गलतियाँ
-शिवदयाल
जिधर से
बच-बचाकर निकलना था
वहाँ तन कर
खतरा मोल लिया
जब खड़ा रहना था सीधा
इतना झुका
कि अपना होना ही न रहा
वहाँ बोला
जहाँ कुछ भी बोलने की
दरकार न थी
जब दो टूक
बोलने की बात आई
चुप्पी में वजन तलाशा
चलना उन रास्तों पर होता रहा
जिन्हें बहुत पहले
छोड़ देना था
तकता रहा आसमान
जबकि निगाह
जमीन पर जमाए रखनी थी
हाय ! इतनी गलतियाँ करते हुए
गुजरा जीवन
- यही बन पाया
कोटि-कोटि करके जतन
कि एक-एक गलती के पीछे
सौ-सौ सही कोशिशें जाया हुईं !
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