब अत्यंत उग्र प्रतिक्रिया हुई। लेकिन आज आरक्षण के कर्पूरी फार्मूले को सबसे अधिक व्यावहारिक और इसीलिए स्वीकार्य माना जाता है। कर्पूरी ठाकुर के इस कदम से कम से कम बिहार में पिछड़ों और दलितों के बीच राजनीतिक दूरी कम करने में मदद मिली जिसका भरपुर लाभ नब्बे के दशक में उठाया गया। लेकिन तभी बेलछी कांड हुआ। इस जघन्य घटना में पिछड़ी जाति के दबंगों ने दलितों की सामूहिक हत्या की। इसी के पश्चात श्रीमती गाँधी ने ‘हाथी पर चढ़ कर’ इस गाँव का दौरा किया था और बाद में 1980 के चुनाव में भारी बहुमत से उन्होंने सत्ता में वापसी की।

काँग्रेस के लिए 1980 का चुनाव दिल्ली में वापसी के लिहाज से तो ठीक रहा लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में उसका जनाधार लगातार बिखरता चला गया। उधर पृष्ठभूमि में चली गई दलित राजनीति उत्तर भारत में एक नये स्वरूप में कहीं अधिक आक्रामक रूप से उभर रही थी। यह अल्पजन सवर्णों के विरुद्ध बहुजन दलितों-पिछड़ों (पिछडे़ इसमें बाद में जुड़े) की राजनीति थी जिसने धीरे-धीरे पाँव पसारे और पंजाब से चलकर लखनऊ फतह कर लिया। इसने तीन बार उत्तर प्रदेश को (बेशक एक ही) मुख्यमंत्री दिए - वह भी लोहिया की शब्दावली में सर्वाधिक उत्पीडि़त, अर्थात दलित महिला। यह इस अर्थ में भारत के जातीय इतिहास की एक महान घटना है जो लोकतंत्र में संभव हुई।

खैर! उत्तर भारत, बल्कि हिन्दीभाषी राज्यों जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा में काँग्रेस की खाली की गई जमीन पहले पिछड़ी जातियों के हाथ लगी। मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्य भले ही भाजपा के साथ चले गए हों, लेकिन नेतृत्व पर पिछड़े ही हावी रहे। बाद में मंडल आयोग की 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिशों को लागू करने को लेकर जो आंदोलन (मंडल आंदोलन) चला उसने न सिर्फ हिन्दीभाषी राज्यों, बल्कि गैर हिन्दीभाषी राज्यों में भी राजनीति ही नहीं एक हद तक समाज को भी नए सिरे से ध्रुवीकृत कर दिया। शुरू में तो ‘कमण्डल’, यानी राम जन्मभूमि आंदोलन, जिसकी अगुआई भाजपा कर रही थी, मंडलवाद के बिल्कुल खिलाफ खड़ा नजर आया और यह कहा गया कि हिन्दू समाज का जातीय विभाजन आसन्न देख जनमत का रुख धर्म अथवा धार्मिक विभाजन की ओर करने की कोशिश की गई। वास्तविकता लेकिन यही है कि मंडल का प्रभाव अन्तरदलीय आधार पर काम कर रहा था और इसने लगभग हर पार्टी के अंदर इसके विरोध (मंडल के विरोध) की सीमा ही नहीं तय कर दी, बल्कि दलों को अगड़े-पिछडे़ आधार पर एक तरह से बाँट भी दिया। यहाँ तक कि मुस्लिम समाज में भी ‘पसमांदा’ की आवाज बुलंद हुई और इस्लाम की लाख दुहाई देने के बावजूद मुस्लिम राजनीति अगड़ी-पिछड़ी आधार पर विभक्त होने से न बच सकी।

नब्बे के दशक में बिहार में जहाँ मण्डलीकरण के प्रभाव में पिछड़ों-दलितों का एका स्थापित हुआ जिसमें मुस्लिम अल्पसंख्यक भी शामिल हुए, वहीं उत्तर प्रदेश की राजनीति भी अधिक जटिल हो गई। वहाँ दलितों की ताकत ‘बहुजन समाज’ में अभिव्यक्त हो रही थी जबकि पिछड़ी जातियाँ ‘मण्डल’ और ‘कमण्डल’ में विभक्त थीं। आज भी, यदि जातियों की दृष्टि से विचार किया जाए तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में तीन ब्लॉक बन गए हैं। सीधे-सीधे यह निष्कर्ष के तौर पर तो नहीं कहा जा सकता लेकिन दलित-पिछड़ों की राजनीतिक का असर कम्यूनिस्ट आंदोलनों पर भी पड़ा। बिहार में वर्ग-युद्ध और जाति-युद्ध (या वर्ण युद्ध) में अंतर करना कठिन हो गया। नरसंहारों का सिलसिला बना जिसमें निरीह लोगों को निशाना बनाया गया। और इसके राजनीतिक फलाफल भी बटोरे गए। इसी दौर में कुछ सवर्ण जातियों को सीधे लक्ष्य बनाकर हत्याकांडों को अंजाम दिया गया। यह ‘अभूतपूर्व’ हुआ तो वर्ग-संघर्ष के नाम पर लेकिन यह दलित जातियों की सवर्ण जातियों के विरुद्ध चरम प्रतिक्रिया थी जिसे योजनाबद्ध ढंग से अंजाम दिया गया था। कहाँ जा सकता है कि नरसंहारों की राजनीति से मण्डलवादी राजनीति का प्रकारांतर से हित ही सधता था और इससे जातीय ध्रुवीकरण को साफ और तीखा बनाने में मदद मिलती थी। सांप्रदायिकता को रोकने के नाम पर भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी सत्ताधारी दल के समर्थन में आ गई और इस बहाने जाति की वास्तविकता को भी स्वीकार किया।

मण्डलीकरण के पश्चात विशेषकर शिक्षण संस्थाओं में युवा शक्ति का बिखराव साफ-साफ नजर आया, ज्यादातर शिक्षण संस्थाओं में नियमित चुनाव तक नहीं हो रहे। दूसरी ओर ट्रेड यूनियन आंदोलन की धार इतनी कुंद हुई कि नवउदारवादी व्यवस्था में श्रमसंघ की अहमियत ही खत्म हो गई और इसका ढंग से प्रतिकार तक न हो सका। नतीजा? बाजारवादी, जनविरोधी व्यवस्था का दंश पूरा समाज झेल रहा है, बल्कि जो कमजोर हैं, वे ज्यादा झेल रहे हैं। छोटी इकाइयों में बँटकर बड़ी लड़ाइयाँ नहीं लड़ी जा सकतीं।

2010 में भारत में दलित और पिछड़ी जातियों की स्थिति वैसी ही नहीं जैसी स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय थी। देश की राजनीति की वास्तविक नियंता आज यही हैं। लोकतंत्र संख्याबल से चलता है जो इन्हीं के पास है। संसद से लेकर विधानमण्डलों में इनकी मजबूत उपस्थिति है। पिछड़ी जातियाँ न सिर्फ राजनीतिक वर्चस्व बल्कि भूमि-अधिकार के मामले में भी आज आगे हैं। सवर्णों की जोतें पिछड़ी, विशेषकर मध्य जातियों को हस्तांतरित हुई हैं। आज गाँवों की शक्ति-संरचना बदल चुकी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और ‘विकास’ की परिघटना ने जातीय बंधनों को बहुत हद तक शिथिल कर दिया है और जातीय पहचानें धूमिल हुई हैं। दूसरी ओर एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में भारत की उपलब्धियाँ भी कम नहीं है। और यह सब अब तक जातीय गणना के बिना हुआ! वह भी तब जबकि देश के पिछड़े-दलित नेतृत्व ने सार्वजनिक जीवन में ’सवर्णवादी मूल्यों’ से जरा भी अलग दिखने की जरूरत नहीं समझी।

आज भारतीय नागरिकता के ऊपर जाति की सदस्यता को हावी होने देने का क्या कारण हो सकता है? होना तो यह चाहिए कि हम अब आगे जातीय पहचानों के विलोपीकरण की ओर बढ़ें, लेकिन स्थिति यह है कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर उन आग्रहों का भारी दबाव है जो लोकतंत्र-पूर्व के हमारे सामाजिक-राजनीतिक व्यवहार के नियामक रहे हैं। जातीय पहचानों को किसी न किसी बहाने कायम रखने का आग्रह इसी से जुड़ा है और इसके लिए सभी दोषी हैं। वास्तविकता यह है कि जातियों की गणना किए बिना भी हम इस व्यवस्था में असमानता, अन्याय और शोषण की पड़ताल करते रहे हैं और इसका समाधान भी ढूँढ़ते रहे हैं। पिछले छह दशकों में पूरे देश में समय-समय पर हुए आंदोलन और संघर्ष इसका प्रमाण है जिनका आधार अंतरजातीयता रहा है। भारत की जनता ने चुपचाप कभी कुछ भी नहीं स्वीकार किया। अब यह समय बताएगा कि भविष्य में निर्माण और प्रतिकार की शक्ति हमें भारतीय जन से जुटानी है या जाति-जन से। हमारे अंदर बुराइयाँ हर समय रहती हैं लेकिन हम उन्हें ढँकते हैं और अच्छाइयों को बाहर लाते हैं। जाति-धर्म आधारित भेदभाव हमारे सामाजिक जीवन की बुराइयाँ हैं, इन्हें खोल देने से ये बुराइयाँ अच्छाइयों में नहीं बदल जाएँगी। भारत की श्रेणीबद्ध समाज व्यवस्था को चुनौती देने के लिए श्रेणियों की नये सिरे से पहचान और उनके प्रति स्वीकार से कितनी सहायता मिल सकती है?

जातीय पहचानों को अटूट रखकर अन्य पहचानों µ भाषाई, धार्मिक, क्षेत्रीय, नृतात्विक - आदि को किस प्रकार संयमित रखा जा सकता है। इन्हें तो उल्टे इससे उकसावा मिलेगा। दूसरी ओर, यदि ध्यान से देखें तो भारत में जातीय संघर्ष केवल सवर्ण बनाम अवर्ण के आधार पर ही नहीं हुए। पिछड़ी जातियों, दलित जातियों एवं जनजातियों के बीच भी आपसी प्रतिद्वन्द्विता रही है, और है। जातीय गणना में, संभव है कमजोरों को अपनी बिरादरी की नई शक्ति (संख्या बल) का अहसास हो, लेकिन वहीं पहले से शक्तिमत्त जातियों के उन्मत्त होने का भी खतरा है। जातिवाद के ज्वार को स्वयं पिछड़ों और दलितों का नेतृत्व नहीं रोक सकेगा। यह केवल सवर्णों की चिन्ता नहीं होनी चाहिए। वास्तव में जाति का जनसंख्यात्मक पक्ष ऐसा संकट पैदा कर सकता है जिसके परिणामों का आकलन हम अभी से नहीं कर सकते। एक और महत्वपूर्ण बात यह कि अलग-अलग क्षेत्रें में अलग-अलग जाति-समूह प्रभावी है। उनकी प्रभुता के खिलाफ भी कोई एक जाति नहीं बल्कि जाति-समूह सक्रिय हैं। भूमंडलीकरण में कमजोर होते जा रहे भारतीय गाँवों में एक नए प्रकार के संघर्ष की जमीन तैयार होगी, एक ऐसा संघर्ष जो अंगुलियों को तो संभव है मजबूत बनाए, लेकिन जिससे मुट्ठी नहीं बन सकेगी।

इसलिए यह बात समझनी होगी कि जाति नहीं बल्कि अंतरजातीयता से भारतीय समाज का वर्गीय आधार विकसित होगा। जातीय गणना इस रास्ते की बाधा है न कि सुविधा। यह आकस्मिक नहीं है कि भारतीय समाज की जितनी भी क्रांतिकारी या परिवर्तनकामी धाराएँ रही हैं उन्होंने जातीय पहचानों को हमेशा गौण स्थान दिया। यह जाति से मुँह चुराना नहीं था बल्कि उसके प्रभाव को कम से कमतर करते जाना था जिससे कि बदलाव की चेतना क्षैतिज विभाजनों में बँटकर निष्प्रभावी न हो जाए। यह बात भूदान से लेकर तेलंगाना, नक्सलबाड़ी से लेकर संपूर्ण क्रांति, ‘चिपको’ से लेकर सरदार सरोवर तक - किसी भी आंदोलन से समझी जा सकती है। स्वतंत्रता आंदोलन के बाद इन आंदोलनों ने हमारी एक राष्ट्रीयता को पुष्ट ही किया है। और इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ अनुस्यूत किया है। अब यह हमारे नेतृत्व को तय करना है कि हमें किस ओर वे ले जाना चाहते हैं। फिलहाल तो वे उस ओर देखना भी गवारा नहीं कर रहे जहाँ युवा प्रेम कर रहे है और मारे जा रहे हैं। फिर भी प्रेम कर रहे है। ( 2011 में जनसत्ता सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।)

#जनगणना2021 #जातीयजनगणना #भारतकीजनगणना #Census2021 #censusofindia #castecensus #indianpopulation #indiansociologicalsociety #casteclassandpower #development

No comments:

Post a Comment

  नव-चैतन्य के महावट - रवींद्रनाथ                                 - शिवदयाल  ब चपन में ही जिन विभूतियों की छवि ने मन के अंदर अपना स्थाई निवा...