याद
-शिवदयाल
*
फिर सुलझाने बैठे
बेतरह उलझा
हिसाब-किताब
कि क्या दिया
क्या पाया !
*
थक कर
सुस्ताने के बहाने
घूमा किये
और देखा किये
वे सडकें , वे गलियां
वे मकां , वे लोग
जो सालों में
नहीं बदले
नहीं बद्ले… !
*
रात देखा
कटता हुआ चाँद
झूमती हुई हवा
आखों में तैर आये
कैसे-कैसे दिन
कैसी-कैसी रातें
लमहे बहते रहे बूँद-बूँद .....!