स्वतन्त्रता के उस स्वर्ग की ओर
-शिवदयाल
गुलामी चली जाती है, अपने चिह्न छोड़ जाती है - प्रतीकों के रूप में स्थूल और प्रवृत्तियों तथा आदतों और मानसिकता के रूप में अभौतिक चिह्न अथवा अवशेष। भौतिक अवशेष तो आसानी से मिट जाते हैं या मिटा दिए जा सकते हैं, लेकिन अभौतिक अवशेषों की उम्र लंबी होती है। इनसे मुक्त होने के लिए अलग से प्रयास संगठित करने पड़ते हैं, और वास्तव में यह गुलामी के विरुद्ध एक और संघर्ष ठानने जैसा उद्यम होता है।
स्वतंत्रता के अमृत काल में आजादी के 75 वर्ष बाद गुलाम मानसिकता की बात करना अपने आप में एक विडंबना ही है। सचमुच अगर मानसिकता के रूप में भी गुलामी के अवशेष बच गए थे तो उनको तिरोहित करने के लिए पचहत्तर वर्ष पर्याप्त से बहुत अधिक है। इसका अर्थ यह हुआ कि स्वतंत्रता पश्चात भी हमें परतंत्रता के प्रतीकों एवं व्यवहार प्रतिमानों के साथ जीना सुविधाजनक लगा। इसके विरुद्ध अलग से संघर्ष करने की, अभियान चलाने की जरूरत हमें महसूस नहीं हुई। लेकिन आज अगर इन बंधनों - गुलाम मानसिकता के बंधनों की जकड़न हमें महसूस हो रही है तो इसका अर्थ यही है कि हमारा राष्ट्रीय जीवन इनसे प्रभावित हो रहा है, उसका प्रवाह अवरुद्ध हो रहा है। साथ ही, स्वतंत्रता का सुफल अभी सबको लब्ध नहीं हो सका है। इसका एक और कहीं गहरा अर्थ यह हो सकता है कि इनसे हमारी राष्ट्रीयता के आधार पर आघात हो रहा है, और तब यह सच में एक अत्यंत शोचनीय स्थिति है।
गुलाम मानसिकता अथवा मानसिक पराधीनता का एक सीधा अर्थ है अपनी सोच में मौलिकता का, नवीनता का अभाव। इसके स्थान पर अपने स्वामी की दृष्टि से जगत व्यापार को देखना, उनके ही आदर्शों को अपना जीवन आदर्श बनाना, उनके प्रतीकों को अपना मानना, उन्हीं की भाषा बोलने में गौरव अनुभव करना। पराधीन मानसिकता का एक और मजबूत लक्षण है अधीनता और अनुकरण में ही जीवन की उपलब्धि मानते हुए दूसरों को अपने अधीन और अनुगामी बनाने की लालसा और प्रयत्न। सवाल उठता है कि स्वतंत्र भारत में हमारे स्वामी कौन हैं जिन्हें अपना आदर्श मानकर उनका अनुकरण करना है? मानसिक पराधीनता के दृष्टिकोण से हमारे स्वामी, उपनिवेशक स्वामी वही अंग्रेज अब तक बने हुए हैं जो पचहत्तर वर्ष पहले चले गए थे। हमारी गुलाम मानसिकता की जड़ दो सौ वर्षों के उपनिवेश काल में है।
उपनिवेश काल में हमारे कई राजनीतिक एवं सांस्कृतिक नेता और कतिपय बुद्धिजीवी यह मानते रहे थे कि हमारे लिए केवल राजनीतिक स्वतंत्रता ही नहीं, मानसिक और वैचारिक स्वतंत्रता भी जरूरी है। औपनिवेशिक मानस के रहते हम पूर्ण स्वराज के लक्ष्य को नहीं प्राप्त कर सकते। कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने 1905 में अपनी पुस्तक 'स्वदेशी समाज' में औपनिवेशिक शासन का एक विकल्प ही प्रस्तुत किया और स्वदेशी को पहले विचार के स्तर पर अपना लेने का स्पष्ट आग्रह उसमें था। औपनिवेशिक मानस स्वदेशी समाज की स्थापना नहीं कर सकता था। अपनी रचनाओं में कविगुरु ने 'आत्मा की स्वतंत्रता' की बात कही है। 1908 में गांधी जी ने हिंद स्वराज में वैकल्पिक सभ्यता की प्रस्तावना रखते हुए यह बात भी सामने रखी कि यदि हम यूरोपीय सभ्यता और उसके प्रतीकों को ही अपना आदर्श मानते रहे तो कभी स्वराज प्राप्त नहीं कर सकेंगे। मानसिक पराधीनता के विरुद्ध सबसे व्यवस्थित स्थापना रखी चिंतक और दार्शनिक कृष्णचंद्र भट्टाचार्य ने। उन्होंने कहा कि 'मनुष्य का दूसरे मनुष्य के ऊपर प्रभुत्व सबसे अधिक स्पष्टता के साथ राजनीति में प्रतिबिंबित होता है, लेकिन कहीं कम प्रगट रूप में लेकिन निश्चित रूप से एक संस्कृति का प्रभुत्व दूसरी संस्कृति में विचारों के क्षेत्र में प्रतिबिंबित होता है। यह प्रभुत्व वास्तव में अधिक गंभीर परिणामों का कारण बनता है क्योंकि साधारणतया इसे अनुभव ही नहीं किया जाता।' आगे वे यह भी कहते हैं, ''भले ही पश्चिमी शिक्षा ने हमारा भला किया हो, उसका हमारी प्राचीन शिक्षा के साथ आत्मसातीकरण नहीं हुआ। दोनों पद्धतियों का तुलनात्मक मूल्यांकन किए बिना पश्चिमी पद्धति को श्रेष्ठ मान लिया गया। उस 'प्राच्य संसार का भारतीय मानस' सांस्कृतिक चेतना की निचली तहों में दब गया है। यह एक सामान्य व्यक्ति के ऊपर किसी प्रेत के सवार होने जैसा है।''
विडंबना इतनी बड़ी कि यह प्रेत पश्चिमी मूल्यों और मानकों का, आज भी साधारण भारतीय, बल्कि उनमें भी पढ़े-लिखों पर कहीं अधिक बल के साथ सवार है। कई विचारकों ने विखंडित भारतीय मानस की चर्चा की है। आश्चर्य यह है कि इतनी ताकीदों और चेतावनियों के बावजूद हमने 'आत्मा की स्वतंत्रता' तो दूर, विचार-स्वातंत्र्य का, पराधीन मानस से मुक्ति का रास्ता भी नहीं पकड़ा। स्वतंत्र भारत में भी वैचारिक परिसर में औपनिवेशिक मानस या मानसिक पराधीनता से मुक्ति की बात जोर देकर की गई, लेकिन स्वयं हमारी सरकारों की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी। स्वातंत्र्योत्तर भारत के राजनीतिक विचारों एवं विकास क्रम पर यदि गहराई से विचार करें तो कांग्रेस और वामदलों को छोड़कर लगभग सभी राजनीतिक दल ऐसे मुद्दों को लेकर चले हैं जो कहीं ना कहीं औपनिवेशिक मानसिकता पर चोट करते हैं और भारतीय जनमानस को स्वराज के मूल्यों से भी कुछ न कुछ जोड़ते हैं, चाहे वह शिक्षा का सवाल हो, भाषा का सवाल हो, अर्थनीति या राजव्यवस्था का सवाल हो। स्वयं लोकतंत्र को मजबूत और सर्वव्यापी बनाना, एक विकेंद्रित राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था, पंचायती राज और ग्राम स्वराज्य, चौखंभा राज्य आदि सभी संकल्पनाएं विउपनिवेशीकरण का ही आग्रह रखती हैं। दूसरी ओर स्वतंत्र भारत में सरकारों का जोर स्थिरता पर रहा, स्थिरता उसी प्रणाली की जो अंग्रेज हमें सौंप गए थे, बल्कि स्वयं हमने संविधान के माध्यम से जिन्हें अपना लिया था।
मानसिकता तो एक विशेष परिवेश और व्यवस्था में पनपती है, दृढ़ होती है। उपनिवेश काल की व्यवस्था अगर स्वतंत्र भारत में भी जारी रही तो गुलाम मानसिकता के बंधन तो और मजबूत होते गए। उसको तो कायदे से चुनौती मिली ही नहीं कि क्योंकि स्वयं सत्ता उसको प्रश्रय देती रही। आज हमें यह सोचना चाहिए कि स्वतंत्रता पश्चात हमने नया क्या गढ़ा जिसे मौलिक रूप से अपना कहें? स्वभाषा के स्थान पर औपनिवेशिक शासन की भाषा ही स्वतंत्र भारत की नियंता बनी रही। आज तो स्थिति यह है कि मध्यवर्गीय स्कूली बच्चे किस्से -कहानियां भी अंग्रेजी में पढ़ते-समझते हैं। आज भी अंग्रेजी शासन की, वर्चस्व की भाषा है। कोई प्रधानमंत्री हिंदी या कोई देसी भाषा कैसी बोलते हैं, इस पर कोई ध्यान नहीं देता, अंग्रेजी कितनी अच्छी तरह बोलते हैं - यह उनकी परीक्षा होती है। महान प्रधानमंत्री अंग्रेजी भी अच्छी बोलते हैं! गैर-हिंदी प्रदेशों में अंग्रेजी ही संपर्क भाषा के रूप में काम करती है, पढ़े-लिखे तबकों के बीच विशेष रूप से। दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों के प्रभु वर्ग की भाषा, कहीं-कहीं तो मातृभाषा अंग्रेजी है। हिंदी लेखकों का भी अंग्रेजी मोह और अंग्रेजी जानने, न जानने की कुंठा वितृष्णा पैदा करती है। भाषा की दृष्टि से तो हम अंग्रेजी राज में ही रह रहे हैं, उन्हीं की प्रजा की तरह हैं। सर्वोच्च न्यायालय की भाषा भी अंग्रेजी है। हिंदी से कमाने-खाने वाले फिल्मी दुनिया के लोग भी अंग्रेजी झाड़ कर अपनी विशिष्टता प्रदर्शित करते हैं। हाल ही में प्रतियोगिता परीक्षाओं में भाषाई विकल्प की सुविधा मिली है लेकिन इसके प्रभाव लंबे समय बाद ही दृष्टिगोचर होंगे।
यह तो रहा स्वतंत्र भारत में अपनी भाषा का हाल! शिक्षा प्रणाली को लेकर नया क्या हुआ जिसे हम अपना कहते? अपनी भाषा रही नहीं, अपनी शिक्षा प्रणाली भी नहीं बन सकी। उन्नीसवीं सदी में जो अंग्रेजों ने शिक्षा व्यवस्था बनाई उसे ही हम आज तक चला रहे हैं। हम स्वतंत्र हुए, इसका आभास हमारी शिक्षा प्रणाली ने नहीं होने दिया - न विषयवस्तु के स्तर पर, न व्यवस्था और संगठन के स्तर पर। बस हमने इसमें अपनी तरफ से संस्थाएं जोड़ीं। पिछले कुछ दशकों में 'ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था' का हल्ला मचा और स्थिति आज यह बन आई है कि ज्ञान अब पैसे से खरीदा जा सकता है। यह कम से कम भारत के इतिहास में पहली बार हुआ। अब तक ज्ञान साधना से अर्जित किया जाता रहा था। शिक्षा प्रणाली किसी राष्ट्र के ध्येय को, चरम मूल्यों को, आदर्शों को प्रतिबिंबित करती है। इस पर पीढ़ियों के निर्माण का गुरुतर दायित्व होता है। यदि स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद भी हमारी शिक्षा प्रणाली अपरिवर्तित रही तो इसका अर्थ यह हुआ कि हमने यूरोप और पश्चिम के राष्ट्रीय मूल्यों और आदर्शों को ही हूबहू अपना लिया। हमने भी वही पहुंचना तय किया जहां कि वे पहुंचे हुए हैं और अभी और आगे जाना चाहते हैं, हालांकि आगे रास्ता है नहीं। मतलब कि पश्चिम के अनुगमन को ही हमने स्वयं अपनी नियति बना लिया। अनुगामी, गुलाम मानसिकता के साथ ही हमने स्वतंत्र भारत की पीढ़ियों को शिक्षित-प्रशिक्षित किया। अब कैसे अंग्रेजी जाती, कैसे कोई भारतीय भाषा उसके सामने खड़ी होती, उसका स्थानापन्न बनती? कैसे भारत में इंडिया का वर्चस्व नहीं बनता? औपनिवेशिक भारत का अंग्रेजी पढ़ा-लिखा वर्ग जिसे गांधी जी ने 'हृदयहीन' कहा था और जो औपनिवेशिक शासन का मजबूत स्तंभ था, स्वतंत्र भारत में उसी की तूती बोलती रही तो अचंभा कैसा?
शिक्षा व्यवस्था में कुछ भी 'भारतीय' रखा ही नहीं गया। बस ब्रिटेन और पश्चिम का अंधानुकरण - एक ऐसे देश में जहां तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला जैसी विश्व-स्तरीय संस्थाएं डेढ़-दो हजार साल पहले थीं। प्राचीन भारतीय विद्या संस्थान जैसा एक संस्थान हम खड़ा नहीं कर पाए। विवेकानंद, टैगोर और गांधीजी भारतीय पद्धति की शिक्षा के समर्थक थे। टैगोर ने शांतिनिकेतन और विश्व भारती जैसी संस्थाएं खड़ी कीं। ब्रह्म समाज और आर्य समाज ने भी इस दिशा में कुछ मौलिक प्रयास किए लेकिन उन्हें भी तो राष्ट्रीय शिक्षा की मूल धारा में ही अंततः समाहित होना था। आखिर तो कविगुरु के विश्वभारती की भी मौलिकता नष्ट करके उसे भी प्रचलित विश्वविद्यालयी ढांचे में ढाल दिया गया। गांधीजी के बुनियादी विद्यालयों का भी यही हश्र हुआ। एक अभिनव कोशिश भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने की थी। उन्होंने प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित एवं पुनर्स्थापित करने के लिए नालंदा में 1951 में 'नव नालंदा महाविहार' की स्थापना की। उनकी कल्पना थी कि यह नया विहार समूचे एशिया के लिए ज्ञान का प्रकाश स्तंभ बनेगा। ज्ञातव्य हो कि नव नालंदा महाविहार का आदर्श ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज नहीं बल्कि स्वयं प्राचीन नालंदा महाविहार और विक्रमशिला विश्वविद्यालय था, यानी शुद्ध भारतीय ज्ञान परंपरा की पुनर्स्थापना की ठोस चेष्टा राजेंद्र बाबू ने की, लेकिन स्वयं उनकी ही सरकार का अपेक्षित सहयोग इस शिक्षा केंद्र को नहीं मिला। इसका विकास अपेक्षित स्तर तक नहीं हो सका। अभी कुछ वर्ष पहले एक नये 'नालंदा यूनिवर्सिटी' की स्थापना बड़े धूमधाम से की गई लेकिन ध्यान रहे कि इसका आदर्श पश्चिमी शिक्षा संस्थाएं हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा और परंपरागत शिक्षा पद्धति से इसका कोई संबंध नहीं।
हद तो यह कि स्वतंत्रता पश्चात अपनी जरूरतों की राज व्यवस्था का निर्माण भी हम नहीं कर सके। सत्ता के हस्तांतरण और ब्रिटिश तरीके की संसदीय प्रणाली को अपनाने के बाद इसकी जरूरत ही कहां बची। आजकल संविधान को लेकर एक भारी संरक्षणवादी और शुद्धतावादी रवैया दिखाई देता है, मानो संविधान राष्ट्र के ऊपर ईश्वर प्रदत कोई चीज है। 1954 में जयप्रकाश नारायण ने कांग्रेस के साथ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के सहयोग के नेहरू जी के प्रस्ताव पर एक 14 सूत्री कार्यक्रम भेजा था। इस पत्र की शुरुआत में ही उन्होंने नेहरू जी को लिखा कि 'मुझे हैरत है कि आपने ऐसे संविधान को स्वीकार कैसे कर लिया?' इन 14 सूत्री कार्यक्रम का पहला ही बिंदु संविधान संशोधन था। यह सचमुच सोचने की बात है कि एक इतने बड़े गौरवशाली अतीत वाले नव-स्वतंत्र देश ने औपनिवेशिक शासन तंत्र को ज्यों का त्यों कैसे अंगीकार कर लिया! फिर मामूली फेरबदल से उपनिवेश काल में पलता रहा शासक-शासित संबंध आखिर किस प्रकार बदला जा सकता था। तो स्वतंत्र देश की प्रजा भी प्रत्यक्षतः कलेक्टर और दारोगा के अधीन ही रही, उनके राजनीतिक वरिष्ठ या बॉस जो ब्रिटिश पार्लियामेंट और यहां असेंबली और वायसराय हाउस में बैठते थे, अब भारतीय संसद और विधानसभाओं में बैठते थे, केवल उनका रंग और कुछ हद तक वेशभूषा बदल गई थी। लोकतंत्र में अगर लोक का शासन स्थापित हुआ मान भी लें, तो तंत्र वही पुराना अत्याचारी, शोषक, उत्पीड़क औपनिवेशिक तंत्र था। ऐसे में कलेक्टर या किसी भी राज्य कर्मचारी से एक साधारण नागरिक का कैसा संवाद हो सकता था?
लोकतंत्र में भी तो राजशक्ति की ही महिमा बननी थी। आज भी भारतीय प्रशासनिक सेवा में आना सबसे बड़ी उपलब्धि है क्योंकि उसमें पावर है, प्रिविलेज है, प्रेस्टीज है(और आज बहुत पैसा भी)। पचहत्तर वर्ष बाद ब्रिटिश काल की इंडियन इंपीरियल सर्विस और इंडियन सिविल सर्विस अब 'इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस - आई ए एस' नाम की केंद्रीय सेवा उपनिवेश काल का जीवंत अवशेष है जिसके हाथ में ग्राम स्तर, जिला स्तर, राज्य स्तर से लेकर केंद्र स्तर तक का प्रशासन। है। हमारा जिला अथवा जनपदीय प्रशासन पूरी तरह कलेक्टर अथवा जिलाधिकारी केंद्रित है जबकि स्थानीय स्तर पर थाने का दरोगा सबसे अहम पदधारी है। यह व्यवस्था अपनी उपनिवेशक काल के मुकाबले कहीं अधिक उत्पीड़क है। मानव-अधिकार हनन के मामलों का अंबार इस तथ्य की पुष्टि करता है। नौकरशाही किसी भी शासन की जरूरत होती है लेकिन भारत की नौकरशाही एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक देश की नौकरशाही जैसी क्या वास्तव में है? सच्चाई यह है कि कुछ कमियों के बावजूद पीठ पीछे अगर न्यायपालिका ना हो तो एक आम भारतीय नागरिक की कोई हैसियत नहीं। जनता की सेवा के नाम पर संस्थाएं या विभाग चलते हैं लेकिन उनका संचालन और कार्यप्रणाली ही ऐसी ही है कि जनता ही उनकी सेवा-टहल में लगी रहे, जी-हुजूरी और खुशामद करे, पैरवी करे और जायज कामों के लिए भी घूस दे। जैसे पुराने कानूनों को औपनिवेशिक अवशेष मानकर हटाया गया, उसी प्रकार इस प्रशासनिक व्यवस्था को भी लोकतंत्र के मूल्यों और मर्यादाओं के अनुरूप ढालना होगा यदि हम सचमुच गुलाम मानसिकता से मुक्त होना चाहते हैं। हमें एक नई लोक संवेदी राज व्यवस्था के निर्माण के लिए अब प्रस्तुत होना चाहिए। यह नई व्यवस्था कैसी हो इस पर बहुत कुछ पहले ही कहा जा चुका है।
एक और भारी कमी रह गई स्वातंत्र्योत्तर भारत के नेतृत्व में। उपनिवेश काल में अंग्रेजों ने जिन संरचनाओं को अपने औपनिवेशिक हित में बल्कि औपनिवेशिक लूट के लिए तोड़ा-फोड़ा था, उनकी पुनर्रचना की ओर ध्यान क्यों नहीं दिया गया? जो कुछ लंबे दो सौ सालों में ध्वस्त हुआ, उसे फिर से खड़ा करने की कोशिश ही नहीं हुई, हुई भी हो तो प्राथमिकता में यह बात नहीं रही। यह बात एक चैतन्य नागरिक को सचमुच अवसन्न करती है। अंग्रेजों ने ग्राम व्यवस्था, उसके आत्मनिर्भर अर्थतंत्र को तहस-नहस किया था। उत्पादक इकाइयों को जबरन बंद करा कर वि-उद्योगीकरण, de-industrialisation की मुहिम चलाई थी। हमारे किसानों को कंगाल और दस्तकारों को पंगु बना डाला था। हमारे ग्राम समुदाय की शक्ति, उसका स्वत्व खींच लिया था। आश्चर्य, स्वतंत्रता पश्चात ग्राम पुनर्निर्माण हमारे पुनर्निर्माण के संकल्पों में शामिल नहीं था। किसानों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया, जो खड़े हुए थे तो आजादी मिली थी। कुछ छिटपुट सहकारी खेती के प्रयास हुए वे विफल ही रहे। जमीदारी उन्मूलन पूरी तरह से हुआ नहीं, भूमि वितरण का काम नहीं हुआ, भूमि संबंध नहीं बदले। सामुदायिक विकास योजनाओं और कार्यक्रमों को भी अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी और कृषि और ग्रामीण क्षेत्र पिछड़ते गए। साथ ही ग्रामीण और शहरी भारत के बीच फांक बढ़ती चली गई। वह तो 1962 और 1965 के युद्धों का सबक था जो हमारा ध्यान कृषि और किसानों की ओर गया। यह सरकार की प्राथमिकताओं का हाल रहा, तो दूसरी ओर समुदाय दलों के वोट बैंक में बंटता-छंटता चला गया, आज लगभग बिखर चुका है। सबसे दर्दनाक बात हुई आजाद भारत के हुक्मरानों के हाथों कि पंचायत चुनाव में भी वह अपनी नाक घुसेड़ने लगे, दलीय आधार पर चुनाव होने लगे। तो समुदाय जो कुछ उपनिवेश काल के बाद बचा भी रह गया हो, उसे भी भारत की लोकतांत्रिक राजनीति ने तोड़ डाला। लोकतंत्र के नाम पर राज करने, राज भोगने की प्रवृत्ति, अपने ही देशवासियों पर शासन करने की ललक और लालसा राजनीति का मूल उद्देश्य बन गई है। यह अपने ही लोगों को उपनिवेशक की दृष्टि से देखने जैसा है। हमारे कर्णधारों ने भारतीय जनता के लिए स्वतंत्रता का अर्थ इतना संकुचित कर दिया कि वह केवल अंग्रेजी शासन से मुक्ति भर रह गया। बाकी तो जनता को बांटने का औपनिवेशिक एजेंडा अब तक जारी है। भेद और अलगाव के नित नए आधार खोजे जाते हैं ताकि सत्ता सुलभ हो। आखिर तो सत्ता की राजनीति की जरूरत है यह। करोड़ों रुपए खर्च कर चुनाव लड़े जाते हैं। कहां से आता है यह पैसा? इतना खर्च करके किसे लाभ पहुंचता है? आखिर चुनावी खर्च में जनता का ही अपना हित कोई तो नहीं हो सकता!
गुलाम मानसिकता की जड़ कहां है, हम इतने आत्महीन और आत्मद्रोही क्यों हैं, इन गहन प्रश्नों का उत्तर तलाशने का यह उपक्रम यह कहे बिना पूरा नहीं हो सकता कि देशी के प्रति गहन वितृष्णा या कि घृणा ही हमें 'प्रगतिशील' पहचान देती रही है। स्वतंत्रता के छिहत्तर वर्षों बाद हमें अनुगमन वृत्ति से बाहर आना चाहिए और स्वाधीनता के उस स्वर्ग की ओर कदम बढ़ाना चाहिए जिसकी कल्पना गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने की थी।
- शिवदयाल (नवनीत, अगस्त 2023 अंक में प्रकाशित)