- शिवदयाल
बालेश्वर मास्टरसाहेब याद आ रहे हैं। बाबू बालेश्वर प्रसाद सिंह। गर्दनीबाग़ के दमड़िआ मोहल्ले में स्कूल चलाते थे - राष्ट्रीय विकास विद्यालय। वही हेडमास्टर थे और माटसाहेब, यानी शिक्षक भी वही। साल दो साल उनके स्कूल में रहा था। बच्चों को उनके घर से उठाते और लाइन में चलाते हुए स्कूल पहुंचाते, और घर वापस ले आते। जमीन पर बोरी बिछाकर बच्चे बैठते। हमेशा खद्दर का धोती-कुरता पहने होते। गेहुआँ रंग , अधपके बाल , औसत कद.. नाक पर मोटे फ्रेम का चश्मा। कभी मारा हो, याद नहीं आता। मीठे स्वभाव के व्यक्ति! पैदल ही हम बच्चों को कभी-कभी घुमाने ले जाते - शहीद स्मारक ,सचिवालय, डनबर पार्क …! तब पटना में चिड़ियाघर नहीं बना था।
इन्हीं बालेसर माटसाहेब के मुँह से पहली बार उनका नाम सुना था - जयप्रकाश बाबू। जयप्रकाश नारायण ! याद आता है शायद सतमूर्ति, यानी शहीद स्मारक के पास किसी अन्य व्यक्ति के साथ बातचीत में यह नामोल्लेख हुआ था। बाद में बाबूजी ने उनके बारे में बताया था।
एक और शिक्षक याद आते हैं - रामकिशोर बाबू। केंद्रीय विद्यालय के शिक्षक। वे भी खद्दरधारी , ऊपर से गांधी टोपी भी। बहुत सौम्य व्यक्तित्व। घर आते तो चाय की घूँट को मानो गरारा करके निगलते। माँ उन्हें भरसक नाश्ता कराके भेजती। कभी डांटा नहीं मुझे।
केंद्रीय विद्यालय में एक ऐसे भी शिक्षक थे (पीटीआई) जिन्होंने साथ बैठे सहपाठी के साथ बात करने के अपराध पर इतने जोर का चांटा लगाया था कि तारे दिखाई दिए थे, बल्कि पेशाब भी निकल आया था। तब मैं चौथी या पाँचवीं कक्षा में था।
एक मैडम थीं - गुहा मैडम। हिंदी पढ़ाती थीं। श का उच्चारण उन्होंने ही सिखाया और इसके लिए बहुत मशक्कत की। बाद में हिंदी पाठ का रीडिंग मुझसे लगवातीं और बच्चों को मेरा अनुकरण करने को कहतीं। बी ए तक सौ अंक का एक पत्र हिंदी का पढ़ा ,इस अर्थ में मैं हिंदी का आदमी नहीं हूँ , तब भी हिंदी में काम करता हूँ तो इसके पीछे कहीं न कहीं गुहा मैडम का मुझमें जताया भरोसा भी है।
संगीत शिक्षक जो मुझे लेकर आम बागीचे में अभ्यास कराते और हाई स्केल पर गाना उठाने को कहते --' जिंदगी तैयार हो जा देश सेवा के लिए.. ','भवानी दयानी महावाकवाणी..''।उन्होंने एक दिन दुखी होकर कहा कि वे मुझे संगीत नहीं सीखा सकते क्योंकि मेरे पिता को यह बात पसंद नहीं। उनका चेहरा , उनकी भंगिमाएँ और उनकी आवाज - सब याद है, लेकिन उनका नाम याद नहीं रहा।
बचपन में जिस शिक्षक ने भूगोल और इतिहास में रूचि जगाई वे (एल के?) झा सर थे ,लेकिन मैं विज्ञान में आ गया। बात वहीँ ख़त्म हो गई ! पर क्या सचमुच?
व्हीलर मैडम सटीक , शुद्ध उच्चारण के साथ अँग्रेजी पढ़ातीं। प्रजापति मैडम बायोलॉजी पढ़ातीं ,... प्रसाद मैडम की भी याद आ गई!
एक और शिक्षक थे जो टंडन नामक मेरे सहपाठी से अंग्रेजी की कक्षा में सहगल का गाना सुनते। पता नहीं आज मेरे ये शिक्षक कहाँ और किस हाल में हैं। मैं जो हूँ उन्हीं की रचना हूँ ,चाहे जैसा भी, भले ही उनकी उम्मीद से कमतर. । लेकिन उन्हें याद करता हूँ - कृतज्ञता से , और धन्यता की अनुभूति से भरकर !
इन्हीं बालेसर माटसाहेब के मुँह से पहली बार उनका नाम सुना था - जयप्रकाश बाबू। जयप्रकाश नारायण ! याद आता है शायद सतमूर्ति, यानी शहीद स्मारक के पास किसी अन्य व्यक्ति के साथ बातचीत में यह नामोल्लेख हुआ था। बाद में बाबूजी ने उनके बारे में बताया था।
एक और शिक्षक याद आते हैं - रामकिशोर बाबू। केंद्रीय विद्यालय के शिक्षक। वे भी खद्दरधारी , ऊपर से गांधी टोपी भी। बहुत सौम्य व्यक्तित्व। घर आते तो चाय की घूँट को मानो गरारा करके निगलते। माँ उन्हें भरसक नाश्ता कराके भेजती। कभी डांटा नहीं मुझे।
केंद्रीय विद्यालय में एक ऐसे भी शिक्षक थे (पीटीआई) जिन्होंने साथ बैठे सहपाठी के साथ बात करने के अपराध पर इतने जोर का चांटा लगाया था कि तारे दिखाई दिए थे, बल्कि पेशाब भी निकल आया था। तब मैं चौथी या पाँचवीं कक्षा में था।
एक मैडम थीं - गुहा मैडम। हिंदी पढ़ाती थीं। श का उच्चारण उन्होंने ही सिखाया और इसके लिए बहुत मशक्कत की। बाद में हिंदी पाठ का रीडिंग मुझसे लगवातीं और बच्चों को मेरा अनुकरण करने को कहतीं। बी ए तक सौ अंक का एक पत्र हिंदी का पढ़ा ,इस अर्थ में मैं हिंदी का आदमी नहीं हूँ , तब भी हिंदी में काम करता हूँ तो इसके पीछे कहीं न कहीं गुहा मैडम का मुझमें जताया भरोसा भी है।
संगीत शिक्षक जो मुझे लेकर आम बागीचे में अभ्यास कराते और हाई स्केल पर गाना उठाने को कहते --' जिंदगी तैयार हो जा देश सेवा के लिए.. ','भवानी दयानी महावाकवाणी..''।उन्होंने एक दिन दुखी होकर कहा कि वे मुझे संगीत नहीं सीखा सकते क्योंकि मेरे पिता को यह बात पसंद नहीं। उनका चेहरा , उनकी भंगिमाएँ और उनकी आवाज - सब याद है, लेकिन उनका नाम याद नहीं रहा।
बचपन में जिस शिक्षक ने भूगोल और इतिहास में रूचि जगाई वे (एल के?) झा सर थे ,लेकिन मैं विज्ञान में आ गया। बात वहीँ ख़त्म हो गई ! पर क्या सचमुच?
व्हीलर मैडम सटीक , शुद्ध उच्चारण के साथ अँग्रेजी पढ़ातीं। प्रजापति मैडम बायोलॉजी पढ़ातीं ,... प्रसाद मैडम की भी याद आ गई!
एक और शिक्षक थे जो टंडन नामक मेरे सहपाठी से अंग्रेजी की कक्षा में सहगल का गाना सुनते। पता नहीं आज मेरे ये शिक्षक कहाँ और किस हाल में हैं। मैं जो हूँ उन्हीं की रचना हूँ ,चाहे जैसा भी, भले ही उनकी उम्मीद से कमतर. । लेकिन उन्हें याद करता हूँ - कृतज्ञता से , और धन्यता की अनुभूति से भरकर !
No comments:
Post a Comment