शिवदयाल की कविताएं
बगुले और तबेले
- शिवदयाल
ताल में नहीं
तबेले में उतर रहे थे
बगुले
उनकी पीली चोचों में
मछलियाँ नहीं
कीलनियाँ भरी थीं
जो उन्होंने मवेशियों की
देह से खुरच कर निकाली थीं
उनके नथुनों में
गीली मिट्टी नहीं, सड़ते पानी और
गोबर की गंध भरी थी
बगुलों की आदतें बदल गई थीं
बदल गई थीं भंगिमाएँ
गई पीढ़ी के बुजुर्ग देखते
तो देखते रह जाते
दाँतों में अंगुली दबाए
कि बगुलों की चाल निश्शंक थी
एक टाँग पर देर तक
दम साधे खड़े रहने का
उनका कौशल जाता रहा था
ध्यान लगाने का न उनके पास धीरज था
न दरकार, और भगतई का तो
कोई प्रयोजन ही नहीं रह गया था
- नई पीढ़ी के बगुले
अपने बड़ों से जिसके बारे में सुनते
बड़े हो रहे थे ...
बगुलों की आदतें बदल गई थीं
जीने का तरीका बदल गया था
वे तैरना भूल गए थे
कहीं-कहीं उथले चहबच्चों में
बस उनके पीले, बल्कि धूसर पंजे भर डूबते थे
जिनमें उनके बच्चे कौतूहल से
‘छपाक’की आवाज निकाल कर खुश हो लेते थे
अब तो उन्हें
पानी में गर्दन डुबाने की
कल्पना करके भी भय लगता था
बगुलों के बच्चे भारी विस्मय से
ताल-तलैयों की कथा बाप-दादाओं,
से उनके बाप-दादाओं के बारे में सुनते थे
कि कैसे कोस भर की ऊँचाई से वे
ताल के तल में सोनबचवा मछली देख
बिजली की गति से गोते भी लगा लेते थे
और चोंच में छटपट करती मछली को दबाए ही
बाहर आते थे भींगे पाँख झटकारते ....
बुजुर्ग बताते कि आसमान से
ताल कितने नीले नजर आते
मानो धरती पर आसमान ही उतर आता था साक्षात्!
बच्चे सोचते ताज्जुब से -
पानी का रंग नीला? कितनी लंबी हाँकते हैं बूढ़े भी!
और फिर अदद मछली के लिए इतना खतरा मोल लेना ...!
मछलियाँ क्या इन रसीली कीलनियों से
अधिक स्वादिष्ट होती होंगी
चिपटी रहती हैं जो मवेशियों की चमड़ी से,
जिनसे जान छुड़ाने को कान आगे कर वे
मानो अम्यर्थना करते हैं हमारी
हुँह! बूढ़ों की ऐसी की तैसी
खामख्वाह हमें छोटा बनाने, हममें
हीन भावना भरने की कोशिश करते रहते हैं
बगुलों के पाँखों की सफेदी
ढल गई थी
उनमें सन के फूलों की जो गीली चमक होती थी
वह जाती रही थी
सूरज की किरणें बगुलों के परों से टकरा कर
पहले की तरह चकाचौध नहीं पैदा करती थीं
उनमें जज्ब हो जाती थीं
उनके डैनों की लम्बाई जैसे घट रही थी
या क्या पता उन्हें पूरा खोलने की नौबत ही नहीं थी
यह उनकी लम्बी उड़ानों का जमाना नहीं था
दूरियाँ मानो सिमट आई थीं,
या कि आकाश में उनके लिए
जगह तंग हो गई थी
बगुले अब निस्सीम, निरभ्र आकाश को ताकते भर थे
फेंफड़ों में वे अपनी उतनी ही हवा खींचते थे
जितने में पास खड़े मरियल-से मझौले नीम से उतर कर
तबेले में आ सकें, और फिर वापस तबेले से नीम पर ....
तबेले की छप्परों से सरकंडे खींच
वे नीम पर घोंसले बनाने की कोशिश करते जबकि
कुछ कुनबों ने पास की इमारतों में
भूले-बिसरे छूटी जगहों पर आबाद होना भी शुरू किया था
कूड़ेदानों के आस-पास उनका कलरव चलता रहता
चील-कौवे, कठफोड़वे, मैनाएँ और पंडुक
यह काम पहले ही शुरू कर चुके थे
उनके बच्चे तो पेड़ों को अपना निवास मानते ही नहीं थे
पेड़ों पर रहना, घोंसले बनाना उन्हें असुरक्षित और खतरनाक लगता था
बगुलों और भवनों-अट्टालिकाओं के बीच
अभी तबेले मौजूद थे
जहाँ केवल आहार नहीं, आश्रय भी था -
धूप-हवा और यदा-कदा की बारिश से बचने का ठिकाना
बूढ़े यह समझते थे और यही समझाने की कोशिश करते
कि अभी उनके शरणागत मत होवो
जब तक बन सके इन मत्र्य, नश्वर तबेलों में रहो
पुरखों का कुछ तो मान रहे ....
गजब की बात थी यह
कि बुजुर्ग बगुले अमरत्व और अनश्वरता से
भय खाते थे, बल्कि घृणा करते थे
उन्होंने प्रत्यक्ष देखा था कि कैसे इनसे
सृजन और पल्लवन की संभावना मिटती जाती है
वे अपने चारों तरफ उगी, फैली-पसरी
ठोस और कठोर अमर्त्य संरचनाओं को
जुगुप्सा से देखते थे
और अपने पुरखों के आद्रता-सम्पन्न जीवन
और उनकी दिशा-अन्वेषी उत्तुंग उड़ानों की याद कर
इनके ऊपर या अगल-बगल से उड़ते
यथासंभव, यथाशक्ति इन पर बीट मार कर
अनिर्वचनीय सुख की उपलब्धि करते थे, बल्कि
अपनी संतानों को भी इसके लिए प्रेरित करते थे
बुजुर्ग बगुले जो नहीं जानते थे
वह यह कि तबेले आस-पास उगते
फैलते-पसरते-ऊँचे उठते भवनों-निलयों का ही
विस्तारित हिस्सा थे - उन्हीं की छाया में पलते
उन्हीं पर आश्रित
जिनकी देह से लगी कीलनियाँ गटकते वे जिन्दा थे
उन मवेशियों के दूध पर वहाँ बच्चे पल-बढ़ रहे थे
आसमान जितना भी बचा था उसे अपनी जद में लेने को...
वास्तव में
ताल से तबेले के इस संक्रमण में
बगुलों का समर्पण हो चुका था, पहले ही
- मनुष्य-सभ्यता के समक्ष -
पूरा, सम्पूर्ण समर्पण!
क्या पता बगुले इसे जान रहे हों
मान नहीं रहे हो...
वास्तव में सृष्टि आरम्भ होने के बाद
मनुष्येत्तर जीव की
यह सबसे बड़ी छलांग थी - एक युग से दूसरे युग में,
जो बगुलों ने लगाई थी - अपनी उत्तरजीविता के लिए
- ताल से उठ कर तबेले में गिरना!
- शिवदयाल
(सरस्वती, जनवरी-मार्च 21 तथा ' पहली बार' ब्लॉग में प्रकाशित।)
