प्रतिबद्धता
कुछ नहीं
कहीं कुछ नहीं
इस उबड़- खाबड़
अंतहीन रास्ते पर
दृष्टिहीन कर देनेवाले
अंधियारे में
पसरा हुआ सन्नाटा है
जिसमें हमारी
उखड़ती साँसों का शोर है
बस !
पर अभी पुतलियों में शेष है
उसकी रश्मियों की थिरकन
जिस प्रकाश के लिए
हम इतनी दूर चले ..
(1982-83 में 'प्रक्रिया' में प्रकाशित मेरी कविता )
कुछ नहीं
कहीं कुछ नहीं
इस उबड़- खाबड़
अंतहीन रास्ते पर
दृष्टिहीन कर देनेवाले
अंधियारे में
पसरा हुआ सन्नाटा है
जिसमें हमारी
उखड़ती साँसों का शोर है
बस !
पर अभी पुतलियों में शेष है
उसकी रश्मियों की थिरकन
जिस प्रकाश के लिए
हम इतनी दूर चले ..
(1982-83 में 'प्रक्रिया' में प्रकाशित मेरी कविता )
ब्लॉग की दुनिया में प्रवेश का स्वागत.कविता बहुत अच्छी है.
ReplyDeleteBahut dhanyavad Kundan ji.
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