एक और दुनिया होती
जेपी आंदोलन की परिवर्तनकामी धारा पर केंद्रित मेरे उपन्यास का एक अंश ! इस साल जेपी आंदोलन के चालीस साल पूरे हो रहे हैं। उपन्यास अभी छपा नहीं , एक प्रकाशक के विचाराधीन है।
''. . अर्चना वैसे स्वस्थ नहीं चल रही थी। अक्सर उसे किसी न किसी दवा का सेवन करता देखता। एक दिन उसके पास ही बैठा था, उसने झोेले में से एक टिकिया निकाली और निगल गई।
‘‘यह तुम क्या दवाइयाँ लेती रहती हो अर्चना? क्या हुआ तुम्हें?’’
‘‘कुछ नहीं, बस बदन में दर्द है।’’
‘‘इसके लिए दवा की क्या जरूरत है। दर्दनाशक दवाइयाँ ज्यादा नहीं खानी चाहिएँ।’’
‘‘वो तो ठीक है लेकिन क्या करूँ, दर्द ज्यादा है आज कुछ’’
‘‘कहाँ दर्द है अर्चना?’’
‘‘सीने में दर्द है, हफ्रते भर से ...’’
‘‘यह तो ठीक नहीं है।’’ मैंने उसे ध्यान से देखा। वह पीली-सी दिखी। निचुड़ा हुआ मुखमण्डल। आँखों के नीचे मध्यम छाँह-सी बनती। मिट्टी की दीवार से लगी थी वह, सामने पाँव फैलाए , आँखें बन्द किए। मुझे अनिष्ट की ही आशंका हुई। और वह यों ही नहीं थी। बाद में अर्चना को बहुत झेलना पड़ा। लापरवाही के नतीजे में वह छह महीने तक बिस्तर पर रही। मैं कभी-कभी उसके घर जाता गो कि मुश्किल से उससे मिलने दिया जाता, तो बिस्तर पर पड़ी-पड़ी वह कैसी निरीह लगती। उसकी आँखों के कोरों से बहते आँसू देखकर मन भारी हो जाता। उस दौरान मैंने उसे कई किताबें दी थीं पढ़ने को। वह शायद शारीरिक तकलीफ के साथ किन्हीं स्तरों पर मानसिक त्रास भी झेल रही थी। कहा उसने कभी कुछ नहीं। निम्न मध्यवर्गीय परिवार में लंबा इलाज पूरे कुनबे को तोड़ कर रख देता है। फिर भाइयों पर आश्रित अर्चना! मैं कभी नहीं भूल सकता उसका बिलख-बिलख कर रोना जब मैंने सबकी नजरें बचाकर उसकी हथेली पर सौ रुपया का नोट छोड़ दिया था। लौटकर जीवन में पहली बार मैं उतना रोया था। पैसा क्या अजीब चीज है! कैसे-कैसे भेद खोलता है!
लेकिन यह तो बाद की बात है। उन दिनों तो अर्चना हमारी नेता थी - समर्थ, ऊर्जस्विनी और निडर। उस दिन बातों ही बातों में उसने बताया कि शिप्रा का विवाह हो गया था। मुझे सुनकर कुछ धक्का-सा लगा। तत्क्षण अमृत का ख्याल आया। क्या पता उसे मालूम भी है या नहीं। सुनकर उसे कैसा लगेगा, यह सोचता रहा। मैंने अर्चना पर कुछ प्रगट नहीं होने दिया। कुछ देर को वातावरण बोझिल-सा हो आया, मैंने उसे हल्का करने की गरज से पूछा,
‘‘अर्चना, तुम्हें नहीं लगता, तुमने जो यह ‘विध्वंसकारी’ भूमिका और मुद्रा अख्तियार की है, यह तुम्हारे लिए शायद सपनों का राजकुमार सुलभ नहीं करा पाएगी?’’
‘‘सपनों का राजकुमार! हुँह! तुम विश्वास करोगे, मैंने कभी इस ओर सोचा ही नहीं! सच!’’
‘‘क्यों अर्चना?’’
‘‘क्यों क्या, बस नहीं सोचा। लेकिन तुम क्या यही सब सोचते रहते हो?’’
‘‘मेरी बात छोड़ो। सवाल पहले मैंने किया है।’’
‘‘तो जवाब तो मैंने दे दिया। कभी नहीं सोचा, लेकिन ... सुनो, एक बात ईमानदारी से बताओगे?’’ शातिर मुस्कान थी उसके चेहरे पर। मैं चैंका।
‘‘क्या?’’
‘‘ईमानदारी से बताओगे न?’’
‘‘बोलो तो, क्या?’’
‘‘अपूर्वा क्या तुम्हें बहुत पसंद है? है न?’’
‘‘उफ, अर्चना!’’
‘‘क्यों? है न?’’ वह हँसने लगी और मैं इस प्रसंग से विचित्र मनःस्थिति में घिरा। लेकिन अर्चना ने यह कैसे जाना? तो क्या और भी साथियों पर यह बात जाहिर हो चुकी है? मैंने क्या जाने-अनजाने अपने भाव प्रगट हो जाने दिए हैं? और अपूर्वा? क्या वह भी? ओह!
‘‘क्यों उस बेचारी को मेरे साथ घसीटती हो!’’ मुझसे और कुछ कहते न बना।
‘‘ओ ... हो... बेचारी! पकड़े गए न!’’ वह शरारत पर उतर आई थी। हम दोनों की नजरें मिलीं और सहसा हम खिलखिला कर हँस पड़े। और हँसते ही चले गए। यहाँ तक कि उसे खाँसी होने लगी। हँसी का जोर थमने पर उसने कहा -
‘‘अपनी तो कहते नहीं, मेरे चक्कर में पड़ते हो। ... मुझे कौन पूछता है! और मुझे ही कौन-सी परवाह है! किसे फुर्सत है भला!’’
‘‘अर्चना, अगर कोई मान लो पूछे तो क्या करोगी?’’
‘‘कौन बुद्धू आएगा?’’
‘‘मान लो कोई हो?’’
‘‘मानना ही है तो कुछ भी माना जा सकता है।’’
‘‘नहीं, यह तो तुम जिद कर रही हो!’’
‘‘तुम्हारा सवाल ही बेतुका है। कोई बेवकूपफ ऐसा मिला भी तो उसके बारे में अभी से कुछ कैसे कहा जा सकत है? तुम क्या चाहते हो, कोई आ जाए और मैं उसे स्वीकार कर लूँ, बस? मैं ऐसी भी तो नहीं प्रेम कि मैं अस्वीकार के अपने अध्किार से वंचित हो रहूँ?’’
‘‘ओफ, अर्चना, तुम तो इस प्रसंग को वैचारिक बहस में उतार रही हो! मैं तो तुम्हारा मन जानना चाहता था। ...’’
‘‘जान लिया?’’
‘‘हाँ, जान लिया।’’ मैंने मुस्कराकर उससे कहा लेकिन अब तक गंभीर हो आई थी।
अर्चना कंबल ओढ़ कर लेट गई। मैं बाहर निकल आया। शाम ढलने में अभी देर थी। कुछ देर मैं यूँ ही टहलता हुआ बच्चों को गुल्ली-डंडा खेलते देखता रहा। कुछ स्त्रिायाँ बाँस के खपच्चों से टोकरी और सूप बना रही थीं। कुछेक आपस में बतियाती जुएँ निकाल रही थीं। धूप में कितने ही चीथड़े या कि गुदडि़याँ सूखने को डाल दी गई थीं। दूर टोले की सीमा पर जामुन के दो पेड़ साथ लगे खड़े थे। आगे रास्ते से कुछ हट कर जब मैंने गेंदे के फूलों का एक छोटा-सा झुरमुट देखा तो रोमांचित हो गया। पीले और कत्थई फूल! लगता था जैसे कोई बिछुड़ा सहसा आ मिला हो। पौधे बेतरतीबी से उगे थे, कोई साज-सँवार नहीं किया गया था उनका। इससे उनका सौन्दर्य कई गुना बढ़ गया लगता था। थोड़ी देर को मैं वहीं बैठ गया धरती पर - फूलों और पत्तियों को देखता-निरखता। कुछ ही देर में वहाँ मेरे इर्द-गिर्द कुछ बच्चे भी आ खड़े हुए। शायद कौतूहलवश। मैंने उन्हें मुस्कराकर देखा और बैठने को कहा तो दो बच्चे बैठ गए, शेष खड़े ही रहे। बच्चे पाँच से दस बरस के बीच रहे होंगे।
‘‘ये कौन-सा फूल है?’’
‘‘गेंदा!’’ एक ने जवाब दिया।
‘‘तुम इन्हें तोड़ते नहीं?’’
‘‘कभी-कभी तोड़ते हैं!’’
‘‘कभी-कभी इसका पत्ती तोड़ते हैं।’’
‘‘क्यों, पत्ती क्यों?’’
‘‘घाव पर उसका रस लगाते हैं।’’
‘‘अच्छा?’’
‘‘हाँ!’’
‘‘और धनेसी चाचा जब मरे थे गोली से तो हम लोग माला बनाकर उनको पहनाए थे।’’
जानकारी जैसे मेरा नशा उतारने के लिए काफी थी। फूलों को लेकर जो सौन्दर्य-बोध जगा था, उसकी अकाल-मृत्यु हो गई। कुछ देर को मैं चुप रहा। बच्चे लेकिन वहीं डटे रहे। मैं उनसे बातें करता रहा। कुछ सामान्य जानकारियों की परीक्षा भी लेता रहा। बच्चे अपनी आस-पास की दुनिया से अनभिज्ञ नहीं थे। सभी आन्दोलनकारी मजदूर-किसानों के बच्चे थे। उनके पास सुनाने के लिए भी आन्दोलन से सम्बन्ध्ति किस्से ही थे। कुछ ने भूत-प्रेतों के बारे में भी अपनी जिज्ञासा जरूर प्रगट की। उनमें से दो बच्चों को हिन्दी वर्णमाला और सौ तक गिनती याद थी। स्कूल कोई नहीं जाता था। स्कूल था भी वहाँ से दस कोस दूर। यह बच्चों को बताया गया था। उन्होंने अब तक अपनी आँखों से स्कूल देखा तक नहीं था।
कुछ देर उनके साथ बहला रहा और उन्हें भी बहलाता रहा। मन में सोचता रहा, कल को जब ये बच्चे पढ़ने-लिखने लगेंगे, जब दुनिया एक अलग ही ढंग से इनके सामने खुलना शुरू होगी तब हमसे ये जाने कौन-कौन से सवालों के जवाब माँगेंगे। सही मायनों में तब इतिहास करवट लेगा।
सामने सूरज डूब रहा था - सुदूर ताड़ के पेड़ों की पंक्ति के पीछे। सिन्दूरी सूरज, जो शनैः शनैः निस्तेज पड़ता जा रहा था। इतनी खामोश शाम! शाम की तो कैसी-कैसी अभिरंजित कल्पनाएँ हैं। यहाँ तो बस दूर तक फैली, फसल से खाली हुई धरती , सूने क्षितिज में जैसे कुछ भरने की कोशिश करते ताड़-वृक्ष, और मेरे बिल्कुल पास यह गेंदे के फूलों का झुरमुट! बस! तभी मेरे सर के ऊपर से बगुलों की कतार गुजरी। मैं फिर से हैरत में पड़ा। ये बगुले किधर से आते हैं, किधर को जाते हैं? कहाँ हैं इनको जीविका देने वाले ताल-तलैया? वे सीधे पश्चिम की ओर उड़ रहे थे - जिधर सूरज डूबने को था - शाम में कुछ रंग भरते हुए।...''
-शिवदयाल