नई पुस्तक, निबंध संग्रह - 'स्वतंत्र हुए स्वाधीन होना है', प्रकाशक - प्रलेक प्रकाशन, मुंबई (फोन 7021263557)। पुस्तक अमेज़न पर उपलब्ध।
इस पुस्तक में लेखक का बहुआयामी प्रबुद्ध चिंतन राजनीति, धर्म, दर्शन, साहित्य के साथ ही सामयिक संदर्भों और सरोकारों से जुड़े अभिज्ञानधर्मी लेख-निबंधों में अत्यंत सशक्त शैली में प्रकट हुआ है। सांस्कृतिक समीक्षा और सभ्यतामूलक विमर्श के क्षेत्र में यह एक विशिष्ट कृति है जो पाठक के सोच के दायरे को बढ़ाकर उसकी चिंतनशीलता को उच्चतर भाव-भूमि पर प्रतिष्ठापित करती है।
'स्वतंत्र हुए स्वाधीन होना है' पुस्तक में स्वाधीनता, स्वराज, लोकतंत्र और विऔपनिवेशिकीकरण जैसी जटिल और संश्लिष्ट संकल्पनाओं पर समकालीन और सामयिक वैश्विक तथा स्थानीय संदर्भों एवं परिस्थितियों में नितांत नवीन एवं मौलिक दृष्टि से विचार किया गया है। इस पुस्तक में संकलित निबंधों में साहित्यालोचन भी है, सांस्कृतिक समीक्षा भी। यही नहीं, नई विश्व व्यवस्था के लिए सभ्यतामूलक विमर्श की आधारभूमि भी यह पुस्तक प्रस्तुत करती है।
