Monday, 24 November 2014

 
                       दक्षिण का वाम पक्ष
                                                                                                                                             -शिवदयाल
                पहली बार हुआ है कि किसी नई सरकार के सत्ता  संभालने पर देश का बुद्धिजीवी समाज संदेह और आशंका से ग्रस्त दीखता है। दक्षिणपंथ लेेखकों-बुद्धिजीवियों को यों भी आकर्षित नहीं करता और इसके कारण भी बहुत स्पष्ट हैं। दक्षिणपंथ आपको सीमित करता है, खुलने नहीं देता और प्रायः समाजों और देशों के लिए त्रासदी लेकर आता रहा है। एक बार जड़ जमा लेने के बाद इससे पार पाना आसान भी नहीं रहता। यह भी विचित्र संयोग है कि पिछले दस-पंद्रह सालों में लगभग पूरी दुनिया में दक्षिणपंथ और कट्टर राजशाहियों के विरुद्ध जनमत बना है। भारतीय उपमहाद्वीप ही नहीं, अरब देशों और कुछ अमेरीकी और लातिन अमेरिकी देशों में भी आम लोगों ने दक्षिणपंथ को निर्णायक चुनौती दी है और तानाशाहियों और राजशाहियों को लोकतंत्र से प्रतिस्थापित किया है। और तब भारत में दक्षिणपंथ का सशक्त अभ्युदय ! पहली बार अपने देश पर किसी गैर कांग्रेसी दल को पूर्ण बहुमत , और वह बहुसंख्यक हिंदू समुदाय के लिए राजनीति करने वाला सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर हिन्दू राष्ट्रवाद की आकांक्षा रखने वाला दल हो, यह सहज ग्राह्य बात नहीं लगती। वह भी तब जबकि भाजपा को यह जीत वाजयेयी जैसेउदारऔरस्वीकृतनेता की बदौलत नहीं मिली, बल्कि उग्र और आक्रामक हिन्दुत्व के पैरोकार (बल्कि प्रतीक) माने जाने वाले नरेन्द्र मोदी की अगुआई में मिली है। तो क्या यह माना जाए कि लाख गवर्नेंस और विकास के नाम पर चुनाव लड़ने का दावा करने के बावजूद दिल्ली के सिंहासन परहिन्दू शक्तिही विराजमान हुई है? अगर हाँ, तो यह साढ़े चार सौ साल के बाद हो रहा है। 1556 में इतिहासकारों द्वारा मध्यकाल का समुद्रगुप्त (या नेपोलियन) कहे जाने वाले हेमू - हेमचंद्र विक्रमादित्य ने अफगानों, राजपूतों और जनजातिय योद्धाओं को साथ लेकर लगातार  बाइस युद्ध जीतने के बाद 7 अक्टूबर, 1556 में दिल्ली में अपना राज्याभिषेक करवाया था और हिन्दू परम्पराओं के अनुसारविक्रमादित्यकी उपाधि ग्रहण की थी।  लेकिन एक माह के अंदर ही पानीपत की दूसरी लड़ाई में एक गुमनाम सैनिक का तीर उसकी आँख में चुभ गया और वह लगभग जीती हुई लड़ाई हार गया। और अगर इस अत्यल्प अवधि के शासन को छोड़ दें तो पूरे आठ सौ साल बाद, पृथ्वीराज चैहान के बाद दिल्ली मेंहिन्दू  राजस्थापित हुआ है।
                घटनाक्रम को इस तरह से देखना अपने आप में बहुत अजीब है क्योंकि संघ की शाखाओं के बाहर काहिन्दूवास्तव मेंभारतीयमें समाहित मान लिया गया है (था) हिन्दू भी कोई धार्मिक समुदाय अथवा सम्प्रदाय या पंथ है, और उसके होने का कोई राजनीतिक फलाफल अथवा निहितार्थ भी हो सकता है - इस तथ्य से लगभग समूचा गैर संघी, गैर भाजपा राजनीतिक वर्ग बेखबर रहा है। और यह वर्ग तो यह सपने में भी नहीं सोच सकता था कि हिन्दू समुदाय की भी कोई राजनीतिक आकांक्षा हो सकती है, या फिर पिछले हजार सालों में यह समुदाय इस योग्य हो सका कि इसकी अपनी कोई सत्ताकांक्षा हो। अगर सचमुच इस चुनाव मेंउल्टा ध्रुवीकरणअर्थात हिन्दुओं ने एकजुट होकर मतदान किया है जाने-अनजाने, तो अब समय गया है कि इन प्रश्नों को ढकने, इनसे बचने की बजाए इन पर गहराई से विचार किया जाए। यह जरूरी है कि इस चुनाव केहिन्दू कोणपर गंभीरता से विचार किया, जाए, बावजूद इसके कि प्रगतिशील विचारक भाजपा की जीत कोक्रोनी कैपिटलिज्मकी कारगुजारी ही मानकर संतुष्ट हो जाना चाहते हैं। वैसे इसमें कोई शक नहीं कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भारत के संसाधनों पर गिद्ध-दृष्टि जमाए बैठी हैं और अपने हित में गवर्नेंस और विकास के नाम पर देश की व्यवस्था में बदलाव चाहती हैं। चुनाव प्रचार के दौरान ऐसा भ्रम फैलाया गया मानो भारत किसी भयानक आपदा का सामना कर रहा हो, गर्त में जा रहा हो और उसे तत्काल बचा निकालने की दरकार हो। यथार्थ यह है कि देश के अंदर कोई बड़ा आर्थिक संकट नहीं, अलग-अलग किस्म के उग्रवादी आंदोलनों के बावजूद भारत की अखंडता पर कोई खतरा नहीं, ही कोई युद्ध की स्थिति है। दरअसल पिछले पाँच सालों के अंदर ताबड़तोड़ घोटालों, बढती़ महंगाई , अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन तथा निर्भया कांड के बाद देश भर में काँग्रेस के खिलाफ जबरदस्त वातावरण बना। इसका लाभ सबसे पहले वैकल्पिक राजनीति का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी को मिला लेकिन खामख्वाह दिल्ली की सत्ता को छोड़ना लोग पचा नहीं सके। इसी समय चुनाव की घोषणा के बाद राष्ट्रपति प्रणाली की तर्ज पर चुनाव लड़ने के भाजपा के निर्णय से जो स्थिति बनी और पार्टी द्वारा जिस स्तर का और जिस पैमाने पर चुनाव अभियान चलाया गया, उसमें भाजपा हीबदलावका वास्तविक संवाहक बन गई - भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन औरआपकी कमाई भी भाजपा के खाते में। लेकिन यह विश्लेषण महत्वपूर्ण होते हुए भी भाजपा की 282 और एनडीए की 335 सीटों का औचित्य पूरी तरह स्पष्ट नहीं कर पाता। वैसे भी पिछड़ों और दलितों की राजनीति करने वाले दलों का सफाया किस प्रकार संभव हो सका - सपा, राष्ट्रीय जनता दल, बसपा और यहाँ तक कि विकास केबिहार माॅडलका दावा करने वाला जेडीयू? फिर क्या यह माना जाए कि नरेन्द्र मोदी की चुनाव सभाओं में उमड़े युवाओं ने जाति, धर्म, वर्ग, क्षेत्र की सीमा लाँघकरअच्छे दिनोंकी खातिर भाजपा को यह बहुमत दिया? आखिर 1990 के बाद पैदा हुए युवाओं कोधर्मनिरपेक्षताको लेकर नरेन्द्र मोदी के साथ जाने में क्या हिचक हो सकती थी, यह पीढ़ी तो मंडल-कमंडल के प्रभाव से प्रायः मुक्त है। उस दौर से दुनिया बहुत आगे बढ़ गई है, भारत आगे निकल आया है - आज का भूमंडलीकृत भारत! भूमंडलीकरण की प्रक्रिया स्थानीय अंतर्विरोधों को ढकने-तोपने, बल्कि पचा जाने की भी सामथ्र्य रखती है। 
                हमारा दुर्भाग्य यह रहा कि आजादी के बाद देश में धर्मनिरपेक्षता की जो राजनीति चलाई गई, विशेषकर सत्तर के दशक के बाद, उसमें बहुसंख्यक समाज के विखंडन को ही उसका आधार बनाया गया। यह मानकर चला गया, बल्कि विश्वास दिलाया गया कि पिछड़े और दलित हिन्दू इस सीमा तकधर्मनिरपेक्षहैं, मानो वे हिन्दू समाज के अंग ही नहीं हैं, बल्कि उससे बाहर हैं। उनकी कोई धार्मिक आकांक्षा नहीं हो सकती, आग्रह नहीं हो सकता। एक जाति के रूप में हिन्दुओं के बहुसंख्यक होते हुए भी उनके ऐतिहासिक दमन, त्ताहीनता, वर्चस्वहीनता के ऊपर हिन्दु समाज के अंदर बहुसंख्यक दलित-पिछड़ी जातियों के ऐतिहासिक दमन की और इसके एवज में क्षतिपूर्ति की बात की गई। यह एक हीसिक्के के दो पहलूजैसा है। इतिहास में हुए अन्याय को आधार बनाकर हिन्दू (‘साम्प्रदायिक‘) राजनीति के पैरोकार स्वतंत्र भारत में सत्ता और व्यवस्था में हिन्दुओं का वर्चस्व चाहते रहे, जबकि इसी आधार परधर्मनिरपेक्षदलसामाजिक न्यायके नाम पर पिछड़ों-दलितों के लिए सत्ता की कुंजी माँगते रहे। पहली राजनीति के निशाने पर मोटे तौर पर मुसलमान औरमुसलमान परस्तदल रहे जबकि दूसरे प्रकार की राजनीति मुस्लिमों को अपने साथ लेकरहिंदूसवर्णों को अपने निशाने पर लेेती रही। धर्मनिरपेक्ष दलों ने सवर्ण-विरोध की आड़ में खुलेआम हिन्दू प्रतीकों पर हमला किया। उन्होंने हिन्दू धर्म को ब्राह्मणों या अधिक से अधिक सवर्णों का धर्म बनाकर प्रस्तुत किया। आमतौर परप्रगतिशील’, ‘धर्मनिरपेक्षऔरसामाजिक न्यायके पाले में रहने वाले बुद्धिजीवियों ने इस राजनीति का साथ दिया, इसे परिपुष्ट किया। आज इसीलिए भारत की केन्द्रीय सत्ता पर हिन्दुत्ववादियों को आसीन देख वे हतप्रभ हैं। उनके लिए हिन्दुओं काएकहोकर मतदान करना कल्पनातीत है। वे सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि अगर 15 या 25 प्रतिशत आबादी को वोट बैंक के रूप में एकजुट होकर मतदान के लिए प्रेरित किया जा सकता है, तो यह काम 85 प्रतिशत आबादी के लिए बखूबी किया जा सकता है। लेकिन अगर पीछे मुड़कर देखें तो पिछले तीस-पैंतीस सालों की राजनीति इसी बात के लिए बहुसंख्यक समुदाय को उकसाती रही है। बल्कि स्वतंत्रता पश्चात ही इसकी शरुआत हो चुकी थी।
                अतीत के पुनरावलोकन से यह बात स्पष्ट होती है और इस हिन्दू उभार का औचित्य भी समझ में   आता है, बल्कि उसका एकवामपक्ष भी खुलता दिखाई देता है। यह बात बहुत आश्चर्यजनक लग सकती है। इसका स्रोत इतिहास में है। अन्याय, वंचना, पराजय बोध इसके मूल में है। हिन्दू भारत में बहुसंख्यक जरूर रहे हैं लेकिन पिछले लगभग आठ सौ सालों में हिन्दू जाति एकाध दृष्टांतों को छोड़ कभी शासक जाति नहीं रही - कम से कम केन्द्र में। एकेश्वरवादी साम्राज्यवाद के बाद प्रोटेस्टेंट उपनिवेशवाद ने लगातार सैंकड़ों साल तक हिन्दुओं को भारत की केन्द्रीय सत्ता से दूर रखा। एकेश्वरवादी केन्द्रीय सत्ता के खिलाफ परिधि परपैगन’ (हिन्दू, मूर्तिपूजक, प्रकृतिपूजक, बहुदेववादी) प्रतिरोध कभी इतना सक्षम नहीं बन सका कि वह उसे विस्थापित कर दे। मध्यकाल मेें इसी दौर में भारतीय समाज विजयी और विजित, मूर्तिभंजक और मूर्तिपूजक, एकदेववादी और बहुदेववादी के बीच सामंजस्य बैठाने की कोशिश कर रहा था। धर्मांतरण भी इस प्रक्रिया का अंग था। स्वैच्छिक धर्मांतरण कोई नयी बात नहीं थी। हिंदू बड़ी संख्या में बौद्ध बने थे, और बाद में इसका उल्टा भी हुआ था। लेकिन बलपूर्वक धर्मांतरण का संभवतः पहला अनुभव भारत को हो रहा था। पहली बार भारतीय समाज ऐसे आक्रांताओं का सामना कर रहा था और उनके सामने परास्त भी हो रहा था जो अपना राजनीतिक ही नहीं, धार्मिक प्रभुत्व भी स्थापित करना चाह रहे थे। इस कोशिश  के तहत बलात् धर्मांतरण भी हो रहा था और उपासना स्थलों को भी नष्ट किया जा रहा था। यहाँ ज्ञान, किसी विद्या की कुछ चल रही थी, कोई शास्त्रार्थ था। जो आए थे उन्हेंअसभ्योंकोसभ्यबनाना था। पैगन, नास्तिकों कोआस्तिकयानी एक ईश्वर का उपासक बनाना था। मुस्लिम सत्ता जब एक बार स्थापित हो गई तो इसका एक और परिणाम हुआ - कई क्षेत्रों में हिन्दू सामाजिक पदानुक्रम में शोषण और भेदभाव की शिकारनिम्नजातियों को इस्लाम के  ‘समानताके सिद्धांत में अपनी मुक्ति का मार्ग दिखलाई पड़ा। इन जातियों का इस्लाम (बाद में कुछ हद तक ईसाई में) में सामूहिक धर्मांतरण लगभग लगातार चलता रहा - भले ही छिटपुट रूप से। इससेसमाहितीकरणकी प्रक्रिया को तो बल मिला ही इस्लाम धर्म और इस्लामी शासकों के  प्रति स्वीकार्यता भी बढ़ी - इस हद तक कि तेरहवीं सदी से लेकर उन्नीसवीं सदी के मध्य तक भारत की केन्द्रीय सत्ता पर कमोवेश उनका नियंत्रण बना रहा।
                इसके बाद आया उपनिवेशवाद का दौर। ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने समूचे भारत के राजनीतिक स्वरूप को बदल दिया। इसने मुसलमानों को भी कुचला और हिन्दुओं को भी। यह एक ऐसी व्यवस्था थी जिसमें देशी साधनों के दोहन से सात समंदर पार की सभ्यता समृद्ध हो रही थी और भारतवासी कंगाल हो रहे थे। इस दौर में, 19वीं और 20वीं सदी मेें यूरोप में एक ओर पूँजीवाद का विकास हो रहा था तो दूसरी ओर नयी राष्ट्रीयताएं सिर उठा रही थीं और इसी आधार पर राष्ट्र-राज्य विकसित हो रहे थे। भारत में उपनिवेशवाद के मुकाबले में राष्ट्रवाद मजबूत हो रहा था तमाम विविधताओं के रहते। राष्ट्रीय एकता और स्वशासन का अधिकार - ये दो चुनौतियाँ इसके सामने थीं। धर्म, भाषा, क्षेत्र, जाति आदि की बहुलता में, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी के शब्दों मेंविविधता से एक राष्ट्र का निर्माणहो रहा था। इस राष्ट्र की कल्पना सबकी अपनी-अपनी थी लेकिन इस राष्ट्रवाद का लक्ष्य साझा था - उपनिवेशवादी शासन की समाप्ति और अपना शासन स्थापित करना। इस प्रक्रिया में राष्ट्रीयताओं के अलग-अलग स्वर भी उभर रहे थे। भारतीय राष्ट्रवाद के समक्ष दो विकल्प थे - सार्वभौमवाद, जिसमें हर पहचान, हर सामाजिक-सांस्कृतिक इकाई को मान्यता थी और जिसकी विश्व-दृष्टि मानव समाज की समस्त इकाइयों के सृजनात्मक सहयोग और सहकार से निर्मित हुई थी। सार्वभौमवाद की जड़ें भारतीय सभ्यता में थीं और इसके पैरोकार और सिद्धांतकार रवीन्द्रनाथ और महात्मा गाँधी थे, और कहीं कहीं विवेकानंद भी। दूसरा विकल्प था यूरोप के राष्ट्र-राज्य को अंगीकार कर लेना। इससे भारत राजनीतिक रूप से एक हो सकता था और राष्ट्रवादियों को यही अभीष्ट भी था। आखिरकार भारत ने यूरोप के राष्ट्र राज्य माॅडल को ही अपनाया।
                लेकिन यूरोप में राष्ट्रीयताओं के उदय और राष्ट्र-राज्यों के अस्तित्व में आने का एक नकारात्मक प्रभाव बीसवीं सदी की शुरुआत में ही दृष्टिगोचर होने लगा। यूरोप में राष्ट्रीयता का आधार एक प्रजाति, एक साझा अतीत और भूभाग बना था। भारत में धर्म को राष्ट्रीयता का आधार मानने का आग्रह बढ़ने लगा। अगर धर्म यूरोप में राष्ट्रीयता का आधार होता तो समूचा यूरोप एक राष्ट्र होता। जहाँ हिंदू पुनरुत्थानवादी अखण्ड भारत में हिन्दुओं का वर्चस्व चाहते थे वहीं मुस्लिम राष्ट्रवादियों ने आगे चलकर मुसलमानों के लिए एक
देश की ही माँग कर दी। बीसवीं सदी के शुरुआत  अगर मुस्लिम राजनीति आकार ले रही थी, 1906 में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना के साथ, तो हिन्दू राजनीति भी विनायक दामोदर सावरकर, केशव हेडगेवार और गुरु गोलवलकर जैसे नेताओं की अगुआई में अपने रास्ते चल पड़ी थी। 1914 में हिन्दू महासभा की और 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई। यूरोपीय राष्ट्र-राज्य का सिद्धांत भारत को राजनीतिक रूप से भी एक रख सका। मुसलमान भारत की शासक जाति रही थी और हिन्दू शासित। स्वतंत्र लोकतांत्रिक भारत में मुस्लिम राष्ट्रवादी अल्पसंख्यक मुसलमानों को बहुसंख्यक (शसक) हिन्दुओं के अधीन देखना नहीं चाहते थे। उन्होंने सदियों में विकसित हुए मिट्टी के रिश्ते के ऊपर धार्मिक पहचान को वरीयता दी। भारत का विभाजन हुआ - उसके तीन टुकड़े हो गए (राजनीतिक रूप से दो) यह हिन्दू राष्ट्रवादियों ही नहीं आम हिन्दू, बल्कि भारतीय के लिए बहुत बड़ा सदमा था। शासित रही जाति के दृष्टिकोण से देखें तो यह बहुत बड़ा धोखा था - जब बराबरी की बात आई तो अलग देश ही बना डाला!
एक देश के नेता जो दो देशों के राज्याध्यक्ष हुए !
                आश्चर्यजनक बात यह है कि हिन्दू और मुस्लिम राजनीति दोनों भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा में शामिल नहीं थीं। 1917 का साल बहुत महत्वपूर्ण था। देश के अंदर चंपारण सत्याग्रह से गाँधीजी स्वतंत्रता आंदोलन की धुरी बन गए थे, तो देश के बाहर रूस मेंसर्वहारा का राजस्थापित हुआ था जिसका गहरा और दूरगामी असर भारत पर भी हुआ था। देश के अंदर समाजवादी और वामपंथी धारा का निर्माण हुआ था। स्वयं जवाहरलाल सोवियत समाजवाद से बहुत प्रभावित थे, दूसरी ओर भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद जैसे युवाओं के नेतृत्व में क्रांतिकारी धारा बनी थी, भारत में मजदूरों-किसानों का राज स्थापित करना जिसका उद्देश्य था। इसके पहले की जो क्रांतिकारी जमातें थीं वे राष्ट्रवाद से ओतप्रोत थीं और स्वशासन की स्थापना और अपनी सभ्यता-संस्कृति की रक्षा के उद्देश्य से कार्य कर रही थीं। इस धारा में सक्रिय कई नेता बाद में हिन्दुत्व की राजनीति में सक्रिय हो गए, जैसे सावरकर, हेडगेवार और गुरु गोलवलकर। कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि हिन्दुत्व की राजनीति की प्रतिक्रिया में मुस्लिम राजनीति खड़ी हुई और द्विराष्ट्र के सिद्धांत के आधार पर मुसलमानों  के लिए अलग देश माँगा। मगर वास्तव में हिन्दुत्व की राजनीति वह ताकत और विस्तार कभी हासिल नहीं कर पाई जो चालीस के दशक  में मुस्लिम लीग को लभ्य हुई। इसका एक बड़ा कारण काँग्रेस और गाँधीजी का नेतृत्व था। एक तो काँग्रेस में हिन्दू रुझान के कई बड़े नेता थे जो व्यापक हिन्दू समाज और भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते थे। दूसरी बात यह कि स्वयं गाँधीजी जिसधर्मयुक्तराजनीतिकी बात कर रहे थे और जिन प्रतीकों को इस्तेमाल कर रहे थे वे मूलतः खाँटी देशी थे और कहीं कहीं आम हिन्दू उनसे गहरे जुड़ा था। दूसरे शब्दों में कहें तो हिन्दू आकांक्षाओं को व्यापक भारतीयता में विन्यस्त कर गाँधीजी और स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष चलाया। यह मात्र संयोग नहीं कि गाँधीजी नेराम राज्यका जो प्रतीक देशवासियों के समक्ष रखा उसमें बहुसंख्यक दमित हिन्दू आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति मिलती थी। आश्चर्य नहीं कि मुस्लिम लीग के नेता प्रकारांतर से गाँधी को निरा हिन्दू और काँग्रेस को हिन्दुओं की पार्टी कहते थे। तब भी हिन्दू देश (राष्ट्र) के आग्रही लोग स्वतंत्रता आंदोलन से दूरी बनाकर हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों के माध्यम से एक समानान्तर धारा चलाते रहे। स्वतंत्रता आंदोलन में इनका योगदान बहुत सीमित था।
                आधी सदी पुरानी काँग्रेस चालीस का दशक आते-आते हाँफने लगी थी। उसे जल्द से जल्द आजादी चाहिए थी और इसी में वह तमाम समस्याओं का अंत भी देखती थी। एक ओर मुस्लिम तो दूसरी ओर दलित राजनीति ने उसे त्रस्त कर रखा था। दलित पक्ष तो फिर भी संभाल में था, लेकिन मुस्लिम लीग कीसीधी कार्रवाईकाँग्रेस पर बल्कि देश पर भारी पड़ी। काँग्रेस बँटवारे के लिए तैयार हो गई - हिन्दू भारत और मुस्लिम पाकिस्तान! अखंड भारत का सपना चकनाचूर हो गया, भारत भूमि तीन भागों में खंडित हो गई। भयानक रक्तपात हुआ। आजादी का रंग फीका पड़ गया। धर्म राष्ट्रीयता का नया आधार बना। जिस राष्ट्रवाद ने यूरोप को दो महायुद्धों में तबाह कर दिया था, उसी ने बदले भेष में भारत को भी तबाह किया।
                धार्मिक आधार पर विभाजन के बाद भी भारत मेंहिन्दुओं का राजनहीं आया बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के पूर्व घोषित लक्ष्यों के अनुरूप एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की स्थापना हुई। इस प्रकार बीसवीं सदी के  में ही जो हिन्दू एजेंडा आकार ले रहा था, उसे पहला बड़ा धक्का भारत विभाजन से लगा। एक ओर तो इससे अखंड भारत के टुकड़े हो गए, तो दूसरी ओर इस विभाजन का कारण भी मुस्लिम लीग के साथ हिन्दू संगठनों को भी बताया गया, खासकर काँग्रेस द्वारा क्योंकि हिन्दू नेता भी धर्म के आधार पर हिन्दुओं-मुसलमानों की राष्ट्रीयताओं में फर्क करते थे। अभी यह सदमा ताजा ही था कि स्वाधीनता प्राप्ति के छह माह बाद ही गाँधीजी की हत्या कर दी गई - उग्र हिन्दुत्ववादियों द्वारा! यह इतना भयानक दुष्कृत्य था कि इससे हिन्दू एजेंडा एकदम से पीछे, पृष्ठभूमि
शिमला कांफ्रेंस ,1946 : पंत ,जिन्ना ,राजगोपालाचारी और मौलाना आज़ाद 
में ला गया। जनभावना हिंदुत्ववादियों के खिलाफ हो गई, महासभा और  राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इस घटना से सरदार पटेल जैसे नेता भी निस्तेज हो गए। यहाँ उल्लेख करना आवश्यक है कि पटेल आजादी की मंजिल तक पहुँचते-पहुँचते मुस्ल्मि लीग के लिए सबसे ड़े दुश्मन बन गए थे, इसके पहले गाँधीजी लीग के  दुश्मन नम्बर एक रहे थे। पटेल खुलकर अपनी बात रखते थे और एकदम सामने आकर लीग को जवाब देते थे, उस समय यह काम करने वाला और कोई था भी नहीं। लेकिन लीग ही नहीं पटेल नेहरू , आजाद सहित समाजवादियों की आँख की भी किरकिरी बने हुए थे। गाँधीजी की हत्या के बाद पटेल सहित काँग्रेस के वे सभी नेता जिनको हिन्दू हितों की परवाह करने वाला माना जाता था, जिनकी पहचानसंकीर्णपरम्परावादीके रूप में थी, ‘दबगए या रक्षात्मक हो गए। पटेल की पहल पर आजादी के फौरन बाद सोमनाथ के जीर्णोंद्वार का काम हाथ में लिया गया जिसे के.एम. मुंशी ने पूरा कराया। 1951 में नये मंदिर की आधारशिला रखने स्वयं राजेन्द्र प्रसाद गए थे। नेहरू जी ने तब हिन्दु पुनरुथान का प्रयास कहकर इसकी आलोचना की थी जबकि प्रसाद और मुंशी ने इसेस्वतंत्रता का फलऔर अतीत में हुए अन्याय को दुरुस्त करना बताया था। राजेन्द्र बाबू को दो और अवसरों पर जानबूझ्ाकर परंपरावादी घोषित किया गया। एक बार जब वाराणसी में उन्होंने पारम्परिक ढंग से पुरोहित पूजा की, और दूसरी बार जब आजादी के तुरंत बाद नेहरू जी हिन्दू कोड बिल संसद में लाना चाहते थे तब राजेन्द्र बाबू ने उन्हें टोका था कि देश की एक बड़ी आबादी की संस्कृति और परम्पराओं में दखल देने वाला यह बिल प्रोविजनल एसेम्बली में लाकर चुनी हुई संसद में प्रस्तुत करना चाहिए। आखिर दो बार के प्रयास के बाद भी प्रोविजनल एसेम्बली में यह बिल पास नहीं हुआ।
पूर्वाद्ध
हैदराबाद ,1952 , राजेंद्र बाबू के साथ के.एम.मुंशी
                स्वतंत्र भारत में राष्ट्र-निर्माताओं ने राष्ट्र निर्माण के प्रयास तेज कर दिए। नेहरुजी के नेतृत्व में उनके सपनों के अनुरूप  एक सशक्त समाजवादी भारत का निर्माण अब प्रत्येक देशवासी की कामना थी। सभी भारतवासियों को एक नयी भारतीय पहचान मिली। इस बीच हिन्दू भावनाओं को सहलाने का पहला महत्वपूर्ण प्रयास हुआ सोमनाथ के जीर्णोद्वार से जिसकी चर्चा की गई। इधर विभाजन के बाद भी जो मुसलमान भारत में रह गए, वे अपनी शर्तों पर यहाँ नहीं रुके थे, बल्कि मिट्टी से जुड़ाव और मातृभूमि से प्रेम के कारण ही खतरा मोल लेकर भी यहाँ रह गए। अजीब स्थिति तब बननी शुरू हुई जब कि एक के बाद एक सरकारों ने उनकी तरफ से खुद ही शर्तें बाँधनी शुरू कर दीं - धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक अधिकारों के नाम पर। जबकि, हमारा संविधान किसी भी स्तर पर दो नागरिकों के बीच भेद नहीं करता था, चुनाव जीतने के समीकरणों के तहतथोक वोटकी अभिलाषा में मुसलमान जो आजादी के समय कुछ प्रतिशत थे, जबरन राजनीति के केन्द्र में लाए गए। आजादी के बाद समाज सुधार के काम को आगे बढ़ाने के लिए भी सरकार ने हिन्दू विश्वासों और परम्पराओं में हस्तक्षेप करने के लिए तो अपने को अधिकृत माना लेकिन मुस्लिम सहित अन्य पद्धतियों एवं परम्पराओं की ओर से तटस्थ रही। कायदे सेएक समान नागरिक संहिताको जल्द से जल्द लागू करने की ओर सरकार को बढ़ना था लेकिन यहसमाजवादी लक्ष्यलगातार दूर होता चला गया और आज तो यह असंभव की सीमा के अंदर दीखता है। सरकारों कीभारतीयताको बढ़ाने में रुचि कम रही, विभाजन पैदा करने से मतलब ज्यादा रहा।
                मुस्लिम प्रथाओं में सुधार का एक अवसर सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो मुकदमें के फैसले में कराया था लेकिन मुस्लिम संगठनों के विरोध के बाद इस निर्णय को संसद द्वारा पलट दिया गया। वास्तव में काँग्रेस और अन्य धर्मनिरपेक्ष सरकारों ने सुविधानुसारधर्मनिरपेक्षताका इस्तेमाल किया, कभी इसका पलड़ा मुसलमानों की ओर झुकाया तो कभी हिन्दुओं के पक्ष में। सलमान रुश्दी तसलीमा नसरीन के मामलों में मुस्लिम कट्टरपंथ को खुश किया गया तो हुसैन के मामले हिन्दू कट्टरपंथियों को। शाहबानो मामले में जब सरकार की भद हुई तो संतुलन स्थापित करने के लिए अयोध्या में राम मंदिर का ताला खोल दिया गया। यही वह बिन्दु है जहाँ से हिन्दुत्व की राजनीति उग्र हुई और इसने अखिल भारतीय विस्तार पाया। 1951 में जनसंघ की स्थापना के साथ हिंदुत्ववादी संसदीय राजनीति में दाखिल हुए लेकिन लगातार हाशिए पर रहे। 1967 की संविद सरकारों में और इसके दस साल बाद आपातकाल के बाद बनी  जनता पार्टी में एक घटक के रूप में जनसंघ शामिल हुआ। 1980 में जनसंघ जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी बन गया। चार साल बाद श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद हुए आम चुनावों में पहली बार काँग्रेसहिन्दू लहरपर सवार हो 424 सीटें लेकर संसद में आई। उसके बाद घटनाओं की पूरी श्रंृखला है। दिल्ली में सत्ता के भंगुर प्रयोगों ने भाजपा को स्पेस दिया।
उपलब्ध
स्वतंत्र भारत के शिल्पकार : पटेल ,प्रसाद और नेहरू 
                इस बीच साम्प्रदायिकता विरोध के नाम पर ब्राह्मणवाद, सवर्णवाद आदि को लगातार निशाने पर लिया जाता रहा और बहुसंख्यक समाज की चिंताओं और सरोकारों की अनेदेखी की गई। साम्प्रदायिकता विरोध हिन्दू विरोध और  की सीमा में दाखिल हो गया। हिन्दू दक्षिणपंथी उभार को बुद्धिजीवियों ने घृणा और तिरस्कार से देखा, कभी तार्किक ढंग से ऐतिहासिक परिपे्रक्ष्य में उसे समझने की कोशिश नहीं की गई। देश में शायद ही कोई ऐसा लेखक हो जिसने इन आंदोलनों के बारे में सहानुभूति की एक पंक्ति लिखी हो। वी.एस. नाॅयपाल और सैमुएल हट्टिंगटन जैसे विचारकों ने इसे अनहोनी के रूप  में देखकर इसका औचित्य सिद्ध करने की कोशिश की तो हठात वे बौने बुद्धिजीवी सिद्ध किए जाने लगे।कुछ महत्वपूर्ण लेखक जिन्होंने देशी सभ्यता और मूल्यों के पुनराविष्कार में आधुनिक सभ्यता के संकटों हल खोजने की कोशिश की वे हिंदूवादी घोषित कर दिए गए। 
                भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की धारा अनेक उपधाराओं से मिलकर बनी थी  - सभी का भारत की मुक्ति का अपना स्वप्न था, अपनी आकांक्षाएँ और अपेक्षाएँ थीं। इनमें मध्यममार्गियों के अलावा समाजवादी, वामपंथी हिंदुत्व दलित और मुस्लिम धारा प्रमुख थी। भारत की स्वतंत्रता जरूर एक साझा लक्ष्य था लेकिन इसे इनके नेता अपने ढंग से परिभाषित करते थे - इनका अलग-अलग एजेंडा था। गाँधीजी, जवाहरलाल, सरदार पटेल, मौलाना आजाद, राजेन्द्र प्रसाद, राजगोपालाचारी, अम्बेदकर, जिन्ना, नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण, नम्बूदरीपाद, रणदिवे, डांगे आदि 1946-47 तक देश के प्रमुख नेता थे जो कमोवेश उपरिलिखित धाराओं का प्रतिनिधित्व करते थे। नेताजी के अभियान को छोड़ दें तो प्रायः शान्तिपूर्ण स्वतंत्रता आंदोलन का अंत भयानक हिंसा और रक्तपात में हुआ, और अचरज और क्षोभ की बात यह कि यह राज्य की हिंसा नहीं थी, राज्य भले ही पृष्ठभूमि में रहा हो। देश स्वतंत्र हुआ तो मध्यममार्गियों की अभिलाषा पूरी हुई - नेहरू, पटेल, प्रसाद नव स्वतंत्र देश के अभिभावक बने। नेहरू जी मध्यममार्गियों के नेता थे ही समाजवादी रुझानों के कारण समाजवादियों और वामपंथियों में भी बहुत लोकप्रिय थे। समाजवादियों और वामपंथियों को नेहरूजी प्रधानमंत्रित्व में अपना एजेंडा पूरा होता दिखा। पाकिस्तान बनने के साथ मुस्लिम धारा (लीग) का एजेंडा पूरा हुआ। मुस्लिमों के लिए अलग से पाकिस्तान तो बना ही, समान नागरिकता के आधार पर भारत भी उनका देश! दलित राजनीति की सबसे बड़ी उपलब्धि यह हुई कि संविधान सभा में अम्बेदकर को प्रारुप समिति का जिम्मा सौंपा गया। बची हिन्दू राजनीति जिसके हाथ आयाजंबू द्वीपे भरत खण्डेके स्थान पर कटा-फटा देश, रक्तपात, विस्थापन, देशांतरण और ....... गाँधी-हत्या का कलंक और अपराध बोध! तब एक धार्मिक समुदाय (वह भी अस्सी प्रतिशत की बहुसंख्या के साथ) के प्रतिनिधित्व का दावा करने वाली हिंदुत्व की राजनीति का एजेंडा तब से अनसुलझा पड़ा है। आश्चर्य की बात यह है कि महासभा, संघ या भाजपा के लोग इसे या तो ठीक से समझते नहीं रहे या देश को समझा नहीं पाए। मुस्लिम विरोध ने इस एजेंडे को पूरी तरह ढक लिया। ऐसे में व्यापक जन समुदाय की सहानुभूति इसके साथ नहीं जुड़ी और यह उचित भी था क्योंकि 15 अगस्त 1947 को जो भारत बना, उसी के लिए जीना-मरना हम सबकी नियति है, कोई इसे बदल नहीं सकता। इसीलिए स्वतंत्र भारत में हिन्दुओं ने अपनी पहचान कोभारतीयमें समाहित हो जाने दिया, यह श्रेय तो पूरी तरह धर्मनिरपेक्षतावादियोंको जाना चाहिए जिनकी बदौलत इस चुनाव में हिन्दू वापस हिन्दू हो गये।
-शिवदयाल
जनसत्ता ( 12 एवं 13 जून 2014, ' बहुमत की उमीद का हिन्दू कोण ' तथा 'सेक्युलर राजनीति की भूलें ') में प्रकाशित। अविकल, असंपादित लेख।फोटो : इंटरनेट।  

No comments:

Post a Comment

  नव-चैतन्य के महावट - रवींद्रनाथ                                 - शिवदयाल  ब चपन में ही जिन विभूतियों की छवि ने मन के अंदर अपना स्थाई निवा...