दक्षिण का वाम पक्ष
-शिवदयाल
-शिवदयाल
पहली बार
हुआ है
कि किसी
नई सरकार
के सत्ता संभालने
पर देश
का बुद्धिजीवी
समाज संदेह
और आशंका
से ग्रस्त
दीखता है।
दक्षिणपंथ लेेखकों-बुद्धिजीवियों को यों
भी आकर्षित
नहीं करता
और इसके
कारण भी
बहुत स्पष्ट
हैं। दक्षिणपंथ
आपको सीमित
करता है,
खुलने नहीं
देता और
प्रायः समाजों
और देशों
के लिए
त्रासदी लेकर
आता रहा
है। एक
बार जड़
जमा लेने
के बाद
इससे पार
पाना आसान
भी नहीं
रहता। यह
भी विचित्र
संयोग है
कि पिछले
दस-पंद्रह
सालों में
लगभग पूरी
दुनिया में
दक्षिणपंथ और कट्टर राजशाहियों के
विरुद्ध जनमत
बना है।
भारतीय उपमहाद्वीप
ही नहीं,
अरब देशों
और कुछ अमेरीकी और लातिन
अमेरिकी देशों
में भी
आम लोगों
ने दक्षिणपंथ
को निर्णायक
चुनौती दी
है और
तानाशाहियों और राजशाहियों को लोकतंत्र
से प्रतिस्थापित
किया है।
और तब
भारत में
दक्षिणपंथ का सशक्त अभ्युदय ! पहली
बार अपने
देश पर
किसी गैर
कांग्रेसी दल को पूर्ण बहुमत
, और वह
बहुसंख्यक हिंदू समुदाय के लिए
राजनीति करने
वाला सांस्कृतिक
राष्ट्रवाद के नाम पर हिन्दू
राष्ट्रवाद की आकांक्षा रखने वाला
दल हो,
यह सहज
ग्राह्य बात
नहीं लगती।
वह भी
तब जबकि
भाजपा को
यह जीत
वाजयेयी जैसे
‘उदार’ और
‘स्वीकृत’ नेता की बदौलत नहीं
मिली, बल्कि
उग्र और
आक्रामक हिन्दुत्व
के पैरोकार
(बल्कि प्रतीक)
माने जाने
वाले नरेन्द्र
मोदी की
अगुआई में
मिली है।
तो क्या
यह माना
जाए कि
लाख गवर्नेंस
और विकास
के नाम
पर चुनाव
लड़ने का
दावा करने
के बावजूद
दिल्ली के
सिंहासन पर
‘हिन्दू शक्ति’
ही विराजमान
हुई है?
अगर हाँ,
तो यह
साढ़े चार
सौ साल
के बाद
हो रहा
है। 1556 में
इतिहासकारों द्वारा मध्यकाल का समुद्रगुप्त
(या नेपोलियन)
कहे जाने
वाले हेमू
- हेमचंद्र विक्रमादित्य ने अफगानों, राजपूतों
और जनजातिय
योद्धाओं को साथ लेकर लगातार बाइस युद्ध जीतने
के बाद
7 अक्टूबर, 1556 में दिल्ली में अपना
राज्याभिषेक करवाया था और हिन्दू
परम्पराओं के अनुसार ‘विक्रमादित्य’ की
उपाधि ग्रहण
की थी। लेकिन
एक माह
के अंदर
ही पानीपत
की दूसरी
लड़ाई में
एक गुमनाम
सैनिक का
तीर उसकी
आँख में चुभ गया
और वह
लगभग जीती
हुई लड़ाई
हार गया।
और अगर
इस अत्यल्प
अवधि के
शासन को
छोड़ दें
तो पूरे आठ सौ
साल बाद,
पृथ्वीराज चैहान के बाद दिल्ली
में ‘हिन्दू राज’ स्थापित हुआ
है।
घटनाक्रम को
इस तरह
से देखना
अपने आप
में बहुत
अजीब है
क्योंकि संघ
की शाखाओं
के बाहर
का ‘हिन्दू’
वास्तव में
‘भारतीय’ में
समाहित मान
लिया गया
है (था)। हिन्दू
भी कोई
धार्मिक समुदाय
अथवा सम्प्रदाय
या पंथ
है, और
उसके होने
का कोई
राजनीतिक फलाफल
अथवा निहितार्थ
भी हो
सकता है
- इस तथ्य
से लगभग
समूचा गैर
संघी, गैर
भाजपा राजनीतिक
वर्ग बेखबर
रहा है।
और यह
वर्ग तो
यह सपने
में भी
नहीं सोच
सकता था
कि हिन्दू
समुदाय की
भी कोई
राजनीतिक आकांक्षा
हो सकती
है, या
फिर पिछले
हजार सालों
में यह
समुदाय इस
योग्य हो
सका कि
इसकी अपनी
कोई सत्ताकांक्षा हो।
अगर सचमुच
इस चुनाव
में ‘उल्टा
ध्रुवीकरण’ अर्थात हिन्दुओं ने एकजुट
होकर मतदान
किया है
जाने-अनजाने,
तो अब
समय आ
गया है
कि इन
प्रश्नों को
ढकने, इनसे
बचने की
बजाए इन
पर गहराई
से विचार
किया जाए।
यह जरूरी
है कि
इस चुनाव
के ‘हिन्दू
कोण’ पर
गंभीरता से
विचार किया,
जाए, बावजूद
इसके कि
प्रगतिशील विचारक भाजपा की जीत
को ‘क्रोनी
कैपिटलिज्म’ की कारगुजारी ही मानकर
संतुष्ट हो
जाना चाहते
हैं। वैसे
इसमें कोई
शक नहीं
कि बहुराष्ट्रीय
कम्पनियाँ भारत के संसाधनों पर
गिद्ध-दृष्टि
जमाए बैठी
हैं और
अपने हित
में गवर्नेंस
और विकास
के नाम
पर देश
की व्यवस्था
में बदलाव
चाहती हैं।
चुनाव प्रचार
के दौरान
ऐसा भ्रम
फैलाया गया
मानो भारत
किसी भयानक
आपदा का
सामना कर
रहा हो,
गर्त में
जा रहा
हो और
उसे तत्काल
बचा निकालने
की दरकार
हो। यथार्थ
यह है
कि देश
के अंदर
कोई बड़ा
आर्थिक संकट
नहीं, अलग-अलग किस्म
के उग्रवादी
आंदोलनों के
बावजूद भारत
की अखंडता
पर कोई
खतरा नहीं,
न ही
कोई युद्ध
की स्थिति
है। दरअसल
पिछले पाँच
सालों के
अंदर ताबड़तोड़
घोटालों, बढती़
महंगाई , अन्ना
हजारे के
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन तथा निर्भया
कांड के
बाद देश
भर में
काँग्रेस के
खिलाफ जबरदस्त
वातावरण बना।
इसका लाभ
सबसे पहले
वैकल्पिक राजनीति
का दावा
करने वाली
आम आदमी
पार्टी को
मिला लेकिन
खामख्वाह दिल्ली
की सत्ता को
छोड़ना लोग
पचा नहीं
सके। इसी
समय चुनाव
की घोषणा
के बाद
राष्ट्रपति प्रणाली की तर्ज पर
चुनाव लड़ने
के भाजपा
के निर्णय
से जो
स्थिति बनी
और पार्टी
द्वारा जिस
स्तर का
और जिस
पैमाने पर
चुनाव अभियान
चलाया गया,
उसमें भाजपा
ही ‘बदलाव’
का वास्तविक
संवाहक बन
गई - भ्रष्टाचार
विरोधी आंदोलन
और ‘आप’
की कमाई
भी भाजपा
के खाते
में। लेकिन
यह विश्लेषण
महत्वपूर्ण होते हुए भी भाजपा
की 282 और
एनडीए की
335 सीटों का औचित्य पूरी तरह
स्पष्ट नहीं
कर पाता।
वैसे भी
पिछड़ों और
दलितों की
राजनीति करने
वाले दलों
का सफाया
किस प्रकार
संभव हो
सका - सपा,
राष्ट्रीय जनता दल, बसपा और
यहाँ तक
कि विकास
के ‘बिहार
माॅडल’ का
दावा करने
वाला जेडीयू?
फिर क्या
यह माना
जाए कि
नरेन्द्र मोदी
की चुनाव
सभाओं में
उमड़े युवाओं
ने जाति,
धर्म, वर्ग,
क्षेत्र की
सीमा लाँघकर
‘अच्छे दिनों’
की खातिर
भाजपा को
यह बहुमत
दिया? आखिर
1990 के बाद
पैदा हुए
युवाओं को
‘धर्मनिरपेक्षता’ को लेकर
नरेन्द्र मोदी
के साथ
जाने में
क्या हिचक
हो सकती
थी, यह
पीढ़ी तो
मंडल-कमंडल
के प्रभाव
से प्रायः
मुक्त है।
उस दौर
से दुनिया
बहुत आगे
बढ़ गई
है, भारत
आगे निकल
आया है
- आज का
भूमंडलीकृत भारत! भूमंडलीकरण की प्रक्रिया
स्थानीय अंतर्विरोधों
को ढकने-तोपने, बल्कि
पचा जाने
की भी
सामथ्र्य रखती
है।
हमारा दुर्भाग्य
यह रहा
कि आजादी
के बाद
देश में
धर्मनिरपेक्षता की जो राजनीति चलाई
गई, विशेषकर सत्तर के दशक
के बाद,
उसमें बहुसंख्यक
समाज के
विखंडन को
ही उसका
आधार बनाया
गया। यह
मानकर चला
गया, बल्कि
विश्वास दिलाया
गया कि
पिछड़े और
दलित हिन्दू
इस सीमा
तक ‘धर्मनिरपेक्ष’
हैं, मानो
वे हिन्दू
समाज के
अंग ही
नहीं हैं,
बल्कि उससे
बाहर हैं।
उनकी कोई
धार्मिक आकांक्षा
नहीं हो
सकती, आग्रह
नहीं हो
सकता। एक
जाति के
रूप में
हिन्दुओं के
बहुसंख्यक होते हुए भी उनके
ऐतिहासिक दमन,
सत्ताहीनता,
वर्चस्वहीनता के ऊपर हिन्दु समाज
के अंदर
बहुसंख्यक दलित-पिछड़ी जातियों के
ऐतिहासिक दमन
की और
इसके एवज
में क्षतिपूर्ति
की बात
की गई।
यह एक
ही ‘सिक्के
के दो
पहलू’ जैसा
है। इतिहास
में हुए
अन्याय को
आधार बनाकर
हिन्दू (‘साम्प्रदायिक‘)
राजनीति के
पैरोकार स्वतंत्र
भारत में सत्ता और व्यवस्था
में हिन्दुओं
का वर्चस्व
चाहते रहे,
जबकि इसी
आधार पर
‘धर्मनिरपेक्ष’ दल ‘सामाजिक न्याय’ के
नाम पर
पिछड़ों-दलितों
के लिए सत्ता की कुंजी
माँगते रहे।
पहली राजनीति
के निशाने
पर मोटे
तौर पर
मुसलमान और
‘मुसलमान परस्त’
दल रहे
जबकि दूसरे
प्रकार की
राजनीति मुस्लिमों
को अपने
साथ लेकर
‘हिंदू’ सवर्णों
को अपने
निशाने पर
लेेती रही।
धर्मनिरपेक्ष दलों ने सवर्ण-विरोध
की आड़
में खुलेआम
हिन्दू प्रतीकों
पर हमला
किया। उन्होंने
हिन्दू धर्म
को ब्राह्मणों
या अधिक
से अधिक सवर्णों का
धर्म बनाकर
प्रस्तुत किया।
आमतौर पर
‘प्रगतिशील’, ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘सामाजिक न्याय’
के पाले में रहने
वाले बुद्धिजीवियों
ने इस
राजनीति का
साथ दिया,
इसे परिपुष्ट
किया। आज
इसीलिए भारत
की केन्द्रीय
सत्ता पर हिन्दुत्ववादियों
को आसीन
देख वे
हतप्रभ हैं।
उनके लिए
हिन्दुओं का
‘एक’ होकर
मतदान करना
कल्पनातीत है। वे सपने में
भी नहीं
सोच सकते
थे कि
अगर 15 या
25 प्रतिशत आबादी को वोट बैंक
के रूप में एकजुट
होकर मतदान
के लिए
प्रेरित किया
जा सकता
है, तो
यह काम
85 प्रतिशत आबादी के लिए बखूबी
किया जा
सकता है।
लेकिन अगर
पीछे मुड़कर
देखें तो
पिछले तीस-पैंतीस सालों
की राजनीति
इसी बात
के लिए
बहुसंख्यक समुदाय को उकसाती आ
रही है।
बल्कि स्वतंत्रता
पश्चात ही
इसकी शरुआत
हो चुकी
थी।
अतीत के
पुनरावलोकन से यह बात स्पष्ट
होती है
और इस
हिन्दू उभार
का औचित्य
भी समझ में
आता
है, बल्कि
उसका एक
‘वाम’ पक्ष
भी खुलता
दिखाई देता
है। यह
बात बहुत
आश्चर्यजनक लग सकती है। इसका
स्रोत इतिहास
में है।
अन्याय, वंचना,
पराजय बोध
इसके मूल
में है।
हिन्दू भारत
में बहुसंख्यक
जरूर रहे
हैं लेकिन
पिछले लगभग
आठ सौ
सालों में
हिन्दू जाति
एकाध दृष्टांतों
को छोड़
कभी शासक
जाति नहीं
रही - कम
से कम
केन्द्र में।
एकेश्वरवादी साम्राज्यवाद के बाद प्रोटेस्टेंट
उपनिवेशवाद ने लगातार सैंकड़ों साल
तक हिन्दुओं
को भारत
की केन्द्रीय
सत्ता से दूर
रखा। एकेश्वरवादी
केन्द्रीय सत्ता के खिलाफ
परिधि पर
‘पैगन’ (हिन्दू,
मूर्तिपूजक, प्रकृतिपूजक, बहुदेववादी)
प्रतिरोध कभी
इतना सक्षम
नहीं बन
सका कि
वह उसे
विस्थापित कर दे। मध्यकाल मेें
इसी दौर
में भारतीय
समाज विजयी
और विजित,
मूर्तिभंजक और मूर्तिपूजक, एकदेववादी और
बहुदेववादी के बीच सामंजस्य बैठाने
की कोशिश
कर रहा
था। धर्मांतरण
भी इस
प्रक्रिया का अंग था। स्वैच्छिक
धर्मांतरण कोई नयी बात नहीं
थी। हिंदू
बड़ी संख्या
में बौद्ध
बने थे,
और बाद
में इसका
उल्टा भी
हुआ था।
लेकिन बलपूर्वक
धर्मांतरण का संभवतः पहला अनुभव
भारत को
हो रहा
था। पहली
बार भारतीय
समाज ऐसे
आक्रांताओं का सामना कर रहा
था और
उनके सामने
परास्त भी
हो रहा
था जो
अपना राजनीतिक
ही नहीं,
धार्मिक प्रभुत्व
भी स्थापित
करना चाह
रहे थे।
इस कोशिश के तहत बलात्
धर्मांतरण भी हो रहा था
और उपासना
स्थलों को
भी नष्ट
किया जा
रहा था।
यहाँ न
ज्ञान, न
किसी विद्या
की कुछ
चल रही
थी, न
कोई शास्त्रार्थ
था। जो
आए थे
उन्हें ‘असभ्यों’
को ‘सभ्य’
बनाना था।
पैगन, नास्तिकों
को ‘आस्तिक’
यानी एक
ईश्वर का
उपासक बनाना
था। मुस्लिम सत्ता जब एक
बार स्थापित
हो गई
तो इसका
एक और
परिणाम हुआ
- कई क्षेत्रों
में हिन्दू
सामाजिक पदानुक्रम
में शोषण
और भेदभाव
की शिकार
‘निम्न’ जातियों
को इस्लाम
के
‘समानता’ के सिद्धांत में अपनी
मुक्ति का
मार्ग दिखलाई
पड़ा। इन
जातियों का
इस्लाम (बाद
में कुछ
हद तक
ईसाई में) में सामूहिक
धर्मांतरण लगभग लगातार चलता रहा
- भले ही
छिटपुट रूप
से। इससे
‘समाहितीकरण’ की प्रक्रिया को तो
बल मिला
ही इस्लाम
धर्म और
इस्लामी शासकों
के
प्रति स्वीकार्यता भी बढ़ी - इस
हद तक
कि तेरहवीं
सदी से
लेकर उन्नीसवीं
सदी के
मध्य तक
भारत की
केन्द्रीय सत्ता पर कमोवेश
उनका नियंत्रण
बना रहा।
इसके बाद
आया उपनिवेशवाद
का दौर।
ब्रिटिश उपनिवेशवाद
ने समूचे
भारत के
राजनीतिक स्वरूप
को बदल
दिया। इसने
मुसलमानों को भी कुचला और
हिन्दुओं को
भी। यह
एक ऐसी
व्यवस्था थी
जिसमें देशी
साधनों के
दोहन से
सात समंदर
पार की
सभ्यता समृद्ध
हो रही
थी और
भारतवासी कंगाल
हो रहे
थे। इस
दौर में,
19वीं और
20वीं सदी
मेें यूरोप
में एक
ओर पूँजीवाद
का विकास
हो रहा
था तो
दूसरी ओर
नयी राष्ट्रीयताएं
सिर उठा
रही थीं
और इसी
आधार पर
राष्ट्र-राज्य
विकसित हो
रहे थे।
भारत में
उपनिवेशवाद के मुकाबले में राष्ट्रवाद
मजबूत हो
रहा था
तमाम विविधताओं
के रहते।
राष्ट्रीय एकता और स्वशासन का
अधिकार - ये
दो चुनौतियाँ
इसके सामने
थीं। धर्म,
भाषा, क्षेत्र,
जाति आदि
की बहुलता
में, सुरेन्द्र
नाथ बनर्जी
के शब्दों
में ‘विविधता
से एक
राष्ट्र का
निर्माण’ हो
रहा था।
इस राष्ट्र
की कल्पना
सबकी अपनी-अपनी थी
लेकिन इस
राष्ट्रवाद का लक्ष्य साझा था
- उपनिवेशवादी शासन की समाप्ति और
अपना शासन
स्थापित करना।
इस प्रक्रिया
में राष्ट्रीयताओं के अलग-अलग स्वर
भी उभर
रहे थे।
भारतीय राष्ट्रवाद
के समक्ष
दो विकल्प
थे - सार्वभौमवाद,
जिसमें हर
पहचान, हर
सामाजिक-सांस्कृतिक
इकाई को
मान्यता थी
और जिसकी
विश्व-दृष्टि
मानव समाज
की समस्त
इकाइयों के
सृजनात्मक सहयोग और सहकार से
निर्मित हुई
थी। सार्वभौमवाद
की जड़ें
भारतीय सभ्यता
में थीं
और इसके
पैरोकार और
सिद्धांतकार रवीन्द्रनाथ और महात्मा गाँधी
थे, और
कहीं न
कहीं विवेकानंद
भी। दूसरा
विकल्प था
यूरोप के
राष्ट्र-राज्य
को अंगीकार
कर लेना।
इससे भारत
राजनीतिक रूप
से एक
हो सकता
था और
राष्ट्रवादियों को यही अभीष्ट भी
था। आखिरकार
भारत ने
यूरोप के
राष्ट्र राज्य
माॅडल को
ही अपनाया।
लेकिन यूरोप
में राष्ट्रीयताओं
के उदय
और राष्ट्र-राज्यों के
अस्तित्व में
आने का
एक नकारात्मक
प्रभाव बीसवीं
सदी की
शुरुआत में
ही दृष्टिगोचर
होने लगा।
यूरोप में
राष्ट्रीयता का आधार एक प्रजाति,
एक साझा
अतीत और
भूभाग बना
था। भारत
में धर्म
को राष्ट्रीयता
का आधार
मानने का
आग्रह बढ़ने
लगा। अगर
धर्म यूरोप
में राष्ट्रीयता
का आधार
होता तो
समूचा यूरोप
एक राष्ट्र
होता। जहाँ
हिंदू पुनरुत्थानवादी
अखण्ड भारत
में हिन्दुओं
का वर्चस्व
चाहते थे
वहीं मुस्लिम
राष्ट्रवादियों ने आगे चलकर मुसलमानों
के लिए
एक
देश की ही माँग कर दी। बीसवीं सदी के शुरुआत अगर मुस्लिम राजनीति आकार ले रही थी, 1906 में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना के साथ, तो हिन्दू राजनीति भी विनायक दामोदर सावरकर, केशव हेडगेवार और गुरु गोलवलकर जैसे नेताओं की अगुआई में अपने रास्ते चल पड़ी थी। 1914 में हिन्दू महासभा की और 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई। यूरोपीय राष्ट्र-राज्य का सिद्धांत भारत को राजनीतिक रूप से भी एक न रख सका। मुसलमान भारत की शासक जाति रही थी और हिन्दू शासित। स्वतंत्र लोकतांत्रिक भारत में मुस्लिम राष्ट्रवादी अल्पसंख्यक मुसलमानों को बहुसंख्यक (शसक) हिन्दुओं के अधीन देखना नहीं चाहते थे। उन्होंने सदियों में विकसित हुए मिट्टी के रिश्ते के ऊपर धार्मिक पहचान को वरीयता दी। भारत का विभाजन हुआ - उसके तीन टुकड़े हो गए (राजनीतिक रूप से दो)। यह हिन्दू राष्ट्रवादियों ही नहीं आम हिन्दू, बल्कि भारतीय के लिए बहुत बड़ा सदमा था। शासित रही जाति के दृष्टिकोण से देखें तो यह बहुत बड़ा धोखा था - जब बराबरी की बात आई तो अलग देश ही बना डाला!
देश की ही माँग कर दी। बीसवीं सदी के शुरुआत अगर मुस्लिम राजनीति आकार ले रही थी, 1906 में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना के साथ, तो हिन्दू राजनीति भी विनायक दामोदर सावरकर, केशव हेडगेवार और गुरु गोलवलकर जैसे नेताओं की अगुआई में अपने रास्ते चल पड़ी थी। 1914 में हिन्दू महासभा की और 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई। यूरोपीय राष्ट्र-राज्य का सिद्धांत भारत को राजनीतिक रूप से भी एक न रख सका। मुसलमान भारत की शासक जाति रही थी और हिन्दू शासित। स्वतंत्र लोकतांत्रिक भारत में मुस्लिम राष्ट्रवादी अल्पसंख्यक मुसलमानों को बहुसंख्यक (शसक) हिन्दुओं के अधीन देखना नहीं चाहते थे। उन्होंने सदियों में विकसित हुए मिट्टी के रिश्ते के ऊपर धार्मिक पहचान को वरीयता दी। भारत का विभाजन हुआ - उसके तीन टुकड़े हो गए (राजनीतिक रूप से दो)। यह हिन्दू राष्ट्रवादियों ही नहीं आम हिन्दू, बल्कि भारतीय के लिए बहुत बड़ा सदमा था। शासित रही जाति के दृष्टिकोण से देखें तो यह बहुत बड़ा धोखा था - जब बराबरी की बात आई तो अलग देश ही बना डाला!
![]() |
| एक देश के नेता जो दो देशों के राज्याध्यक्ष हुए ! |
आधी सदी
पुरानी काँग्रेस
चालीस का
दशक आते-आते हाँफने
लगी थी।
उसे जल्द
से जल्द
आजादी चाहिए
थी और
इसी में
वह तमाम
समस्याओं का
अंत भी
देखती थी।
एक ओर
मुस्लिम तो
दूसरी ओर
दलित राजनीति
ने उसे
त्रस्त कर
रखा था।
दलित पक्ष
तो फिर
भी संभाल में था,
लेकिन मुस्लिम
लीग की
‘सीधी कार्रवाई’
काँग्रेस पर
बल्कि देश
पर भारी
पड़ी। काँग्रेस
बँटवारे के
लिए तैयार
हो गई
- हिन्दू भारत
और मुस्लिम
पाकिस्तान! अखंड भारत का सपना
चकनाचूर हो
गया, भारत
भूमि तीन
भागों में
खंडित हो
गई। भयानक
रक्तपात हुआ।
आजादी का
रंग फीका
पड़ गया।
धर्म राष्ट्रीयता
का नया
आधार बना।
जिस राष्ट्रवाद
ने यूरोप
को दो
महायुद्धों में तबाह कर दिया
था, उसी
ने बदले
भेष में भारत को
भी तबाह
किया।
धार्मिक आधार
पर विभाजन
के बाद
भी भारत
में ‘हिन्दुओं
का राज’
नहीं आया
बल्कि स्वतंत्रता
आंदोलन के
पूर्व घोषित
लक्ष्यों के अनुरूप एक धर्मनिरपेक्ष
राष्ट्र की
स्थापना हुई।
इस प्रकार
बीसवीं सदी
के में ही
जो हिन्दू
एजेंडा आकार
ले रहा
था, उसे
पहला बड़ा
धक्का भारत
विभाजन से
लगा। एक
ओर तो
इससे अखंड
भारत के
टुकड़े हो
गए, तो
दूसरी ओर
इस विभाजन
का कारण
भी मुस्लिम
लीग के
साथ हिन्दू
संगठनों को
भी बताया
गया, खासकर
काँग्रेस द्वारा
क्योंकि हिन्दू
नेता भी
धर्म के
आधार पर
हिन्दुओं-मुसलमानों
की राष्ट्रीयताओं
में फर्क
करते थे।
अभी यह
सदमा ताजा
ही था
कि स्वाधीनता
प्राप्ति के
छह माह
बाद ही
गाँधीजी की
हत्या कर
दी गई
- उग्र हिन्दुत्ववादियों
द्वारा! यह
इतना भयानक
दुष्कृत्य था कि इससे हिन्दू
एजेंडा एकदम
से पीछे,
पृष्ठभूमि
में चला गया। जनभावना
हिंदुत्ववादियों के खिलाफ हो गई,
महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक
संघ पर
प्रतिबंध लगा
दिया गया।
इस घटना
से सरदार
पटेल जैसे
नेता भी
निस्तेज हो
गए। यहाँ
उल्लेख करना
आवश्यक है
कि पटेल
आजादी की
मंजिल तक
पहुँचते-पहुँचते
मुस्ल्मि लीग
के लिए
सबसे बड़े
दुश्मन बन
गए थे,
इसके पहले
गाँधीजी लीग
के
दुश्मन नम्बर एक रहे थे।
पटेल खुलकर
अपनी बात
रखते थे
और एकदम
सामने आकर
लीग को
जवाब देते
थे, उस
समय यह
काम करने
वाला और
कोई था
भी नहीं।
लेकिन लीग
ही नहीं
पटेल नेहरू
, आजाद सहित
समाजवादियों की आँख की भी
किरकिरी बने
हुए थे।
गाँधीजी की
हत्या के
बाद पटेल
सहित काँग्रेस
के वे
सभी नेता
जिनको हिन्दू
हितों की
परवाह करने
वाला माना
जाता था,
जिनकी पहचान
‘संकीर्ण‘ व ‘परम्परावादी‘ के रूप
में थी,
‘दब’ गए
या रक्षात्मक
हो गए।
पटेल की
पहल पर
आजादी के
फौरन बाद
सोमनाथ के
जीर्णोंद्वार का काम हाथ में
लिया गया
जिसे के.एम. मुंशी
ने पूरा
कराया। 1951 में नये मंदिर की
आधारशिला रखने
स्वयं राजेन्द्र
प्रसाद गए
थे। नेहरू
जी ने
तब हिन्दु
पुनरुथान का
प्रयास कहकर
इसकी आलोचना
की थी
जबकि प्रसाद
और मुंशी
ने इसे
‘स्वतंत्रता का फल‘ और अतीत
में हुए
अन्याय को
दुरुस्त करना
बताया था।
राजेन्द्र बाबू को दो और
अवसरों पर
जानबूझ्ाकर परंपरावादी घोषित किया गया।
एक बार
जब वाराणसी
में उन्होंने
पारम्परिक ढंग से पुरोहित पूजा
की, और
दूसरी बार
जब आजादी
के तुरंत
बाद नेहरू
जी हिन्दू
कोड बिल
संसद में
लाना चाहते
थे तब
राजेन्द्र बाबू ने उन्हें टोका
था कि
देश की
एक बड़ी
आबादी की
संस्कृति और
परम्पराओं में दखल देने वाला
यह बिल
प्रोविजनल एसेम्बली में न लाकर
चुनी हुई
संसद में
प्रस्तुत करना
चाहिए। आखिर
दो बार
के प्रयास
के बाद
भी प्रोविजनल
एसेम्बली में
यह बिल
पास नहीं
हुआ।
पूर्वाद्ध
| शिमला कांफ्रेंस ,1946 : पंत ,जिन्ना ,राजगोपालाचारी और मौलाना आज़ाद |
पूर्वाद्ध
![]() |
| हैदराबाद ,1952 , राजेंद्र बाबू के साथ के.एम.मुंशी |
मुस्लिम प्रथाओं
में सुधार
का एक
अवसर सर्वोच्च
न्यायालय ने
शाहबानो मुकदमें
के फैसले
में
कराया था
लेकिन मुस्लिम
संगठनों के
विरोध के
बाद इस
निर्णय को
संसद द्वारा
पलट दिया
गया। वास्तव में काँग्रेस
और अन्य
धर्मनिरपेक्ष सरकारों ने सुविधानुसार ‘धर्मनिरपेक्षता’
का इस्तेमाल
किया, कभी
इसका पलड़ा
मुसलमानों की ओर झुकाया तो
कभी हिन्दुओं
के पक्ष
में। सलमान
रुश्दी व
तसलीमा नसरीन
के मामलों
में मुस्लिम
कट्टरपंथ को
खुश किया
गया तो
हुसैन के
मामले हिन्दू
कट्टरपंथियों को। शाहबानो मामले में
जब सरकार
की भद
हुई तो
संतुलन स्थापित
करने के
लिए अयोध्या
में राम
मंदिर का
ताला खोल
दिया गया।
यही वह
बिन्दु है
जहाँ से
हिन्दुत्व की राजनीति उग्र हुई
और इसने
अखिल भारतीय
विस्तार पाया।
1951 में जनसंघ
की स्थापना
के साथ
हिंदुत्ववादी संसदीय राजनीति में दाखिल
हुए लेकिन
लगातार हाशिए
पर रहे।
1967 की संविद
सरकारों में
और इसके
दस साल
बाद आपातकाल
के बाद
बनी
जनता पार्टी में एक घटक
के रूप
में जनसंघ
शामिल हुआ।
1980 में जनसंघ
जनता पार्टी
से अलग
होकर भारतीय
जनता पार्टी
बन गया।
चार साल
बाद श्रीमती
इंदिरा गाँधी
की हत्या
के बाद
हुए आम
चुनावों में
पहली बार
काँग्रेस ‘हिन्दू लहर’ पर सवार
हो 424 सीटें
लेकर संसद
में आई।
उसके बाद
घटनाओं की
पूरी श्रंृखला
है। दिल्ली
में सत्ता के
भंगुर प्रयोगों ने भाजपा
को स्पेस
दिया।
उपलब्ध
उपलब्ध
| स्वतंत्र भारत के शिल्पकार : पटेल ,प्रसाद और नेहरू |
भारतीय स्वतंत्रता
आंदोलन की
धारा अनेक
उपधाराओं से
मिलकर बनी
थी
- सभी का भारत की मुक्ति
का अपना
स्वप्न था,
अपनी आकांक्षाएँ
और अपेक्षाएँ
थीं। इनमें
मध्यममार्गियों के अलावा समाजवादी, वामपंथी
हिंदुत्व दलित
और मुस्लिम
धारा प्रमुख
थी। भारत
की स्वतंत्रता
जरूर एक
साझा लक्ष्य
था लेकिन
इसे इनके
नेता अपने
ढंग से
परिभाषित करते
थे - इनका
अलग-अलग
एजेंडा था।
गाँधीजी, जवाहरलाल,
सरदार पटेल,
मौलाना आजाद,
राजेन्द्र प्रसाद, राजगोपालाचारी, अम्बेदकर, जिन्ना,
नरेन्द्र देव,
जयप्रकाश नारायण,
नम्बूदरीपाद, रणदिवे, डांगे आदि 1946-47 तक
देश के
प्रमुख नेता
थे जो
कमोवेश उपरिलिखित
धाराओं का
प्रतिनिधित्व करते थे। नेताजी के
अभियान को
छोड़ दें
तो प्रायः
शान्तिपूर्ण स्वतंत्रता आंदोलन का अंत
भयानक हिंसा
और रक्तपात
में हुआ,
और अचरज
और क्षोभ
की बात
यह कि
यह राज्य
की हिंसा
नहीं थी,
राज्य भले
ही पृष्ठभूमि
में रहा
हो। देश
स्वतंत्र हुआ
तो मध्यममार्गियों
की अभिलाषा
पूरी हुई
- नेहरू, पटेल,
प्रसाद नव
स्वतंत्र देश
के अभिभावक
बने। नेहरू
जी मध्यममार्गियों
के नेता
थे ही
समाजवादी रुझानों
के कारण
समाजवादियों और वामपंथियों में भी
बहुत लोकप्रिय
थे। समाजवादियों
और वामपंथियों
को नेहरूजी
प्रधानमंत्रित्व में अपना एजेंडा पूरा
होता दिखा।
पाकिस्तान बनने के साथ मुस्लिम
धारा (लीग)
का एजेंडा
पूरा हुआ।
मुस्लिमों के लिए अलग से
पाकिस्तान तो बना ही, समान
नागरिकता के
आधार पर
भारत भी
उनका देश!
दलित राजनीति
की सबसे
बड़ी उपलब्धि
यह हुई
कि संविधान
सभा में
अम्बेदकर को
प्रारुप समिति
का जिम्मा
सौंपा गया।
बची हिन्दू
राजनीति जिसके
हाथ आया
‘जंबू द्वीपे
भरत खण्डे’
के स्थान
पर कटा-फटा देश,
रक्तपात, विस्थापन,
देशांतरण और
....... गाँधी-हत्या का कलंक और
अपराध बोध!
तब एक
धार्मिक समुदाय
(वह भी
अस्सी प्रतिशत
की बहुसंख्या
के साथ)
के प्रतिनिधित्व
का दावा
करने वाली
हिंदुत्व की
राजनीति का
एजेंडा तब
से अनसुलझा
पड़ा है।
आश्चर्य की
बात यह
है कि
महासभा, संघ
या भाजपा
के लोग
इसे या
तो ठीक
से समझते
नहीं रहे
या देश
को समझा
नहीं पाए।
मुस्लिम विरोध
ने इस
एजेंडे को
पूरी तरह
ढक लिया।
ऐसे में
व्यापक जन
समुदाय की
सहानुभूति इसके साथ नहीं जुड़ी
और यह
उचित भी
था क्योंकि
15 अगस्त 1947 को जो भारत बना,
उसी के
लिए जीना-मरना हम
सबकी नियति
है, कोई
इसे बदल
नहीं सकता।
इसीलिए स्वतंत्र
भारत में
हिन्दुओं ने
अपनी पहचान
को ‘भारतीय’
में समाहित
हो जाने
दिया, यह
श्रेय तो
पूरी तरह
धर्मनिरपेक्षतावादियों’ को जाना
चाहिए जिनकी
बदौलत इस
चुनाव में
हिन्दू वापस
हिन्दू हो
गये।
-शिवदयाल
जनसत्ता ( 12 एवं 13 जून 2014, ' बहुमत की उमीद का हिन्दू कोण ' तथा 'सेक्युलर राजनीति की भूलें ') में प्रकाशित। अविकल, असंपादित लेख।फोटो : इंटरनेट।




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