'औद्योगिक सभ्यता का सीमांत'
इस लेख के पहले अनुच्छेद(पैराग्राफ) को आज की अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों(रूस-यूक्रेन युद्ध तथा इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष) को दृष्टिगत रखते हुए अपने हिसाब से संशोधित करते हुए पढ़ें और गुनें। यह लेख वर्ष 2011-12 के दौरान दक्षिणी यूरोप के देशों में उभरे युवा-आक्रोश की पृष्ठभूमि में लिखा गया था। तब से दुनिया में बहुत कुछ घटा। बीच में एक वैश्विक महामारी के दुर्दांत और मर्मांतक अनुभव से भी हमारी भोग-वृत्ति और हिंसाचार पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वास्तव में 'चने को भाड़ में झोंकने' की प्रक्रिया और तेज हो चुकी है।
औद्योगिक सभ्यता का सीमांत
-शिवदयाल
यह नहीं कि युद्ध के बादल मँडरा रहे हैं लेकिन लगभग पूरी दुनिया में हलचल-सी है। वैसे भी युद्ध की अनुपस्थिति का यह अर्थ नहीं कि शांति है, संघर्ष नहीं है। संघर्षों से अपने ढंग से चीजें बदलती हैं, उनका दुनिया पर प्रभाव पड़ता है। कई तरह के संघर्षों में अभी दुनिया उलझी हुई है - व्यापारिक संघर्ष, सर्वसत्तावादी सत्ताएँ और आर्थिक उपनिवेशवाद तथा संसाधनों पर असमान नियंत्रण एवं वितरण - ये सब स्थितियाँ संघर्ष की उपस्थिति का ही प्रमाण हैं।
लेकिन ये संघर्ष ही इस हलचल को पूरी तरह परिभाषित नहीं करते। कुछ और भी है जो समान रूप से ग्रह के निवासियों को उद्वेलित कर रहा है। वह है यह आशंका कि क्या धरती पर हमारे रहने की दशाएँ बदल रही हैं? यदि हाँ, तो क्या मनुष्य समाज इन बदली हुई दशाओं के साथ अनुकूलन करने में समर्थ या सफल हो सकेगा? क्या सचमुच प्रकृति कुपित है, और इसीलिए दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश की भी परीक्षा ले रही है - किस्म-किस्म के चक्रवात जिनमें तीन सौ किलोमीटर तक की रफ्तार से हवाएँ चलती हैं। बाढ़, भूस्खलन, समुद्री चक्रवात और ... सुनामी! ज्वालामुखी भी ताबड़तोड़ फूट रहे हैं। प्रकृति द्वारा प्रस्तुत इन चुनौतियों से जूझने में बहुत शक्ति जा रही है, लेकिन आदतन एक बार संकट टल जाने के बाद हम वापस अपने आप में लौट आते हैं, यानी यथास्थिति में।
अब एक दूसरा दृश्य! एक अधेड़ ग्रीक नागरिक ने एक अध्ययन दल को बताया, ‘‘ एक आसान लक्ष्य बनाए जाने के कारण मैं अपने देश से उकता गया हूँ। ग्रीस को दिवालिया हो जाने दो। समूचे यूरोप को दिवालिया हो जाने दो। मैं उन्हें रोकना चाहता हूँ कि वे पैसों के लिए मेरा खून न बहाएँ, पैसे मेरे पास हैं ही नहीं!....’’ ऋण संकट से जूझते ग्रीस में युवाओं का गुस्सा उबल पड़ा। उससे पहले स्पेन में दो हफ्ते की जबरदस्त हड़ताल हुई। वहाँ के युवा सरकार की मितव्ययिता की नीति का विरोध कर रहे हैं। स्पेन के युवा अपने देश के लिए एक बिलकुल नई राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था चाहते हैं। यही माँग पुर्तगाल तक पहुँच गई और अब इसकी प्रतिध्वनियाँ ग्रीस में भी सुनाई पड़ रही हैं। अंदेशा है कि समय बीतने के साथ यूरोप में हर कहीं इसकी अनुगूँज सुनने को मिल सकती है।
डोमिनिक रेनी एक राजनीतिविज्ञानी हैं और वे पेरिस के थिंक टैंक कहे जाने वाले ‘फाउंडेशन फाॅर पोलिटिकल इनोवेशन’ के जेनरल सेक्रेटरी भी हैं। वे कहते हैं कि यह आंदोलन उन तनावों का प्रतिनिधित्व करता है जिन्हें यूरोप के युवा झेल रहे हैं। यह पीढ़ी राजनीतिक और लोकतांत्रिक अर्थों में अधिक दुर्द्धर्ष है। यह जानना रोचक होगा और अपने देश के लोगों के लिए कुछ चकित करने वाला भी कि यूरोप के युवाओं के गुस्से का सर्वप्रमुख कारण यह है अब उनके समाज और सत्ताओं के पास उन्हें देने के लिए वह सब सुख-साधन और स्वतंत्रता नहीं, जिनका उपभोग स्वयं उनके माता-पिता, अर्थात पूर्ववर्ती पीढ़ी करती आई थी। रोजगार, केरियर और अवकाश (मुक्त समय) की यूरोपीय युवाओं की यह चिन्ता कोई नई नहीं है। पिछले कुछ दशकों में इन मुद्दों पर निराशा इस हद तक बढ़ी है कि इंग्लैण्ड सहित कई देशों में आव्रजन सम्बंधी नीतियों का भी विरोध हुआ है जिनके अंतर्गत दूसरे देश के लोगों को यूरोपीय देशों में रोजगार मिलता है। कहीं-कहीं निराशा नृजातीय तनावों के रूप में प्रकट होती रही है। यह स्थिति धनाढ्य उत्तरी यूरोप तथा कमतर पूर्वी एवं दक्षिणी यूरोप में बनी रही है।
जैसा कि विश्लेषक कहते हैं ग्रीस, स्पेन, पुर्तगाल आदि देशों में जो युवा देश की सत्ता के खिलाफ खुलकर सामने आए हैं, उन्हें लगता है कि उनके समाज और उनके देश की सरकारों ने उनकी कोई सुध नहीं ली और उनकी आकांक्षाओं को विफल किया है। पिछले महीनों में ‘अरब-वसंत’ लाने वाले समानधर्मा तरुणों से प्रेरणा लेकर सत्ता और नीतियों को बदलने के संकल्प के साथ वे सड़कों पर आए हैं। मित्तव्ययिता और संयम बरतने की उनकी सरकारों की अपील उनको जैसे मुँह चिढ़ा रही है। हाँ, यह विडम्बना है कि सरकार की वृद्ध लोगों की सामाजिक सुरक्षा और पेंशन सम्बन्धी प्रावधानों का भी वे खुलकर विरोध कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि उनके हितों की कीमत पर बूढ़े सब माल काट ले जा रहे हैं। पेरिस स्थित ‘फाउंडेशन फाॅर पोलिटिकल इनोवेशन’ द्वारा कराए गए एक अध्ययन - ‘2011, वर्ल्ड यूथ्स’ में यह बात उजागर हुई है कि यूरोप आने वाले दिनों में पीढ़ियों के बीच जबरदस्त संघर्ष से दो-चार होगा। वहाँ युवाओं में यह समझ बन रही है कि ज्यों-ज्यों आबादी बूढ़ी होती जाएगी, त्यों-त्यों यांत्रिक रूप से वह सामूहिक धन अवशोषित करती जाएगी जिसकी कीमत युवाओं को ही चुकानी पड़ेगी। उन्हें उन ऋणों का भी भुगतान करना पड़ेगा जो कि वर्तमान जीवन स्तर को संभव बनाने के लिए उगाहे गए थे लेकिन जिसका वे स्वयं उपभोग नहीं कर पाएँगे। युवाओं को लगता है अब भी बुजुर्ग या अनुभवी लोग उनके लिए बहुत कम जगह छोड़ रहे हैं - उत्तरदायित्व की दृष्टि से भी और सुविधा की दृष्टि से भी।
इस स्थिति को हम इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की पीढ़ी ने ‘वृद्धि दर’ की दौड़ में अपने लिए जिस भोग-विलास का सामान इकट्ठा किया, उसे अपनी भावी पीढ़ी तक पहुँचाने में असफल रही। यह विलास इस तरह अल्पजीवी दिखाई देता है जिसकी उम्र बमुश्किल साठ-सत्तर साल रही। अभी तो यह परिघटना मुख्यतः पूर्वी यूरोप एवं दक्षिणी-यूरोप में ही अधिक परिलक्षित हो रही है लेकिन उत्तरी यूरोप भी इससे शायद ही अछूता रह पाए। उत्तरी यूरोप के देशों ने समय रहते अपनी नीतियों में कुछ सुधार शुरू कर दिए थे।
तो दो सौ साल पूर्व के औद्योगिकीकरण के परिणामों की विवेचना का एक यह आधार भी हो सकता है कि प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन, मानव श्रम के अपरिमित शोषण और मूल निवासियों एवं औपनिवेशिक आबादियों के नृशंस दमन का फलाफल यह कि पश्चिम का उपभोग-स्तर ऊपर उठ जाए, उनके लिए दुनियावी सहूलियतों का ऊँचा से ऊँचा मुकाम हासिल किया जाए, और तब भी वह आगे की पीढ़ियों के लिए कम पड़े। इस पूरी प्रक्रिया में जिस जीवनमूल्य का निर्माण हो उसमें युवतर पीढ़ी अपनी अग्रज पीढ़ी को जरूरत के समय प्रदान की जा रही मूलभूत सुविधाओं पर एतराज करे, क्योंकि इसके लिए उसे कमतर सुविधाओं और सुरक्षा से संतोष करना पड़ेगा। पूर्व की महानता का बखान न भी करें तो पिछले दो सौ सालों में ‘नई सभ्यता’ का निर्माण करके पश्चिम अपने लिए यही जीवनमूल्य सृजित कर पाया है।
युवा दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में उबल रहे हैं, अलग-अलग कारणों से। अरब के युवाओं के आक्रोश का कारण सर्वसत्तावादी व्यवस्था का उत्पीड़न, भ्रष्टाचार, गरीबी और बेकारी है। कहीं-कहीं बाहरी हस्तक्षेप भी एक कारण है। वे लोकतंत्र और सत्ता में आम जनता की भागीदारी के लिए भी लड़ रहे हैं, और कठोर दमन के शिकार हो रहे हैं। उस प्रकार के दमन की उमीद यूरोप में नहीं की जा सकती क्योंकि वहाँ लोकतांत्रिक सरकारें काम कर रही हैं। वहाँ भी बेकारी या रोजगार के अवसरों का सीमित होना जरूर एक बड़ा कारण है युवाओं के आक्रोश का, लेकिन वास्तव में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद कायम हुई सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था से उनका विश्वास उठ गया है जिसमें उनकी आकांक्षाओं के लिए जगह ही नहीं बचती, उनके लिए सुखद और सुरक्षित भविष्य का आश्वासन नहीं मिलता। यानी यूरोप और एशिया, दोनों ही महादेशों में युवाओं का अपने यहाँ की व्यवस्थाओं पर भरोसा नहीं रह गया है।
क्या यह आकस्मिक है कि अरब के तेल भण्डारों से ही यूरोप का बैभव बना है? ये भण्डार दिनोंदिन खाली हो रहे हैं। यही क्यों, यूरोप के कोयला भण्डार भी तो अक्षय नहीं है। दूसरी ओर उपभोग की लालसा बढ़ती ही जा रही है, कम होने का नाम नहीं लेती। उपभोग के लिए उत्पादन, उत्पादन के लिए ऊर्जा, और ऊर्जा के लिए? धरती, उसके संसाधन जो धीरे-धीरे चुक रहे हैं, शेष हो रहे हैं। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर हो रहने की कोई स्थिति नहीं है, आगे भी बनती दिखाई नहीं देती। परमाणु ऊर्जा के सक्षम विकल्प के रूप में इस्तेमाल होने पर चेरनोविल और फुकुशिमा जैसे हादसों से बार-बार सवाल उठ रहे हैं। परमाणु हादसों को रोकने की शत-प्रतिशत गारंटी नहीं है, हादसों के प्रभावों पर तो कोई वश ही नहीं है, ऐसे में परमाणु ऊर्जा को सक्षम विकल्प के रूप में कैसे देखा जा सकता है? दूसरी ओर लगातार बिगड़ता पर्यावरण ऊर्जा के परम्परागत स्रोतों - कोयला, गैस, तेल आदि के इस्तेमाल के प्रति सचेत कर रहा है।
यदि यह स्थिति, जिसे हम ‘ग्रोथ’ (वृद्धि) कहते हैं, उसकी सीमा है तब इसमें कोई संदेह नहीं कि हम उत्तर-औद्योगिक समाज के उद्भव के निकट हैं। औद्योगिकीकरण काल की उत्पादन-पद्धति की जहाँ स्पष्ट सीमा बनती दिखाई दे रही है, वहीं सामाजिक और राजनीतिक संस्थाओं की क्षमता और पहुँच लगातार सिकुड़ रही है, हमारे समक्ष उत्पन्न चुनौतियों का मुकाबला करने में इनकी सक्षमता संदिग्ध हो गई है। यहाँ बाजार का जिक्र करना भी जरूरी है। बाजार हमारी कोई मदद नहीं कर पा रहा। वास्तव में बाजार एक ऐसी सामाजिक संस्था है जिसका मूल उद्देश्य मानवीय सृजन क्षमता के विकास के लिए अवसर उपलब्ध कराना, तथा अन्तरनिर्भरता की एक स्थाई व्यवस्था का निर्माण करना रहा है जिसमें लोग एक-दूसरे की जरूरतों की पूर्ति कर सकें। केवल और केवल मुनाफा से जुड़कर बाजार अपनी भूमिका खोकर अपने मूल उद्देश्य से ही भटक गया है। वह अपने आप में एक स्वतंत्र संस्था या कि सत्ता बन गया है जिसकी समाज की मूलभूत आवश्यकताओं के साथ कोई संगति नहीं। बाजार पर समाज का नियंत्रण या तो रहा नहीं, या अपर्याप्त है, उल्टे बाजार ही समाज की संस्थाओं को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है। यह चने को जल्दी-से-जल्दी भाड़ में झोंकने जैसा है। यदि समाज की सारी शक्ति बाजार को बनाने-बढ़ाने में ही प्रयुक्त होती रही और बाजार यदि खपत की यही गति बनाए रखने में सफल हो गया तो यह जल्द ही हमें बिल्कुल रीता कर देने वाला है।
पश्चिम के आंदोलनकारी युवाओं का ध्यान इस ओर जरूर जाना चाहिए कि धरती की क्षमता अब चुक रही है, उसका धैर्य भी समाप्त हो रहा है, उत्पादन के पुराने औजार अब काम के नहीं रहे। अब यह संभव नहीं कि उन्हें भी वह सब कुछ (वह ऐश और बेतकल्लुफी!) मिल जाए जो उनके बाप-दादों को नसीब हुआ था। पश्चिमोन्मुखी एशियाई और अफ्रीकी युवाओं को भी पश्चिम के अपने भाइयों की इस जद्दोजहद से सीख लेनी चाहिए और अपना रास्ता खुद बनाने की तैयारी करनी चाहिए। उन्हें इस प्रश्न से भी जूझना चाहिए कि कहीं वास्तव में हम औद्योगिक सभ्यता के सीमांत पर तो नहीं? यहाँ से दुनिया को आगे ले जाने के लिए पुरानी युक्तियों तथा स्थापनाओं से काम नहीं बनने वाला।
यह युवा विश्व है - 1.1 बिलियन युवाओं की दुनिया। ज्ञात आँकड़ों में अब तक युवाओं की इतनी बड़ी तादाद दर्ज नहीं है। दुनिया का भविष्य उनके हाथों में है। दूसरी ओर मानव जाति आज जितनी सक्षम कभी न थी। जितना ज्ञान और कौशल उसने अर्जित किया है उसमें यह असंभव नहीं कि वह विश्वास के साथ दूसरी ओर देखे और कदम बढ़ाए। (2012 में जनसत्ता में प्रकाशित।)

