Friday, 7 April 2023


मृणाल - कथा-आकाश का ध्रुव तारा


                            -  शिवदयाल


वह चिड़िया बनना चाहती थी - 'पंख खोल वह आसमान में जिधर चाहे, उड़ जाती है।.. कैसी मौज है!' जो बनना चाहती थी, वही वह बन न सकी, कहना कठिन है।

उसकी कहानी शुरू करते उसका भतीजा प्रमोद, जज प्रमोद कहता है - 'मेरी बुआ पापिष्ठा नहीं थी, यह भी कहने वाला मैं कौन हूं? पर आज मेरा जी अकेले में उन्हीं के लिए चार आंसू बहाता है।' उसके स्मरण-मात्र से अंतर में एक दाह-सी उठती है। उसके साथ जो हुआ, उसमें कहीं अपनी भी हिस्सेदारी तो नहीं थी? यह सोचकर एक अपराध बोध भी आत्मा पर बोझ बन कर बैठ जाता है। फिर चेत होता है - वह तो कथा-चरित्र है, एक पात्र - मृणाल! जैनेंद्र के उपन्यास 'त्यागपत्र' की मृणाल। उसको रचे तो अब एक सदी पूरी होने वाली होगी कुछ वर्षों के अनंतर। लेकिन न जाने क्यों मन मानो उसे एक व्यक्ति के रूप में ही याद करना चाहने लगता है। आखिर यह कैसे संभव है कि एक काल्पनिक चरित्र मन में इतनी पीड़ा उपजा दे कि अवास्तविक ही वास्तविक लगने लगे, और जो सचमुच वास्तविक है - अपने सामने यह फैली-पसरी दुनिया, उसी के प्रति आदमी एक विच्छिन्नता और विविक्ति के भाव से भरने लगे।

अपने पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी मृणाल। दो बड़ी बहनें गुजर चुकी हैं - प्रसव के दौरान। एक भाई बर्मा में बस गया है। माता-पिता को बहुत कम उम्र में खो चुकी मृणाल को भाई के रूप में पितृत्व की छाया तो मिलती है, लेकिन भाभी मां तो क्या बनती, वह तो उसके लिए महा-अनर्थकारी भूमिका में होती है। स्वयं प्रमोद अपनी मां को मृणाल की विदाई के अवसर पर रोता हुआ कहता है - तू राक्षस है। भाभी की इस भूमिका के कारण मृणाल का भाई उसे पिता का-सा संरक्षण नहीं दे पाता, अपनी बेटी जैसी बहन का जीवन नष्ट होते हुए देखता रहता है, और एक दिन असमय ही दुनिया छोड़ जाता है।

मृणाल का एकमात्र सहारा है उससे चार-पांच ही साल छोटा प्रमोद, उसका भतीजा, जिसे कभी वह बेटा कहती है, कभी भैया तो कभी गदहा! प्रमोद मृणाल का सखा भी है जिसके साथ उसका बचपन और कैशोर्य गुजरता है, जिसको वह अपने मन की बात कह सकती है। घर में बुआ-भतीजे के रूप में ये दो ही बच्चे हैं जिनके बीच पीढ़ी के हिसाब से तो दूरी है, लेकिन आयु के हिसाब से निकटता। प्रमोद का हाल यह है कि मानो उसकी बुआ ही उसके जीवन की धुरी है,वह बुआ की छाया की तरह उसके साथ लगा रहता है। उसे जरा-सा दुख पहुंचते ही वह विकल हो जाता है, कभी-कभी विद्रोही भी। विडंबना यह कि भले ही वह बुआ के सामने ललकार कर कहे कि बुआ, मेरे रहते तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता, वह अवश भाव से उसे कष्ट पाते और नरक भोगते देखता रहता है, कुछ नहीं कर पाता। प्रमोद तो  होश संभालते ही, कि उसके भी पहले से बुआ की आंखों से ही दुनिया देखता है, और पाठक के समक्ष यही प्रमोद की देखी-समझी दुनिया आ खड़ी होती है। बुआ के साथ ही प्रमोद की कहानी भी चलती रहती है।

मृणाल सुंदर है - 'ऐसा रूप कब किसको विधाता देता है। जब देता है तब कदाचित उसकी कीमत भी वसूल कर लेने की मन ही मन नीयत उसकी रहती है।' मृणाल माता-पिता की छाया से वंचित होकर भी प्रसन्न दिखनेवाली , कभी-कभी क्रीड़ा-कौतुक में भी रस लेने वाली नटखट लड़की है। स्कूल जाना उसे पसंद है, किताब-कॉपी भी खूब संभाल कर रखती है, हालांकि पढ़ने में उसका उतना मन नहीं लगता। उसमें दूसरों के लिए कष्ट सहन करने का विरल गुण इसी उम्र में दिखता है। उसकी सहपाठिन शीला गणित के शिक्षक की कुर्सी की गद्दी में पिन चुभोकर रख देती है। शिक्षक पूछते हैं कि किसने यह शरारत की, तो कोई सामने नहीं आता। फिर वह एक-एक को बेंत से पीटने की बात कहते हैं। तब मृणाल खड़ी होकर कहती है - यह मेरा कसूर है मास्टर जी। फिर शीला की गलती के लिए खुद मार खाती है। आगे जाकर पता लगता है कि जैसे मृणाल का जन्म दूसरों के अपराध का दंड भुगतने के लिए ही हुआ है‌। यह जिसे सभ्य समाज कहते हैं, कितने-कितने किस्म के अपराध जिसमें होते हैं, उन सब का दंड भुगतने के लिए भी मृणाल प्रस्तुत होती है। 

जिस शीला की बात हो रही है, उसके घर मृणाल का आना-जाना बढ़ जाता है। इसकी परिणति यह होती है कि एक दिन कोठरी में बंद करके उसकी भाभी, प्रमोद की मां उसे बेंत से पीटती है। यह घटना क्या हुई, हंसमुख मृणाल की हंसी सदा के लिए चली जाती है। घटनाक्रम में तेजी आती है। मृणाल का विवाह होता है, किसी 'अच्छे' परिवार के 'ओहदेदार' लड़के से, जो उम्र में उससे बहुत बड़ा है, और जिसका यह दूसरा विवाह है। मृणाल इस विवाह से खुश नहीं है। वह जानती है, उससे किसी तरह बला छुड़ाई जा रही है। तभी विदाई के मौके पर प्रमोद बिना किसी बात की परवाह किए अपनी मृणाल बुआ के पैरों से लिपट जाता है, उसे जाने नहीं देता। अपनी मां को राक्षस कहता है और पिता से थप्पड़ खाता है। और तब मृणाल उसे नीचे झुककर उठाती है उसकी ठोड़ी पकड़ कर पूछती है - प्रमोद, तू मेरी बात भी नहीं मानेगा? मैं जल्दी आऊंगी..। आंसुओं से भीगा बुआ का चेहरा देख प्रमोद का हठ गल जाता है। 

वास्तव में मृणाल की पिटाई उसके शीला के भाई के प्रेम में पड़ने का पुरस्कार था। उस समय मृणाल के हाव-भाव और व्यवहार को प्रमोद आश्चर्य और कौतूहल के साथ देखता है। वह इस परिवर्तन को समझ नहीं पाता। मृणाल का प्रमोद के प्रति प्यार का रूप बदल गया है। वह उसे उपदेश नहीं देती, उसे छाती से लगाए पार जाने कहां देखने लगती है। अधिक बातें नहीं करती। एकांत उसे उतना बुरा नहीं लगता। शाम को खटोला डाले ऊपर उड़ती चीलों को चुपचाप देखती रहती है। कटी पतंग को आंखों से ओझल हो जाने तक देखती है। खटोले पर पेट के बल लेटकर कोयले से धरती पर लकीरें खींची रहती है। वह चिड़िया बनना चाहती है... लेकिन फिर पिटाई, और विवाह। विवाह के चार दिन बाद वह मायके आती है। उसे देखकर प्रमोद के मन में होता है कि किस तरह वह बुआ के काम आए कि उनका जी हल्का हो। और नहीं तो उनके गले लग कर फूट ही पड़े। उसे खिलौना पकड़ा मृणाल पूछती है - मरना क्या होता है, क्यों रे, तू जानता है? प्रमोद को यह मजाक अच्छा नहीं लगता। वह बुआ के लिए स्वयं मर जाने का हौसला रखता है क्योंकि उनके मरने के बाद वह जी ही नहीं सकता। लेकिन वह देख लेगा कि आखिर बुआ को मारने वाला कौन है। मृणाल शीला के भाई के पास प्रमोद के हाथों एक चिट्ठी भेजती है। प्रमोद को वे बहुत प्यार करते हैं। प्रमोद भी उनसे मिलकर बहुत खुश होता है। जवाब में वे भी चिट्ठी देते हैं, खुली ही चिट्ठी। ऐसे अच्छे आदमी की लिखावट की सुंदरता देखने के लिए पत्र उसने खोला और उसमें 'माय डियर' लिखा हुआ उसे इतना अच्छा लगा कि वह कई दिन तक वैसे ही 'माय डियर' लिखने की कोशिश करता रहा।  लेकिन चिट्ठी का जवाब मृणाल को अवसन्न कर देता है। वह कहती है - अगर शीला के भाई का कोई पैगाम आया तो वह अपनी जान दे देगी। लौटने के एक दिन पहले तक मृणाल मानो एकदम मुरझा-सी जाती है। उसकी निगाहें जैसे कहीं धंसकर रह जाती हैं - 'जैसे सामने उन्हें कुछ नहीं दीखता। सब भाग्य दीखता है और वह भाग्य चीन्हा नहीं जाता।' वह कुछ चाहती है जैसे, लेकिन उसे खुद ही नहीं पता कि क्या। प्रमोद उसका सर दाबता है, कि वह उसे एक दवा का नाम लिखकर शीला के घर भेजती है दवा लाने को। चिट पढ़कर पहले तो शीला के भाई बहुत नाराज हो जाते हैं, फिर मृणाल का हाल जानने को प्रमोद को ले चलने को कहते हैं। प्रमोद कहता है - नहीं, जीजी छत से गिरकर मर जाएंगी। 

कुछ महीनों बाद मृणाल एक नौकर के साथ मायके आती है। उसकी शारीरिक और मानसिक अवस्था ठीक नहीं है। वह आई है और वापस जाने की इच्छा उसकी नहीं है। बातों ही बातों में वह प्रमोद को कहती है, केवल प्रमोद को - 'बेंत खाना मुझे अच्छा नहीं लगता। न यहां अच्छा लगता है, न वहां अच्छा लगता है।' प्रमोद को पता चलता है कि फूफा ने बुआ पर कुछ अभियोग लगाए थे। पिता के साथ लंबे पत्राचार के बाद सुलह की स्थिति बनती है। फूफा वापस मृणाल को ले जाने को आने वाले हैं। मृणाल को उसके पितातुल्य भाई स्त्री धर्म की शिक्षा देते हैं - पत्नी का धर्म है पति है। घर पति-गृह है। उसका धर्म, कर्म और उसका मोक्ष भी वही है। मृणाल जाना नहीं चाहती। वे कारण जानना चाहते हैं लेकिन बताना भी नहीं चाहती। लेकिन आखिरकार मृणाल लौटने की तैयारी करने लगती है, सामान बटोरने-सहेजने लगती है। किताब कोई नहीं ले जाती अपने साथ इस बार, क्योंकि किताब 'उन्हें' अच्छी नहीं लगती। उनसे समय बर्बाद होता है। 

मृणाल के पति सुबह आने वाले हैं उसे लिवा ले जाने, लेकिन शाम में उसकी तबीयत बहुत बिगड़ने लगती है। इसके बारे में किसी को भी बताने से वह प्रमोद को मना कर देती है। उसे जमालगोटा (विरेचक, लेकिन गर्भवती स्त्री के लिए वर्जित औषधि) लाने को कहती है। इसके सेवन के बाद से तो उसकी अवस्था चिंतनीय हो जाती है। प्रमोद पूछता है - यह तुमने क्या किया बुआ? प्रमोद उससे पूछता है, व्यथा से भर कर - अपने तन को क्यों होती हो? बुआ कहती है - मैं नहीं जानती। अच्छा बताओ, तन का क्या करूं?' फिर फूफा आते हैं। उस अहंकारी पुरुष की अवमानना भी अपने ढंग से प्रमोद करता है। बुआ अंतिम बार मायके से विदा होती है। वह घर से ही नहीं, सबके जीवन से निकल जाती है, फिर कभी लौट के नहीं आती। जमालगोटा का असर या कुछ और, मृणाल एक मृत कन्या को जन्म देती है। फिर वह परित्यक्ता बन जाती है। उसके पति उसे शहर के हाशिए पर एक मलिन इलाके की कोठरी में छोड़ जाते हैं। उसे मैके जाने के लिए कहा गया जिसके लिए वह तैयार नहीं हुई, जोर-जबरदस्ती और मारपीट के बाद भी तैयार नहीं हुई। बुआ के बारे में खबरें उड़ती हुई कभी-कभार प्रमोद तक पहुंचतीं। ऐसे ही एक दिन पता लगा कि बुआ पुरानी जगह छोड़ नई जगह आ टिकी है जो कि प्रमोद की यूनिवर्सिटी के करीब पड़ती है। वह एक कोयला व्यापारी के साथ रह रही है, यह भी पता चला। 

प्रमोद आखिर एक दिन मृणाल के पास पहुंचता है, शहर के ऐसे इलाके में जहां सभ्यता का तलछट, उसकी मैल जमा होती है। मृणाल को वह अकल्पनीय स्थान पर दु:सह्य स्थिति में पाता है। वह कमजोर है, और गर्भवती है। प्रमोद ही उसके जीवन का एकमात्र सहारा है (कम से कम भावात्मक)। वही है जिसके समक्ष वह अपने हृदय की बात कह सकती है, और अब तो वह बीस वर्ष का समझदार नौजवान है। वह उसे खुलकर बताती है कि जब पति ने उसे छोड़ा था और वह मरणासन्न थी, तब इसी कोयले के व्यवसायी ने उसकी सहायता की थी, उसका जीवन बचाया था। तो यह जीवन है एक ऋण की तरह है जिसे वह तन देकर चुकाती है। उसके गर्भ में उसी का अंश पल रहा है। कोयला व्यापारी उसके रूप पर मोहित है, आसक्त है। उसके लिए उसने अपना घर-परिवार आज भले छोड़ दिया हो, जल्द ही उसकी रुचि मृणाल में समाप्त हो जाएगी और वह अपने कुटुंब में जा मिलेगा। तब क्या होगा? यह तो भगवान ही जानता है, वही सबको राह दिखाता है। लेकिन प्रमोद को बुआ के मुख से ऐसे शब्द भी सुनने पड़ते हैं - और जो हो, लेकिन मैं वेश्यावृत्ति नहीं करूंगी - तन देने की जरूरत हो सकती है, लेकिन तन देकर पैसा कैसे लिया जा सकता है? प्रमोद सोच में पड़ जाता है - पति का घर छोड़ इस गंदी जगह पर व्यभिचार में डूबी अपनी मृणाल बुआ को लांछित करने की बजाय उसके प्रति और खिंचकर क्यों वह रह गया है!

मृणाल आखिर प्रमोद के साथ कैसे जा सकती थी। परित्यक्ता और ऊपर से गर्भवती स्त्री का मैके तो क्या कहीं भी क्या स्थान कोई हो सकता है? वह अपने पितृकुल को संकट में कैसे डाल सकती है। फिर वही हुआ। मृणाल का सोचा हुआ ही हुआ। मृणाल ने एक कन्या को जन्म दिया। उसके बाद उसके साथ मारपीट करके वह कोयला व्यवसाई उसे छोड़कर चला गया। 

समय गुजरा। इधर प्रमोद के विवाह की बात आगे बढ़ी। लड़की देखने जब वह गया तो एक मास्टरनी जी को बच्चों को पढ़ाते देखा। मास्टरनी जी क्या, वह तो उसकी मृणाल बुआ ही थी। उसे विकलता से प्रमोद खोजता फिरा था, उस कोयले की दुकान वाले की कोठरी से लेकर अस्पतालों में, और कहां-कहां...! और आज उसे इस तरह अनायास पा सका। दोनों उस समय अन्चीन्हे बने रहे। लेकिन उसका पता मालूम करके प्रमोद मृणाल के यहां पहुंच ही जाता है। बुआ बदली हुई दिखाई देती है। वह अकेली है। उसकी आंखों में स्निग्धता है। 'देह इकहरी और वशीभूत। मानो अपने भाग्य से गहरा सौहार्द है...। जो झेला है सब पी गई है। सबका रस बन गया है। खार कोई नहीं है।' मृणाल बेटी को नहीं बचा सकी। उसे प्रमोद और राजनंदिनी का रिश्ता किसी भी कीमत पर चाहिए। प्रमोद को उसके बारे में हरगिज लड़की वालों को कुछ नहीं बताना चाहिए। लेकिन सच कहने का दबाव प्रमोद पर इस कदर हावी होता है कि लड़की वालों के यहां से चलते चलते-चलते वह लड़की के डाक्टर पिता से कह बैठता है - मास्टरनी मेरी बुआ है। डाक्टर साहब से प्रमोद के संबंध जीवनपर्यंत बने रहे, लेकिन वह संबंध विवाह वाला, बनने से रह गया। लड़की की मां बुआ वाली बात स्वीकार न कर सकी, पचा न सकी। मृणाल फिर एक बार स्थान छोड़ने को विवश हुई। कहां गई, प्रमोद को मालूम ना हो सका। मालूम तब हुआ जब मृणाल ने प्रमोद की माता के स्वर्गवास का समाचार सुनकर उसे पत्र लिखा। उस पत्र में अपना पता भी लिखा। पत्र में लिखा - 'मैं जानती हूं तुम आओगे।.. तुम आओगे तो आ जाना लेकिन मुझसे किसी बात की उम्मीद ना करना। जिन लोगों के बीच बसी हूं, वह समाज की जूठन है, और कौन जानता है कि वे जूठन होने के योग्य भी नहीं हैं... मैं किसी भी और बात पर अब जिंदा रहना नहीं चाहती हूं। उनकी बुझती और जगती इंसानियत के भरोसे ही रहना चाहती हूं। दर-दर भटकी हूं और मैंने सीखा है कि दुर्जन लोगों की सद्भावना के सिवा मेरी कुछ और पूंजी नहीं हो सकती।... सबके अभ्यंतर में परमात्मा है और वह सर्वन्तर्यामी है, इससे अभी यहां से टूटकर उखड़ना नहीं चाहती।'

मृणाल वास्तव में ऐसी जगह बसी है जहां चरित्र और नैतिकता कोई विषय ही नहीं है। सच्चरित्रता से यहां आदमी की माप, मूल्य नहीं निर्धारित होता। यहां तो दुर्जनता का ही बोलबाला है, क्योंकि वही सबसे प्रगट सच है। इसी से यहां गुप्त कुछ नहीं, छल की तो कोई बात ही नहीं। यह सभ्य या शिष्ट समाज का एक समांतर समाज है। दोनों के बीच शायद ही कुछ समान है। इस दूसरे, समांतर समाज में टिके रहने की सबसे बड़ी शर्त है अंदर और बाहर एक रहना, द्वैध यहां नहीं चल सकता।

जिस स्थान का, जिस समाज का मृणाल बुआ ने अपने पत्र में इतना बखान किया था, वहां उससे मिलने प्रमोद पहुंचता है। उस जगह जहां कि नगर की सड़ांध होती है। वहां बुआ की जो अवस्था होती है, वह देख कर उसे गहरी पीड़ा होती है। वह उसे फिर साथ चलने को कहता है - बुढ़ापे में ही तुम्हें आराम नहीं दे सकूंगा तो कब दूंगा। मृणाल कहती है कि जिन लोगों के बीच वह है, उनका उस पर बहुत उपकार है, उसे उन सब को भी अपने घर उसी प्रकार ले चलना होगा जिस प्रकार युधिष्ठिर कुत्ते को स्वर्ग लेकर गए थे। कुत्ता साक्षात धर्म था और उससे अपने साथियों की तुलना वह अनायास ही नहीं करती। वह जानती है और समझती है कि यह एकदम गए बीते लोग ही मनुष्यता की कसौटी बनाते हैं। तो आखिर प्रमोद फिर एक बार मृणाल बुआ को साथ लाने में नाकामयाब रहता है और नाराज होकर चला जाता है। जमकर वकालत करता है फिर एक दिन जज बनता है।


इस बात के सत्रह साल बाद उसे मृणाल बुआ के मरने की खबर मिलती है। प्रमोद संताप और ग्लानि में डूबा है। ग्लानी कि कैसे वह आखिर इतने सालों से बुआ की ओर से मुंह फेरे रह सका। क्यों आखिर बुआ की मांग उससे पूरी न हुई? किस अमानुषिकता के साथ सत्रह वर्ष बिना बुआ को देखे काट गया। वह बुआ कि जिन्होंने कुछ भी किया तो बस उसे प्रेम ही किया, उसे दिया ही दिया, लिया कभी कुछ नहीं। मृणाल बुआ जिस व्यवस्था, जिस अमानुषिक और बर्बर व्यवस्था का शिकार हुई, उसके विरुद्ध उनके पक्ष में न्याय करने में असमर्थ मानकर, बल्कि उसके सबसे प्रामाणिक प्रतिनिधि के नाते उनकी दुरावस्था, दमन और दलन में अपनी हिस्सेदारी जानकर जजी से त्यागपत्र दे देता है। प्रमोद यह संकल्प लेता है कि शेष जीवन वह उतनी ही स्वल्पता के साथ बिताएगा जितना कि जीवित रहने के लिए अनिवार्य हो, और हरिद्वार चला जाता है। उपन्यास के आरंभ में इसी जज प्रमोद यानी पूर्व चीफ जस्टिस एम. दयाल के मरणोपरांत उनके असबाब में से एक पांडुलिपि मिलती है जिस पर उनके हस्ताक्षर हैं। उसी अंग्रेजी पांडुलिपि का उल्था यह उपन्यास 'त्यागपत्र' है।


मृणाल की कहानी एक बच्ची के स्त्री बनने की या स्त्री में रूपांतरित होने की भी कथा है। इसमें बेंत की, यानी बल की एक महत्वपूर्ण, बल्कि निर्णायक भूमिका है। मृणाल के बचपन और किशोरावस्था के प्रसंग बड़े स्वाभाविक रूप से इस प्रक्रिया या कि परिघटना को दर्शाते हैं। मृणाल की कहानी पुरुष वर्चस्व वाले समाज में चरित्र और नैतिकता पर प्रश्न उठाती है और उनका मूल्यांकन उस जगह पर रहकर उन लोगों के बीच खड़ी होकर करती है जो समाज की जूठन है। इस प्रकार इन प्रश्नों को एक प्रकार से वैधता मिलती है, ये व्यवस्था पर कोई प्रतिक्रिया मात्र बनकर नहीं रह जाते।


'त्यागपत्र' 1937 में छपा था। देश में उस समय उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष चल रहा था। हर भाषा में इस संघर्ष को स्वर मिल रहा था। और इसी समय जैनेंद्र, जो कि खुद स्वतंत्रता आंदोलन में जेल जा चुके थे, जो विशेषकर गांधीजी के सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा जैसी अहिंसक युक्तियों के कायल थे, ने 'त्यागपत्र' लिखा। स्त्रियां बढ़-चढ़कर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग ले रही थीं।  वे सत्याग्रही भी थीं और क्रांतिकारी भी। जहां एक ओर यह सब हो रहा था, वहीं मानो एक युगांतरकारी सृजनात्मक उद्यम से जैनेंद्र ने पुरुष-सत्ता - उसके मूल्यों एवं संरचनाओं के खिलाफ एक सत्याग्रही स्त्री चरित्र खड़ा कर दिया - मृणाल!


पुरुष सत्ता के विरुद्ध मृणाल का आत्म-दलन वास्तव में सत्याग्रह का ही एक और रूप या संस्करण है। मृणाल सत्य पथ से कभी नहीं डिगती और जीवन भर इसकी कीमत चुकाती

है। शीला के डॉक्टर भाई का उसे एक पत्र मिलता है जिसमें उसने लिखा है कि वह अविवाहित है और आगे भी अविवाहित रहेगा। मृणाल विवाहित है और वह उसके सुख की कामना करता है। फिर भी अगर कभी अगर उसे किसी भी बात की दरकार हो तो वह हमेशा उसके लिए प्रस्तुत रहेगा। एक पतिव्रता स्त्री होने के नाते वह यह बात पति से नहीं छुपा पाती। सच कहने का उसे यह पुरस्कार मिलता है कि पति उसे अपने घर से और जीवन से बाहर कर देता है। नैतिक होने का अर्थ सच्चा होना होता है। मृणाल सच्ची है - अपने परपीड़क पति के प्रति भी, इसी से अपने प्रेम प्रसंग की बात भी उस पर प्रगट कर देती है और निष्कासन पाती है। सच्चा नहीं हुआ जा सकता। एक स्त्री के लिए सच्चा व्यक्ति होना मानो कहीं अधिक जोखिम से भरा है।

मृणाल का चरित्र देह की शुचिता और आत्मा की पवित्रता का द्वंद्व भी सामने लेकर आता है। आत्मा की पवित्रता के आगे मृणाल के सामने देह की शुचिता की कोई कीमत नहीं। मैके आई बीमार मृणाल खुद को और बीमार बनाती है और प्रमोद के टोकने पर पूछती है - बताओ, तन का क्या करूं? यही तन आगे उसके द्वारा प्रतिदान का माध्यम बन जाता है - आत्मा की मुक्ति के रास्ते की रुकावट देह को क्यों बनने देना चाहिए? आखिर तो इसे गलना है, जलना है, तो ठीक है, तन मिट्टी ही तो है आखिर। यहां मृणाल देह की शुचिता पर अवलंबित सामाजिक नैतिकता को चुनौती देती है। ऐसी उस समय कोई दूसरी स्त्री पात्र नजर नहीं आती जो विवाहित होते हुए पर-पुरुष से गर्भवती होती है, बल्कि शिशु को जन्म भी देती है। यह जैनेंद्र ने सौ साल बाद का, भविष्य का स्त्री पात्र खड़ा किया है। मृणाल के आत्मदान के आगे आधुनिक स्त्री-विमर्श के सारे प्रतीक निस्तेज हैं। मृणाल कहती है - दान स्त्री का धर्म है, देते जाने में ही स्त्री-जीवन की सार्थकता है। अपने आप को देकर, चुकाकर मृणाल जो प्रतिमान लगभग सौ साल पहले रचती है, वह लेने को व्यग्र और आतुर कोई वैमर्शिक पात्र आज तक नहीं खड़ा कर पाया। इन दोनों स्थितियों में ऐसा ही अंतर है जैसा कि प्राण देने की तैयारी और प्राण लेने की उद्धतता के बीच है। मृणाल समाज में तोड़फोड़ नहीं चाहती, क्योंकि जब समाज ही नहीं रहेगा तब हम सब कहां रहेंगे? लेकिन अपने को गला कर, जलाकर, वह सोए हुए जड़ समाज को जगाना चाहती है, संवेदित करना चाहती है। जो कोई उसके जीवन को नष्ट करने के लिए जिम्मेदार हैं, उनके प्रति भी वह सच्ची और करुणापूरित है, चाहे वह उसकी भाभी हो, पति हो, या कोयला व्यापारी।

कष्ट, निरादर और निष्कासन झेलती लेकिन अपने लिए स्वाधीनता का भी वृत्त रचती मृणाल का व्यक्तित्व एक सजग चिंतक के रूप में ढलता जाता है, जो अपने ही अनुभवों को लेकर तत्व-मीमांसा में उलझती है, जगज्जीवन के उलझे डोर सुलझाने की कोशिश करती है, और सर्वन्तर्यामी को कर्त्ता और कारण मानकर अध्यात्म की ओर मुड़ती जाती है। जिनके साथ समाज भेद करता है, मृणाल उन्हीं के साथ अभेद स्थापित करती है, उन्हीं की होकर रहती है। यह महा-मूल्य रचते हुए मृणाल कथाकाश में ध्रुव तारे की तरह जगमगा रही है।

मृणाल को एक पात्र के रूप में जो ऊंचाई मिली है, उसमें सबसे बड़ा योगदान प्रमोद का है। जैनेंद्र जी ने प्रमोद के रूप में ऐसा स्त्री-संवेदी पात्र खड़ा किया है जो जज होकर भी अपनी बुआ की नजरों से दुनिया को देखता है, और न्याय की तराजू में अपना पलड़ा हल्का पाकर जजी छोड़कर विरक्त जीवन बिताने लगता है। यह दोनों ही वास्तव में विद्रोही पात्र हैं और अपने-अपने उद्यम में सफल हैं, और अनासक्ति और आत्म निग्रह इन दोनों के अस्त्र हैं, युक्तियां हैं! (कथादेश,मार्च 2023 में प्रकाशित.)

                           -  शिवदयाल

ईमेल : sheodayallekhan@gmail.com


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