मनुष्यता की जय!
शिवदयाल
कोसी ने करवट बदली और हाहाकार मच गया। नदी जब मर्यादाएँ लाँघती है तो बाढ़ आती है, और जब करवट बदलती है तो प्रलय आता है। यह पता करना मुष्किल है कि करवट बदलने के लिए नदी को बाध्य किया जाता है, या फिर यह उसका शगल है - ऐसा शगल जो उसे वर्षों में कभी-कभी याद आता है। संभवतः दोनों ही बातें अपनी जगह सही हों, लेकिन इतना तो तय है कि नदी का मर्म जानना एक विषम चुनौती है। नदियाँ धरती की धमनियाँ हैं जिनमें प्रवहमान जल का नियंता है समुद्र। हर नदी समुद्र से मिलने को बेकल है - कभी धीर-गंभीर मंथर गति से तो कभी उछलती-कूदती अल्हड़ नवयौवना-सी। यह प्रकृति की स्वाभाविक गति है जिससे हमारा जीवन चलता है, उसमें लय बनती है और जिस कारण प्रकृति सुंदर है और दिव्य। लेकिन प्रकृति संुदर ही नहीं विकराल भी है। पता नहीं विनाष और रचना का कौन-सा द्वन्द्व इसके अंदर चलता है, न जाने कौन-सा रहस्य है। जीवनदायिनी प्रकृति विध्वंसक हो उठती है हठात्, और कोई अवसर नहीं देती।
मानव जाति का इतिहास प्रकृति के साथ अनुकूलन का ही इतिहास नहीं है बल्कि प्रकृति को अपने अनुकूल बनाने का इतिहास भी है। मनुष्य की जिजीविषा वे एक अलग ही संसार रच डाला। उसकी इच्छाषक्ति ने अगम को सुगम बनाया और असाध्य को साध्य। आज की दुनिया एक प्रति-सृष्टि है। इस प्रति-सृष्टि में भी रचना और ध्वंस की शक्ति साथ-साथ उपस्थित है। आदमी रचता है, रचता जाता है, उसी तरह तोड़ता भी है, तोड़ता जाता है। रचना के साथ-साथ उसने ध्वंस की अपरिमित शक्ति अर्जित कर ली है। अपनी रचना-षक्ति से वह अपनी ही नहीं, ईष्वर की दुनिया में भी कुछ जोड़ता जाता है, जबकि उसकी विनाषक क्षमता से ईष्वर की ही नहीं, उसकी अपनी दुनिया भी बर्बाद होती है। प्राकृतिक आपदाओं में ही नहीं युद्धों और संघर्षों में भी बर्बादी होती है। एक ओर कैटरीना और सुनामी का तांडव मचता है तो दूसरी ओर बमों-गोलों से शहर के शहर बर्बाद हो रहे हैं। स्थिति यहाँ तक आ पहुँची है कि जान लेने की उत्कटता में मानव ने स्वयं को ही ‘बम’ के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। मनुष्य-समाज की अतिषय सक्रियता ने खुद उसके और प्रकृति के समक्ष गंभीर संकट खड़े कर दिए है। मानवीय प्रयास भी प्राकृतिक आपदाओं का आधार तैयार कर रहे हैं। किन्तु अन्तिम भोक्ता कौन है ?
कोसी के कोप से त्रस्त एक बूढ़े मजदूर (नाम ....... साव) की छवि सामने आ जाती है जिसे एक प्रादेषिक टीवी चैनल ने प्रसारित किया। साव जी से बात करने की कोषिष की गई। लेकिन प्रत्युत्तर में उन्होंने सिर्फ हाथ जोड़ दिए। दस-बारह दिन की बढ़ी खिचड़ी दाढ़ी, मैले-कुचैले कपड़े, लुटा-पिटा निस्तेज मुखमण्डल और डबडबाई आँखें। यह चित्र अंदर से हिलाकर रख देता है। मनुष्य की ऐसी पराजित-अवसन्न मुद्रा सिर्फ हिला ही नहीं देती, डरा भी देती है। सिर्फ करुणा ही नहीं भय भी उपजता है। आदमी की ऐसी टूटी हुई, गिरी हुई, बेबस और निरीह छवि सहन नहीं होती है। लगता है मानो हम स्वयं उसी पराजय और अवषता में घिरते चले जा रहे हैं। दुनिया में आजतक जो भी उद्धारक, सुधारक, व मुक्तिदाता हुए हैं उन्हें मनुष्य की ऐसी ही मुद्रा ने विचलित किया होगा और उन्होंने मनुष्यता को उठाने, उसे गरिमा दिलाने में अपना जीवन खपाया। राम मोहन राय ने सती होती स्त्री की विवषता देखी, मोहनदास करमचंद गांधी ने परतंत्रता का संताप देखा, विवेकानंद ने स्मृतिहीन, आत्महीन, विवर्ण जनसमूह देखे, मंडेला ने गुलामी की जलालत भोगती आबादियों को देखा .... और अपने हिसाब से दुनिया को बदलने के महान प्रयत्नों में लगे। इन सबको और अन्य क्रांतिवीरों को अपने लोगों के निस्तेज मुखमण्डलों और पराजित भंगिमाओं ने उद्वेलित किया होगा।
ऐसे ही एक और चित्र ने अंतर में हलचल मचा दी थी। एक प्रमुख साप्ताहिक पत्रिका के आवरण पृष्ठ पर गुजरात दंगों के शिकार एक व्यक्ति का चित्र। साँवला चेहरा, आँसुओं से लबरेज आँखें, जुड़े हुए विनती करते हाथ - बस, अब और नहीं! यह इन्तिहा है, पराकाष्ठा है, इसके बाद फिर क्या-कुछ बच रहेगा! अब और नहीं। यहाँ कोसी की उत्तप्त धारा से हारते हुए या भुज के विनाषकारी भूकम्प में सबकुछ गँवा चुके आदमी का चित्र नहीं था। यह था अपने ही शहर और पास-पड़ोस के लोगों के नृषंस हमलों के एक निरीह शिकार का चेहरा जो हम कह रहा है - अब बस करो! आखिर कितनी यंत्रणा, कितना त्रास ? हाल के आतंकवादी हमलों के षिकार लोगों और उनके परिजनों के चेहरों पर भी बेबसी और हताषा के यही भाव थे। लेकिन ऐसे कितने ही चेहरे हैं जो हमारे सामने नहीं आ पाते, अलग-अलग कारणों से जिनपर हताशा और हार की इबारत लिखी हुई है।
हमारे समवेदना से भरे हुए दिल और सहारे के लिए बढ़े हुए हाथ ही एकमात्र आष्वासन हैं कि हममें रचने की शक्ति अभी चुक नहीं गई, कि करुणा की धारा अभी सूखी नहीं। मनुष्य की विजय अंततः मनुष्यता की जय में है.। ( 'दोआब ' में 'हार की इबारत ' शीर्षक से प्रकाशित। )