Sunday, 24 January 2021

ओसारा


 'ओसारा '

             - शिवदयाल


वह घर 

कभी घर नहीं लगा

जिसमें एकदम से

हो जाते हैं अंदर

और अन्दर से

एकदम बाहर


अंदर और बाहर का

संधिस्थल है ओसारा

अंदर और बाहर आकर मिलते हैं

ओसारे में

बाहर से आए तो

जरा देर पसीना सुख लिया

और बाहर निकलते-निकलते

थोड़ा रुक कर

मौसम का मिजाज पढ़ लिया


वैसे भी उचटे मन को

ओसारे का आसरा रहता है

ओसारा

न कोरा स्याह है

न कोरा सफेद

धूसर रंगवाला

यह वह इलाका है जहां

अन्य रंगों के लिए

सम्भावनाएं जन्मती हैं


यह जीवन जैसे 

बिन ओसारे का घर..

Tuesday, 19 January 2021

लिफाफा

 लिफाफा'

            - शिवदयाल

दूसरों के

संदेश-पांती ढोता रहा

और ऊंचा अपने को आंकता रहा


मैं धारक 

उससे बड़ा नहीं हो सकता था

जिसे मैंने धारण किया था


मैं निमित्त उससे 

महती नहीं हो सकता था

जो मेरा हेतु था


अपनी तो महिमा

उतने अक्षरों से बनी थी

जितने में पानेवाले का

नाम-गाम लिखा था..

उन अक्षरों के प्रति

श्रद्धा बरतनी थी! 


जो फाड़ा गया

तो पड़ा हूं कूड़ेदान में

अपने हेतु से विछिन्न

अभिप्राय से हीन...


जिसे ढोता आया

जतन से, वह पत्र

सहेजा गया होगा कहीं

- इतनी-सी आशा

इतनी आश्वस्ति!

                      - शिवदयाल

  नव-चैतन्य के महावट - रवींद्रनाथ                                 - शिवदयाल  ब चपन में ही जिन विभूतियों की छवि ने मन के अंदर अपना स्थाई निवा...